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Thursday, September 10, 2020

धूप का एक टुकड़ा- निर्मल वर्मा (Dhoop Ka Ek Tukda by Nirmal Verma)


क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूँ? नहीं, आप उठिए नहीं! मेरे लिए यह कोना ही काफ़ी है। आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क, चारों तरफ़ ख़ाली बेंचें, मैं आपके पास ही क्यों धँसना चाहती हूँ? आप बुरा न मानें, तो एक बात कहूँ? जिस बेंच पर आप बैठे हैं, वह मेरी है। जी हाँ, मैं यहाँ रोज़ बैठती हूँ। नहीं, आप ग़लत न समझें। इस बेंच पर मेरा कोई नाम नहीं लिखा है। भला म्यूनिसिपैलिटी की बेंचों पर नाम कैसा? लोग आते हैं, घड़ी-दो घड़ी बैठते हैं, और फिर चले जाते हैं। किसी को याद भी नहीं रहता कि फ़लाँ दिन फ़लाँ आदमी यहाँ बैठा था। उसके जाने के बाद बेंच पहले की तरह ही ख़ाली हो जाती है। जब कुछ देर बाद कोई नया आगन्तुक आकर उस पर बैठता है, तो उसे पता भी नहीं चलता कि उससे पहले वहाँ कोई स्कूल की बच्ची या अकेली बुढ़िया या नशे में धुत्त जिप्सी बैठा होगा।

नहीं जी, नाम वहीं लिखे जाते हैं, जहाँ आदमी टिककर रहे—तभी घरों के नाम होते हैं, या फिर क़ब्रों के—हालाँकि कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि क़ब्रों पर नाम भी न रहें, तो भी ख़ास अन्तर नहीं पड़ता। कोई जीता-जागता आदमी जान-बूझकर दूसरे की क़ब्र में घुसना पसन्द नहीं करेगा!

आप उधर देख रहे हैं घोड़ा-गाड़ी की तरफ़? नहीं, इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। शादी-ब्याह के मौक़ों पर लोग अब भी घोड़ा-गाड़ी इस्तेमाल करते हैं। मैं तो हर रोज़ देखती हूँ। इसीलिए मैंने यह बेंच अपने लिए चुनी है। यहाँ बैठकर आँखें सीधी गिरजे पर जाती हैं, आपको अपनी गर्दन टेढ़ी नहीं करनी पड़ती। बहुत पुराना गिरजा है। इस गिरजे में शादी करवाना बहुत बड़ा गौरव माना जाता है। लोग आठ-दस महीने पहले से अपना नाम दर्ज करवा लेते हैं। वैसे सगाई और शादी के बीच इतना लम्बा अन्तराल ठीक नहीं। कभी-कभी बीच में मन-मुटाव हो जाता है, और ऐन विवाह के मुहूर्त पर वर-वधू में से कोई भी दिखायी नहीं देता। उन दिनों यह जगह सुनसान पड़ी रहती है। न कोई भीड़, न कोई घोड़ा-गाड़ी। भिखारी भी ख़ाली हाथ लौट जाते हैं। ऐसे ही एक दिन मैंने सामनेवाली बेंच पर एक लड़की को देखा था। अकेली बैठी थी और सूनी आँखों से गिरजे को देख रही थी।

पार्क में यही एक मुश्किल है। इतने खुले में सब अपने-अपने में बन्द बैठे रहते हैं।

आप किसी के पास जाकर सान्त्वना के दो शब्द भी नहीं कह सकते। आप दूसरों को देखते हैं, दूसरे आपको। शायद इससे भी कोई तसल्ली मिलती होगी। यही कारण है, अकेले कमरे में जब तकलीफ़ दुश्वार हो जाती है, तो अक्सर लोग बाहर चले आते हैं। सड़कों पर। पब्लिक पार्क में। किसी पब में। वहाँ आपको कोई तसल्ली न भी दे, तो भी आपका दुःख एक जगह से मुड़कर दूसरी तरफ़ करवट ले लेता है। इससे तकलीफ़ का बोझ कम नहीं होता, लेकिन आप उसे कुली के सामान की तरह एक कन्धे से उठाकर दूसरे कन्धे पर रख देते हैं। यह क्या कम राहत है? मैं तो ऐसा ही करती हूँ, सुबह से ही अपने कमरे से बाहर निकल आती हूँ। नहीं, नहीं! आप गलत न समझें, मुझे कोई तकलीफ़ नहीं। मैं धूप की ख़ातिर यहाँ आती हूँ— आपने देखा होगा, सारे पार्क में सिर्फ़ यही एक बेंच है, जो पेड़ के नीचे नहीं है। इस बेंच पर एक पत्ता भी नहीं झरता। फिर इसका एक बड़ा फ़ायदा यह भी है कि यहाँ से मैं सीधे गिरजे की तरफ़ देख सकती हूँ, लेकिन यह शायद मैं आपसे पहले ही कह चुकी हूँ।

