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Monday, September 7, 2020

अँधेरे में - निर्मल वर्मा (Andhere Mein by Nirmal Verma )


बीच की तीन पगडंडियों को पार कर बानो आती थी। आते ही पूछती थी, “कुछ पता चला?” मेरा मन झूठ बोलने के लिए मचल उठता। सोचता, कह दूँ-“हाँ, पता चल गया..हम दिल्ली जा रहे हैं।“ लेकिन बानो झूठ ताड़ जाएगी, इसलिए आँखें मूँदे रहता।

बानो मेरे माथे पर हाथ रखती। जब उसका हाथ ठंडा लगता, मैं जान जाता कि अभी बुखार है, जब गरम लगता तो मन उल्लसित हो उठता। आँखें खोलकर पूछता-“कैसा लगता है बानो? और बानो निराश भरे स्वर में कहती, “अभी तो कम है, लेकिन शाम तक जरूर चढ़ जाएगा।” बानो समझती थी कि जब तक बुखार रहेगा, हम उसके संग शिमले में ही रहेंगे- बुखार उतरने लगता, तो उसे निराशा होती। जब कभी बानो की आहट मिल जाती, मैं जान बूझकर पास रखे ठंडे पानी से अपना माथा रगड़ लेता। जब वह आती तो उसका हाथ अपने माथे पर रखकर पूछता, “देखो तो बानो, कितना ठंडा है।“ बानो गुमसुम-सी खिड़की के बाहर देखती रहती।

खिड़की के बाहर नीले जंगल हैं, ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ है, पेड़ों के घने झुरमुट हैं। जब हवा का झोंका परदे को डुलाता हुआ भीतर आता है, दूर दिगंत की एक स्वप्निल-सी खूशबू कमरे में बिखर जाती है।

“इन पहाड़ों के पीछे दिल्ली है, है न बानो?”  मैं पूछता।

बानो ने चुपचाप सिर हिला दिया- उसे दिल्ली की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कभी-कभी मुझे उस पर काफी तरस आता- उस बेचारी ने अब तक दिल्ली नहीं देखी थी। उसके अब्बा का दफ्तर बारहों महीने शिमले रहता  था।

“मैं आज गयी थी-अपने घर,” बानो ने कहा। जिस ‘अपने घर’ का नाम सुनकर मैं सबकुछ भूल जाता था, आज उसके प्रति मेरे मन में कोई उत्सुकता नहीं जगी।

“मेरे अलूचे तुम ले लेना… बानो,” मैं आँखें मूँदे लेटा रहा।

“तुम्हारे गले-सड़े अलूचे कौन खाएगा, जब दिल्ली जाओगे, अपनी पोटली में बाँधकर ले जाना।“ बानो खीजकर बाहर बरामदे में भाग गयी।

मुझे गुस्सा लगा। लेकिन बीमारी में गुस्सा भी टूटा-फूटा आता है, कोई भी भाव अंत तक नहीं पहुँच पाता, बीच रास्ते में ही सूख जाता है। जब रोने को जी करता है, तो रोना नहीं आता, आँखें ही बिफरी-सी रह जाती हैं। जब खुशी होती है, तो दिल तेजी से नहीं धड़कता, केवल होंठ काँपकर रह जाते हैं।

इन दिनों मेरे कमरे में आने से पहले बानो की तलाशी ली जाती थी कि कहीं वह खट्टे अलूचे और कच्ची खूबानियाँ लुक-छिपकर भीतर न ले आए। उसके दुपट्टे के सिरे में नमक-मिर्च की पुड़िया बंधी रहती-बीमारी से पहले अलूचों को उनमें भिगोकर हम चटनी बनाया करते थे।

बानो ने जिसे अभी ‘अपने घर’ कहा था, वह पड़ोस में एक भुतहा मकान था, जो बारहों महीने खाली-उजाड़ पड़ा रहता रहता था। कहते थे, वहाँ एक मेम ने अपने हाथों से अपने को जान से मार लिया था। उस मकान का एक कमरा गुसलखाने में खुलता था- वहीं मैं और बानो अपनी कच्ची-पक्की खूबानियों और अलूचों का खजाना छिपाकर रखते थे। यह एक गुप्त व्यापार था, जिसकी खबर अभी तक किसी तीसरे व्यक्ति के कान में नहीं पड़ी थी।

बानो बाहर बरामदे में देर तक झूला झूलती रही। जब वह झोटा लेकर झूला ऊपर लाती है, उसकी सलवार गुब्बारे-सी फूल जाती है। झूले को ऊपर-नीचे घूमता देखते हुए मेरी आँखें झपकने लगीं। कब आँख लग गयी, याद नहीं आता। सपना आया था। दुपहर को सोते हुए जो सपना आता है, वह मुझे हमेशा याद रहता है। दफ्तर से बाबू के टिफिन लेने के लिए चपरासी आया है। उसने हँसते हुए बताया है कि हम दिल्ली जा रहे हैं। भुतहा मकान के कमरे की खिड़की से बानो मेरे अलूचों को बाहर फेंक रही है, और दूर पहाड़ियों में कालका-शिमला की रेल में वही मेम बैठी है, जिसने आत्महत्या की थी। बानो जो अलूचे बाहर फेंटी है, रेल के डिब्बे से वही मेम खिड़की से हाथ बाहर निकालकर उन्हें पकड़ती जा रही है।

जब मेरी आँख खुली तो बानो कब की जा चुकी थी।

शाम को माँ चाय लेकर आयी, तो मैंने पूछा-“चपरासी आया था?” माँ ने हैरान होकर कहा, “हाँ, आया था, क्यों?” “कुछ कहता था?” मैंने पूछा। माँ ने कहा, “नहीं-क्यों, क्या बात है?” मैं कुछ नहीं बोला और तकिये के सहारे अधलेटा-सा चाय पीने लगा।

माँ ने थर्मामीटर लगाकर देखा, फिर झटक दिया। पहले मैं अपना बुखार पूछ लिया करता था, किन्तु जब देखा कि माँ झूठ बताती हैं, तो पूछना छोड़कर केवल उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश किया करता था। कभी-कभी माँ मेरे गंभीर चेहरे को देखकर कहतीं-“जल्दी ठीक हो जाओ, फिर दिल्ली चलेंगे।“ वह इस निश्छल, हल्के ढंग से कहतीं, मानो ठीक होना मेरे वश की बात है, जैसे मैं जान बूझकर जिद किए हुए बीमार पड़ा हूँ और वह मुझे ठीक होने के लिए फुसला-मना रही हैं। इससे मुझे गुस्सा आता और मैं करवट बदलकर खिड़की की ओर मुँह मोड लेता। किन्तु उन्हें काफी देर तक पता नहीं चला कि मैं गुस्सा किये हूँ। मैं अपने पाँव ऐंठ लेता, दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बंद कर लेता और दांतों को भींचता हुआ जोर-जोर से साँस लेने लगता। माँ जो खिड़की से बाहर देख रही होतीं, एकदम घबरा उठतीं। मेरे चेहरे को देखतीं, फिर एक ठंडी साँस लेकर सिरहाने बैठ जातीं। न जाने मैं कैसे जान लेता कि वह मेरे अभिनय को भांप गयी हैं। किन्तु ऊपर से वह कुछ नहीं बतलातीं… धीरे से आलमारी से कैडबरी चाकलेट निकालकर मेरे तकिये के नीचे रख देतीं। “बाबू को मत बताना,” उन्होंने मेरे बालों को उँगलियों से सहलाते हुए कहा। दूसरे क्षण वह मुझे भूल गयीं। उनकी उँगलियों के अनिश्चित, अर्ध-सोये स्पर्श से मुझे पता चल जाता है कि वह स्वयं मुझसे कोसों दूर खो गयी हैं। चाकलेट जो मुझे दी है, वह मुझे रिझाने को नहीं, बल्कि मुझसे छुटकारा पाने के लिए, जिससे वह बिना किसी विघ्न-बाधा के अपने में सिमटी रह सकें। ऐसे क्षणों में मैं चुपचाप उनकी ओर देखता रहता। वह नहीं जानतीं कि मैं उनकी ओर देख रहा हूँ। उनके चेहरे के बल ढीले पड़ जाते, सब उतार-चढ़ाव मिट जाते और एक शून्य-सी समतलता बिछ जाती। मुझे लगता जैसे उनकी आँखों में सूखी तपिश की  गरमाई-सी फ़ाइल गयी है, किन्तु दूसरे ही क्षण भ्रम होता कि उनमें धुंधला-सा गीलापन है, जो चमक रहा है। मुझे अक्सर यह खुशफहमी होती कि वह मेरी बीमारी के संबंध में सोच रही हैं-हालांकि भीतर-ही-भीतर मुझे मालूम था कि ऐसे क्षणों में उनके ख्यालों से मेरा दूर का भी वास्ता नहीं है।

तब मैंने धीरे-से उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। वह एकदम हड़बड़ाकर चौंक गयीं। मुझे लगा जैसे मैं उन्हें जबर्दस्ती कहीं बहुत दूर से खींच लाया हूँ। वह मुझे कुछ देर तक घूरती रहीं। फिर अचानक मेरे होंठों को चूम लिया। मैंने कमीज की बांह से अपने होंठों को पोंछा, वह मुस्कराने लगीं।

“बच्ची, एक बात पूछूँ?

“क्या?”

“अगर मैं कहीं चली जाऊँ, तो क्या तुम मुझे समझोगे?”

माँ अपलक एकटक मुझे देख रही हैं।

 “क्या मैं भी तुम्हारे संग चलूँगा?”

“न”-उन्होंने सिर हिलाया।

 “बाबू के संग जाओगी?”

“न”

“फिर?” मैं विस्मित-सा उनकी ओर देखता रहा।

वह हँसने लगीं और मेरे संग पलंग पर लेट गयीं।

मैंने अपने गाल उनके गालों से सटा लिए। माँ बहुत खूबसूरत हैं। घर में सब उनसे डरते हैं; मुझे कभी-कभी काफी आश्चर्य होता है कि उनमें कौन-सी ऐसी बात है जो सबको इतना आतंकित किए रहती है। वैसे डर मुझे भी लगता है-उनकी आँखों से, जब वह मेरे पास बैठकर मुझे देखती हैं।

मैं बहुत दिन पहले बाबू के संग उनके एक मित्र के घर गया था। वापिस आते हुए हमें पहाड़ी नाले के संग-संग ऊपर चढ़ना पड़ा था। ऊपर आकर हम पेड़ों के घने अँधेरे झुरमुट के बीच कुछ देर के लिए सुस्ताने खड़े हो गए थे। मैं उस जगह की वीरान चुप्पी से डर गया था।

आज जब कभी मैं माँ की आँखों को देखता हूँ, तो न जाने क्यों मुझे उस रात जंगल के झुरमुट का घना-घना-सा अँधेरा याद आ जाता है।

संगमरमर-सी चिकनी सफेद उनकी बाँहें हैं, जिन्हें मैं शरमाते-शरमाते छूता हूँ। वह अपने बालों को बहुत कसकर बाँधती हैं, इसलिए उनका माथा इतना चौड़ा दिखायी देता है। बालों के बीचोंबीच सीधी मांग है-जिसे देखकर मैं उदास हो जाता हूँ। उनके कान बहुत छोटे-छोटे हैं, गुड़िया के कानों-से-जिन्हें वे अपने बालों के भीतर छिपाये रखती हैं। जब कभी वे मुझसे सटकर लेटती हैं, मैं उनके कानों को बालों के भीतर से निकाल लेता हूँ। मुझे बानो की बात याद आती है, और मेरे सारे शरीर में एक हल्की-सी झुरझुरी फैलने लगती है। “जिनके कान छोटे होते हैं,” बानो ने एक दिन कहा था, “वे लोग बहुत जल्दी मार जाते हैं।“ मैंने यह बात माँ को नहीं बतायी है, सोचता हूँ, जब वह मरने लगेंगी तो कह दूंगा कि वह अपने छोटे-छोटे कानों की वजह से ही मर रही हैं।

कभी-कभी मुझे लगता है कि उन्हें मेरी बीमारी की विशेष चिंता नहीं है। मुझे लगता है कि वह यह भी भूल जातीं हैं कि मैं बीमार हूँ। एक दिन जब मैंने केक खाने की इच्छा प्रकट की, तो उन्होंने बुआ अथवा बाबा की तरह मेरी नाजायज मांग का कोई विरोध नहीं किया। चुपचाप आलमारी से केक का एक टुकड़ा तश्तरी पर रखकर मेरे सामने धर दिया और खुद आँखें मूंदकर कुर्सी पर लेटी रहीं। मुझे कुछ बुरा लगा और केक खाने की मेरी इच्छा उसी क्षण मर गई। मुझे भी था कि कुछ भी कहा लेने से मेरी बीमारी लंबी हो जाएगी, और तब दिल्ली जाने का दिन और भी पीछे टल जाएगा।

मुझे मालूम है-माँ दिल्ली नहीं जाना चाहतीं। इसका कारण मुझे आज भी समझ में नहीं आता, किन्तु एक बार उन्होंने यह बात बीरेन चाचा से कही थी।

कभी-कभी चोरी-चुपके से मैं माँ के कमरे में जाता हूँ। पिछले कुछ महीनों से माँ और बाबू अलग-अलग, अपने-अपने कमरों में सोते हैं। पहले मुझे यह बात कुछ अजीब-सी लगी थी-किन्तु कुछ चीजें हैं, जिन्हें मैं किसी से नहीं पूछता, मन का एक कोना है, जिसमें सबकी आँखों से छिपाकर उन्हें दबा देता हूँ।

माँ का कमरा छज्जे के अंतिम सिरे पर है। मुझे अपने कमरे से उनके कमरे की दो खिड़कियां दिखाई देती हैं-खिड़कियों के बीच दीवार का छोटा-सा टुकड़ा है, जिस पर, पत्तों की जालीदार छाया हर शाम सिमट आती है। कभी-कभी खिड़की का नीला पर्दा उड़कर दीवार से चिपक जाता है, तब पत्तों की जाली दीवार से उठकर परदे पर मँडराने लगती है। खुली खिड़की से माँ का सिर दिखायी देता है। जब वह सिर जरा ऊपर उठाती हैं, तो धूप में उनका जूड़ा सुनहरा-सा होकर चमक उठता है। मैं समझ जाता हूँ, माँ खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी पढ़ रही हैं।

मैं कई बार माँ के कमरे में गया हूँ-सोफ़े पर, उनके पलंग पर तकिये के पास, पलंग के नीचे किताबें बिखरी रहती हैं। माँ को शायद बहुत कम नींद आती है-रात को अनेक बार मैंने उनके कमरे में बत्ती का प्रकाश देखा है। सोचता हूँ, वह इन्हीं किताबों को पढ़ती रहती होंगी।

एक बार मैंने कोई किताब खोली थी, उस पर छोटे-छोटे, टेढ़े-नीले अक्षरों में बीरेन चाचा का नाम लिखा था-मैं मंत्रमुग्ध-सा उन अक्षरों में खो गया था। बाद में वह नाम मैंने माँ के कमरे में रखी अनेक किताबों पर देखा था।

मुझे बीरेन चाचा की छोटी-सी कॉटेज याद आती है, जहाँ एक दिन मैं माँ के संग गया था। एक बड़े कमरे में छत तक किताबें चुनी रखी थीं। हर शेल्फ के नीचे छोटी-छोटी सीढ़ियाँ खड़ी थीं, जिन पर चढ़कर किताबों को उतारना पड़ता था। दूसरे कमरे में टेढ़ी-मेढ़ी बेडौल शक्लों के अजीब चित्र टंगे थे, जिन्हें देखकर मैं स्तंभित-स खड़ा रह गया था। बाबू बताते हैं कि लड़ाई से पहले बीरेन चाचा ने इन चित्रों को यूरोप में खरीदा था। मुझे बीरेन चाचा पर कभी अचंभा होता, कभी दया आती- वह बारहों महीने सर्दी, गर्मी में इस निर्जन, अकेले मकान में कैसे रह पाते होंगे।

बाबू के मित्रों में शायद बीरेन चाचा का स्थान सबसे अलग है। बाबू केवल उनके संग मेरे कमरे में चाय पीते हैं-उनके अन्य मित्र बाहर बैठक में बैठते हैं। जब वह आते हैं, उस शाम मुझे जल्दी सोने के लिए मजबूर नहीं किया जाता- देर तक मेरे कमरे में ही बातचीत होती है। मेरे लिए ये रातें बहुत सुखद होती हैं।

एक शाम बीरेन चाचा जब हमारे घर आए, तो उनकी वेशभूषा देखकर उन्हें एकदम नहीं पहचान सका। घुटनों तक लंबे बूट, कंधे पर खाकी थैला, दूसरे पर कैमरा और सिर पर सोला हैट—इस पोशाक में उनकी छोटी-सी दाढ़ी बड़ी बेमेल और कृत्रिम लग रही है। पैंट की दोनों जेबों में किताबें ठूंस रखी थीं।

वह मेरे पलंग के पास आए और मुझसे हाथ मिलाया। वह मुझसे ऐसे पेश आते हैं, जैसे मैं बीमार हूँ ही नहीं, और न कभी मेरी तबीयत ही पूछते हैं।

माँ पास की कुर्सी पर बैठी बुन रही थीं—एक बार उन्होंने बीरेन चाचा को देखा और फिर सिर झुका लिया।

उन्होंने बताया कि वह एक रात के लिए कुफ़री जा रहे हैं, रेस्ट हाउस में ही ठहरेंगे और अगले दिन शाम तक वापिस लौट आएंगे।

“कहते हैं, रेस्ट हाउस का चौकीदार बड़ा काबिल आदमी है। वह पिछले तीस साल से कुफ़री में रह रहा है-उसे शायद कुफ़री के बारे में बहुत-सी बातें मालूम होंगी,” बीरेन चाचा ने कहा।

माँ के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान सिमट आयी, मानो उनकी आँखों में बीरेन चाचा की बात रत्ती भर मूल्य नहीं रखती।

“इस तरह के इंटरव्यू तुम कितने बरसों से ले रहे हो।“ माँ ने आँखें झुकाए बुनते हुए कहा।

“ओह, तुम्हें विश्वास नहीं होता-लेकिन तुम्हें मेरे नोट्स देखने चाहिए।“ बीरेन चाचा की नीली आँखें चमक उठीं। वह जब कभी अपनी किताब ‘शिमला का इतिहास’ का जिक्र छेड़ते हैं, माँ ऐसे ही हँसती हैं।

“कभी-कभी इस किताब के सिलसिले में खोज करते हुए अजीब चीजें मिल जाती हैं।“

“कैसी चीजें, बीरेन चाचा,” मैं बीरेन चाचा की किताब के बारे में काफी उत्सुकता दिखलाता हूँ। मुझे मालूम है, इससे उन्हें काफी प्रसन्नता होती है।

 “एक बहुत पुरानी फोटो मिली थी-किसी अंग्रेज ने ली होगी।“

“क्या था फोटो में?” इस बार माँ की आँखें सलाइयों से ऊपर उठ जाती हैं।

“रेसकोर्स की भीड़ दिखाई गई है….  बहुत-से लोग भीड़ में खो गए हैं, लेकिन एक अंग्रेज लड़की का चेहरा बिल्कुल साफ दिखता है-वह पवेलियन के पास छाता लिए खड़ी है-जबकि और सब लोगों की आँखें भागते हुए घोड़ों पर जमी हैं… वह गहरी उत्सुक आँखों से पीछे की ओर देख रही है—उसका इस तरह पीछे मुड़कर देखना मुझे काफी अजीब-सा लगा।“

बीरेन चाचा अचानक चुप हो गए-माँ के हाथों में सलाइयाँ चलती-चलती ठहर गयीं।

“फोटो के नीचे लिखा था—“एननडेल, शिमला, 1903… पचास साल गुजर गए और वह वैसे ही छाता लिए पीछे मुड़कर देख रही है..।“

बीरेन चाचा धीरे-से हँसने लगे, मानो उन्हें अपनी बात काफी बेतुकी-सी जान पड़ी हो। माँ गुमसुम-सी उनकी ओर देख रही हैं और मुझे आश्चर्य होता है कि बीरेन चाचा कभी-कभी इस प्रकार की अर्थहीन-सी बातें क्यों करते हैं।

“कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि लोगों की अपेक्षा शहरों की कहानी लिखना बहुत कठिन है—मेरे पास शिमला के बारे में इतने पुराने फोटो नोट्स, किताबें, टूरिस्टों के यात्रा-लेख जमा हैं, किन्तु मुझे लगता है कि मैं किताब शायद कभी नहीं लिख पाऊँगा।“

 “क्यों?” माँ ने पूछा।

“शहर… हर शहर—अपने में हमेशा इतना चुप जो रहता है।“ बीरेन चाचा उठ खड़े हुए—धीरे से उन्होंने मेरा माथा छुआ।

“रास्ते में डॉक्टर मिले थे-कहते थे, दो-चार दिनों में तुम घूमने-फिरने लगोगे।“ उन्होंने तनिक झुककर मुझसे कहा।

“जरा बैठ जाओ-देखूँ, तुम्हारा फोटो कैसा आता है!“ उन्होंने अपने कंधे से कैमरा उतार लिया। मेरा फोटो लेने के बाद वह अपनी छड़ी उठाकर जाने लगे।

 “कब वापिस लौटोगे?” माँ ने पहली बार सीधे उनकी ओर देखा।

“शायद कल शाम तक-कुछ देर के लिए आऊँगा,” बीरेन चाचा जब माँ की ओर देखते हैं, तो उनकी आँखें चौंधिया-सी जाती हैं-और वह अपना मुँह दूसरी ओर मोड़ लेते हैं।