आप सचमुच सौभाग्यशाली हैं। पहले दिन यहाँ आए और सामने घोड़ा-गाड़ी! आप देखते रहिए, कुछ ही देर में गिरजे के सामने छोटी-सी भीड़ जमा हो जाएगी। उनमें से ज़्यादातर लोग ऐसे होते हैं, जो न वर को जानते हैं, न वधू को। लेकिन एक झलक पाने के लिए घण्टों बाहर खड़े रहते हैं। आपके बारे में मुझे मालूम नहीं, लेकिन कुछ चीज़ों को देखने की उत्सुकता जीवन-भर ख़त्म नहीं होती। अब देखिए, आप इस पेराम्बुलेटर के आगे बैठे थे। पहली इच्छा यह हुई, झाँककर भीतर देखूँ, जैसे आपका बच्चा औरों से अलग होगा। अलग होता नहीं। इस उम्र में सारे बच्चे एक जैसे ही होते हैं— मुँह में चूसनी दबाए लेटे रहते हैं। फिर भी जब मैं किसी पेराम्बुलेटर के सामने से गुज़रती हूँ, तो एक बार भीतर झाँकने की ज़बरदस्त इच्छा होती है।

मुझे यह सोचकर काफ़ी हैरानी होती है कि जो चीज़ें हमेशा एक जैसी रहती हैं, उनसे ऊबने के बजाय आदमी सबसे ज़्यादा उन्हीं को देखना चाहता है, जैसे प्राम में लेटे बच्चे या नव-विवाहित जोड़े की घोड़ा-गाड़ी या मुर्दों की अर्थी।

आपने देखा होगा, ऐसी चीज़ों के इर्द-गिर्द हमेशा भीड़ जमा हो जाती है। अपना बस हो या न हो, पाँव ख़ुद-ब-ख़ुद उनके पास खिंचे चले आते हैं।

मुझे कभी-कभी यह सोचकर बड़ा अचरज होता है कि जो चीज़ें हमें अपनी ज़िन्दगी को पकड़ने में मदद देती हैं, वे चीज़ें हमारी पकड़ के बाहर हैं। हम न उनके बारे में कुछ सोच सकते हैं, न किसी दूसरे को बता सकते हैं।

मैं आपसे पूछती हूँ— क्या आप अपनी जन्म की घड़ी के बारे में कुछ याद कर सकते हैं, या अपनी मौत के बारे में किसी को कुछ बता सकते हैं, या अपने विवाह के अनुभव को हू-ब-हू अपने भीतर दुहरा सकते हैं? आप हँस रहे हैं… नहीं, मेरा मतलब कुछ और था। कौन ऐसा आदमी है, जो अपने विवाह के अनुभव को याद नहीं कर सकता! मैंने सुना है, कुछ ऐसे देश हैं जहाँ जब तक लोग नशे में धुत्त नहीं हो जाते, तब तक विवाह करने का फ़ैसला नहीं लेते… और बाद में उन्हें उसके बारे में कुछ याद नहीं रहता। नहीं जी, मेरा मतलब ऐसे अनुभव से नहीं था।

मेरा मतलब था, क्या आप उस क्षण को याद कर सकते हैं, जब आप एकाएक यह फ़ैसला कर लेते हैं कि आप अलग न रहकर किसी दूसरे के साथ रहेंगे… ज़िन्दगी-भर? मेरा मतलब है, क्या आप सही-सही उस बिन्दु पर अँगुली रख सकते हैं, जब आप अपने भीतर के अकेलेपन को थोड़ा-सा सरकाकर किसी दूसरे को वहाँ आने देते हैं?

जी हाँ… उसी तरह जैसे कुछ देर पहले आपने थोड़ा-सा सरककर मुझे बेंच पर आने दिया था और अब मैं आपसे ऐसे बातें कर रही हूँ, मानो आपको बरसों से जानती हूँ।

लीजिए, अब दो-चार सिपाही भी गिरजे के सामने खड़े हो गए। अगर इसी तरह भीड़ जमा होती गई, तो आने-जाने का रास्ता भी रुक जाएगा। आज तो ख़ैर धूप निकली है, लेकिन सर्दी के दिनों में भी लोग ठिठुरते हुए खड़े रहते हैं। मैं तो बरसों से यह देखती आ रही हूँ… कभी-कभी तो यह भ्रम होता है कि पन्द्रह साल पहले मेरे विवाह के मौक़े पर जो लोग जमा हुए थे, वही लोग आज भी हैं, वही घोड़ा-गाड़ी, वही इधर-उधर घूमते हुए सिपाही… जैसे इस दौरान कुछ भी नहीं बदला है! जी हाँ, मेरा विवाह भी इसी गिरजे में हुआ था। लेकिन यह मुद्दत पहले की बात है। तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के दरवाज़े पर आकर ठहर सके। हमें उसे गली के पिछवाड़े रोक देना पड़ा था और मैं अपने पिता के साथ पैदल चलकर यहाँ तक आयी थी। सड़क के दोनों तरफ़ लोग खड़े थे और मेरा दिल धुक-धुक कर रहा था कि कहीं सबके सामने मेरा पाँव न फिसल पड़े। पता नहीं, वे लोग अब कहाँ होंगे, जो उस रोज़ भीड़ में खड़े मुझे देख रहे थे! आप क्या सोचते हैं? अगर उनमें से कोई आज मुझे देखे, तो क्या पहचान सकेगा कि बेंच पर बैठी यह अकेली औरत वही लड़की है, जो सफ़ेद पोशाक में पन्द्रह साल पहले गिरजे की तरफ़ जा रही थी? सच बताइए, क्या पहचान सकेगा? आदमियों की तो बात मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे लगता है कि वह घोड़ा मुझे ज़रूर पहचान लेगा, जो उस दिन हमें खींचकर लाया था…

जी हाँ, घोड़ों को देखकर मैं हमेशा हैरान रह जाती हूँ। कभी आपने उनकी आँखों में झाँककर देखा है? लगता है, जैसे वे किसी बहुत ही आत्मीय चीज़ से अलग हो गए हैं, लेकिन अभी तक अपने अलगाव के आदी नहीं हो सके हैं। इसीलिए वे आदमियों की दुनिया में सबसे अधिक उदास रहते हैं। किसी चीज़ का आदी न हो पाना, इससे बड़ा और कोई दुर्भाग्य नहीं। वे लोग जो आख़िर तक आदी नहीं हो पाते, या तो घोड़ों की तरह उदासीन हो जाते हैं, या मेरी तरह धूप के एक टुकड़े की खोज में एक बेंच से दूसरी बेंच का चक्कर लगाते रहते हैं।

क्या कहा आपने? नहीं, आपने शायद मुझे ग़लत समझ लिया। मेरे कोई बच्चा नहीं, यह मेरा सौभाग्य है। बच्चा होता, तो शायद मैं कभी अलग नहीं हो पाती। आपने देखा होगा, आदमी और औरत में प्यार न भी रहे, तो भी बच्चे की ख़ातिर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं। मेरे साथ कभी ऐसी रुकावट नहीं रही।

इस लिहाज़ से मैं बहुत सुखी हूँ— अगर सुख का मतलब है कि हम अपने अकेलेपन को ख़ुद चुन सकें।

लेकिन चुनना एक बात है, आदी हो सकना बिल्कुल दूसरी बात। जब शाम को धूप मिटने लगती है, तो मैं अपने कमरे में चली जाती हूँ। लेकिन जाने से पहले मैं कुछ देर उस पब में ज़रूर बैठती हूँ, जहाँ वह मेरी प्रतीक्षा करता था। जानते हैं, उस पब का नाम? बोनापार्ट! जी हाँ, कहते हैं, जब नेपोलियन पहली बार इस शहर में आया, तो उस पब में बैठा था, लेकिन उन दिनों मुझे इसका कुछ पता नहीं था। जब पहली बार उसने मुझसे कहा कि हम बोनापार्ट के सामने मिलेंगे, तो मैं सारी शाम शहर के दूसरे सिरे पर खड़ी रही, जहाँ नेपोलियन घोड़े पर बैठा है। आपने कभी अपनी पहली डेट इस तरह गुज़ारी है कि आप सारी शाम पब के सामने खड़े रहें और आपकी मंगेतर पब्लिक-स्टेचू के नीचे! बाद में जो उसका शौक़ था, वह मेरी आदत बन गई। हम दोनों हर शाम कभी उस जगह जाते, जहाँ मुझे मिलने से पहले वह बैठता था, या उस शहर के उन इलाक़ों में घूमने निकल जाते, जहाँ मैंने बचपन गुज़ारा था।

यह आपको कुछ अजीब नहीं लगता कि जब हम किसी व्यक्ति को बहुत चाहने लगते हैं, तो न केवल वर्तमान में उसके साथ रहना चाहते हैं, बल्कि उसके अतीत को भी निगलना चाहते हैं, जब वह हमारे साथ नहीं था?