 “बीरेन चाचा…” मैं बुरी तरह शरमा रहा हूँ।

 “क्या बच्ची?” उन्होंने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

 “एक फोटो मैं खींचूँगा।“

बीरेन चाचा ने मुस्कराकर कैमरा मेरे हाथों में थमा दिया।

मैं माँ की ओर देखता हूँ।

 “नहीं बच्ची, मेरी नहीं…” माँ एकदम झुँझला-सी उठती हैं।

 “सिर्फ तुम नहीं… बीरेन चाचा भी रहेंगे।“ मैंने कहा। बीरेन चाचा का चेहरा क्षण-भर के लिए म्लान-सा हो उठा-वह माँ की ओर देखते हैं। माँ ने इस बार विरोध नहीं किया, वह कुर्सी से उठ खड़ी हुईं, “बच्ची, तुम बहुत जिद्दी हो,” उन्होंने कहा।

“बीरेन चाचा, तुम जंगले के पास खड़े हो जाओ, वहाँ धूप आ रही है, और माँ, तुम उधर दायीं तरफ।“ मैं पलंग से उतरकर दीवार के सहारे खड़ा हो गया हूँ। मेरा सिर चकरा रहा है, लेकिन फोटो ठीक आता है। आज भी वह फोटो मेरे पास है..।

कमरे में शाम का धुंधलका कब चुपके-से घिर आया, पता नहीं चला। बीरेन चाचा बहुत पहले जा चुके थे। माँ मेरे पलंग के पास कुर्सी पर बैठी हैं-जब से बीरेन चाचा गए हैं, तब से वह वैसे ही चुपचाप बिना हिले-डुले उस कुर्सी पर अधलेटी-सी पड़ी हैं। मैं बत्ती नहीं जलाता, मुझे कमरे में अँधेरे का धीरे-धीरे आना अच्छा लगता है।

मेरी आँखों के सामने बहुत दिन पहले की एक शाम घूम जाती है-तब मैं बीमार नहीं पड़ा था। माँ उस शाम मुझे बीरेन चाचा के घर ले गयीं थीं।

हमें देखकर बीरेन चाचा हैरान-से हो गए थे। फाटक खोलकर वह माँ के सामने ठिठक गए।

“पोनों, तुम… “ एक क्षण के लिए वह खोए-से खड़े रहे। पहली बार उन्होंने मेरे सामने माँ को उनके नाम से पुकारा था। उनके मुँह से माँ का नाम सुनकर मुझे बहुत अजीब-सा लगा था। माँ हँसने लगीं और न जाने क्यों मुझे माँ की वह हँसी अच्छी नहीं लगी-एक घुटा-घुटा-सा डर मेरे मन में समा गया।

“यूँ ही सैर को निकले थे, सोचा तुमसे मिलते चलें,” माँ ने कहा। पहली बार मैंने माँ को झूठ बोलते देखा था।

बीरेन चाचा की नीली आँखों में हल्का-सा विस्मय घिर आया। उन्होंने मेरी उँगली पकड़ी और चुपचाप कॉटेज के भीतर चले आए।

वहीं मैंने पहली बार उनकी लाइब्रेरी देखी थी। उन्होंने मुझे अपनी अलबमों में शिमले की पहाड़ियों, घाटियों और झरनों के फोटो दिखलाये, जो उन्होंने अपनी किताब के लिए जमा किए थे। मेज पर ढेर-सी किताबों के पास हल्के रंग की शेड से ढँका टेबिल-लैम्प जल रहा था। उन्होंने जब दो चाकलेटें मुझे दीं, तो मैं कुछ हैरान-सा हो गया। उन्होंने हँसते हुए कहा-“मेरे पास बहुत-सी रखी हैं, बर्फ के दिनों में बाहर जाना नहीं होता, इसलिए जमा कर रखता हूँ।“ मैं क्षण-भर उन्हें देखता रह जाता हूँ। बीरेन चाचा बाबू से कितने लग हैं—उनमें वह तनाव, बोझिल गंभीरता अथवा भारीपन नहीं है, जो मैं बाबू में देखता हूँ। हर चीज पर उनका स्पर्श एक स्निग्ध कोमलता लिए रहता है। उनकी छोटी-सी दाढ़ी के ऊपर जो आँखें हैं, उन्हें देखकर मुझे हमेशा लगता है, जैसे वह धीमे-धीमे कुछ कह रहीं हों, मानो जिस वस्तु पर वे टिक जायेंगी, वह अपने आप सँवर-निखर जायेगी।

 “तुमने कभी बहुत पास से किसी पहाड़ी की चोटी पर बर्फ देखी है?” उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने सिर हिल दिया।

“वहाँ से बर्फ का रंग बिल्कुल नीला दिखता है। मैंने एक कलर्ड फोटो लिया है…” वह उस फोटो को लाने के लिए दूसरे कमरे में चले गए। मैं मेज पर रखी अलबमों को उलटने-पलटने लगा। हर फोटो में शिमले का कोई-न-कोई दृश्य था: ग्लैन, जाखू ,चैटविक फॉल। मैंने इन सब स्थानों को आसानी से पहचान लिया। कुछ देर बाद जब बीरेन चाचा नहीं आये, तो मैं ऊब गया। पास किताबों के शेल्फ पर एक छोटा-सा अलबम कोने में रखा था, मैंने उसे खोला और खोलते ही एक क्षण के लिए मुझे लगा-यह चेहरा मैंने कहीं देखा है, किन्तु दूसरे ही क्षण मेरी आँखें स्तब्ध-सी स्थिर हो गयीं। फोटो माँ का था।

क्या माँ कभी ऐसी थीं? मेरे भीतर कहीं एक गहरा-सा साँस उखड़ आया। वही चौड़ा-सा माथा, किन्तु उस पर छोटी-सी बिंदी लगी थी, जो माँ अब नहीं लगातीं, दोनों चोटियाँ कंधे के नीचे लटक रही थीं, पूरे स्लीव का स्वेटर पहन रखा था और बालों के भीतर वही छोटे-छोटे कान छिपे थे। सहसा मुझे आभास हुआ कि इस चेहरे में कुछ ऐसा है, जिसका मुझसे कोई संबंध नहीं, बाबू से कोई संबंध नहीं।

फोटो माँ का था, लेकिन उसमें माँ कहाँ थीं?

अचानक मुझे बीरेन चाचा के पैरों की आहट सुनाई दी। न जाने मेरे भीतर क्या चोर छिपा था कि मैंने डरकर झटपट वह अलबम किताबों में छिपा दी।

जब हम वापिस लॉन में आए तो हल्का, फीका-फीका-सा अँधेरा छाने लगा था। माँ शॉल में दुबकी हुई पत्थर की बेंच पर बैठी थीं।

“इतनी देर कहाँ लगा दी?” उन्होंने मुझे खींचकर अपने से सटा लिया। बीरेन चाचा माँ के पैरों के निकट घास पर बैठ गए। मेरी आँखें माँ के चेहरे पर टिकी रहीं, मानो मैं कुछ खोज रहा हूँ, माँ की आँखें, मुँह, माथा हर चीज अलग-अलग देखो तो वैसी ही थीं, किन्तु आपस में मिलकर जो भाव बनता था, वह उस चेहरे से बिल्कुल अलग था, जो मैंने अभी कुछ देर पहले बीरेन चाचा की अलबम में देखा था।

जो अंतर है-उसे समझा नहीं सकता, उस पर उँगली नहीं रख पाता… वह कैसा भाव था जो किसी लंबी दूरी को हमारे पास ले आता है, लेकिन अपने को दूर ही रहने देता है।

“बच्ची क्या बात है-?” माँ मेरे बालों को धीरे-धीरे अपनी उँगलियों में उलझाने लगीं।

मैंने सिटपिटाकर मुँह फेर लिया।

माँ ने आगे कुछ नहीं पूछा। हम तीनों इसी तरह अपने-अपने में सिमटे चुप बैठे रहे। जब से हम आए थे, बीरेन चाचा ने माँ से कोई बात नहीं की थी। मुझे शुरू-शुरू में कुछ आश्चर्य-सा हुआ था, किन्तु मैंने उस पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

लॉन पर नीला-नीला-सा अँधेरा घिर आया। दूर पहाड़ियों के बीच छोटे-छोटे जुगनुओं-सी बत्तियाँ बिखरी थीं-और अँधेरे में पहाड़ियों के छिप जाने से लगता था कि आकाश बहुत नीचे सरक आया है, कभी-कभी तो पता भी नहीं चलता कि तारों और बत्तियों में कौन-सी बत्तियाँ और कौन-से तारे हैं।

बीमारी के दिनों में मुझे अक्सर वह शाम याद आ जाती है-हालाँकि उस शाम कोई भी ऐसी बात नहीं हुई थी, जिसे याद रखा जाता। जब हम वापिस लौटने लगे, तो बीरेन चाचा कुछ दूर हमारे संग आए थे। फिर माँ के कहने पर कि हम खुद चले जाएँगे, वापिस मुड़ गए थे। मैं और माँ कुछ देर ऊपर की सड़क पर चुपचाप चढ़ते रहे। मैं तेज कदमों से माँ के आगे-आगे चल रहा था। कुछ दूर चलने के बाद सहसा मेरे पाँव ठिठक गये। मुझे लगा, माँ मेरे पीछे नहीं आ रही हैं। मैं वापिस मुड़कर पीछे की ओर चलने लगा। अँधेरे में मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

कुछ दूर नीचे उतरकर अचानक मेरे पाँव रुक गए-मैं अँधेरे में आँखें फाड़ता हुआ हतबुद्धि-सा खड़ा रहा। माँ सड़क के मोड़ पर खड़ी थीं, किनारे पर लगी तार पर झुकी हुई-उनकी साड़ी का आँचल हवा से उड़कर कंधे पर आ गिरा था-अपने में बिल्कुल खोयी-सी वह अपलक नीचे देख रही थीं…

उतराई के नीचे थी—बीरेन चाचा की कॉटेज, जो शाम के धुंधलके में बिल्कुल सूनी और निर्जन दिखाई दे रही थी। लाइब्रेरी की खिड़की से आती हुई मद्धिम-सी प्रकाश-रेखा में लॉन की घास झिलमिला रही थी।

कुछ देर तक शाम के झुटपुटे में हम बिल्कुल खामोश खड़े रहे, फिर माँ अचानक आगे मुड़कर चलने लगीं-उनकी चाल इतनी धीमी थी कि एक क्षण मुझे लगा, मानो वह सोते हुए चल रही हों।

वह मेरे पास आ गयीं-आँखें ऊपर उठाकर एक लंबे क्षण तक अपनी आकुल, विवश निगाहों से मुझे निहारती रहीं, फिर झपटकर उन्होंने मुझे अपने पास घसीट लिया और बार-बार अपने ठंडे, सूखे होंठों से मुझे चूमने लगीं।

कुछ दिनों बाद एक सुबह मुझे अपने मुँह का स्वाद कुछ अच्छा-सा लगा। अंगों में एक हल्की-सी स्फूर्ति का आभास हुआ। पहले मैं धूप से बचने के लिए खिड़की बंद किए रहता था, अँधेरे कमरे में आँखें मूंदकर लेटना भला लगता था। अब मैंने खिड़की खोलकर परदों को उठा दिया। बाहर की गर्म, ऊनी धूप मेरे पलंग को चारों ओर से घेर लेती है। मैं बिस्तर से उतरकर मेज के सहारे खड़ा हो जाता हूँ। सिर पहले की तरह नहीं चकराता, मैं पायदान की ओर कुछ कदम बढ़ाता हूँ और मुझे लगता है, मानो मैंने ज़िंदगी में पहली बार अपने आप चलना सीखा हो।

मैं चुपके से बाहर बरामदे में आ जाता हूँ। कुछ दूर पर बुआ गीली धोती काठ के जंगले पर सुखा रही हैं-मैं उनकी आँख बचाकर बाबू के कमरे के पीछेवाले छज्जे पर चला जाता हूँ। कमरे के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद हैं, भीतर के लाल परदे नीचे गिरे हुए हैं। जब माँ मौसी के घर चली जाती हैं, तो बाबू उस कमरे को बंद कर देते हैं। अपनी सारी चीजें ऊपर छत पर ‘स्टडी’ में ले जाते हैं और रात को वहीं सोते हैं।

छज्जा निपट सूना है। नीचे ‘आउट हाउस’ के क्वॉर्टरों की छतों के चौड़े नीले टिन के पटरों पर बड़ियाँ चमक रही हैं, जो पहाड़ी खानसामा की औरत हीरा ने सुखाने रख छोड़ी है। सामने मदरसे के छोटे-से मैदान में लड़के बस्ता घुमाते हुए चार-चार की पाँत में खड़े नकियाते अलसाये स्वर में प्रार्थना कर रहे हैं-“लब पे आयी है दुआ बनके तमन्ना तेरी।“

उनकी तीखी-रूखी आवाज को सुनकर जब मैं ऊब जाता हूँ, तो मेरी आँखें खड्ड के ऊपर मेम के उस रहस्यमय बंगले पर टिक जाती है, जहाँ हम कच्चे अलूचे छिपाकर रखते थे। उससे जरा दूर पेड़ों और झाड़ियों से घिरी हुई एक पगडंडी साँप की तरह बलखाती हुई बानो के मकान के ऊबड़-खाबड़ अहाते में जाकर गुम हो गयी है। मैं अपने कमरे से बाबू की पुरानी छड़ी ले आता हूँ, जिसके सिरे पर मैंने माँ की लाल साड़ी का चिथड़ा बाँध रखा है। मैं जंगले से बाहर गर्दन निकालकर छड़ी को हवा में दायें-बायें घुमाता हूँ-लाल रेशम की झंडी हवा में फरफराती है। बानो ने मेरी लाल झंडी को देख लिया है-उसने हाथ उठाकर कुछ कहा है, जिसे मैं कुछ भी सुन-समझ नहीं पाता। यह मेरा और बानो का पुराना और प्रिय खेल है। हमारे और उसके मकान के बीच ढलान पर कई कोठियाँ और दुकानें हैं, किन्तु ऊँचाई पर होने के कारण हम एक-दूसरे को छज्जे से देख पाते हैं-हालाँकि हम चाहे कितना भी चिल्लाकर क्यों न बोलें, एक दूसरे की बात नहीं सुन पाते। इसलिए इशारों से बात करने के लिए मैं बाबू की छड़ी से सिगनल का उपयोग करता हूँ।

बानो अपनी अम्मी को भीतर से बरामदे में खींच लायी है-अम्मी ने हाथ उठाकर मुझे बुलाया है। अम्मी मुझे इतनी दूर से नहीं देख पातीं, फिर भी मैं शरमा जाता हूँ और छड़ी को बरामदे में फेंककर अपने कमरे में भाग आता हूँ।

कमरे की देहरी पर सहसा मेरे पाँव ठिठक गये-बाबू का स्वर सुनाई दिया। नौकर ने आकर बताया कि बाबू अपने कमरे में मुझे बुलाते हैं।

मेरे दिल में खुशी की लहर-सी दौड़ गयी। ऐसा बहुत कम होता है कि बाबू मुझे अपने कमरे में बुलाकर मुझसे बातें करें-अक्सर वह हाल-चाल पूछने मेरे कमरे में ही आ जाते हैं। मैं झटपट अपने नाखून दांतों से काट लेता हूँ, क्योंकि बाबू हमेशा सबसे पहले मेरे दोनों हाथों को देखते हैं। आँखों को गीले तौलिए से पोंछ लेता हूँ और हाथों को मुँह पर रखकर फूँक मारता हूँ, और फिर उन्हें सूँघता हूँ-यह देखने के लिए कि मुँह साफ है या नहीं। फिर शीशे में मुँह देखकर कंघी करता हूँ (माँ के न होने से पिछले कुछ दिनों से मुझे ये सब काम खुद करने पड़ते हैं) और जब कंघे से अपने बालों को झरता हुआ देखता हूँ, तो न जाने क्यों मुझे अपने ऊपर गहरी-सी दया आने लगती है, और मेरी आँखों में आँसू भर आते हैं।

ड्राइंग रूम (जिसे उन दिनों हम हॉल कहते हैं-क्योंकि वह हमारे घर का सबसे बड़ा कमरा था) के कालीन पर पैरों की आहट नहीं होती, फिर भी मैं बहुत हौले-हौले दबे पाँवों से बाबू के कमरे की ओर जाता हूँ। सुबह मैं ठीक था, किन्तु अब सिर चकराता है, मानो कनपटियों से धुएं की दो लकीरें ऊपर उठती हुई सिर के बीचोंबीच मिलने की चेष्टा कर रही हों और बीच में रुई का एक घुटा-घुटा-सा बादल इन दोनों के बीच आकर अड़ गया हो।

मैं उनके कमरे की देहरी पर खड़ा हूँ-परदों के रिंग हाथ लगाने से धीरे-धीरे बजते हैं। वह बिना मेरी ओर देखे मुझे भीतर बुलाते हैं। मैं और आगे खिसक आता हूँ। बाबू के कमरे को पहचानना कितना आसान है-सिगार के धुएं की गर्म-गर्म-सी गंध, चारों ओर फैली गहरी बोझिल-सी चुप्पी, एक अजीब धुंधली-सी रोशनी, जो दिन और रात दोनों समय एक-सी रहती है। और एक खट्टी और भीनी-सी बू, जो मेरी दवा की बू से मिलती हुई भी कहीं दूर जाकर उससे अलग हो जाती है। उसके बारे में मैं कभी तय नहीं कर पाता कि वह मुझे अच्छी लगती है या बुरी-लगता है, वह बू नहीं है, महज एक हल्का-सा रंग है, जो बाबू के कमरे की हवा में तिरता रहता है।

“बाहर क्या कर रहे थे!” मैं उनकी आवाज पहचानता हूँ-उसमें गुस्सा नहीं है।

“बानो को देख रहा था—“ और मैं सकुचाकर चुप हो जाता हूँ।

“बाबू.. “

उनकी आँखें ऊपर उठ आयीं।

“आज मैं ठीक हूँ… बुखार नहीं है।“

बाबू ने मेरे दोनों हाथों को अपनी गोद में रख लिया। “अभी कुछ दिन तुम्हें बिस्तर पर लेटना होगा…” उन्होंने मेरे हाथों को एक दूसरे के ऊपर रख दिया, और उन्हें अपने खुरदरे बालों से भरे हाथों में समेट लिया।

“बाबू-हम दिल्ली कब जा रहे हैं?” जब कभी मुझे उनसे बात करने का मौका मिलता है, मैं हर बार उनसे यह प्रश्न करता हूँ।

उन्होंने सिगार को मुँह से निकालकर अंगुलियों में थाम लिया। वह कुछ देर तक चुपचाप दीवार के बेल-बूटोंवाले कागज को देखते रहे, मानो उस पर कुछ लिखा है, जिसे वह बड़े गौर से पढ़ रहे हों।

“बच्ची, तुम्हें डर तो नहीं लगता?”

“डर?” मैं विस्मित-सा होकर उनकी ओर देखने लगा। उनकी आँखें दीवार से उतरकर मुझ पर टिक गयीं।

“माँ घर में नहीं हैं… शायद इसलिए…”

“लेकिन वह तो कुछ दिनों में आ जायेंगी?” मैं चाहता था कि बाबू मेरी बात का समर्थन करें, किन्तु वह चुपचाप मेरी ओर देखते रहे।

“हाँ-वह आयेंगी,” बाबू का स्वर इतना धीमा, इतना सोया-सा था मानो वह यह बात मुझसे न कहकर अपने से कह रहे हों।

“बच्ची.?”

“क्या बाबू?”

“तुम क्या उन्हें देखना चाहोगे?”