हम इतने लालची और ईर्ष्यालु हो जाते हैं कि हमें यह सोचना भी असहनीय लगता है कि कभी ऐसा समय रहा होगा, जब वह हमारे बग़ैर जीता था, प्यार करता था, सोता-जागता था। फिर अगर कुछ साल उसी एक आदमी के साथ गुज़ार दें, तो यह कहना भी असम्भव हो जाता है कि कौन-सी आदत आपकी अपनी है, कौन-सी आपने दूसरे से चुरायी है… जी हाँ, ताश के पत्तों की तरह वे इस तरह आप में घुल-मिल जाती हैं कि आप किसी एक पत्ते को उठाकर नहीं कह सकते कि यह पत्ता मेरा है, और वह पत्ता उसका।

देखिए, कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि मरने से पहले हम में से हर एक को यह छूट मिलनी चाहिए कि हम अपनी चीर-फाड़ ख़ुद कर सकें। अपने अतीत की तहों को प्याज़ के छिलकों की तरह एक-एक करके उतारते जाएँ… आपको हैरानी होगी कि सब लोग अपना-अपना हिस्सा लेने आ पहुँचेंगे, माँ-बाप, दोस्त, पति… सारे छिलके दूसरों के, आख़िर की सूखी डण्ठल आपके हाथ में रह जाएगी, जो किसी काम की नहीं, जिसे मृत्यु के बाद जला दिया जाता है, या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है।

देखिए, अक्सर कहा जाता है कि हर आदमी अकेला मरता है। मैं यह नहीं मानती। वह उन सब लोगों के साथ मरता है, जो उसके भीतर थे, जिनसे वह लड़ता था या प्रेम करता था। वह अपने भीतर पूरी एक दुनिया लेकर जाता है। इसीलिए हमें दूसरों के मरने पर जो दुःख होता है, वह थोड़ा-बहुत स्वार्थी क़िस्म का दुःख है, क्योंकि हमें लगता है कि इसके साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए ख़त्म हो गया है।

अरे देखिए… वह जाग गया। ज़रा पेराम्बुलेटर हिलाइए। धीरे-धीरे हिलाते जाइए, अपने आप चुप हो जाएगा। मुँह में चूसनी इस तरह दबाकर लेटा है, जैसे छोटा-मोटा सिगार हो! देखिए—कैसे ऊपर बादलों की तरफ़ टुकुर-टुकुर ताक रहा है! मैं जब छोटी थी, तब लकड़ी लेकर बादलों की तरफ़ इस तरह घुमाती थी, जैसे वे मेरे इशारों पर ही आकाश में चल रहे हों। आप क्या सोचते हैं? बच्चे इस उम्र में जो कुछ देखते हैं या सुनते हैं, वह क्या बाद में उन्हें याद रहता है? रहता ज़रूर होगा— कोई आवाज़, कोई झलक, या कोई आहट, जिसे बड़े होकर हम उम्र के जाले में खो देते हैं। लेकिन किसी अनजाने मौक़े पर, ज़रा-सा इशारा पाते ही हमें लगता है कि इस आवाज़ को कहीं हमने सुना है, यह घटना या ऐसी ही कोई घटना पहले कभी हुई है, और फिर उसके साथ-साथ बहुत-सी चीज़ें अपने-आप खुलने लगती हैं, जो हमारे भीतर अरसे से जमा थीं, लेकिन रोज़मर्रा की दौड़-धूप में जिनकी तरफ़ हमारा ध्यान जाता नहीं, लेकिन वे वहाँ हैं, घात लगाए कोने में खड़ी रहती हैं—मौक़े की तलाश में—और फिर किसी घड़ी सड़क पर चलते हुए या ट्राम की प्रतीक्षा करते हुए या रात को सोने और जागने के बीच वे अचानक आपको पकड़ लेती हैं और तब आप कितना ही हाथ-पाँव क्यों न मारें, कितना ही क्यों न छटपटाएँ, वे आपको छोड़ती नहीं। मेरे साथ एक रात ऐसे ही हुआ था…।

हम दोनों सो रहे थे और तब मुझे एक अजीब-सा खटका सुनायी दिया। बिल्कुल वैसे ही, जैसे बचपन में मैं अपने अकेले कमरे में हड़बड़ाकर जाग उठती थी और सहसा यह भ्रम होता था कि दूसरे कमरे में माँ और बाबू नहीं हैं, और मुझे लगता था कि अब मैं उन्हें कभी नहीं देख सकूँगी और तब मैं चीख़ने लगती थी। लेकिन उस रात मैं चीखी-चिल्लायी नहीं। मैं बिस्तर से उठकर देहरी तक आयी, दरवाज़ा खोलकर बाहर झाँका, बाहर कोई न था। वापस लौटकर उसकी तरफ़ देखा। वह दीवार की तरफ़ मुँह मोड़कर सो रहा था, जैसे वह हर रात सोता था। उसे कुछ भी सुनायी नहीं दिया था। तब मुझे पता चला कि वह खटका कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर हुआ था। नहीं, मेरे भीतर भी नहीं, अन्धेरे में एक चमगादड़ की तरह वह मुझे छूता हुआ निकल गया था — न बाहर, न भीतर, फिर भी चारों तरफ़ फड़फड़ाता हुआ। मैं पलंग पर आकर बैठ गई, जहाँ वह लेटा था और धीरे-धीरे उसकी देह को छूने लगी। उसकी देह के उन सब कोनों को छूने लगी, जो एक ज़माने में मुझे तसल्ली देते थे। मुझे यह अजीब-सा लगा कि मैं उसे छू रही हूँ और मेरे हाथ ख़ाली-के-ख़ाली वापस लौट आते हैं। बरसों पहले की गूँज, जो उसके अंगों से निकलकर मेरी आत्मा में बस जाती थी, अब कहीं न थी। मैं उसी तरह उसकी देह को टोह रही थी, जैसे कुछ लोग पुराने खण्डहरों पर अपने नाम खोजते हैं, जो मुद्दत पहले उन्होंने दीवारों पर लिखे थे। लेकिन मेरा नाम वहाँ कहीं न था। कुछ और निशान थे, जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था, जिनका मुझसे दूर का भी वास्ता न था। मैं रात-भर उसके सिरहाने बैठी रही और मेरे हाथ मुर्दा होकर उसकी देह पर पड़े रहे… मुझे यह भयानक-सा लगा कि हम दोनों के बीच जो ख़ालीपन आ गया था, वह मैं किसी से नहीं कह सकती। जी हाँ, अपने वकील से भी नहीं, जिन्हें मैं अरसे से जानती थी।

वे समझे, मैं सठिया गई हूँ। कैसा खटका! क्या मेरा पति किसी दूसरी औरत के साथ जाता था? क्या वह मेरे प्रति क्रूर था? जी हाँ, उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी और मैं थी कि एक ईडियट की तरह उनका मुँह ताकती रही। और तब मुझे पहली बार पता चला कि अलग होने के लिए कोर्ट-कचहरी जाना ज़रूरी नहीं है। अक्सर लोग कहते हैं कि अपना दुःख दूसरों के साथ बाँटकर हम हल्के हो जाते हैं। मैं कभी हल्की नहीं होती। नहीं जी, लोग दुःख नहीं बाँटते, सिर्फ़ फ़ैसला करते हैं — कौन दोषी है और कौन निर्दोष। मुश्किल यह है, जो एक व्यक्ति आपकी दुखती रग को सही-सही पहचान सकता है, उसी से हम अलग हो जाते हैं। इसीलिए मैं अपने मुहल्ले को छोड़कर शहर के इस इलाक़े में आ गई। यहाँ मुझे कोई नहीं जानता। यहाँ मुझे देखकर कोई यह नहीं कहता कि देखो, यह औरत अपने पति के साथ आठ वर्ष रही और फिर अलग हो गई। पहले जब कोई इस तरह की बात कहता था, तो मैं बीच सड़क पर खड़ी हो जाती थी। इच्छा होती थी, लोगों को पकड़कर शुरू से आख़िर तक सब कुछ बताऊँ। कैसे हम पहली शाम अलग-अलग एक-दूसरे की प्रतीक्षा करते रहे थे — वह पब के सामने, मैं मूर्ति के नीचे। कैसे उसने पहली बार मुझे पेड़ के तने से सटाकर चूमा था, कैसे मैंने पहली बार डरते-डरते उसके बालों को छुआ था। जी हाँ, मुझे यह लगता था कि जब तक मैं उन्हें यह सच नहीं बता दूँगी, तब तक उस रात के बारे में कुछ नहीं कह सकूँगी, जब पहली बार मेरे भीतर खटका हुआ था और बरसों बाद यह इच्छा हुई थी कि मैं दूसरे कमरे में भाग जाऊँ, जहाँ मेरे माँ-बाप सोते थे… लेकिन वह कमरा ख़ाली था। जी, मैंने कहीं पढ़ा था कि बड़े होने का मतलब है कि अगर आप आधी रात को जाग जाएँ और कितना ही क्यों न चीख़ें-चिल्लाएँ, दूसरे कमरे से कोई नहीं आएगा। वह हमेशा ख़ाली रहेगा। देखिए, उस रात के बाद मैं कितनी बड़ी हो गई हूँ!