बाबू का स्वर एकदम भारी-सा हो आया। उनका यह प्रश्न मुझे काफी  विचित्र और निरर्थक-सा लगा था-सोचा, कह दूँ, हाँ… उनके पास जाऊँगा; और दूसरे ही क्षण मुझे लगा कि बाबू मुझसे इस उत्तर की आशा नहीं कर रहे हैं, जैसे वह सच जानते हुए भी जान-बूझकर मुझसे झूठ कहलवाना चाह रहे हों।

मैंने ‘नहीं’ में सिर हिला दिया। हैरत-भरी दृष्टि से वह मुझे देखते रहे-फिर धीरे-से उन्होंने मेरे हाथों को अपनी गोद से हटा दिया।

“अच्छा, अब अपने कमरे में जाओ-अभी दो-तीन दिन तक बाहर खेलने मत जाना।“

वह कुर्सी से उठ खड़े हुए और मेरी ओर से मुँह मोड़कर खिड़की से बाहर देखने लगे।

कुछ देर तक मैं वहाँ चुपचाप खड़ा रहा। मेरे मन में अचानक बाबू के प्रति भीगी-भीगी-सी सहानुभूति उमड़ने लगी। माँ के संग मेरा संबंध अधिक सहज और सीधा था। बाबू के संग जो संकोच और तनाव रहता है, वह माँ के संग बिल्कुल नहीं है। वह कोई भी प्रतिवाद किए बिना मेरी हर फरमायश को चुपचाप मान लेती हैं-किन्तु इतना सब करने पर भी वह मुझसे हमेशा दूर रहती हैं, कभी न मिटनेवाला एक अलगाव बनाये रखती हैं। उनके सामने मुझे लगता है कि मैं एक बहुत ही छोटा, बेडौल और निरर्थक-सा प्राणी बन गया हूँ। किन्तु बाबू की बात दूसरी है। मैं उनसे डरता हूँ, कोई भी फरमायश करते समय मेरा दिल धड़कने लगता है, कभी खुलकर उनसे मैंने अपने मन की बात नहीं की-इसके बावजूद वह मुझे अपने अधिक निकट और जाने-पहचाने लगते हैं। कुछ ऐसा है, जो हम दोनों को माँ से अलग कर देता है, इसलिए माँ को चाहते हुए भी उनपर कभी सहानुभूति नहीं होती और बाबू से डरते हुए भी उन्हें देखकर कभी-कभी मेरे भीतर कुछ रूआँसा हो जाता है।

बाबू ने पीछे मुड़कर मुझे देखा और एकटक देखते रहे। मुझे लगा जैसे वह कुछ देर के लिए मेरी उपस्थिति बिल्कुल भूल गए थे और अब सहसा मुझे अपने सम्मुख देखकर समझ न पा रहे हों कि मैं कौन हूँ, उनके कमरे में कैसे खड़ा हूँ।

मैं कमरे से बाहर चला आया। कुछ देर तक बड़े कमरे की दीवार से सटकर बाबू के कमरे की देहरी पर खड़ा रहा। सोचा था, बाबू बाहर आकर मुझसे कुछ कहेंगे, किन्तु यह मेरा भ्रम था। उनके कमरे में सिर्फ सन्नाटा था-एक घना गहरा-सा सन्नाटा जो हमारे सारे घर पर घिर आया था।

और तब उस क्षण मुझे लगा कि मैं बहुत अकेला हूँ, बाबू भी अपने में बहुत अकेले हैं। माँ के बिना हर कमरा साँय-साँय-सा करता प्रतीत होता है।

मैं दीवार से सटकर आँखें मूँद लेता हूँ।

जिस दिन माँ मौसी के घर मुझसे मिले बिना चली गयीं, उससे एक दिन पहले आधी रात को मेरी आँख खुल गयी थी।

कमरे में अँधेरा था। हवा से खिड़की का परदा मेरे तकिये के ऊपर जोर-जोर से फड़फड़ा उठता था। कुछ देर तक मेरे मन में अजीब-सा भ्रम मंडराता रहा। मुझे लगा कि इस कमरे में-जहाँ मैं लेटा हूँ-हर चीज अपने पुराने स्थान को छोड़कर नए कोनों में उठ आयी है। मुझे लगा कि जो खिड़की मेरे बायीं ओर होती थी, वह अँधेरे में चुपचाप खिसककर बिल्कुल मेरे सामने आ गयी है। मेरे पलंग से दो गज की दूरी पर जहाँ पहले दीवार थी, वहाँ दरवाजा सिमट आया है। दरवाजा आधा खुला हुआ था। उसके भीतर से बाबू के कमरे की रोशनी थर्मामीटर की तरह चमकती हुई पारे की रेखा-सी फर्श पर खिंच आयी थी-इतनी महीन, इतनी म्लान मानो हाथ से छूते ही टूट जायेगी, चारों ओर पानी-सी बिखर जायेगी।

अचानक वह दरवाजा दोनों बड़े-बड़े काले पंखों-सा फड़फड़ाता हुआ खुल गया, प्रकाश की पतली-सी रेखा फर्श पर तेजी से लपकती हुई सामने की दीवार पर चढ़ गयी। दरवाजे के पीछे छोटे-से गलियारे में कोई जोर-जोर से हाँफ रहा था। पहले क्षण मुझे लगा कि दरवाजा हवा के झोंके से खुल गया है-किन्तु माँ उसे बंद करने आयी हैं। किन्तु कुछ देर तक कोई भीतर नहीं आया। दरवाजे के पीछे गलियारे में उखड़ी हुई साँसों का एक हल्का-सा बवंडर उठता था और फिर दब जाता था। कुछ सहमे हुए शब्द सुनाई देते थे-कभी दूर से-इतने दूर से कि शब्दों के बजाय आहट ही मुझ तक पहुँच पाती थी, कभी पास से, इतने पास से मानो कोई मेरे कानों में फुसफुसा रहा हो।

“नहीं, तुम भीतर नहीं जाओगी,” मैंने बाबूजी का स्वर पहचान लिया।

एक पतली-सी चीख चमकीले कांच के टुकड़ों-सी अँधेरे को छील गयी। माँ को क्या हो गया है? वह इस अजीब ढंग से चीख क्यों रही हैं?

“छोड़ो… मेरा हाथ छोड़ दो।“

“पोनो…. तुम भीतर नहीं जाओगी।“

“कौन हो तुम मुझे रोकनेवाले-छि:, शर्म नहीं आती?”

“पोनो … वह सो रहा है… इस तरह मत चिल्लाओ।“

“मैं चिल्लाऊँगी नहीं, मुझे भीतर जाने दो।“

“नहीं… इस वक्त नहीं।“

“तुम समझते हो, मैं पागल हूँ… उसे सबकुछ बता दूँगी?”

“पोनो… अपने कमरे में चलो… यहाँ मैं कुछ नहीं सुनूँगा। इस वक्त तुम होश में नहीं हो।“

किन्तु बाबू अपनी बात पूरी नहीं कह पाए-बीच में ही किसी ने झपटकर परदा हटा दिया-गलियारे की रोशनी में मेरा बिस्तर चमक उठा, पलंग और खिड़की के बीच की दीवार अँधेरे से बाहर निकल आयी।

मैंने देखा-संगमरमर-सी सफेद दो बाँहें परदे के बाहर हवा में फैली है। पीछे एक छाया है, भूखी, फटी-फटी-सी दो आँखें हैं… परदे को नोचती हुई लंबी-पतली काँपती अँगुलियाँ हैं और बिजली में चमचमाती नाक की लौंग, जो बार-बार फड़फड़ाते होंठों के ऊपर तारे-सी टिकी है… यह सबकुछ मैंने एक छोटे-से क्षण में देखा था-दूसरे क्षण मुझे लगा मानो परदा अपनी जगह वापिस खींच लिया गया है, सिर्फ एक भर्रायी-सी आवाज सुनायी दे जाती है, जो ऊपर उठने से पहले ही दबा दी जाती है, मानो किसी ने अपने हाथ से उसे भींच रखा हो।

तब जो मैंने सुना, उस पर एकाएक विश्वास नहीं हो पाया। मुझे लगा परदे के पीछे कोई धीरे-धीरे हँस रहा है। नहीं, यह माँ नहीं हो सकती। माँ को जब कभी फिट आता है, तब केवल उनके दाँत कटकटाते हैं। मैंने उन्हें इतने विचित्र ढंग से हँसते हुए कभी नहीं सुना। फिर भी मैं जानता था कि यह माँ की ही आवाज है-मैं आगे कुछ भी नहीं सुन पाता-लगता है मानो कमरे का अँधेरा कमरे से अलग होकर एक मैले चीथड़े की तरह मेरी आँखों के चारों ओर घूम रहा है। संगमरमर-सी सफेद दो बाँहें काली झील से ऊपर उठी हैं-कातर-सी होकर मुझे बुलाती हैं-बार-बार अपनी ओर खींचती हैं।

उस रात देर तक मैं बिस्तर पर बैठा-बैठा काँपता रहा। एक अजीब-सी आवाज हवा के संग खिड़की से भीतर आती थी और मेरे चेहरे को छूती-सहलाती धीरे-धीरे हँसने लगती थी।

बानो टैरेस के नीचे गिरी हुई खूबानियाँ बीन रही है।

बानो…

मैं हौले से कहता हूँ… बानो।

शिमले की एक दुपहर-जब मैं टैरेस पर लेटा हूँ-बीमारी के बाद के दिन हैं, जब हमें कोई नहीं पूछता। सब निश्चिंत से हो गए हैं, बाबू अब मेरे कमरे में हर शाम नहीं आते, बीरेन चाचा एक लंबे अर्से से दिखायी नहीं दिये। मेरे ठीक होने पर अगर दुख है तो शायद बानो को-मैं अगर बीमार बना रहता, तो दिल्ली जाने के दिन टलते रहते।

टैरेस के पीछे दो छोटी-छोटी पहाड़ियाँ खुली हुई कैंची की तरह आकाश की ओर उठी है-उनके बीच पेड़ों की लंबी शृंखला दूर तक चली गयी है। जब कभी कालका जानेवाली ट्रेन वहाँ से गुजरती है, तो धुएँ की एक लट आकाश के चेहरे पर उड़ जाती है।

बानो… हम दिल्ली जा रहे हैं।

दिल्ली ! इस एक शब्द में कितनी स्मृतियाँ छिपी हैं-शिमला-कालका की साँप-सी बलखाती टेढ़ी-मेढ़ी लाइन, लंबी-लंबी अँधेरी सुरंगे और रेल के डिब्बे की खिड़की से बाहर हवा में फिसलते तारे… शाम हो जाती और मैं ऊँघ जाता। माँ कन्धा झकझोरकर जगातीं, “बच्ची, उठो !” मैं हड़बड़ाकर बैठता। बाहर अँधेरे मैदान में दूर-दूर तक कालका की झिलमिल-झिलमिल-सी रोशनियों को देखकर लगता मानो ढेर से तारे आकाश से उतरकर जमीन पर बिखर गए हों।

बानो सीढ़ियाँ चढ़कर कब टैरेस पर आ गयी, मुझे पता नहीं लगा। उसने अपनी फ्रॉक को उठाकर झोला बना लिया है, जिसमें ठसाठस खूबानियाँ भरी हैं। नंगे पेट के चारों ओर जाँघिये के नेफे के निशान जहाँ-तहाँ छोटी-छोटी मछलियों से उभर आए हैं।

वह फ्रॉक नीची करके खूबानियाँ बिखेर देती है-कच्ची, पक्की खूबानियाँ हैं, हरी, पीली, कुछ-कुछ लाल…

“लो खाओ।“ वह एक पकी हुई पीले रंग की खूबानी मेरे आगे कर देती है।

मैंने सिर हिला दिया। बाबू ने बाहर की कोई भी चीज खाने से मना किया है।

“यह कच्ची नहीं है, इससे कुछ नहीं होगा,” किन्तु उसने मेरी स्वीकृति की प्रतीक्षा नहीं की और जो खूबानी वह मुझे दे रही थी, उसे निश्चिंत होकर खुद खाने लगी।

खाने को खूबानी खा लेता, बाबू का तो बहाना है। असली कारण दूसरा है, जो कोई नहीं जानता, बानो बेचारी तो बिल्कुल नहीं जानती। जब से बुखार उतरा है, मुझे लगता है, जैसे मैं सब लोगों से भिन्न हूँ, अलग हूँ। कमजोरी के कारण जब कभी सिर चकराता है, पाँव काँपते हैं तो अच्छा लगता है, मन में अजीब-सी खुशी होती है, अपने पर गर्व होता है, लगता है, मुझमें एक अद्भुत परिवर्तन हो गया है और मैं असाधारण हूँ। पहले-बीमारी से पहले, माँ के मौसी के घर जाने से पहले-मेरा अपना घेरा था, जिसमें बानो और माँ, बीरेन चाचा और बाबू सब कोई थी। न मालूम, बीमारी के इस लंबे अर्से में कौन-सा क्षण आया था, जब यह घेरा टूट गया था। पिछले कुछ दिनों से मैं जिस चीज को जैसे देखता हूँ, वैसे शायद कोई नहीं देखता। पहले मैं हर चीज को दूसरों की आँखों से देखता था-और निश्चिंतता थी। अब उनके पीछे एक रहस्य है, डर है, जो मेरा अपना है, और जिसे कोई नहीं जानता।

टैरेस के पास पवेलियन की छत पर खटखटाहट होती है। लगता है जैसे टपाटप बूंदें गिर रही हों। मैं जँगले के बाहर हाथ निकालकर देखता हूँ-बारिश नहीं है, केवल कुछ पहाड़ी चिड़ियाँ हैं, जो छत पर एक कोने से दूसरे कोने तक फुदक-फुदककर उड़ती हैं।

बानो खूबानी को गाल के भीतर लट्टू की तरह घुमाती है-उसका कहना है कि इस तरह मुँह का सारा थूक खूबानी के भीतर जाकर रस बन जाता है।

“दिल्ली जाना पक्का हो गया?”

“माँ आ जायें, तब !”

“कहाँ गयी हैं तुम्हारी माँ?”

“मौसी के घर।“

“तुम्हें पक्का मालूम है कि वह मौसी के घर गयी हैं?” बानो ने रहस्य-भरी आँखों से मेरी ओर देखा।

मैं विस्मय से बानो की ओर देखता हूँ-“क्या बात है बानो?”

“कुछ नहीं, ऐसे ही पूछा था,” बानो ने थूक में भीगी खूबानी को होंठों पर रगड़ते हुए कहा।

“अम्मी ने मना किया है-कहा है तुमसे कुछ न कहूँ।“

मैं चुपचाप लापरवाही से मुस्कराता हूँ। बानो पर मुझे बेहद गुस्सा है। मुझे जब बहुत गुस्सा आता है, तो मैं हमेशा मुस्कराता हूँ, ताकि कोई यह न समझे कि मेरा मन इतना कच्चा और छोटा है।

सुर्मई रंग के बादल नीचे झुके आ रहे हैं। टैरेस के पीछे पहाड़ियाँ काली, भूरी-सी हो गयी हैं। जब कभी बादलों की ओर से सूरज का मुँह बाहर निकलता है, तो पतली-दुबली छायायें पूर्व से पश्चिम की ओर भागने लगती हैं।

टैरेस पर- चारों ओर आस-पास अब सन्नाटा है। बरसों पहले एक मेम यहाँ रहती थी। उसके मार जाने के बाद अब यहाँ कोई नहीं रहता। बारहों महीने-गर्मी, सर्दी- कमरे बंद रहते हैं। बरामदा और उसके आगे लंबा गलियारा सूना पड़ा रहता है। हम गेस्ट हाउस के पिछवाड़े सीढ़ियाँ चढ़कर पवेलियन पर चोरी-चुपके चले जाते हैं और वहीं एक कोने में अपने अलूचे और खूबानियों का खजाना जमा करते हैं।

कौन-सी बात है, जो बानो मुझसे छिपा रही है, क्या सचमुच उसकी अम्मी ने मना किया है, या वह सिर्फ मुझे चिढ़ाने के लिए बहका रही है।

मैं टैरेस पर लेटे-लेटे अधमुँदी आँखों से अपने घर की छत देखता हूँ। दायीं ओर छज्जे के सिरे पर माँ के कमरे की खिड़की दिखायी देती है-माँ जब घर में नहीं होतीं, तो वह हमेशा बंद रहती है। वह अभी तक वापिस क्यों नहीं लौटीं? मौसी के घर वह इतने दिन कभी नहीं रहती थीं। क्या वह जानती हैं कि मैं अब चल-फिर लेता हूँ और बाबू ने मुझे अब यहाँ- मेम के भुतहे मकान तक आने की अनुमति दे दी है।

उस रात से मैंने उन्हें नहीं देखा जब वह चीखती हुई मेरे दरवाजे तक आयी थीं और बाबू ने उन्हें भीतर आने से रोक दिया था। मैं निश्चय नहीं कर पाता कि क्या ऐसा सचमुच हुआ था, या मैंने सिर्फ कोई सपना देखा है।

“दिल्ली पहाड़ों के ऊपर है या नीचे?” बानो ने पूछा।

“दिल्ली मैदान में है-वहाँ जाने के लिए नीचे उतरना पड़ता है,” मैंने सुनी-सुनायी बात बड़े गर्व से कह दी।

बानो ने अविश्वास भरी दृष्टि से मुझे देखा।

“नीचे तो एननडेल का मैदान है और उसके नीचे खड्ड है-दिल्ली क्या खड्ड के नीचे है?”

बानो कभी दिल्ली नहीं गयी, मुझे उस पर हमेशा तरस आता है। मैं उसकी जिज्ञासा को शांत करने का कोई प्रयत्न नहीं करता, और लापरवाही से सिर फेर लेता हूँ।

बानो ने खूबानियों की गुठलियाँ पवेलियन के पीछे गेस्ट-रूम में फेंक दीं और वहीं कुछ देर तक दरवाजे से सटकर खड़ी रही।

हवा से खूबानी के पेड़ की शाखाएं छतों पर झुकती हैं। खूबानियाँ झरती हैं-कुछ जमीन पर, कुछ पवेलियन की छत पर-खट-खट …

दुपहर और शाम के बीच सारा शिमला चुप हो जाता है, बस केवल खूबानियों की खट-खट आवाज पहाड़ी हवा में गूँजती है…

बानो ने हाथ के इशारे से मुझे अपने पास बुलाया है। गेस्ट-रूम के दरवाजे का एक शीशा टूटा हुआ था, उसी में अपना सिर डालकर वह कमरे के भीतर झाँक रही थी। उसके सिर के ऊपर जो जरा-सी खाली जगह बच गयी थी, वहीं मैंने खींचतान करके अपना सिर अड़ा दिया।

कमरा बिल्कुल खाली था। दीवार के बेल-बूटेदार कागजों का रंग फीका पड़ गया था। छत के एक कोने में मकड़ी का जाला धीरे-धीरे फैल रहा था। बासी हवा की गंध चारों ओर फैली थी। फर्श के बीचोंबीच मैली-सी रोशनी जाम गयी थी, जो कभी पीली हो जाती थी, कभी फीकी-फीकी-सी सफेद। कमरे के धुंधलके में यह सफेद धब्बा बड़ा अजीब और भयावह-सा लग रहा था।

“वह मेम यहाँ रहती होगी।“ बानो ने धीमे स्वर में कहा।

“और शायद यहीं मरी होगी।“ मैंने कहा, और मेरे सारे शरीर में एक हल्की-सी झुरझुरी फैल गयी। मुझे लगा, सामने दीवार के कटे-फटे, उखड़े पलस्तर पर एक बेडौल-सा चेहरा उभर आया है-जिसके जबड़े खुले हैं, फटी-फटी-सी आँखें हैं और जो मेरी ओर देखता हुआ हँस रहा है। मुझे लगता है कि वह चेहरा उस मेम का रहा होगा, जो बरसों पहले उस कमरे में न जाने क्यों अपने-आप मर गयी थी… और वह हँसी, उस रात जैसे दरवाजे के पीछे माँ हँस रही थीं…

टूटे हुए शीशे के भीतर झाँकता हुआ मेरा चेहरा बानो के सिर पर टिका है। मेरे मुँह के जरा नीचे बानो के अखरोटी रंग के बाल हैं, उन बालों की गंध पानी में भीगी मिट्टी की गंध से मिलती है। बालों के बीच छोटी-सी माँग है-माँ की माँग-जैसी, किन्तु माँ की माँग जरा लंबी थी और हमेशा बहुत उदास दिखती थीं।

“बानो…” मेरे होंठों पर सफेद कागज-सा थूक जाम गया।

“क्या?”

“अम्मी ने क्या तुमसे माँ के बारे में कुछ कहा था?”

“तुमसे क्या?” बानो ने ढीठ बनकर कहा।

हवा चलने से सूने, खाली मकान के दरवाजे खड़खड़ा उठते हैं। फर्श पर सिमटा हुआ सफेद धब्बा धीरे-धीरे सरक रहा है।

“बानो… जब मैं बीमार था, तो कभी-कभी बड़ा अजीब-सा लगता था..।“

“कैसा… बच्ची?”

“लगता था जैसे मैं भी माँ की तरह हूँ-जैसे उनकी कोई बात मुझमें भी है।“

“कैसी बात?”

“जिसे सब छिपाते हैं।“

बानो का सिर सिहर जाता है।

“एक सफेद छाया है बानो—जैसे बर्फ में लिपटी हो। वह अँधेरे में भी चमकती है और संगमरमर से सफेद उसके हाथ हैं, जो हमेशा हवा में खुले रहते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि पीछे से चुपचाप आकर उसने मुझे अपने में ओढ़ लिया है, और मैं अपने से ही अलग हो गया हूँ-सच बानो-लगता है जैसे मैं अपने से ही अलग हो गया हूँ…”

मुझे लगा कि बानो पत्ते-सी काँप रही है, भी से उसकी आँखें फैल गयी हैं।

मैं हँसने लगता हूँ।

“डर गयी बानो… ?”

बानो चुप है, उसकी गर्म साँसें मेरे सूखे होंठों को छूती हैं।

“बानो सच-मैं तुम्हें बहका रहा था-जो मैंने कहा वह बिल्कुल झूठ है।“ बानो कुछ नहीं कहती, वह दरवाजे को छोड़कर तेजी से टैरेस की सीढ़ियाँ उतरने लगती है।

“बानो..” मैंने एक-दो बार उसे बुलाया, किन्तु उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

बूंदें आती हैं, पवेलियन की छत टप-टप करती है… और मैं समझ नहीं पाता कि मेरे गालों पर जो बूँदें हैं, वे बादलों से आयी हैं-या पहले से ही वहाँ थीं…

घर का सामान बाँधा जा चुका है। संदूकों, थैलों और बिस्तरों पर लेबल चिपकाये जा रहे हैं, जिन पर मोटी-मोटी सुर्खियों में ‘शिमला-दिल्ली’ और उसके नीचे बाबू का नाम लिखा है। घर में बड़ी चहल-पहल मची है-नौकर, जमादार, कुली और बाबू के दफ्तर के चपरासी सब इधर से उधर भागते हुए दिखायी देते हैं।

माँ ऊपरवाले कमरे में हैं। वह इस बार कुछ काम नहीं कर रहीं-उनकी तबीयत शायद ठीक नहीं है, बाबू ने मुझे उनके पास जाने से मना किया है। जब से वह मौसी के घर से आयी हैं, मैंने उन्हें नहीं देखा, वह शायद रात को आयीं थीं, जब मैं सो रहा था।

सब अपने काम में जुटे थे। मैं ही अकेला एक ऐसा था, जिसे कोई काम नहीं था। कभी छज्जे में जाता था, कभी बरामदे में, किन्तु हर जगह अपनी व्यर्थता महसूस होती थी। खाली-खाली से कमरे, नंगी दीवारें, कोनों में कूड़ों के ढेर… मेरा दम घुटने सा लगा और मैं बाबू की आँख बचाकर बाहर चला आया।

पगडंडी से उतरकर मैं खड्ड के ऊपर नाले के किनारे-किनारे चलने लगा। कभी-कभी खड्ड के भीतर कोई बड़ा, मोटा-सा गेला मिल जाता तो उसे उठाकर जेब में रख लेता। रेल की खिड़की से मैं इन गेलों को छोटे-छोटे तालाबों में फेंका करता था। जब दोनों जेबें भर चुकीं तो देखा कि मैं घर से काफी दूर निकल आया हूँ। सूरज ढलने लगा था हालाँकि दूर की पहाड़ियों पर धूप अब भी थकी-माँदी-सी रेंग रही थी। मैं बीच रास्ते में मूड गया और एक छोटी-सी पगडंडी से घर की ओर चलने लगा।

कुछ दूर चला हूँगा कि अचानक पाँव ठिठक गए। दायीं ओर नीचे की तरफ बीरेन चाचा की कॉटेज दिखायी दे रही थी। पेड़ों के झुरमुट में चारों ओर झाड़-झंखाड़ से घिरे उस घर को देखकर मुझे सहसा वह शाम याद आ गयी, जब मैं माँ के संग यहाँ आया था। माँ भूली-सी, खोयी-सी नीचे देख रही थीं, और मैं चुपचाप उनके पीछे खड़ा था। जब से माँ मौसी के घर गयी थीं, बीरेन चाचा हमारे घर नहीं आए थे। एक बार उनके बारे में बाबू से पूछा था, किन्तु बाबू का चेहरा इतना कठोर, इतना भावहीन-सा हो आया था कि आगे उनसे कुछ भी पूछने का साहस नहीं हुआ।

ढलती धूप में कॉटेज की ढलुआँ छत लाल चमक रही थी। मैं धीरे-धीरे सड़क के किनारे लगी तार के संग नीचे उतरने लगा। फाटक खुला है। मैं दबे कदमों से भीतर चला आया हूँ। हवा आती है तो लॉन की घास पर छोटी-बड़ी सलवटें पड़ जाती हैं, झाड़ियों की सरसराहट आस-पास की नीरवता को और भी अधिक घनी बना जाती हैं। लॉन के किनारे वही पत्थर का बेंच है… जहाँ उस दिन माँ बैठी थीं।

सोचता हूँ, वापिस लौट जाऊँ, लेकिन पाँव बजरी की सड़क पर बँधे से खड़े रह जाते हैं।

दरवाजा खटकाता हूँ-धीरे-धीरे। “बीरेन चाचा… बीरेन चाचा”-मुझे अपनी आवाज उस अकेली, निस्तब्ध कॉटेज में गूँजती-सी सुनाई देती है। लगता है, यह कोई अजनबी आवाज है, जो मेरी आवाज के पीछे-पीछे दौड़ रही है।

“बच्ची, भीतर आ जाओ, दरवाजा खुला है।“ बीरेन चाचा का स्वर सुनाई दिया।

मेरे पाँव देहरी के भीतर जाते ही एक क्षण के लिए रुक गए हैं, टेबल लैम्प का मद्धिम-सा प्रकाश मेज पर बिखरे कागजों, किताबों पर गिर रहा है। एक-दो मिनट तक मैं बेवकूफ-सा देहरी पर खड़ा रहा-और तब सहसा आभास हुआ कि कमरा खाली नहीं है, कोने में ईजी चेयर पर बीरेन चाचा बैठे हैं। जहाँ वह बैठे थे, वहाँ अँधेरा था, इसलिए कमरे में घुसते ही वह मुझे एकदम दिखाई नहीं पड़े थे।

उन्होंने मुझे अपने पलंग पर बैठने के लिए कहा और अपनी कुर्सी मेरे नजदीक खींच ली।

“इतनी दूर अकेले आये हो?” उन्होंने मेरे हाथ को अपने हाथ में ले लिया और मुस्कराने लगे।

मेरी आँखें अनायास अपने निकट की फूली हुई जेबों पर टिक गयीं। संकोच से मेरा मुँह लाल हो गया।

“क्या भर रखा है इनमें—गेले हैं?”

मैंने चुपचाप सिर हिला दिया।

“क्या करोगे इनका?”

“रेल के लिए रखे हैं।“ मैंने अटपटा-सा उत्तर दे दिया।

“रेल के लिए?” बीरेन चाचा की प्रश्न-भरी दृष्टि मुझ पर टिक गयी। और तब सहसा मुझे ख्याल आया कि बीरेन चाचा को कुछ भी नहीं मालूम है। मुझे भीतर-ही-भीतर बहुत खुशी हुई कि मैं पहला व्यक्ति हूँ, जिससे उन्हें यह खबर मिलेगी।

“बीरेन चाचा-आज रात हम दिल्ली जा रहे हैं।“

वह कुछ देर तक अपलक मेरी ओर देखते रहे, मानो उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी। फिर वह कुर्सी से उठे और मेरी ओर कोई ध्यान दिए बिना खिड़की से बाहर देखने लगे।

कुछ देर तक कमरे में घुटा-घुटा-सा सन्नाटा छाया रहा। मुझे लगा मानो बीरेन चाचा को यह बात पहले से ही मालूम थी, तभी शायद उन्होंने कोई कौतूहल नहीं दिखाया।

तभी वह खिड़की से मुड़े। भूरी दाढ़ी के ऊपर उनकी नीली आँखें चमक रही थीं।

“तुमने उस दिन जो फोटो लिया था-वह धुल गया है… देखोगे?”

उन्होंने आलमारी से एक छोटा-सा लिफाफा निकालकर मेरे हाथ में रख दिया।

“तुम्हारा हाथ बहुत सधा हुआ है, फोटो बिल्कुल साफ आया है।“

मैंने फोटो निकाला और मुझे लगा मानो बहुत अर्से पहले की एक घड़ी-जिसे मैं बिल्कुल भूल चुका था-मेरी आँखों के सामने हू-ब-हू वैसी ही वापिस लौट आयी है।

छज्जे के पीछे जंगले पर माँ की साड़ी सूख रही है-उसके पीछे पहाड़ियों की धुंधली-सी रेखा है, बिजली के तार हैं, कोने में सिमटा आकाश का एक टुकड़ा है। आगे के हिस्से में बीरेन चाचा जंगले से सटे खड़े हैं। उनकी एक बाँह माँ की साड़ी से छू भर गयी है और माँ … न जाने क्यों उनकी आँखें मुँद-सी गयी हैं, दोनों होंठ मरी हुई तितली के परों के समान अधखुले रह गये हैं, मानो वे कुछ कहते-कहते अचानक रुक गये हों।

मैं न जाने कितनी देर तक फोटो को निहारता रहा।

अचानक ध्यान आया कि मुझे बहुत देर हो गयी है। स्टेशन जाने का समय पास सरक आया था। बाबू देर से मेरी प्रतीक्षा करते होंगे।

मैं झटपट पलंग से उतर आया।

“अच्छा बीरेन चाचा…“ मुझसे आगे और कुछ नहीं कहा गया।

बीरेन चाचा ने मुझे देखा-एकटक देखते रहे, फिर धीरे-से मेरे पास आये, अपने हाथों से मेरे बालों को छुआ और धीरे-से मेरे माथे को चूम लिया-बिल्कुल वैसे ही, जैसे उस रात माँ ने मुझे चूमा था।

उन्होंने दरवाजा खोला और हम बाहर बरामदे में आ गये।

“मैं तुम्हारे संग चलूँ-तुम्हें डर तो नहीं लगेगा?”

मैंने सिर हिलाकर मना कर दिया, मुझे घर का रास्ता मालूम था।

कुछ देर तक हम बरामदे में चुपचाप खड़े रहे।

“बच्ची…” बीरेन चाचा का स्वर सुनकर मैं चौंक-सा गया। मैंने उनकी ओर देखा।

“माँ ने एक किताब माँगी थी-मुझे याद नहीं रहा-“ वह झिझकते हुए चुप हो गए।

“आप मुझे दे दीजिए-मैं दे दूँगा।“

किताब देते हुए मुझे लगा मानो वह कुछ कहना चाह रहे हैं, किन्तु वह चुप रहे और मैं तेजी से फाटक की ओर चल पड़ा।

कॉटेज बहुत पीछे छूट गयी है। मैं एक संकरी-सी सुनसान सड़क पर चल रहा हूँ। सामने पहाड़ी के ऊपर पेड़ों की एक लंबी कतार चली गयी है। उसके पीछे डूबते सूरज की पीली, गुलाबी, सोनाली छायाएँ आकाश पर खिंच आयी हैं। चारों ओर एक हल्की, हरी-सी धुंध फैल गयी है। घर से कुछ दूर मैं लैम्प पोस्ट के नीचे खड़ा हो गया और किताब खोलकर देखने लगा।

मैंने देखा-पन्नों के बीच वही फोटोवाला लिफाफा रखा था।

किताब बहुत पुरानी है- आज भी उसके जर्द, भुरभुरे पन्ने याद आते हैं-फ्लाबेज लेटर्स टु जॉर्ज साँ। उन दिनों न मैं फ्लाबे को जानता था, न जॉर्ज साँ को। बरसों बाद जब मैंने उसे पढ़ा तो माँ नहीं थीं और बीरेन चाचा एक लंबे अर्से से इटली में जाकर बस गये थे।

किन्तु उस दिन मेरे लिए उस पुस्तक का कोई महत्व नहीं था। उसे हाथ में लिए मैं देर तक अँधेरे में खड़ा रहा-अपने घर के ऊपरवाले कमरे की ओर देखता रहा।

माँ के कमरे की खिड़की बंद थी, सफेद-पीली रोशनी खिड़की के शीशे पर बुझी-बुझी-सी झिलमिला रही थी।

वह शिमले में हमारी आखिरी शाम थी।

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‘परिंदे’ - निर्मल वर्मा (Parinde by Nirmal वर्मा)


अँधेरे गलियारे में चलते हुए लतिका ठिठक गयी। दीवार का सहारा लेकर उसने लैम्प की बत्ती बढ़ा दी। सीढ़ियों पर उसकी छाया एक बैडौल कटी-फटी आकृति खींचने लगी। सात नम्बर कमरे में लड़कियों की बातचीत और हँसी-ठहाकों का स्वर अभी तक आ रहा था। लतिका ने दरवाजा खटखटाया। शोर अचानक बंद हो गया। “कौन है?”

लतिका चुप खड़ी रही। कमरे में कुछ देर तक घुसर-पुसर होती रही, फिर दरवाजे की चिटखनी के खुलने का स्वर आया। लतिका कमरे की देहरी से कुछ आगे बढ़ी, लैम्प की झपकती लौ में लड़कियों के चेहरे सिनेमा के परदे पर ठहरे हुए क्लोजअप की भाँति उभरने लगे। “कमरे में अँधेरा क्यों कर रखा है?” लतिका के स्वर में हल्की-सी झिड़की का आभास था। “लैम्प में तेल ही खत्म हो गया, मैडम!” यह सुधा का कमरा था, इसलिए उसे ही उत्तर देना पड़ा। होस्टल में शायद वह सबसे अधिक लोकप्रिय थी, क्योंकि सदा छुट्टी के समय या रात को डिनर के बाद आस-पास के कमरों में रहनेवाली लड़कियों का जमघट उसी के कमरे में लग जाता था। देर तक गप़-शप, हँसी-मजाक च़लता रहता। “तेल के लिए करीमुद्दीन से क्यों नहीं कहा?” “कितनी बार कहा मैडम, लेकिन उसे याद रहे तब तो।”

कमरे में हँसी की फुहार एक कोने से दूसरे कोने तक फैल गयी। लतिका के कमरे में आने से अनुशासन की जो घुटन घिर आयी थी वह अचानक बह गयी। करीमुद्दीन होस्टल का नौकर था। उसके आलस और काम में टालमटोल करने के किस्से होस्टल की लड़कियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे। लतिका को हठात कुछ स्मरण हो आया। अँधेरे में लैम्प घुमाते हुए चारों ओर निगाहें, दौड़ाईं। कमरे में चारों ओर घेरा बनाकर वे बैठी थीं- पास-पास एक-दूसरे से सटकर। सबके चेहरे परिचित थे, किन्तु लैम्प के पीले मद्धिम प्रकाश में मानो कुछ बदल गया था, या जैसे वह उन्हें पहली बार देख रही थी। “जूली, अब तक तुम इस ब्लाक में क्या कर रही हो?”

जूली खिड़की के पास पलँग के सिरहाने बैठी थी। उसने चुपचाप आँखें नीची कर ली। लैम्प का प्रकाश चारों ओर से सिमटकर अब केवल उसके चेहरे पर गिर रहा था। “नाइट रजिस्टर पर दस्तखत कर दिये?” “हाँ, मैडम।” “फिर…?” लतिका का स्वर कड़ा हो आया। जूली सकुचाकर खिड़की से बाहर देखने लगी। जब से लतिका इस स्कूल में आयी है, उसने अनुभव किया है कि होस्टल के इस नियम का पालन डाँट-फटकार के बावजूद नहीं होता। “मैडम, कल से छुट्टियाँ शुरू हो जायेंगी, इसलिए आज रात हम सबने मिलकर…” और सुधा पूरी बात न कहकर हेमन्ती की ओर देखते हुए मुस्कराने लगी। “हेमन्ती के गाने का प्रोग्राम है, आप भी कुछ देर बैठिए न।”

लतिका को उलझन मालूम हुई। इस समय यहाँ आकर उसने इनके मजे को किरकिरा कर दिया। इस छोटे-से-हिल-स्टेशन पर रहते उसे खासा अर्सा हो गया, लेकिन कब समय पतझड़ और गर्मियों का घेरा पार कर सर्दी की छुट्टियों की गोद में सिमट जाता है, उसे कभी याद नहीं रहता। चोरों की तरह चुपचाप वह देहरी से बाहर को गयी। उसके चेहरे का तनाव ढ़ीला पड़ गया। वह मुस्कराने लगी। “मेरे संग स्नो-फॉल देखने कोई नहीं ठहरेगा?” “मैडम, छुट्टियों में क्या आप घर नहीं जा रही हैं?” सब लड़कियों की आँखे उस पर जम गयीं। “अभी कुछ पक्का नहीं है-आई लव द स्नो-फॉल!”

लतिका को लगा कि यही बात उसने पिछले साल भी कही थी और शायद पिछले से पिछले साल भी। उसे लगा मानों लड़कियाँ उसे सन्देह की दृष्टि से देख रही है, मानों उन्होंने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। उसका सिर चकराने लगा, मानों बादलों का स्याह झुरमुट किसी अनजाने कोने से उठकर उसे अपने में डुबा लेगा। वह थोड़ा-सा हँसी, फिर धीरे-से उसने सर को झटक दिया। “जूली, तुमसे कुछ काम है, अपने ब्लॉक में जाने से पहले मुझे मिल लेना- वेल गुड नाइट!” लतिका ने अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर दिया।

“गुड नाइट मैडम, गुड नाइट, गुड नाइट…” गलियारे की सीढ़ियाँ न उतरकर लतिका रेलिंग के सहारे खड़ी हो गयी। लैंप की बत्ती को नीचे घुमाकर कोने में रख दिया। बाहर धुन्ध की नीली तहें बहुत घनी हो चली थीं। लॉन पर लगे हुए चीड़ के पत्तों की सरसराहट हवा के झोंकों के संग कभी तेज, कभी धीमी होकर भीतर बह आती थी। हवा में सर्दी का हल्का-सा आभास पाकर लतिका के दिमाग में कल से शुरू होनेवाली छुट्टियों का ध्यान भटक आया। उसने आँखें मूँद लीं। उसे लगा कि जैसे उसकी टाँगें बाँस की लकड़ियों की तरह उसके शरीर से बँधी हैं, जिसकी गाँठें धीरे-धीरे खुलती जा रही हैं। सिर की चकराहट अभी मिटी नहीं थी, मगर अब जैसे वह भीतर न होकर बाहर फैली हुई धुन्ध का हिस्सा बन गयी थी।

सीढ़ियों पर बातचीत का स्वर सुनकर लतिका जैसे सोते से जगी। शॉल को कन्धों पर समेटा और लैम्प उठा लिया। डॉ. मुकर्जी मि. ह्यूबर्ट के संग एक अंग्रेजी धुन गुनगुनाते हुए ऊपर आ रहे थे। सीढ़ियों पर अँधेरा था और ह्यूबर्ट को बार-बार अपनी छड़ी से रास्ता टटोलना पड़ता था। लतिका ने दो-चार सीढ़ियाँ उतरकर लैम्प को नीचे झुका दिया। “गुड ईवनिंग डाक्टर, गुड ईवनिंग मि. ह्यूबर्ट!” “थैंक यू मिस लतिका” – ह्यूबर्ट के स्वर में कृतज्ञता का भाव था। सीढ़ियाँ चढ़ने से उनकी साँस तेज हो रही थी और वह दीवार से लगे हुए हाँफ रहे थे। लैम्प की रोशनी में उनके चेहरे का पीलापन कुछ ताँबे के रंग जैसा हो गया था।

“यहाँ अकेली क्या कर रही हो मिस लतिका?” – डाक्टर ने होंठों के भीतर से सीटी बजायी। “चेकिंग करके लौट रही थी। आज इस वक्त ऊपर कैसे आना हुआ मिस्टर ह्यूबर्ट?” ह्यूबर्ट ने मुस्कराकर अपनी छड़ी डाक्टर के कन्धों से छुला दी – “इनसे पूछो, यही मुझे जबर्दस्ती घसीट लाये हैं।”

“मिस लतिका, हम आपको निमन्त्रण देने आ रहे थे। आज रात मेरे कमरे में एक छोटा-सा-कन्सर्ट होगा जिसमें मि. ह्यूबर्ट शोपाँ और चाइकोव्स्की के कम्पोजीशन बजायेंगे और फिर क्रीम कॉफी पी जायेगी। और उसके बाद अगर समय रहा, तो पिछले साल हमने जो गुनाह किये हैं उन्हें हम सब मिलकर कन्फ्रेंस करेंगे।” डाक्टर मुकर्जी के चेहरे पर भारी मुस्कान खेल गयी। “डाक्टर, मुझे माफ करें, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।”

“चलिए, यह ठीक रहा। फिर तो आप वैसे भी मेरे पास आतीं।” डाक्टर ने धीरे-से लतिका के कंधों को पकड़कर अपने कमरे की तरफ मोड़ दिया। डाक्टर मुकर्जी का कमरा ब्लॉक के दूसरे सिरे पर छत से जुड़ा हुआ था। वह आधे बर्मी थे, जिसके चिह्न उनकी थोड़ी दबी हुई नाक और छोटी-छोटी चंचल आँखों से स्पष्ट थे। बर्मा पर जापानियों का आक्रमण होने के बाद वह इस छोटे से पहाड़ी शहर में आ बसे थे। प्राइवेट प्रैक्टिस के अलावा वह कान्वेन्ट स्कूल में हाईजीन-फिजियालोजी भी पढ़ाया करते थे और इसलिए उनको स्कूल के होस्टल में ही एक कमरा रहने के लिए दे दिया गया था। कुछ लोगों का कहना था कि बर्मा से आते हुए रास्ते में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी, लेकिन इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि डाक्टर स्वयं कभी अपनी पत्नी की चर्चा नहीं करते।

बातों के दौरान डाक्टर अक्सर कहा करते हैं – “मरने से पहले मैं एक दफा बर्मा जरूर जाऊँगा” – और तब एक क्षण के लिए उनकी आँखों में एक नमी-सी छा जाती। लतिका चाहने पर भी उनसे कुछ पूछ नहीं पाती। उसे लगता कि डाक्टर नहीं चाहते कि कोई अतीत के सम्बन्ध में उनसे कुछ भी पूछे या सहानुभूति दिखलाये। दूसरे ही क्षण अपनी गम्भीरता को दूर ठेलते हुए वह हँस पड़ते – एक सूखी, बूझी हुई हँसी।

होम-सिक्नेस ही एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज किसी डाक्टर के पास नहीं है। छत पर मेज-कुर्सियाँ डाल दी गईं और भीतर कमरे में परकोलेटर में कॉफी का पानी चढ़ा दिया गया। “सुना है अगले दो-तीन वर्षों में यहाँ पर बिजली का इन्तजाम हो जायेगा” -डाक्टर ने स्प्रिट लैम्प जलाते हुए कहा। “यह बात तो पिछले दस सालों से सुनने में आ रही है। अंग्रेजों ने भी कोई लम्बी-चौड़ी स्कीम बनायी थी, पता नहीं उसका क्या हुआ” – ह्यूबर्ट ने कहा। वह आराम कुर्सी पर लेटा हुआ बाहर लॉन की ओर देख रहा था।

लतिका कमरे से दो मोमबत्तियाँ ले आयी। मेज के दोनों सिरों पर टिकाकर उन्हें जला दिया गया। छत का अँधेरा मोमबत्ती की फीकी रोशनी के इर्द-गिर्द सिमटने लगा। एक घनी नीरवता चारों ओर घिरने लगी। हवा में चीड़ के वृक्षों की साँय-साँय दूर-दूर तक फैली पहाड़ियों और घाटियों में सीटियों की गूँज-सी छोड़ती जा रही थी। “इस बार शायद बर्फ जल्दी गिरेगी, अभी से हवा में एक सर्द खुश्की-सी महसूस होने लगी है” – डाक्टर का सिगार अँधेरे में लाल बिन्दी-सा चमक रहा था। “पता नहीं, मिस वुड को स्पेशल सर्विस का गोरखधन्धा क्यों पसन्द आता है। छुट्टियों में घर जाने से पहले क्या यह जरूरी है कि लड़कियाँ फादर एल्मण्ड का सर्मन सुनें?” – ह्यूबर्ट ने कहा।

डॉक्टर को फादर एल्मण्ड एक आँख नहीं सुहाते थे। लतिका कुर्सी पर आगे झुककर प्यालों में कॉफी उँडेलने लगी। हर साल स्कूल बन्द होने के दिन यही दो प्रोग्राम होते हैं – चैपल में स्पेशल सर्विस और उसके बाद दिन में पिकनिक। लतिका को पहला साल याद आया जब डाक्टर के संग पिकनिक के बाद वह क्लब गयी थी। डाक्टर बार में बैठै थे। बार रूम कुमाऊँ रेजीमेण्ट के अफसरों से भरा हुआ था। कुछ देर तक बिलियर्ड का खेल देखने के बाद जब वह वापिस बार की ओर आ रहे थे, तब उसने दायीं ओर क्लब की लाइब्रेरी में देखा- मगर उसी समय डाक्टर मुकर्जी पीछे से आ गये थे। मिस लतिका, यह मेजर गिरीश नेगी है।” बिलियर्ड रूम से आते हुए हँसी-ठहाकों के बीच वह नाम दब-सा गया था। वह किसी किताब के बीच में उँगली रखकर लायब्रेरी की खिड़की से बाहर देख रहा था। “हलो डाक्टर” – वह पीछे मुड़ा। तब उस क्षण…