लेकिन एक बात मुझे अभी तक समझ में नहीं आती। भूचाल या बमबारी की ख़बरें अख़बारों में छपती हैं। दूसरे दिन सबको पता चल जाता है कि जहाँ बच्चों का स्कूल था, वहाँ खण्डहर हैं; जहाँ खण्डहर थे, वहाँ उड़ती धूल। लेकिन जब लोगों के साथ ऐसा होता है, तो किसी को कोई ख़बर नहीं होती… उस रात के बाद दूसरे दिन मैं सारे शहर में अकेली घूमती रही और किसी ने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं… जब मैं पहली बार इस पार्क में आयी थी, इसी बेंच पर बैठी थी, जिस पर आप बैठे हैं। और जी हाँ, उस दिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं उसी गिरजे के सामने बैठी हूँ, जहाँ मेरा विवाह हुआ था। तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि हमारी घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के सामने आ सके। हम दोनों पैदल चलकर यहाँ आए थे…

आप सुन रहे हैं, ओर्गन पर संगीत? देखिए, उन्होंने दरवाज़े खोल दिए हैं। संगीत की आवाज़ यहाँ तक आती है। इसे सुनते ही मुझे पता चल जाता है कि उन्होंने एक-दूसरे को चूमा है, अँगूठियों की अदला-बदली की है। बस, अब थोड़ी-सी देर और है— वे अब बाहर आनेवाले हैं। लोगों में अब इतना चैन कहाँ कि शान्ति से खड़े रहें, अगर आप जाकर देखना चाहें, तो निश्चिन्त होकर चले जाएँ। मैं तो यहाँ बैठी ही हूँ। आपके बच्चे को देखती रहूँगी। क्या कहा आपने? जी हाँ, शाम होने तक यहीं रहती हूँ। फिर यहाँ सर्दी हो जाती है। दिन-भर मैं यह देखती रहती हूँ कि धूप का टुकड़ा किस बेंच पर है, उसी बेंच पर जाकर बैठ जाती हूँ। पार्क का कोई ऐसा कोना नहीं, जहाँ मैं घड़ी-आधा घड़ी नहीं बैठती। लेकिन यह बेंच मुझे सबसे अच्छी लगती है। एक तो इस पर पत्ते नहीं झरते और दूसरे… अरे, आप जा रहे हैं?

एक दिन का मेहमान - निर्मल वर्मा (Ek Din Ka Mehman By Nirmal Verma)


उसने अपना सूटकेस दरवाजे के आगे रख दिया। घंटी का बटन दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। मकान चुप था। कोई हलचल नहीं – एक क्षण के लिए भ्रम हुआ कि घर में कोई नहीं है और वह खाली मकान के आगे खड़ा है। उसने रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा, अपना एयर-बैग सूटकेस पर रख दिया। दोबारा बटन दबाया और दरवाजे से कान सटा कर सुनने लगा, बरामदे के पीछे कोई खुली खिड़की हवा में हिचकोले खा रही थी।

वह पीछे हट कर ऊपर देखने लगा। वह दुमंजिला मकान था – लेन के अन्य मकानों की तरह-काली छत, अंग्रेजी ‘वी’ की शक्ल में दोनों तरफ से ढलुआँ, और बीच में सफेद पत्थर की दीवार, जिसके माथे पर मकान का नंबर एक काली बिंदी-सा टिमक रहा था। ऊपर की खिड़कियाँ बंद थीं और परदे गिरे थे। कहाँ जा सकते हैं इस वक्त?