उस क्षण न जाने क्यों लतिका का हाथ काँप गया और कॉफी की कुछ गर्म बूँदें उसकी साड़ी पर छलक आयी। अँधेरे में किसी ने नहीं देखा कि लतिका के चेहरे पर एक उनींदा रीतापन घिर आया है। हवा के झोंके से मोमबत्तियों की लौ फड़कने लगी। छत से भी ऊँची काठगोदाम जानेवाली सड़क पर यू.पी. रोडवेज की आखिरी बस डाक लेकर जा रही थी। बस की हैड लाइट्स में आस-पास फैली हुई झाड़ियों की छायाएँ घर की दीवार पर सरकती हुई गायब होने लगीं।

“मिस लतिका, आप इस साल भी छुट्टियों में यहीं रहेंगी?“डाक्टर ने पूछा। डाक्टर का सवाल हवा में टँगा रहा। उसी क्षण पियानो पर शोपाँ का नोक्टर्न ह्यूबर्ट की उँगलियों के नीचे से फिसलता हुआ धीरे-धीरे छत के अँधेरे में घुलने लगा-मानों जल पर कोमल स्वप्निल उर्मियाँ भँवरों का झिलमिलाता जाल बुनती हुईं दूर-दूर किनारों तक फैलती जा रही हों। लतिका को लगा कि जैसे कहीं बहुत दूर बर्फ की चोटियों से परिन्दों के झुण्ड नीचे अनजान देशों की ओर उड़े जा रहे हैं। इन दिनों अक्सर उसने अपने कमरे की खिड़की से उन्हें देखा है-धागे में बँधे चमकीले लट्टुओं की तरह वे एक लम्बी, टेढ़ी-मेढ़ी कतार में उड़े जाते हैं, पहाड़ों की सुनसान नीरवता से परे, उन विचित्र शहरों की ओर जहाँ शायद वह कभी नहीं जायेगी।

लतिका आर्म चेयर पर ऊँघने लगी। डाक्टर मुकर्जी का सिगार अँधेरे में चुपचाप जल रहा था। डाक्टर को आश्चर्य हुआ कि लतिका न जाने क्या सोच रही है और लतिका सोच रही थी-क्या वह बूढ़ी होती जा रही है? उसके सामने स्कूल की प्रिंसिपल मिस वुड का चेहरा घूम गया-पोपला मुँह, आँखों के नीचे झूलती हुई माँस की थैलियाँ, ज़रा-ज़रा सी बात पर चिढ़ जाना, कर्कश आवाज में चीखना-सब उसे ‘ओल्डमेड’ कहकर पुकारते हैं। कुछ वर्षों बाद वह भी हू-ब-हू वैसी ही बन जायेगी…लतिका के समूचे शरीर में झूरझूरी-सी दौड़ गयी, मानों अनजाने में उसने किसी गलीज वस्तु को छू लिया हो। उसे याद आया कुछ महीने पहले अचानक उसे ह्यूबर्ट का प्रेमपत्र मिला था – भावुक याचना से भरा हुआ पत्र, जिसमें उसने न जाने क्या कुछ लिखा था, जो कभी उसकी समझ में नहीं आया। उसे ह्यूबर्ट की इस बचकाना हरकत पर हँसी आयी थी, किन्तु भीतर-ही-भीतर प्रसन्नता भी हुई थी। उसकी उम्र अभी बीती नहीं है, अब भी वह दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। ह्यूबर्ट का पत्र पढ़कर उसे क्रोध नहीं आया, आयी थी केवल ममता। वह चाहती तो उसकी गलतफहमी को दूर करने में देर न लगती, किन्तु कोई शक्ति उसे रोके रहती है, उसके कारण अपने पर विश्वास रहता है, अपने सुख का भ्रम मानो ह्यूबर्ट की गलतफहमी से जुड़ा है…।

ह्यूबर्ट ही क्यों, वह क्या किसी को चाह सकेगी, उस अनुभूति के संग, जो अब नहीं रही, जो छाया-सी उस पर मँडराती रहती है, न स्वयं मिटती है, न उसे मुक्ति दे पाती है। उसे लगा, जैसे बादलों का झुरमुट फिर उसके मस्तिष्क पर धीरे-धीरे छाने लगा है, उसकी टाँगे फिर निर्जीव, शिथिल-सी हो गयी हैं। वह झटके से उठ खड़ी हुई- “डाक्टर माफ करना, मुझे बहुत थकान-सी लग रही है…बिना वाक्य पूरा किये ही वह चली गयी। कुछ देर तक टैरेस पर निस्तब्धता छायी रही। मोमबत्तियाँ बूझने लगी थीं। डाक्टर मुकर्जी ने सिगार का नया कश लिया – “सब लड़कियाँ एक-जैसी होती है-बेवकूफ और सेंटीमेंटल।” ह्यूबर्ट की उँगलियों का दबाव पियानो पर ढीला पड़ता गया, अन्तिम सुरों की झिझकी-सी गूँज कुछ क्षणों तक हवा में तिरती रही।

“डाक्टर, आपको मालूम है, मिस लतिका का व्यवहार पिछले कुछ अर्से से अजीब-सा लगता है।” ह्यूबर्ट के स्वर में लापरवाही का भाव था। वह नहीं चाहता था कि डाक्टर को लतिका के प्रति उसकी भावनाओं का आभास-मात्र भी मिल सके। जिस कोमल अनुभूति को वह इतने समय से सँजोता आया है, डाक्टर उसे हँसी के एक ठहाके में उपहासास्पद बना देगा। “क्या तुम नियति में विश्वास करते हो, ह्यूबर्ट?” डाक्टर ने कहा। ह्यूबर्ट दम रोके प्रतीक्षा करता रहा। वह जानता था कि कोई भी बात कहने से पहले डाक्टर को फिलासोफाइज करने की आदत थी। डाक्टर टैरेस के जंगले से सटकर खड़ा हो गया। फीकी-सी चाँदनी में चीड़ के पेड़ो की छायाएँ लॉन पर गिर रही थी। कभी-कभी कोई जुगनू अँधेरे में हरा प्रकाश छिड़कता हवा में गायब हो जाता था।

“मैं कभी-कभी सोचता हूँ, इन्सान जिन्दा किसलिए रहता है-क्या उसे कोई और बेहतर काम करने को नहीं मिला? हजारों मील अपने मुल्क से दूर मैं यहाँ पड़ा हूँ – यहाँ कौन मुझे जानता है, यहीं शायद मर भी जाऊँगा। ह्यूबर्ट, क्या तुमने कभी महसूस किया है कि एक अजनबी की हैसियत से परायी जमीन पर मर जाना काफ़ी खौफनाक बात है…!”

ह्यूबर्ट विस्मित-सा डाक्टर को देखने लगा। उसने पहली बार डॉक्टर मुकर्जी के इस पहलू को देखा था। अपने सम्बन्ध में वह अक्सर चुप रहते थे। “कोई पीछे नहीं है, यह बात मुझमें एक अजीब किस्म की बेफिक्री पैदा कर देती है। लेकिन कुछ लोगों की मौत अन्त तक पहेली बनी रहती है, शायद वे ज़िन्दगी से बहुत उम्मीद लगाते थे। उसे ट्रैजिक भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आखिरी दम तक उन्हें मरने का एहसास नहीं होता।” “डाक्टर, आप किसका जिक्र कर रहे हैं?” ह्यूबर्ट ने परेशान होकर पूछा। डाक्टर कुछ देर तक चुपचाप सिगार पीता रहा। फिर मुड़कर वह मोमबत्तियों की बुझती हुई लौ को देखने लगा।

“तुम्हें मालूम है, किसी समय लतिका बिला नागा क्लब जाया करती थी। गिरीश नेगी से उसका परिचय वहीं हुआ था। कश्मीर जाने से एक रात पहले उसने मुझे सबकुछ बता दिया था। मैं अब तक लतिका से उस मुलाकात के बारे में कुछ नहीं कह सका हूँ। किन्तु उस रात कौन जानता था कि वह वापस नहीं लौटेगा। और अब…अब क्या फर्क पड़ता है। लेट द डेड। डाई…” डाक्टर की सूखी सर्द हँसी में खोखली-सी शून्यता भरी थी।

“कौन गिरीश नेगी?” “कुमाऊँ रेजीमेंट में कैप्टन था।” “डाक्टर, क्या लतिका…” ह्यूबर्ट से आगे कुछ नहीं कहा गया। उसे याद आया वह पत्र, जो उसने लतिका को भेजा था, कितना अर्थहीन और उपहासास्पद, जैसे उसका एक-एक शब्द उसके दिल को कचोट रहा हो। उसने धीरे-से पियानो पर सिर टिका लिया। लतिका ने उसे क्यों नहीं बताया, क्या वह इसके योग्य भी नहीं था? “लतिका… वह तो बच्ची है, पागल! मरनेवाले के संग खुद थोड़े ही मरा जाता है।“

कुछ देर चुप रहकर डाक्टर ने अपने प्रश्न को फिर दुहराया। “लेकिन ह्यूबर्ट, क्या तुम नियति पर विश्वास करते हो?” हवा के हल्के झोंके से मोमबत्तियाँ एक बार प्रज्जवलित होकर बुझ गयीं। टैरेस पर ह्यूबर्ट और डाक्टर अँधेरे में एक-दूसरे का चेहरा नहीं देख पा रहे थे, फिर भी वे एक-दूसरे की ओर देख रहे थे। कान्वेंट स्कूल से कुछ दूर मैदानों में बहते पहाड़ी नाले का स्वर आ रहा था। अब बहुत देर बाद कुमाऊँ रेजीमेंट सेण्टर का बिगुल सुनायी दिया, तो ह्यूबर्ट हड़बड़ाकर खड़ा हो गया। “अच्छा, चलता हूँ, डाक्टर, गुड नाइट।”

“गुड नाइट ह्यूबर्ट…मुझे माफ करना, मैं सिगार खत्म करके उठूँगा…” सुबह बदली छायी थी। लतिका के खिड़की खोलते ही धुन्ध का गुब्बारा-सा भीतर घुस आया, जैसे रात-भर दीवार के सहारे सरदी में ठिठुरता हुआ वह भीतर आने की प्रतीक्षा कर रहा हो। स्कूल से ऊपर चैपल जानेवाली सड़क बादलों में छिप गयी थी, केवल चैपल का ‘क्रास’ धुन्ध के परदे पर एक-दूसरे को काटती हुई पेंसिल की रेखाओं-सा दिखायी दे जाता था।

लतिका ने खिड़की से आँखें हटाईं, तो देखा कि करीमुद्दीन चाय की ट्रे लिये खड़ा है। करीमुद्दीन मिलिट्री में अर्दली रह चुका था, इसलिए ट्रे मेज पर रखकर ‘अटेन्शन’ की मुद्रा में खड़ा हो गया। लतिका झटके से उठ बैठी। सुबह से आलस करके कितनी बार जागकर वह सो चुकी है। अपनी खिसियाहट मिटाने के लिए लतिका ने कहा – “बड़ी सर्दी है आज, बिस्तर छोड़ने को जी नहीं चाहता।”

“अजी मेम साहब, अभी क्या सरदी आयी है- बड़े दिनों में देखना कैसे दाँत कटकटाते हैं” – और करीमुद्दीन अपने हाथों को बगलों में डाले हुए इस तरह सिकुड़ गया जैसे उन दिनों की कल्पना मात्र से उसे जाड़ा लगना शुरू हो गया हो। गंजे सिर पर दोनों तरफ के उसके बाल खिजाब लगाने से कत्थई रंग के भूरे हो गये थे। बात चाहे किसी विषय पर हो रही हो, वह हमेशा खींचतान कर उसे ऐसे क्षेत्र में घसीट लाता था, जहाँ वह बेझिझक अपने विचारों को प्रकट कर सके।

“एक दफा तो यहाँ लगातार इतनी बर्फ गिरी थी कि भुवाली से लेकर डाक बँगले तक सारी सड़कें जाम हो गईं। इतनी बर्फ थी मेम साहब कि पेड़ों की टहनियाँ तक सिकुड़कर तनों से लिपट गयी थी – बिलकुल ऐसे,” और करीमुद्दीन नीचे झुककर मुर्गा-सा बन गया। “कब की बात है?” लतिका ने पूछा।

“अब यह तो जोड़-हिसाब करके ही पता चलेगा, मेम साहब, लेकिन इतना याद है कि उस वक्त अंग्रेज बहादूर यहीं थे। कण्टोनमेण्ट की इमारत पर कौमी झण्डा नहीं लगा था। बड़े जबर थे ये अंग्रेज, दो घण्टों में ही सारी सड़कें साफ करवा दीं। उन दिनों एक सीटी बजाते ही पचास घोड़ेवाले जमा हो जाते थे। अब तो सारे शेड खाली पड़े हैं। वे लोग अपनी खिदमत भी करवाना जानते थे, अब तो सब उजाड़ हो गया है”। करीमुद्दीन उदास भाव से बाहर देखने लगा। आज यह पहली बार नहीं है जब लतिका करीमुद्दीन से उन दिनों की बातें सुन रही है जब अंग्रेज बहादुर ने इस स्थान को स्वर्ग बना रखा था। “आप छुट्टियों में इस साल भी यही रहेंगी मेम साहब?” “दिखता तो कुछ ऐसा ही है करीमुद्दीन, तुम्हें फिर तंग होना पड़ेगा।” “क्या कहती हैं मेम साहब! आपके रहने से हमारा भी मन लग जाता है, वरना छुट्टियों में तो यहाँ कुत्ते लोटते हैं।”

“तुम जरा मिस्त्री से कह देना कि इस कमरे की छत की मरम्मत कर जाये। पिछले साल बर्फ का पानी दरारों से टपकता रहता था।“ लतिका को याद आया कि पिछली सर्दियों में जब कभी बर्फ गिरती थी, तो उसे पानी से बचने के लिए रात-भर कमरे के कोने में सिमटकर सोना पड़ता था।

करीमुद्दीन चाय की ट्रे उठाता हुआ बोला – “ह्यूबर्ट साहब तो शायद कल ही चले जायें, कल रात उनकी तबीयत फिर खराब हो गयी। आधी रात के वक्त मुझे जगाने आये थे। कहते थे, छाती में तकलीफ है। उन्हें यह मौसम रास नहीं आता। कह रहे थे, लड़कियों की बस में वह भी कल ही चले जायेंगे।” करीमुद्दीन दरवाजा बन्द करके चला गया। लतिका की इच्छा हुई कि वह ह्यूबर्ट के कमरे में जाकर उनकी तबीयत की पूछताछ कर आये। किन्तु फिर न जाने क्यों स्लीपर पैरों में टँगे रहे और वह खिड़की के बाहर बादलों को उड़ता हुआ देखती रही। ह्यूबर्ट का चेहरा जब उसे देखकर सहमा-सा दयनीय हो जाता है, तब लगता है कि वह अपनी मूक-निरीह याचना में उसे कोस रहा है – न वह उसकी गलतफहमी को दूर करने का प्रयत्न कर पाती है, न उसे अपनी विवशता की सफाई देने का साहस होता है उसे लगता है कि इस जाले से बाहर निकलने के लिए वह धागे के जिस सिरे को पकड़ती है वह खुद एक गाँठ बनकर रह जाता है।

बाहर बूँदाबाँदी होने लगी थी, कमरे की टिन की छत खट-खट बोलने लगी। लतिका पलँग से उठ खड़ी हुई। बिस्तर को तहाकर बिछाया। फिर पैरों में स्लीपरों को घसीटते हुए वह बड़े आईने तक आयी और उसके सामने स्टूल पर बैठकर बालों को खोलने लगी। किंतु कुछ देर तक कंघी बालों में ही उलझी रही और वह गुमसुम हो शीशे में अपना चेहरा ताकती रही। करीमुद्दीन को यह कहना याद ही नहीं रहा कि धीरे-धीरे आग जलाने की लकड़ियाँ जमा कर ले। इन दिनों सस्ते दामों पर सूखी लकड़ियाँ मिल जाती हैं। पिछले साल तो कमरा धुएँ से भर जाता था जिसके कारण कँपकँपाते जाड़े में भी उसे खिड़की खोलकर ही सोना पड़ता था।

आईने में लतिका ने अपना चेहरा देखा – वह मुस्कुरा रही थी। पिछले साल अपने कमरे की सीलन और ठण्ड से बचने के लिए कभी-कभी वह मिस वुड के खाली कमरे में चोरी-चुपके सोने चली जाया करती थी। मिस वुड का कमरा बिना आग के भी गर्म रहता था, उनके गदीले सोफे पर लेटते ही आँख लग जाती थी। कमरा छुट्टियों में खाली पड़ा रहता है, किन्तु मिस वुड से इतना नहीं होता कि दो महीनों के लिए उसके हवाले कर जायें। हर साल कमरे में ताला ठोंक जाती हैं वह तो पिछले साल़ गुसलखाने में भीतर की साँकल देना भूल गयी थीं, जिसे लतिका चोर दरवाजे के रूप में इस्तेमाल करती रही थी।

पहले साल अकेले में उसे बड़ा डर-सा लगता था। छुट्टियों में सारे स्कूल और होस्टल के कमरे साँय-साँय करने लगते हैं। डर के मारे उसे जब कभी नींद नहीं आती थी, तब वह करीमुद्दीन को रात में देर तक बातों में उलझाये रखती। बातों में जब खोयी-सी वह सो जाती, तब करीमुद्दीन चुपचाप लैम्प बुझाकर चला जाता। कभी-कभी बीमारी का बहाना करके वह डाक्टर को बुलवा भेजती थी और बाद में बहुत जिद करके दूसरे कमरे में उनका बिस्तर लगवा देती।

लतिका के कंधे से बालों का गुच्छा निकाला और उसे बाहर फेंकने के लिए वह खिड़की के पास आ खड़ी हुई। बाहर छत की ढलान से बारिश के जल की मोटी-सी धार बराबर लॉन पर गिर रही थी। मेघाच्छन्न आकाश में सरकते हुए बादलों के पीछे पहाड़ियों के झुण्ड कभी उभर आते थे, कभी छिप जाते थे, मानो चलती हुई ट्रेन से कोई उन्हें देख रहा हो। लतिका ने खिड़की से सिर बाहर निकाल लिया – हवा के झोंके से उसकी आँखें झिप गयी। उसे जितने काम याद आते हैं, उतना ही आलस घना होता जाता है। बस की सीटें रिजर्व करवाने के लिए चपरासी को रुपये देने हैं जो सामान होस्टल की लड़कियाँ पीछे छोड़े जा रही हैं, उन्हें गोदाम में रखवाना होगा। कभी-कभी तो छोटी क्लास की लड़कियों के साथ पैकिंग करवाने के काम में भी उसे हाथ बँटाना पड़ता था।

वह इन कामों से ऊबती नहीं। धीरे-धीरे सब निपटते जाते हैं, कोई गलती इधर-उधर रह जाती है, सो बाद में सुधर जाती है। हर काम में किचकिच रहती है, परेशानी और दिक्कत होती है, किन्तु देर-सबेर इससे छुटकारा मिल ही जाता है किन्तु जब लड़कियों की आखिरी बस चली जाती है, तब मन उचाट-सा हो जाता है। खाली कॉरीडोर में घूमती हुई वे कभी इस कमरे में जाती हैं और कभी उसमें। वह नहीं जान पातीं कि अपने से क्या करें, दिल कहीं भी नहीं टिक पाता, हमेशा भटका-भटका-सा रहता है।

इस सबके बावजूद जब कोई सहज भाव में पूछ बैठता है, “मिस लतिका, छुट्टियों में आप घर नहीं जा रहीं?” तब वह क्या कहे? डिंग-डांग-डिंग… स्पेशल सर्विस के लिए स्कूल चैपल के घंटे बजने लगे थे। लतिका ने अपना सिर खिड़की के भीतर कर लिया। उसने झटपट साड़ी उतारी और पेटीकोट में ही कन्धे पर तौलिया डाले गुसलखाने में घुस गयी। लेफ्ट-राइट लेफ्ट…लेफ्ट…

कण्टोनमेण्ट जानेवाली पक्की सड़क पर चार-चार की पंक्ति में कुमाऊँ रेजीमेंट के सिपाहियों की एक टुकड़ी मार्च कर रही थी। फौजी बूटों की भारी खुरदरी आवाजें स्कूल चैपल की दीवारों से टकराकर भीतर ‘प्रेयर हाल’ में गूँज रही थीं।

“ब्लेसेड आर द मीक…” फादर एल्मण्ड एक-एक शब्द चबाते हुए खँखारते स्वर में ‘सर्मन आफ द माउण्ट’ पढ़ रहे थे। ईसा मसीह की मूर्ति के नीचे ‘कैण्डलब्रियम’ के दोनों ओर मोमबत्तियाँ जल रही थीं, जिनका प्रकाश आगे बेंचों पर बैठी हुई लड़कियों पर पड़ रहा था। पिछली लाइनों की बैंचें अँधेरे में डूबी हुई थीं, जहाँ लड़कियाँ प्रार्थना की मुद्रा में बैठी हुई सिर झुकाये एक-दूसरे से घुसर-पुसर कर रही थीं। मिस वुड स्कूल सीजन के सफलतापूर्वक समाप्त हो जाने पर विद्यार्थियों और स्टाफ सदस्यों को बधाई का भाषण दे चुकी थीं- और अब फादर के पीछे बैठी हुई अपने में ही कुछ बुड़बुड़ा रही थीं मानो धीरे-धीरे फादर को ‘प्रौम्ट’ कर रही हों।

‘आमीन।’ फादर एल्मण्ड ने बाइबल मेज पर रख दी और ‘प्रेयर बुक’ उठा ली। हॉल की खामोशी क्षण भर के लिए टूट गयी। लड़कियों ने खड़े होते हुए जान-बूझकर बैंचों को पीछे धकेला – बैंचे फर्श पर रगड़ खाकर सीटी बजाती हुई पीछे खिसक गयीं – हॉल के कोने से हँसी फूट पड़ी। मिस वुड का चेहरा तन गया, माथे पर भृकुटियाँ चढ़ गयीं। फिर अचानक निस्तब्धता छा गयी। हॉल के उस घुटे हुए घुँधलके में फादर का तीखा फटा हुआ स्वर सुनायी देने लगा -“जीजस सेड, आई एम द लाइट ऑफ द वर्ल्ड, ही दैट फालोएथ मी शैल नॉट वाक इन डार्कनेस, बट शैल हैव द लाइट ऑफ लाइफ।”

डाक्टर मुखर्जी ने ऊब और उकताहट से भरी जमुहाई ली, “कब यह किस्सा खत्म होगा?” उसने इतने ऊँचे स्वर में लतिका से पूछा कि वह सकुचाकर दूसरी ओर देखने लगी। स्पेशल सर्विस के समय डाक्टर मुकर्जी के होंठों पर व्यंग्यात्मक मुस्कान खेलती रहती और वह धीरे-धीरे अपनी मूँछों को खींचता रहता। फादर एल्मण्ड की वेश-भूषा देखकर लतिका के दिल में गुदगुदी-सी दौड़ गयी। जब वह छोटी थी, तो अक्सर यह बात सेाचकर विस्मित हुआ करती थी कि क्या पादरी लोग सफेद चोगे के नीचे कुछ नहीं पहनते, अगर धोखे से वह ऊपर उठ जाये तो?

लेफ्ट…लेफ्ट…लेफ्ट… मार्च करते हुए फौजी बूट चैपल से दूर होते जा रहे थे-केवल उनकी गूँज हवा में शेष रह गयी थी।

‘हिम नम्बर 117’फादर ने प्रार्थना-पुस्तक खोलते हुए कहा। हॉल में प्रत्येक लड़की ने डेस्क पर रखी हुई हिम-बुक खोल ली। पन्नों के उलटने की खड़खड़ाहट फिसलती हुई एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैल गयी। आगे की बैंच से उठकर ह्यूबर्ट पियानो के सामने स्टूल पर बैठ गया। संगीत शिक्षक होने के कारण हर साल स्पेशल सर्विस के अवसर पर उसे ‘कॉयर’ के संग पियानो बजाना पड़ता था। ह्यूबर्ट ने अपने रूमाल से नाक साफ की। अपनी घबराहट छिपाने के लिए ह्यूबर्ट हमेशा ऐसा ही किया करता था। कनखियों से हॉल की ओर देखते हुए अपने काँपते हाथों से हिम-बुक खोली। लीड काइण्डली लाइट…

पियानो के सुर दबे, झिझकते से मिलने लगे। घने बालों से ढँकी ह्यूबर्ट की लंबी, पीली अँगुलयाँ खुलने-सिमटने लगीं। ‘कॉयर’ में गानेवाली लड़कियों के स्वर एक-दूसरे से गुँथकर कोमल, स्निग्ध लहरों में बिंध गये। लतिका को लगा, उसका जूड़ा ढीला पड़ गया है, मानो गरदन के नीचे झूल रहा है। मिस वुड की आँख बचा लतिका ने चुपचाप बालों में लगे क्लिपों को कसकर खींच दिया। “बड़ा झक्की आदमी है…सुबह मैंने ह्यूबर्ट को यहाँ आने से मना किया था, फिर भी चला आया” – डाक्टर ने कहा।

लतिका को करीमुद्दीन की बात याद हो गयी। रात-भर ह्यूबर्ट को खाँसी का दौरा पड़ा था, कल जाने के लिए कह रहे थे। लतिका ने सिर टेढ़ा करके ह्यूबर्ट के चेहरे की एक झलक पाने की विफल चेष्टा की। इतने पीछे से कुछ भी देख पाना असंभव था, पियानो पर झुका हुआ केवल ह्यूबर्ट का सिर दिखायी देता था।

लीड काइण्डली लाइट, संगीत के सुर मानों एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अबाध शून्यता में बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लम्बे-चैकोर शीशों पर झिलमिला रही है, जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसा मसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है। मोमबत्तियों का धुआँ धूप में नीली-सी लकीर खींचता हुआ हवा में तिरने लगा है। पियानो के क्षणिक ‘पोज’ में लतिका को पत्तों का परिचित मर्मर कहीं दूर अनजानी दिशा से आता हुआ सुनायी दे जाता है। एक क्षण के लिए एक भ्रम हुआ कि चैपल का फीका-सा अँधेरा उस छोटे-से ‘प्रेयर-हॉल’ के चारों कोनों से सिमटता हुआ उसके आस-पास घिर आया है मानों कोई उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे यहाँ तक ले आया हो और अचानक उसकी आँखें खोल दी हों। उसे लगा कि जैसे मोमबत्तियों के धूमिल आलोक में कुछ भी ठोस, वास्तविक न रहा हो-चैपल की छत, दीवारें, डेस्क पर रखा हुआ डाक्टर का सुघड़-सुडौल हाथ और पियानो के सुर अतीत की धुन्ध को भेदते हुए स्वयं उस धुन्ध का भाग बनते जा रहे हों।

एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रान्त भावना-चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा, हवा में झुकी हुई वीपिंग विलोज की काँपती टहनियाँ, पैरों तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़….खड़…। वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिटरी का खाकी हैट लिये खड़ा है-चौड़े, उठे हुए, सबल कन्धे, अपना सिर वहाँ टिका दो, तो जैसे सिमटकर खो जायेगा, चार्ल्स बोयर, यह नाम उसने रखा था, वह झेंपकर हँसने लगा। “तुम्हें आर्मी में किसने चुन लिया, मेजर बन गये हो, लेकिन लड़कियों से भी गये बीते हो, ज़रा-ज़रा-सी बात पर चेहरा लाल हो जाता है।” यह सब वह कहती नहीं, सिर्फ सोचती भर थी, सोचा था कभी कहूँगी, वह ‘कभी’ कभी नहीं आया, बुरुस का लाल फूल लाये हो न झूठे खाकी कमीज के जिस जेब पर बैज चिपके थे, उसमें से मुसा हुआ बुरुस का फूल निकल आया। छिः सारा मुरझा गया अभी खिला कहाँ है? (हाउ क्लन्जी) उसके बालों में गिरीश का हाथ उलझ रहा है-फूल कहीं टिक नहीं पाता, फिर उसे क्लिप के नीचे फँसाकर उसने कहा- देखो

वह मुड़ी और इससे पहले कि वह कुछ कह पाती, गिरीश ने अपना मिलिटरी का हैट धप से उसके सिर पर रख दिया। वह मन्त्रमुग्ध-सी वैसी ही खड़ी रही। उसके सिर पर गिरीश का हैट है-माथे पर छोटी-सी बिन्दी है। बिन्दी पर उड़ते हुए बाल है। गिरीश ने उस बिन्दी को अपने होंठों से छुआ है, उसने उसके नंगे सिर को अपने दोनों हाथों में समेट लिया है – लतिका

गिरीश ने चिढ़ाते हुए कहा- मैन ईटर आफ कुमाऊँ- (उसका यह नाम गिरीश ने उसे चिढ़ाने के लिए रखा था)… वह हँसने लगी। “लतिका…. सुनो!” गिरीश का स्वर कैसा हो गया था! “ना, मैं कुछ भी नहीं सुन रही।” “लतिका… मैं कुछ महीनों में वापिस लौट आऊँगा” “ना… मैं कुछ भी नहीं सुन रही” किन्तु वह सुन रही है- वह नहीं जो गिरीश कह रहा है, किन्तु वह जो नहीं कहा जा रहा है, जो उसके बाद कभी नहीं कहा गया… लीड काइण्डली लाइट…

लड़कियों का स्वर पियानो के सुरों में डूबा हुआ गिर रहा है, उठ रहा है. .ह्यूबर्ट ने सिर मोड़कर लतिका को निमिष भर देखा, आँखें मूँदे ध्यानमग्ना प्रस्तर मूर्ति-सी वह स्थिर निश्चल खड़ी थी। क्या यह भाव उसके लिए है? क्या लतिका ने ऐसे क्षणों में उसे अपना साथी बनाया है? ह्यूबर्ट ने एक गहरी साँस ली और उस साँस में ढेर-सी थकान उमड़ आयी। “देखो… मिस वुड कुर्सी पर बैठे-बैठे सो रही है” डाक्टर होंठों में ही फुसफुसाया। यह डाक्टर का पुराना मजाक था कि मिस वुड प्रार्थना करने के बहाने आँखे मूँदे हुए नींद की झपकियाँ लेती है।

फादर एल्मण्ड ने कुर्सी पर फैले अपने गाउन को समेट लिया और प्रेयर बुक बंद करके मिस वुड के कानों में कुछ कहा। पियानो का स्वर क्रमशः मन्द पड़ने लगा, ह्यूबर्ट की अँगुलियाँ ढीली पड़ने लगी। सर्विस के समाप्त होने से पूर्व मिस वुड ने आर्डर पढ़कर सुनाया। बारिश होने की आशंका से आज के कार्यक्रम में कुछ आवश्यक परिवर्तन करने पड़े थे। पिकनिक के लिए झूला देवी के मन्दिर जाना सम्भव नहीं हो सकेगा, इसलिए स्कूल से कुछ दूर ‘मीडोज’ में ही सब लड़कियाँ नाश्ते के बाद जमा होंगी। सब लड़कियों को दोपहर का ‘लंच’ होस्टल किचन से ही ले जाना होगा, केवल शाम की चाय ‘मीडोज’ में बनेगी।

पहाड़ों की बारिश का क्या भरोसा? कुछ देर पहले धुआँधार बादल गरज रहे थे, सारा शहर पानी में भीगा ठिठुर रहा था- अब धूप में नहाता नीला आकाश धुन्ध की ओट से बाहर निकलता हुआ फैल रहा था। लतिका ने चैपल से बाहर आते हुए देखा-वीपिंग बिलोज की भीगी शाखाओं से धूप में चमकती हुई बारिश की बूँदे टपक रही थीं, लड़कियाँ चैपल से बाहर निकलकर छोटे-छोटे गुच्छे बनाकर कॉरीडोर में जमा हो गयी हैं, नाश्ते के लिए अभी पौन घण्टा पड़ा था और उनमें से अभी कोई भी लड़की होस्टल जाने के लिए इच्छुक नहीं थी। छुट्टियाँ अभी शुरू नहीं हुई थीं, किन्तु शायद इसीलिए वे इन चन्द बचे-खुचे क्षणों में अनुशासन के भीतर भी मुक्त होने का भरपुर आनन्द उठा लेना चाहती थीं।

मिस वुड को लड़कियों का यह गुल-गपाड़ा अखरा, किन्तु फादर एल्मण्ड के सामने वह उन्हें डाँट-फटकार नहीं सकी। अपनी झुँझलाहट दबाकर वह मुस्कराते हुए बोली- “कल सब चली जायेंगी, सारा स्कूल वीरान हो जायेगा।” फादर एल्मण्ड का लम्बा ओजपूर्ण चेहरा चैपल की घुटी हुई गरमाई से लाल हो उठा था। कॉरीडोर के जंगले पर अपनी छड़ी लटकाकर वह बोले – “छुट्टियों में पीछे हॉस्टल में कौन रहेगा?” “पिछले दो-तीन सालों से मिस लतिका ही रह रही हैं।” “और डाक्टर मुकर्जी छुट्टियों में कहीं नहीं जाते?” “डाक्टर तो सर्दी-गर्मी यहीं रहते हैं।” मिस वुड ने विस्मय से फादर की ओर देखा। वह समझ नहीं सकी कि फादर ने डाक्टर का प्रसंग क्यों छेड़ दिया है!

“डाक्टर मुकर्जी छुट्टियों में कहीं नहीं जाते?” “दो महीने की छुट्टियों में बर्मा जाना काफी कठिन है, फादर!” – मिस वुड हँसने लगी।

“मिस वुड, पता नहीं आप क्या सोचती हैं। मुझे तो मिस लतिका का होस्टल में अकेले रहना कुछ समझ में नहीं आता।” “लेकिन फादर,” मिस वुड ने कहा, “यह तो कान्वेन्ट स्कूल का नियम है कि कोई भी टीचर छुट्टियों में अपने खर्चे पर होस्टल में रह सकते हैं।” “मैं फिलहाल स्कूल के नियमों की बात नहीं कर रहा। मिस लतिका डाक्टर के संग यहाँ अकेली ही रह जायेंगी और सच पूछिए मिस वुड, डाक्टर के बारे में मेरी राय कुछ बहुत अच्छी नहीं है।” “फादर, आप कैसी बात कर रहे हैं? मिस लतिका बच्चा थोड़े ही है।” मिस वुड को ऐसी आशा नहीं थी कि फादर एल्मण्ड अपने दिल में ऐसी दकियानूसी भावना को स्थान देंगे।

फादर एल्मण्ड कुछ हतप्रभ-से हो गये, बात पलटते हुए बोले- “मिस वुड, मेरा मतलब यह नहीं था। आप तो जानती हैं, मिस लतिका और उस मिलिटरी अफसर को लेकर एक अच्छा-खासा स्कैण्डल बन गया था, स्कूल की बदनामी होने में क्या देर लगती है” “वह बेचारा तो अब नहीं रहा। मैं उसे जानती थी फादर! ईश्वर उसकी आत्मा को शान्ति दे।” मिस वुड ने धीरे-से अपनी दोनों बाँहों से क्रास किया।

फादर एल्मण्ड को मिस वुड की मुर्खता पर इतना अधिक क्षोभ हुआ कि उनसे आगे और कुछ नहीं बोला गया। डाक्टर मुकर्जी से उनकी कभी नहीं पटती थी, इसलिए मिस वुड की आँखों में वह डाक्टर को नीचा दिखाना चाहते थे। किन्तु मिस वुड लतिका का रोना ले बैठी। आगे बात बढ़ाना व्यर्थ था। उन्होंने छड़ी को जंगले से उठाया और ऊपर साफ खुले आकाश को देखते हुए बोले- “प्रोग्राम आपने यूँ ही बदला, मिस वुड, अब क्या बारिश होगी।”

ह्यूबर्ट जब चैपल से बाहर निकला तो उसकी आँखें चकाचैंध-सी हो गईं। उसे लगा जैसे किसी ने अचानक ढेर-सी चमकीली उबलती हुई रोशनी मुट्ठी में भरकर उसकी आँखों में झोंक दी हो। पियानो के संगीत के सुर रुई के छुई-मुई रेशों की भाँति अब तक उसके मस्तिष्क की थकी-माँदी नसों पर फड़फड़ा रहे थे। वह काफी थक गया था। पियानो बजाने से उसके फेफड़ों पर हमेशा भारी दबाव पड़ता, दिल की धड़कन तेज हो जाती थी। उसे लगता था कि संगीत के एक नोट को दूसरे नोट में उतारने के प्रयत्न में वह एक अँधेरी खाई पार कर रहा है।

आज चैपल में मैंने जो महसूस किया, वह कितना रहस्यमय, कितना विचित्र था, ह्यूबर्ट ने सोचा। मुझे लगा, पियानो का हर नोट चिरन्तन खामोशी की अँधेरी खोह से निकलकर बाहर फैली नीली धुन्ध को काटता, तराशता हुआ एक भूला-सा अर्थ खींच लाता है। गिरता हुआ हर ‘पोज’ एक छोटी-सी मौत है, मानो घने छायादार वृक्षों की काँपती छायाओं में कोई पगडण्डी गुम हो गयी हो, एक छोटी-सी मौत जो आनेवाले सुरों को अपनी बची-खुची गूँजों की साँसे समर्पित कर जाती है, जो मर जाती है, किन्तु मिट नहीं पाती, मिटती नहीं इसलिए मरकर भी जीवित है, दूसरे सुरों में लय हो जाती है।

“डाक्टर, क्या मृत्यु ऐसे ही आती है?” अगर मैं डाक्टर से पूछूँ तो वह हँसकर टाल देगा। मुझे लगता है, वह पिछले कुछ दिनों से कोई बात छिपा रहा है- उसकी हँसी में जो सहानुभूति का भाव होता है, वह मुझे अच्छा नहीं लगता। आज उसने मुझे स्पेशल सर्विस में आने से रोका था – कारण पूछने पर वह चुप रहा था। कौन-सी ऐसी बात है, जिसे मुझसे कहने में डाक्टर कतराता है। शायद मैं शक्की मिजाज होता जा रहा हूँ, और बात कुछ भी नहीं है।

ह्यूबर्ट ने देखा, लड़कियों की कतार स्कूल से होस्टल जानेवाली सड़क पर नीचे उतरती जा रही है। उजली धूप में उनके रंग-बिरंगे रिबन, हल्की आसमानी रंग की फ्रॉकें और सफेद पेटियाँ चमक रही हैं। सीनियर कैम्ब्रिज की कुछ लड़कियों ने चैपल की वाटिका के गुलाब के फूलों को तोड़कर अपने बालों में लगा लिया है कण्टोनमेण्ट के तीन-चार सिपाही लड़कियों को देखते हुए अश्लील मजाक करते हुए हँस रहे हैं और कभी-कभी किसी लड़की की ओर ज़रा झुककर सीटी बजाने लगते हैं।

“हलो मि. ह्यूबर्ट!” ह्यूबर्ट ने चैंककर पीछे देखा। लतिका एक मोटा-सा रजिस्टर बगल में दबाये खड़ी थी। “आप अभी यहीं हैं?” ह्यूबर्ट की दृष्टि लतिका पर टिकी रही। वह क्रीम रंग की पूरी बाँहों की ऊनी जैकट पहने हुई थी। कुमाऊँनी लड़कियों की तरह लतिका का चेहरा गोल था, धूप की तपन से पका गेहुँआ रंग कहीं-कहीं हल्का-सा गुलाबी हो आया था, मानों बहुत धोने पर भी गुलाल के कुछ धब्बे इधर-उधर बिखरे रह गये हों। “उन लड़कियों के नाम नोट करने थे, जो कल जा रही हैं सो पीछे रुकना पड़ा। आप भी तो कल जा रहे हैं मि. ह्यूबर्ट?” “अभी तक तो यही इरादा है। यहाँ रुककर भी क्या करूँगा। आप स्कूल की ओर जा रही हैं?“ “चलिए”

पक्की सड़क पर लड़कियों की भीड़ जमा थी, इसलिए वे दोनों पोलो ग्राउण्ड का चक्कर काटती हुई पगडण्डी से नीचे उतरने लगे। हवा तेज हो चली। चीड़ के पत्ते हर झोंके के संग टूट-टूटकर पगडण्डी पर ढेर लगाते जाते थे। ह्यूबर्ट रास्ता बनाने के लिए अपनी छड़ी से उन्हें बुहारकर दोनों ओर बिखेर देता था। लतिका पीछे खड़ी हुई देखती रहती थी। अल्मोड़ा की ओर से आते हुए छोटे-छोटे बादल रेशमी रूमालों से उड़ते हुए सूरज के मुँह पर लिपटे से जाते थे, फिर हवा में बह निकलते थे। इस खेल में धूप कभी मन्द, फीकी-सी पड़ जाती थी, कभी अपना उजला आँचल खोलकर समूचे शहर को अपने में समेट लेती थी।

लतिका तनिक आगे निकल गयी। ह्यूबर्ट की साँस चढ़ गयी थी और वह धीरे-धीरे हाँफता हुआ पीछे से आ रहा था। जब वे पोलोग्राउण्ड के पवेलियन को छोड़कर सिमिट्री के दायीं और मुडे, तो लतिका ह्यूबर्ट की प्रतीक्षा करने के लिए खड़ी हो गयी। उसे याद आया, छुट्टियों के दिनों में जब कभी कमरे में अकेले बैठे-बैठे उसका मन ऊब जाता था, तो वह अक्सर टहलते हुए सिमिट्री तक चली जाती थी। उससे सटी पहाड़ी पर चढ़कर वह बर्फ में ढँके देवदार वृक्षों को देखा करती थी। जिनकी झुकी हुई शाखों से रुई के गोलों-सी बर्फ नीचे गिरा करती थी, नीचे बाजार जानेवाली सड़क पर बच्चे स्लेज पर फिसला करते थे। वह खड़ी-खड़ी बर्फ में छिपी हुई उस सड़क का अनुमान लगाया करती थी जो फादर एल्मण्ड के घर से गुजरती हुई मिलिटरी अस्पताल और डाकघर से होकर चर्च की सीढ़ियों तक जाकर गुम हो जाती थी। जो मनोरंजन एक दुर्गम पहेली को सुलझाने में होता है, वही लतिका को बर्फ में खोये रास्तों को खोज निकालने में होता था।

“आप बहुत तेज चलती हैं, मिस लतिका” – थकान से ह्यूबर्ट का चेहरा कुम्हला गया था। माथे पर पसीने की बूँदे छलक आयी थीं। “कल रात आपकी तबियत क्या कुछ खराब हो गयी थी?” “आपने कैसे जाना? क्या मैं अस्वस्थ दीख रहा हूँ?” ह्यूबर्ट के स्वर में हलकी-सी खीज का आभास था। सब लोग मेरी सेहत को लेकर क्यों बात शुरू करते हैं, उसने सोचा। “नहीं, मुझे तो पता भी नहीं चलता, वह तो सुबह करीमुद्दीन ने बातों-ही-बातों में जिक्र छेड़ दिया था।” लतिका कुछ अप्रतिभ-सी हो आयी। “कोई खास बात नहीं, वही पुराना दर्द शुरू हो गया था, अब बिल्कुल ठीक है।” अपने कथन की पुष्टि के लिए ह्यूबर्ट छाती सीधी करके तेज कदम बढ़ाने लगा। “डाक्टर मुकर्जी को दिखलाया था?” “वह सुबह आये थे। उनकी बात कुछ समझ में नहीं आती। हमेशा दो बातें एक-दूसरे से उल्टी कहते हैं। कहते थे कि इस बार मुझे छह-सात महीने की छुट्टी लेकर आराम करना चाहिए, लेकिन अगर मैं ठीक हूँ, तो भला इसकी क्या जरूरत है?”