वह मकान के पिछवाड़े गया – वही लॉन, फेंस और झाड़ियाँ थीं, जो उसने दो साल पहले देखी थीं, बीच में विलो अपनी टहनियाँ झुकाए एक काले, बूढ़े रीछ की तरह ऊँघ रहा था। लेकिन गैराज खुला और खाली पड़ा था; वे कहीं कार ले कर गए थे, संभव है, उन्होंने सारी सुबह उसकी प्रतीक्षा की हो और अब किसी काम से बाहर चले गए हों। लेकिन दरवाजे पर उसके लिए एक चिट तो छोड़ ही सकते थे?

वह दोबारा सामने के दरवाजे पर लौट आया। अगस्त की चुनचुनाती धूप उनकी आँखों पर पड़ रही थी। सारा शरीर चू रहा था। वह बरामदे में ही अपने सूटकेस पर बैठ गया। अचानक उसे लगा, सड़क के पार मकानों की खिड़कियों से कुछ चेहरे बाहर झाँक रहे हैं, उसे देख रहे हैं। उसने सुना था, अंग्रेज लोग दूसरों की निजी चिंताओं में दखल नहीं देते, लेकिन वह मकान के बाहर बरामदे में बैठा था, जहाँ प्राइवेसी का कोई मतलब नहीं था; इसलिए वे निस्संकोच, नंगी उन्मुक्तता से उसे घूर रहे थे। लेकिन शायद उनके कौतूहल का एक दूसरा कारण था; उस छोटे, अंग्रेजी कस्बाती शहर में लगभग सब एक-दूसरे को पहचानते थे और वह न केवल अपनी शक्ल-सूरत में, बल्कि झूलते-झालते हिंदुस्तानी सूट में काफी अद्भुत प्राणी दिखाई दे रहा होगा। उसकी तुड़ी-मुड़ी वेशभूषा और गर्द और पसीने में लथपथ चेहरे से कोई यह अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि अभी तीन दिन पहले फ्रेंकफर्ट की कान्फ्रेंस में उसने पेपर पढ़ा था।

‘मैं एक लुटा-पिटा एशियन इमीग्रेंट दिखाई दे रहा हूँगा’ …उसने सोचा और अचानक खड़ा हो गया-मानो खड़ा हो कर प्रतीक्षा करना ज्यादा आसान हो। इस बार बिना सोचे-समझे उसने दरवाजा जोर से खटखटाया और तत्काल हकबका कर पीछे हट गया – हाथ लगते ही दरवाजा खट-से खुल गया। जीने पर पैरों की आवाज सुनाई दी – और दूसरे क्षण वह चौखट पर उसके सामने खड़ी थी।

वह भागते हुए सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आई थी, और उससे चिपट गई थी। इससे पहले वह पूछता, क्या तुम भीतर थीं? और वह पूछती, तुम बाहर खड़े थे? – उसने अपने धूल-भरे लस्तम-पस्तम हाथों से उसके दुबले कंधों को पकड़ लिया और लड़की का सिर नीचे झुक आया और उसने अपना मुँह उसके बालों पर रख दिया।

पड़ोसियों ने एक-एक करके अपनी खिड़कियाँ बंद कर दीं।

लड़की ने धीरे से उसे अपने से अलग कर दिया, ‘बाहर कब से खड़े थे?’

‘पिछले दो साल से।’

‘वाह!’ लड़की हँसने लगी। उसे अपने बाप की ऐसी ही बातें बौड़म जान पड़ती थीं।

‘मैंने दो बार घंटी बजाई – तुम लोग कहाँ थे?’

‘घंटी खराब है, इसलिए मैंने दरवाजा खुला छोड़ दिया था।’

‘तुम्हें मुझे फोन पर बताना चाहिए था – मैं पिछले एक घंटे से आगे-पीछे दौड़ रहा था।’

‘मैं तुम्हें बतानेवाली थी, लेकिन बीच में लाइन कट गई… तुमने और पैसे क्यों नहीं डाले?’