ह्यूबर्ट के स्वर में व्यथा की छाया लतिका से छिपी न रह सकी। बात को टालते हुए उसने कहा – “आप तो नाहक चिन्ता करते हैं, मि. ह्यूबर्ट! आजकल मौसम बदल रहा है, अच्छे भले आदमी तक बीमार हो जाते हैं।” ह्यूबर्ट का चेहरा प्रसन्नता से दमकने लगा। उसने लतिका को ध्यान से देखा। वह अपने दिल का संशय मिटाने के लिए निश्चिन्त हो जाना चाहता था कि कहीं लतिका उसे केवल दिलासा देने के लिए ही तो झूठ नहीं बोल रही। “यही तो मैं सोच रहा था, मिस लतिका! डाक्टर की सलाह सुनकर मैं डर ही गया। भला छह महीने की छुट्टी लेकर मैं अकेला क्या करूँगा। स्कूल में तो बच्चों के संग मन लगा रहता है। सच पूछो तो दिल्ली में ये दो महीनों की छुट्टियाँ काटना भी दूभर हो जाता है।”

“मि. ह्यूबर्ट….कल आप दिल्ली जा रहे हैं?” लतिका चलते-चलते हठात् ठिठक गयी। सामने पोलो-ग्राउण्ड फैला था, जिसके दूसरी ओर मिलिटरी की ट्रकें कण्टोनमेण्ट की ओर जा रही थीं। ह्यूबर्ट को लगा, जैसे लतिका की आँखें अधमुँदी-सी खुली रह गयी हैं, मानों पलकों पर एक पुराना भूला-सा सपना सरक आया है।

“मि.ह्यूबर्ट…आप दिल्ली जा रहे हैं,” इस बार लतिका ने प्रश्न नहीं दुहराया उसके स्वर में केवल एक असीम दूरी का भाव घिर आया। “बहुत अर्सा पहले मैं भी दिल्ली गयी थी, मि. ह्यूबर्ट! तब मैं बहुत छोटी थी, न जाने कितने बरस बीत गये। हमारी मौसी का ब्याह वहीं हुआ था। बहुत-सी चीजें देखी थीं, लेकिन अब तो सब कुछ धुँधला-सा पड़ गया है। इतना याद है कि हम कुतुब पर चढ़े थे। सबसे ऊँची मंजिल से हमने नीचे झाँका था, न जाने कैसा लगा था। नीचे चलते हुए आदमी चाभी भरे हुए खिलौनों-से लगते थे। हमने ऊपर से उन पर मूँगफलियाँ फेंकी थीं, लेकिन हम बहुत निराश हुए थे क्योंकि उनमें से किसी ने हमारी तरफ नहीं देखा। शायद माँ ने मुझे डाँटा था, और मैं सिर्फ नीचे झाँकते हुए डर गयी थी। सुना है, अब तो दिल्ली इतना बदल गया है कि पहचाना नहीं जाता”

वे दोनों फिर चलने लगे। हवा का वेग ढीला पड़ने लगा। उड़ते हुए बादल अब सुस्ताने से लगे थे, उनकी छायाएँ नन्दा देवी और पंचचूली की पहाड़ियों पर गिर रही थीं। स्कूल के पास पहुँचते-पहुँचते चीड़ के पेड़ पीछे छूट गये, कहीं-कहीं खुबानी के पेड़ों के आस-पास बुरुस के लाल फूल धूप में चमक जाते थे। स्कूल तक आने में उन्होंने पोलोग्राउण्ड का लम्बा चक्कर लगा लिया था। “मिस लतिका, आप कहीं छुट्टियों में जाती क्यों नहीं, सर्दियों में तो यहाँ सब कुछ वीरान हो जाता होगा?”

“अब मुझे यहाँ अच्छा लगता है,” लतिका ने कहा, “पहले साल अकेलापन कुछ अखरा था, अब आदी हो चुकी हूँ। क्रिसमस से एक रात पहले क्लब में डान्स होता है, लाटरी डाली जाती है और रात को देर तक नाच-गाना होता रहता है। नये साल के दिन कुमाऊँ रेजीमेण्ट की ओर से परेड-ग्राउण्ड में कार्नीवाल किया जाता है, बर्फ पर स्केटिंग होती है, रंग-बिरंगे गुब्बारों के नीचे फौजी बैण्ड बजता है, फौजी अफसर फैन्सी ड्रेस में भाग लेते हैं, हर साल ऐसा ही होता है, मि. ह्यूबर्ट। फिर कुछ दिनों बाद विण्टर स्पोट्र्स के लिए अंग्रेज टूरिस्ट आते हैं। हर साल मैं उनसे परिचित होती हूँ, वापिस लौटते हुए वे हमेशा वादा करते हैं कि अगले साल भी आयेंगे, पर मैं जानती हूँ कि वे नहीं आयेंगे, वे भी जानते हैं कि वे नहीं आयेंगे, फिर भी हमारी दोस्ती में कोई अंतर नहीं पड़ता। फिर…फिर कुछ दिनों बाद पहाड़ों पर बर्फ पिघलने लगती है, छुट्टियाँ खत्म होने लगती हैं, आप सब लोग अपने-अपने घरों से वापिस लौट आते हैं – और मि. ह्यूबर्ट पता भी नहीं चलता कि छुट्टियाँ कब शुरू हुई थीं, कब खत्म हो गईं”

लतिका ने देखा कि ह्यूबर्ट उसकी ओर आतंकित भयाकुल दृष्टि से देख रहा है। वह सिटपिटाकर चुप हो गयी। उसे लगा, मानों वह इतनी देर से पागल-सी अनर्गल प्रलाप कर रही हो। “मुझे माफ करना मि. ह्यूबर्ट, कभी-कभी मैं बच्चों की तरह बातों में बहक जाती हूँ।” “मिस लतिका…” ह्यूबर्ट ने धीरे-से कहा। वह चलते-चलते रुक गया था। लतिका ह्यूबर्ट के भारी स्वर से चौंक-सी गयी। “क्या बात है मि. ह्यूबर्ट?” “वह पत्र उसके लिए मैं लज्जित हूँ। उसे आप वापिस लौटा दें, समझ लें कि मैंने उसे कभी नहीं लिखा था।”

लतिका कुछ समझ न सकी, दिग्भ्रान्त-सी खड़ी हुई ह्यूबर्ट के पीले उद्धिग्न चेहरे को देखती रही। ह्यूबर्ट ने धीरे-से लतिका के कन्धे पर हाथ रख दिया। “कल डाक्टर ने मुझे सबकुछ बता दिया। अगर मुझे पहले से मालूम होता तो…तो” ह्यूबर्ट हकलाने लगा। “मि. ह्यूबर्ट…” किन्तु लतिका से आगे कुछ भी नहीं कहा गया। उसका चेहरा सफेद हो गया था।

दोनों चुपचाप कुछ देर तक स्कूल के गेट के बाहर खड़े रहे। मीडोज…पगडण्डियों, पत्तों, छायाओं से घिरा छोटा-सा द्वीप, मानों कोई घोंसला दो हरी घाटियों के बीच आ दबा हो। भीतर घूसते ही पिकनिक के काले आग से झुलसे हुए पत्थर, अधजली टहनियाँ, बैठने के लिए बिछाये गये पुराने अखबारों के टुकड़े इधर-उधर बिखरे हुए दिखायी दे जाते हैं। अक्सर टूरिस्ट पिकनिक के लिए यहाँ आते हैं। मीडोज को बीच में काटता हुआ टेढ़ा-मेढ़ा बरसाती नाला बहता है, जो दूर से धूप में चमकता हुआ सफेद रिबन-सा दिखायी देता है।

यहीं पर काठ के तख्तों का बना हुआ टूटा-सा पुल है, जिस पर लड़कियाँ हिचकोले खाते हुए चल रही हैं।

“डाक्टर मुकर्जी, आप तो सारा जंगल जला देंगे”। मिस वुड ने अपनी ऊँची एड़ी के सैण्डल से जलती हुई दियासलाई को दबा डाला, जो डाक्टर ने सिगार सुलगाकर चीड़ के पत्तों के ढेर पर फेंक दी थी। वे नाले से कुछ दूर हटकर चीड़ के दो पेड़ों से गुँथी हुई छाया के नीचे बैठे थे। उनके सामने एक छोटा-सा रास्ता नीचे पहाड़ी गाँव की ओर जाता था, जहाँ पहाड़ की गोद में शकरपारों के खेत एक-दूसरे के नीचे बिछे हुए थे। दोपहर के सन्नाटे में भेड़-बकरियों के गलों में बँधी हुई धण्टियों का स्वर हवा में बहता हुआ सुनायी दे जाता था। घास पर लेटे-लेटे डाक्टर सिगार पीते रहे। “जंगल की आग कभी देखी है, मिस वुड…एक अलमस्त नशे की तरह धीरे-धीरे फैलती जाती है।”

“आपने कभी देखी है डाक्टर?” मिस वुड ने पूछा, “मुझे तो बड़ा डर लगता है।”

“बहुत साल पहले शहरों को जलते हुए देखा था।” डाक्टर लेटे हुए आकाश की ओर ताक रहे थे। “एक-एक मकान” ताश के पत्तों की तरह गिरता जाता। दुर्भाग्यवश ऐसे अवसर देखने में बहुत कम आते हैं।

“आपने कहाँ देखा, डाक्टर?”

“लड़ाई के दिनों में अपने शहर रंगून को जलते हुए देखा था।” मिस वुड की आत्मा को ठेस लगी, किन्तु फिर भी उनकी उत्सुकता शान्त नहीं हुई।

“आपका घर, क्या वह भी जल गया था?”

डाक्टर कुछ देर तक चुपचाप लेटा रहा।

“हम उसे खाली छोड़कर चले आये थे, मालूम नहीं बाद में क्या हुआ।” अपने व्यक्तिगत जीवन के सम्बन्ध में कुछ भी कहने में डाक्टर को कठिनाई महसूस होती है।

“डाक्टर, क्या आप कभी वापिस बर्मा जाने की बात नहीं सोचते?” डाक्टर ने अँगड़ाई ली और करवट बदलकर औंधे मुँह लेट गये। उनकी आँखें मुँद गईं और माथे पर बालों की लटें झूल आयीं।

“सोचने से क्या होता है मिस वुड… जब बर्मा में था, तब क्या कभी सोचा था कि यहाँ आकर उम्र काटनी होगी?”

“लेकिन डाक्टर, कुछ भी कह लो, अपने देश का सुख कहीं और नहीं मिलता। यहाँ तुम चाहे कितने वर्ष रह लो, अपने को हमेशा अजनबी ही पाओगे।”

डाक्टर ने सिगार के धुएँ को धीरे-धीरे हवा में छोड़ दिया- “दरअसल अजनबी तो मैं वहाँ भी समझा जाऊँगा, मिस वुड। इतने वर्षों बाद मुझे कौन पहचानेगा! इस उम्र में नये सिरे से रिश्ते जोड़ना काफी सिरदर्द का काम है, कम-से-कम मेरे बस की बात नहीं है।”

“लेकिन डाक्टर, आप कब तक इस पहाड़ी कस्बे में पड़े रहेंगे, इसी देश में रहना है तो किसी बड़े शहर में प्रैक्टिस शुरू कीजिए।”

“प्रैक्टिस बढ़ाने के लिए कहाँ-कहाँ भटकता फिरूँगा, मिस वुड। जहाँ रहो, वहीं मरीज मिल जाते हैं। यहाँ आया था कुछ दिनों के लिए, फिर मुद्दत हो गयी और टिका रहा। जब कभी जी ऊबेगा, कहीं चला जाऊँगा। जड़ें कहीं नहीं जमतीं, तो पीछे भी कुछ नहीं छूट जाता। मुझे अपने बारे में कोई गलतफहमी नहीं है मिस वुड, मैं सुखी हूँ।”

मिस वुड ने डाक्टर की बात पर विशेष ध्यान नहीं दिया। दिल में वह हमेशा डाक्टर को उच्छृंखल, लापरवाह और सनकी समझती रही है, किन्तु डाक्टर के चरित्र में उनका विश्वास है, न जाने क्यों, क्योंकि डाक्टर ने जाने-अनजाने में उसका कोई प्रमाण दिया हो, यह उन्हें याद नहीं पड़ता।

मिस वुड ने एक ठण्डी साँस भरी। वह हमेशा यह सोचती थी कि यदि डाक्टर इतना आलसी और लापरवाह न होता, तो अपनी योग्यता के बल पर काफी चमक सकता था। इसलिए उन्हें डाक्टर पर क्रोध भी आता था और दुख भी होता था।

मिस वुड ने अपने बैग से ऊन का गोला और सलाइयाँ निकालीं, फिर उसके नीचे से अखबार में लिपटा हुआ चौड़ा कॉफी का डिब्बा उठाया, जिसमें अण्डों की सैण्डविचें और हैम्बर्गर दबे हुए थे। थर्मस से प्यालों में कॉफी उंडेलते हुए मिस वुड ने कहा – “डाक्टर, कॉफी ठण्डी हो रही है”

डाक्टर लेटे-लेटे बुड़बुड़ाया। मिस वुड ने नीचे झुककर देखा, वह कोहनी पर सिर टिकाये सो रहा था। ऊपर का होंठ जरा-सा फैलकर मुड़ गया था, मानों किसी से मजाक करने से पहले मुस्करा रहा हो।

उसकी अँगुलियों में दबा हुआ सिगार नीचे झुका हुआ लटक रहा था। “मेरी, मेरी, वाट डू यू वाण्ट, वाट डू यू वाण्ट?” दूसरे स्टैण्डर्ड में पढ़नेवाली मेरी ने अपनी चंचल, चपल आँखें ऊपर उठायीं, लड़कियों का दायरा उसे घेरे हुए कभी पास आता था, कभी दूर खिंचता चला जाता था।

“आई वाण्ट… आई वाण्ट ब्लू” दोनों हाथों को हवा में घुमाते हुए मेरी चिल्लायी। दायरा पानी की तरह टूट गया। सब लड़कियाँ एक-दूसरे पर गिरती-पड़ती किसी नीली वस्तु को छूने के लिए भाग-दौड़ करने लगीं। लंच समाप्त हो चुका था। लड़कियों के छोटे-छोटे दल मीडोज में बिखर गये थे। ऊँची क्लास की कुछ लड़कियाँ चाय का पानी गर्म करने के लिए पेड़ों पर चढ़कर सूखी टहनियाँ तोड़ रही थीं।

दोपहर की उस घड़ी में मीडोज अलसाया-ऊँघता-सा जान पड़ता था। हवा का कोई भूला-भटका झोंका, चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर ऊबकर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था।

किन्तु जंगल की खामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाजें नीरवता के हल्के झीने परदे पर सलवटें बिछा जाती हैं, मूक लहरों-सी हवा में तिरती हैं, मानों कोई दबे पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है- “देखो मैं यहाँ हूँ” लतिका ने जूली के ‘बाब हेयर’ को सहलाते हुए कहा, “तुम्हें कल रात बुलाया था।”

“मैडम, मैं गयी थी, आप अपने कमरे में नहीं थीं।” लतिका को याद आया कि रात वह डाक्टर के कमरे के टैरेस पर देर तक बैठी रही थी और भीतर ह्यूबर्ट पियानो पर शोपाँ का नौक्टर्न बजा रहा था। “जूली, तुमसे कुछ पूछना था।” उसे लगा, वह जूली की आँखों से अपने को बचा रही है। जूली ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी भूरी आँखों से कौतूहल झाँक रहा था।

“तुम आफिसर्स मेस में किसी को जानती हो?” जूली ने अनिश्चित भाव से सिर हिलाया। लतिका कुछ देर तक जूली को अपलक घूरती रही।

“जूली, मुझे विश्वास है, तुम झूठ नहीं बोलोगी।” कुछ क्षण पहले जूली की आँखों में जो कौतूहल था, वह भय से परिणत होने लगा। लतिका ने अपनी जैकेट की जेब से एक नीला लिफाफा निकालकर जूली की गोद में फेंक दिया। “यह किसकी चिट्ठी है?”

जूली ने लिफाफा उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, किन्तु फिर एक क्षण के लिए उसका हाथ काँपकर ठिठक गया-लिफाफे पर उसका नाम और होस्टल का पता लिखा हुआ था।

“थैंक यू मैडम, मेरे भाई का पत्र है, वह झाँसी में रहते हैं।” जूली ने घबराहट में लिफाफे को अपने स्कर्ट की तहों में छिपा लिया। “जूली, ज़रा मुझे लिफाफा दिखलाओ।” लतिका का स्वर तीखा, कर्कश-सा हो आया।

जूली ने अनमने भाव से लतिका को पत्र दे दिया। “तुम्हारे भाई झाँसी में रहते हैं?” जूली इस बार कुछ नहीं बोली। उसकी उद्भ्रान्त उखड़ी-सी आँखें लतिका को देखती रहीं। “यह क्या है?”

जूली का चेहरा सफेद, फक पड़ गया। लिफाफे पर कुमाऊँ रेजीमेण्टल सेण्टर की मुहर उसकी ओर घूर रही थी। “कौन है यह?” लतिका ने पूछा। उसने पहले भी होस्टल में उड़ती हुई अफवाह सुनी थी कि जूली को क्लब में किसी मिलिटरी अफसर के संग देखा गया था, किन्तु ऐसी अफवाहें अक्सर उड़ती रहती थीं, और उसने उन पर विश्वास नहीं किया था। “जूली, तुम अभी बहुत छोटी हो” जूली के होंठ काँपे-उसकी आँखों में निरीह याचना का भाव घिर आया।

“अच्छा अभी जाओ, तुमसे छुट्टियों के बाद बातें करूँगी।” जूली ने ललचाई दृष्टि से लिफाफे को देखा, कुछ बोलने को उद्यत हुई, फिर बिना कुछ कहे चुपचाप वापिस लौट गयी।

लतिका देर तक जूली को देखती रही, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गयी। क्या मैं किसी खूँसट बुढ़िया से कम हूँ? अपने अभाव का बदला क्या मैं दूसरों से ले रही हूँ?

शायद, कौन जाने… शायद जूली का यह प्रथम परिचय हो, उस अनुभूति से, जिसे कोई भी लड़की बड़े चाव से सँजोकर, सँभालकर अपने में छिपाये रहती है, एक अनिर्वचनीय सुख, जो पीड़ा लिये है, पीड़ा और सुख को डुबोती हुई उमड़ते ज्वर की खुमारी, जो दोनों को अपने में समो लेती है एक दर्द, जो आनन्द से उपजा है और पीड़ा देता है।

यहीं इसी देवदार के नीचे उसे भी यही लगा था, जब गिरीश ने पूछा था-“तुम चुप क्यों हो?” वह आँखें मूँदे सोच रही थी, सोच कहाँ रही थी, जी रही थी, उस क्षण को जो भय और विस्मय के बीच भिंचा था-बहका-सा पागल क्षण। वह अभी पीछे मुड़ेगी तो गिरीश की ‘नर्वस’ मुस्कराहट दिखायी दे जायेगी, उस दिन से आज दोपहर तक का अतीत एक दुःस्वप्न की मानिन्द टूट जाएगा। वही देवदार है, जिस पर उसने अपने बालों के क्लिप से गिरीश का नाम लिखा था। पेड़ की छाल उतरती नहीं थी, क्लिप टूट-टूट जाता था, तब गिरीश ने अपने नाम के नीचे उसका नाम लिखा था। जब कभी कोई अक्षर बिगड़कर ढेढ़ा-मेढ़ा हो जाता था तब वह हँसती थी, और गिरीश का काँपता हाथ और भी काँप जाता था।

लतिका को लगा कि जो वह याद करती है, वही भूलना भी चाहती है, लेकिन जब सचमुच भूलने लगती है, तब उसे भय लगता है कि जैसे कोई उसकी किसी चीज को उसके हाथों से छीने लिये जा रहा है, ऐसा कुछ जो सदा के लिए खो जायेगा। बचपन में जब कभी वह अपने किसी खिलौने को खो देती थी, तो वह गुमसुम-सी होकर सोचा करती थी, कहाँ रख दिया मैंने। जब बहुत दौड़-धूप करने पर खि़लौना मिल जाता, तो वह बहाना करती कि अभी उसे खोज ही रही है, कि वह अभी मिला नहीं है। जिस स्थान पर खिलौना रखा होता, जान-बूझकर उसे छोड़कर घर के दूसरे कोने में उसे खोजने का उपक्रम करती। तब खोई हुई चीज याद रहती, इसलिए भूलने का भय नहीं रहता था।

आज वह उस बचपन के खेल का बहाना क्यों नहीं कर पाती? ‘बहाना’शायद करती है, उसे याद करने का बहाना, जो भूलता जा रहा है…दिन, महीने बीत जाते हैं, और वह उलझी रहती है, अनजाने में गिरीश का चेहरा धुँधला पड़ता जाता है, याद वह करती है, किन्तु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल भरे शीशे को साफ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता, सिर्फ उसको याद करती है, जो पहले कभी होता था, तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है, खुद-ब-खुद उसकी कोशिशों के बावजूद भरता जा रहा है। देवदार पर खुदे हुए अधमिटे नाम लतिका की ओर निस्तब्ध निरीह भाव से निहार रहे थे। मीडोज के घने सन्नाटे में नाले पार से खेलती हुई लड़कियों की आवाजें गूँज जाती थीं…वाट डू यू वाण्ट? वाट डू यू वाण्ट?

तितलियाँ, झींगुर, जुगनू…मीडोज पर उतरती हुई साँझ की छायाओं में पता नहीं चलता, कौन आवाज किसकी है? दोपहर के समय जिन आवाजों को अलग-अलग पहचाना जा सकता था, अब वे एकस्वरता की अविरल धारा में घुल गयी थीं। घास से अपने पैरों को पोंछता हुआ कोई रेंग रहा है झाड़ियों के झुरमुट से परों को फड़फड़ाता हुआ झपटकर कोई ऊपर से उड़ जाता है किन्तु ऊपर देखो तो कहीं कुछ भी नहीं है। मीडोज के झरने का गड़गड़ाता स्वर, जैसे अँधेरी सुरंग में झपाटे से ट्रेन गुजर गयी हो, और देर तक उसमें सीटियों और पहियों की चीत्कार गूँजती रही हो।

पिकनिक कुछ देर तक और चलती, किन्तु बादलों की तहें एक-दूसरे पर चढ़ती जा रही थीं। पिकनिक का सामान बटोरा जाने लगा। मीडोज के चारों ओर बिखरी हुई लड़कियाँ मिस वुड के इर्द-गिर्द जमा होने लगीं। अपने संग वे अजीबोगरीब चीजें बटोर लायी थीं। कोई किसी पक्षी के टूटे पंख को बालों में लगाये हुए थी, किसी ने पेड़ की टहनी को चाकू से छीलकर छोटी-सी बेंत बना ली थी। ऊँची क्लास की कुछ लड़कियों ने अपने-अपने रूमालों में नाले से पकड़ी हुई छोटी-छोटी बालिश्त भर की मछलियों को दबा रखा था जिन्हें मिस वुड से छिपकर वे एक-दूसरे को दिखा रही थीं।

मिस वुड लड़कियों की टोली के संग आगे निकल गयीं। मीडोज से पक्की सड़क तक तीन-चार फर्लांग की चढ़ाई थी। लतिका हाँफने लगी। डाक्टर मुकर्जी सबसे पीछे आ रहे थे। लतिका के पास पहुँचकर वह ठिठक गये। डाक्टर ने दोनों घुटनों को जमीन पर टेकते हुए सिर झुकाकर एलिजाबेथयुगीन अंगे्रजी में कहा – “मैडम, आप इतनी परेशान क्यों नजर आ रही हैं?” और डाक्टर की नाटकीय मुद्रा को देखकर लतिका के होंठों पर एक थकी-सी ढीली-ढीली मुस्कराहट बिखर गयी। “प्यास के मारे गला सूख रहा है और यह चढ़ाई है कि खत्म होने में नहीं आती।”

डाक्टर ने अपने कन्धे पर लटकते हुए थर्मस को उतारकर लतिका के हाथों में देते हुए कहा – “थोड़ी-सी कॉफ़ी बची है, शायद कुछ मदद कर सके।” “पिकनिक में तुम कहाँ रह गये डाक्टर, कहीं दिखायी नहीं दिये?” “दोपहर भर सोता रहा-मिस वुड के संग। मेरा मतलब है, मिस वुड पास बैठी थीं।” “मुझे लगता है, मिस वुड मुझसे मुहब्बत करती हैं।” कोई भी मजाक करते समय डाक्टर अपनी मूँछों के कोनों को चबाने लगता है। “क्या कहती थीं?” लतिका ने थर्मस से कॉफी को मुँह में उँडेल लिया। “शायद कुछ कहतीं, लेकिन बदकिस्मती से बीच में ही मुझे नींद आ गयी। मेरी जिन्दगी के कुछ खूबसूरत प्रेम-प्रसंग कम्बख्त इस नींद के कारण अधूरे रह गये हैं।”

और इस दौरान में जब दोनों बातें कर रहे थे, उनके पीछे मीडोज और मोटर रोड के संग चढ़ती हुई चीड़ और बाँज के वृक्षों की कतारें साँझ के घिरते अँधेरे में डूबने लगीं, मानों प्रार्थना करते हुए उन्होंने चुपचाप अपने सिर नीचे झुका लिये हों। इन्हीं पेड़ों के ऊपर बादलों में गिरजे का क्रास कहीं उलझा पड़ा था। उसके नीचे पहाड़ों की ढलान पर बिछे हुए खेत भागती हुई गिलहरियों से लग रहे थे, जो मानों किसी की टोह में स्तब्ध ठिठक गयी हों। “डाक्टर, मि. ह्यूबर्ट पिकनिक पर नहीं आये?” डाक्टर मुकर्जी टार्च जलाकर लतिका के आगे-आगे चल रहे थे। “मैंने उन्हें मना कर दिया था।” “किसलिए?”

अँधेरे में पैरों के नीचे दबे हुए पत्तों की चरमराहट के अतिरिक्त कुछ सुनायी नहीं देता था। डॉक्टर मुकर्जी ने धीरे-से खाँसा। “पिछले कुछ दिनों से मुझे संदेह होता जा रहा है कि ह्यूबर्ट की छाती का दर्द शायद मामूली दर्द नहीं है।” डाक्टर थोड़ा-सा हँसा, जैसे उसे अपनी यह गम्भीरता अरुचिकर लग रही हो।

डाक्टर ने प्रतीक्षा की, शायद लतिका कुछ कहेगी। किन्तु लतिका चुपचाप उसके पीछे चल रही थी। “यह मेरा महज शक है, शायद मैं बिल्कुल गलत होऊँ, किन्तु यह बेहतर होगा कि वह अपने एक फेफड़े का एक्सरे करा लें, इससे कम-से-कम कोई भ्रम तो नहीं रहेगा।” “आपने मि. ह्यूबर्ट से इसके बारे में कुछ कहा है?” “अभी तक कुछ नहीं कहा। ह्यूबर्ट जरा-सी बात पर चिन्तित हो उठता है, इसलिए कभी साहस नहीं हो पाता” डॉक्टर को लगा, उसके पीछे आते हुए लतिका के पैरों का स्वर सहसा बन्द हो गया है। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, लतिका बीच सड़क पर अँधेरे में छाया-सी चुपचाप निश्चल खड़ी है। “डाक्टर…” लतिका का स्वर भर्राया हुआ था। “क्या बात है मिस लतिका, आप रुक क्यों गयी?” “डाक्टर-क्या मि. ह्यूबर्ट…?

डाक्टर ने अपनी टार्च की मद्धिम रोशनी लतिका पर उठा दी…उसने देखा लतिका का चेहरा एकदम पीला पड़ गया है और वह रह-रहकर पत्ते-सी काँप जाती है। “मिस लतिका, क्या बात है, आप तो बहुत डरी-सी जान पड़ती हैं?” “कुछ नहीं डाक्टर, मुझे…मुझे कुछ याद आ गया था” वे दोनों फिर चलने लगे। कुछ दूर जाने पर उनकी आँखें ऊपर उठ गयीं। पक्षियों का एक बेड़ा धूमिल आकाश में त्रिकोण बनाता हुआ पहाड़ों के पीछे से उनकी ओर आ रहा था। लतिका और डाक्टर सिर उठाकर इन पक्षियों को देखते रहे। लतिका को याद आया, हर साल सर्दी की छुट्टियों से पहले ये परिन्दे मैदानों की ओर उड़ते हैं, कुछ दिनों के लिए बीच के इस पहाड़ी स्टेशन पर बसेरा करते हैं, प्रतीक्षा करते हैं बर्फ के दिनों की, जब वे नीचे अजनबी, अनजाने देशों में उड़ जायेंगे।

क्या वे सब भी प्रतीक्षा कर रहे हैं? वह, डाक्टर मुकर्जी, मि. ह्यूबर्ट, लेकिन कहाँ के लिए, हम कहाँ जायेंगे?

किन्तु उसका कोई उत्तर नहीं मिला-उस अँधेरे में मीडोज के झरने के भुतैले स्वर और चीड़ के पत्तों की सरसराहट के अतिरिक्त कुछ सुनायी नहीं देता था। लतिका हड़बड़ाकर चौंक गयी। अपनी छड़ी पर झुका हुआ डाक्टर धीरे-धीरे सीटी बजा रहा था।

“मिस लतिका, जल्दी कीजिए, बारिश शुरू होनेवाली है।” होस्टल पहुँचते-पहुँचते बिजली चमकने लगी थी। किन्तु उस रात बारिश देर तक नहीं हुई। बादल बरसने भी नहीं पाते थे कि हवा के थपेड़ों से धकेल दिये जाते थे। दूसरे दिन तड़के ही बस पकड़नी थी, इसलिए डिनर के बाद लड़कियाँ सोने के लिए अपने-अपने कमरों में चली गयी थीं।

जब लतिका अपने कमरे में गयी, तो उस समय कुमाऊँ रेजीमेण्ट सेण्टर का बिगुल बज रहा था। उसके कमरे में करीमुद्दीन कोई पहाड़ी धुन गुनगुनाता हुआ लैम्प में गैस पम्प कर रहा था। लतिका उन्हीं कपड़ों में, तकिये को दुहरा करके लेट गयी। करीमुद्दीन ने उड़ती हुई निगाह से लतिका को देखा, फिर अपने काम में जुट गया। “पिकनिक कैसी रही मेम साहब?” “तुम क्यों नहीं आये, सब लड़कियाँ तुम्हें पूछ रही थीं?” लतिका को लगा, दिन-भर की थकान धीरे-धीरे उसके शरीर की पसलियों पर चिपटती जा रही है। अनायास उसकी आँखें नींद के बोझ से झपकने लगीं। “मैं चला आता तो ह्यूबर्ट साहब की तीमारदारी कौन करता। दिनभर उनके बिस्तर से सटा हुआ बैठा रहा और अब वह गायब हो गये हैं।” करीमुद्दीन ने कन्धे पर लटकते हुए मैचे-कुचैले तौलिये को उतारा और लैम्प के शीशों की गर्द पोंछने लगा।

लतिका की अधमुँदी आँखें खुल गयी। “क्या ह्यूबर्ट साहब अपने कमरे में नहीं हैं?” “खुदा जाने, इस हालत में कहाँ भटक रहे हैं। पानी गर्म करने कुछ देर के लिए बाहर गया था, वापिस आने पर देखता हूँ कि कमरा खाली पड़ा है।” करीमुद्दीन बड़बड़ाता हुआ बाहर चला गया। लतिका ने लेटे-लेटे पलँग के नीचे चप्पलों को पैरों से उतार दिया।

ह्यूबर्ट इतनी रात कहाँ गये? किन्तु लतिका की आँखें फिर झपक गयीं। दिन-भर की थकान ने सब परेशानियों, प्रश्नों पर कुंजी लगा दी थी, मानों दिन-भर आँख-मिचौनी खेलते हुए उसने अपने कमरे में ‘दय्या’ को छू लिया था। अब वह सुरक्षित थी, कमरे की चहारदीवारी के भीतर उसे कोई नहीं पकड़ सकता। दिन के उजाले में वह गवाह थी, मुजरिम थी, हर चीज का उससे तकाजा था, अब इस अकेलेपन में कोई गिला नहीं, उलाहना नहीं, सब खींचातानी खत्म हो गयी है, जो अपना है, वह बिल्कुल अपना-सा हो गया है, जो अपना नहीं है, उसका दुख नहीं, अपनाने की फुरसत नहीं…

लतिका ने दीवार की ओर मुँह घुमा लिया। लैम्प के फीके आलोक में हवा में काँपते परदों की छायाएँ हिल रही थीं। बिजली कड़कने से खिड़कियों के शीशे-चमक-चमक जाते थे, दरवाजे चटखने लगते थे, जैसे कोई बाहर से धीमे-धीमे खटखटा रहा हो। कॉरीडोर से अपने-अपने कमरों में जाती हुई लड़कियों की हँसी, बातों के कुछ शब्द, फिर सबकुछ शान्त हो गया, किन्तु फिर भी देर तक कच्ची नींद में वह लैम्प का धीमा-सा ‘सी-सी’ स्वर सुनती रही। कब वह स्वर भी मौन का भाग बनकर मूक हो गया, उसे पता न चला। कुछ देर बाद उसको लगा, सीढ़ियों से कुछ दबी आवाजें ऊपर आ रही हैं, बीच-बीच में कोई चिल्ला उठता है, और फिर सहसा आवाजें धीमी पड़ जाती हैं। “मिस लतिका, जरा अपना लैम्प ले आइये” – कॉरिडोर के जीने से डाक्टर मुकर्जी की आवाज आयी थी।

कॉरीडोर में अँधेरा था। वह तीन-चार सीढ़ियाँ नीचे उतरी, लैम्प नीचे किया। सीढ़ियों से सटे जंगले पर ह्यूबर्ट ने अपना सिर रख दिया था, उसकी एक बाँह जंगले के नीचे लटक रही थी और दूसरी डाक्टर के कन्धे पर झूल रही थी, जिसे डाक्टर ने अपने हाथों में जकड़ रखा था। “मिस लतिका, लैम्प ज़रा और नीचे झुका दीजिए….ह्यूबर्ट…ह्यूबर्ट…” डाक्टर ने ह्यूबर्ट को सहारा देकर ऊपर खींचा। ह्यूबर्ट ने अपना चेहरा ऊपर किया। व्हिस्की की तेज बू का झोंका लतिका के सारे शरीर को झिंझोड़ गया। ह्यूबर्ट की आँखों में सुर्ख डोरे खिंच आये थे, कमीज का कालर उलटा हो गया था और टाई की गाँठ ढीली होकर नीचे खिसक आयी थी। लतिका ने काँपते हाथों से लैम्प सीढ़ियों पर रख दिया और आप दीवार के सहारे खड़ी हो गयी। उसका सिर चकराने लगा था।

“इन ए बैक लेन ऑफ द सिटी, देयर इज ए गर्ल हू लव्ज मी…” ह्यूबर्ट हिचकियों के बीच गुनगुना उठता था।

“ह्यूबर्ट प्लीज…प्लीज,” डाक्टर ने ह्यूबर्ट के लड़खड़ाते शरीर को अपनी मजबूत गिरफ्त में ले लिया।

“मिस लतिका, आप लैम्प लेकर आगे चलिए” लतिका ने लैम्प उठाया। दीवार पर उन तीनों की छायाएँ डगमगाने लगीं।

“इन ए बैक लेन ऑफ द सिटी, देयर इज ए गर्ल हू लव्ज मी” ह्यूबर्ट डाक्टर मुकर्जी के कन्धे पर सिर टिकाये अँधेरी सीढ़ियों पर उल्टे-सीधे पैर रखता चढ़ रहा था।

“डाक्टर, हम कहाँ हैं?” ह्यूबर्ट सहसा इतनी जोर से चिल्लाया कि उसकी लड़खड़ाती आवाज सुनसान अँधेरे में कॉरीडोर की छत से टकराकर देर तक हवा में गूँजती रही।

“ह्यूबर्ट…” डाक्टर को एकदम ह्यूबर्ट पर गुस्सा आ गया, फिर अपने गुस्से पर ही उसे खीझ-सी हो आयी और वह ह्यूबर्ट की पीठ थपथपाने लगा। “कुछ बात नहीं है ह्यूबर्ट डियर, तुम सिर्फ थक गये हो।“ ह्यूबर्ट ने अपनी आँखें डाक्टर पर गड़ा दीं, उनमें एक भयभीत बच्चे की-सी कातरता झलक रही थी, मानो डाक्टर के चेहरे से वह किसी प्रश्न का उत्तर पा लेना चाहता हो। ह्यूबर्ट के कमरे में पहुँचकर डाक्टर ने उसे बिस्तरे पर लिटा दिया। ह्यूबर्ट ने बिना किसी विरोध के चुपचाप जूते-मोजे उतरवा दिये। जब डाक्टर ह्यूबर्ट की टाई उतारने लगा, तो ह्यूबर्ट, अपनी कुहनी के सहारे उठा, कुछ देर तक डाक्टर को आँखें फाड़ते हुए घूरता रहा, फिर धीरे-से उसका हाथ पकड़ लिया। “डाक्टर, क्या मैं मर जाऊँगा?” “कैसी बात करते हो ह्यूबर्ट!” डाक्टर ने हाथ छुड़ाकर धीरे-से ह्यूबर्ट का सिर तकिये पर टिका दिया। “गुड नाइट ह्यूबर्ट” “गुड नाइट डाक्टर,” ह्यूबर्ट ने करवट बदल ली। “गुड नाइट मि. ह्यूबर्ट…” लतिका का स्वर सिहर गया। किन्तु ह्यूबर्ट ने कोई उत्तर नहीं दिया। करवट बदलते ही उसे नींद आ गयी थी।

कॉरीडोर में वापिस आकर डाक्टर मुकर्जी रेलिंग के सामने खड़े हो गये। हवा के तेज झोंकों से आकाश में फैले बादलों की परतें जब कभी इकहरी हो जातीं, तब उनके पीछे से चाँदनी बुझती हुई आग के धुएँ-सी आस-पास की पहाड़ियों पर फैल जाती थी। “आपको मि. ह्यूबर्ट कहाँ मिले?” लतिका कॉरीडोर के दूसरे कोने में रेलिंग पर झुकी हुई थी। “क्लब के बार में उन्हें देखा था, मैं न पहुँचता तो न जाने कब तक बैठे रहते। डाक्टर मुकर्जी ने सिगरेट जलायी। उन्हें अभी एक-दो मरीजों के घर जाना था। कुछ देर तक उन्हें टाल देने के इरादे से वह कॉरीडोर में खड़े रहे।” नीचे अपने क्वार्टर में बैठा हुआ करीमुद्दीन माउथ आर्गन पर कोई पुरानी फिल्मी धुन बजा रहा था।

“आज दिन भर बादल छाये रहे, लेकिन खुलकर बारिश नहीं हुई” “क्रिसमस तक शायद मौसम ऐसा ही रहेगा।” कुछ देर तक दोनों चुपचाप ख़डे रहे। कॉन्वेन्ट स्कूल के बाहर फैले लॉन से झींगुरों का अनवरत स्वर चारों ओर फैली निस्तब्धता को और भी अधिक घना बना रहा था। कभी-कभी ऊप़र मोटर रोड पर किसी कुत्ते की रिरियाहट सुनायी पड़ा जाती थी। “डाक्टर… कल रात आपने मि. ह्यूबर्ट से कुछ कहा था मेरे बारे में?” “वही जो सब लोग जानते हैं और ह्यूबर्ट, जिसे जानना चाहिए था, नहीं जानता था।” डाक्टर ने लतिका की ओर देखा, वह जड़वत अविचलित रेलिंग पर झुकी हुई थी। “वैसे हम सबकी अपनी-अपनी जिद होती है, कोई छोड़ देता है, कोई आखिर तक उससे चिपका रहता है।” डाक्टर मुकर्जी अँधेरे में मुस्कराये। उनकी मुस्कराहट में सूखा-सा विरक्ति का भाव भरा था। “कभी-कभी मैं सोचता हूँ मिस लतिका, किसी चीज को न जानना यदि गलत है, तो जान-बूझकर न भूल पाना, हमेशा जोंक की तरह उससे चिपटे रहना, यह भी गलत है। बर्मा से आते हुए मेरी पत्नी की मृत्यु हुई थी, मुझे अपनी जिन्दगी बेकार-सी लगी थी। आज इस बात को अर्सा गुजर गया और जैसा आप देखती हैं, मैं जी रहा हूँ उम्मीद है कि काफी अर्सा और जिऊँगा। जिन्दगी काफी दिलचस्प लगती है, और यदि उम्र की मजबूरी न होती तो शायद मैं दूसरी शादी करने में भी न हिचकता। इसके बावजूद कौन कह सकता है कि मैं अपनी पत्नी से प्रेम नहीं करता था, आज भी करता हूँ” “लेकिन डाक्टर…” लतिका का गला रुँध आया था। “क्या मि़स लतिका…”

“डाक्टर – सबकुछ होने के बावजूद वह क्या चीज़ है जो हमें चलाये चलती है, हम रुकते हैं तो भी अपने रेले में वह हमें घसीट ले जाती है।” लतिका को लगा कि वह जो कहना चाह रही है, कह नहीं पा रही, जैसे अँधेरे में कुछ खो गया है, जो मिल नहीं पा रहा, शायद कभी नहीं मिल पायेगा। “यह तो आपको फादर एल्मण्ड ही बता सकेंगे मिस लतिका,” डाक्टर की खोखली हँसी में उनका पुराना सनकीपन उभर आया था। “अच्छा चलता हूँ, मिस लतिका, मुझे काफी देर हो गयी है,” डाक्टर ने दियासलाई जलाकर घड़ी को देखा। “गुड नाइट, मिस लतिका।” “गुड नाइट, डाक्टर।”

डाक्टर के जाने पर लतिका कुछ देर तक अँधेरे में रेलिंग से सटी खड़ी रही। हवा चलने से कॉरीडोर में जमा हुआ कुहरा सिहर उठता था। शाम को सामान बाँधते हुए लड़कियों ने अपने-अपने कमरे के सामने जो पुरानी कापियों, अखबारों और रद्दी के ढेर लगा दिये थे, वे सब अब अँधेरे कॉरीडोर में हवा के झोंकों से इधर-उधर बिखरने लगे थे।

लतिका ने लैम्प उठाया और अपने कमरे की ओर जाने लगी। कॉरीडोर में चलते हुए उसने देखा, जूली के कमरे में प्रकाश की एक पतली रेखा दरवाजे के बाहर खिंच आयी है। लतिका को कुछ याद आया। वह कुछ क्षणों तक साँस रोके जूली के कमरे के बाहर खड़ी रही। कुछ देर बाद उसने दरवाजा खटखटाया। भीतर से कोई आवाज नहीं आयी। लतिका ने दबे हाथों से हलका-सा धक्का दिया, दरवाजा खुल गया। जूली लैम्प बुझाना भूल गयी थी। लतिका धीरे-धीरे दबे पाँव जूली के पलँग के पास चली आयी। जूली का सोता हुआ चेहरा लैम्प के फीके आलोक में पीला-सा दीख रहा था। लतिका ने अपनी जेब से वही नीला लिफाफा निकाला और उसे धीरे-से जूली के तकिये के नीचे दबाकर रख दिया।

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