‘मेरे पास सिर्फ दस पैसे थे… वह औरत काफी चुड़ैल थी।’

‘कौन औरत?’ लड़की ने उसका बैग उठाया।

‘वही, जिसने हमें बीच में काट दिया।’

आदमी अपना सूटकेस बीच ड्राइंगरूम में घसीट लाया। लड़की उत्सुकता से बैग के भीतर झाँक रही थी – सिगरेट के पैकेट, स्कॉच की लंबी बोतल, चॉकलेट के बंडल – वे सारी चीजें, जो उसने इतनी हड़बड़ी में फ्रेंकफर्ट के एयरपोर्ट पर ड्यूटी-फ्री दुकान से खरीदी थीं, अब बैग से ऊपर झाँक रही थीं।

‘तुमने अपने बाल कटवा लिए?’ आदमी ने पहली बार चैन से लड़की का चेहरा देखा।

‘हाँ… सिर्फ छुट्टियों के लिए। कैसे लगते हैं?’

‘अगर तुम मेरी बेटी नहीं होतीं तो मैं समझता, कोई लफंगा घर में घुस आया है।’

‘ओह, पापा!’ लड़की ने हँसते हुए बैग से चाकलेट निकाली, रैपर खोला, फिर उसके आगे बढ़ा दी।

‘स्विस चाकलेट,’ उसने उसे हवा में डुलाते हुए कहा।

‘मेरे लिए एक गिलास पानी ला सकती हो?’

‘ठहरो, मैं चाय बनाती हूँ।’

‘चाय बाद में…’ वह अपने कोट की अंदरूनी जेब में कुछ टटोलने लगा – नोटबुक, वालेट, पासपोर्ट – सब चीजें बाहर निकल आईं, अंत में उसे टेबलेट्स की डिब्बी मिली, जिसे वह ढूँढ़ रहा था।

लड़की पानी का गिलास ले कर आई तो उससे पूछा, ‘कैसी दवाई है?’

‘जर्मन,’ उसने कहा, ‘बहुत असर करती है।’ उसने टेबलेट पानी के साथ निगल ली, फिर सोफे पर बैठ गया। सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसने सोचा था। वही कमरा, शीशे का दरवाजा, खुले हुए परदों के बीच वही चौकोर, हरे रूमाल-जैसा लॉन, टी.वी. के स्क्रीन पर उड़ती पक्षियों की छाया, जो बाहर उड़ते थे और भीतर होने का भ्रम देते थे…।

वह किचन की देहरी पर आया। गैस के चूल्हों के पीछे लड़की की पीठ दिखाई दे रही थी। कार्डराय की काली जींस और सफेद कमीज, जिसकी मुड़ी स्लीव्स बाँहों की कुहनियों पर झूल रही थीं। वह बहुत हल्की और छुई-मुई-सी दिखाई दे रही थी।

‘मामा कहाँ हैं?’ उसने पूछा। शायद उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि लड़की ने उसे नहीं सुना, किंतु उसे लगा, जैसे लड़की की गर्दन कुछ ऊपर उठी थी। ‘मामा क्या ऊपर हैं?’ उसने दोबारा कहा और लड़की वैसे ही निश्चल खड़ी रही और तब उसे लगा, उसने पहली बार भी उसके प्रश्न को सुन लिया था। ‘क्या वह बाहर गई हैं?’ उसने पूछा। लड़की ने बहुत धीरे, धुँधले ढंग से सिर हिलाया, जिसका मतलब कुछ भी हो सकता था।

‘तुम पापा, कुछ मेरी मदद करोगे?’

वह लपक कर किचन में चला आया, ‘बताओ, क्या काम है?’

‘तुम चाय की केतली ले कर भीतर जाओ, मैं अभी आती हूँ।’

‘बस!’ उसने निराश स्वर में कहा।

‘अच्छा, प्याले और प्लेटें भी लेते जाओ।’

वह सब चीजें ले कर भीतर कमरे में चला आया। वह दोबारा किचन में जाना चाहता था, लेकिन लड़की के डर से वह वहीं सोफा पर बैठा रहा। किचन से कुछ तलने की खुश्बू आ रही थी। लड़की उसके लिए कुछ बना रही थी – और वह उसकी कोई भी मदद नहीं कर पा रहा था। एक बार इच्छा हुई, किचन में जा कर उसे मना कर आए कि वह कुछ नहीं खाएगा – किंतु दूसरे क्षण भूख ने उसे पकड़ लिया। सुबह से उसने कुछ नहीं खाया था। यूस्टन स्टेशन के कैफेटेरिया में इतनी लंबी ‘क्यू’ लगी थी कि वह टिकट ले कर सीधा ट्रेन में घुस गया था। सोचा था, वह डायनिंग-कार में कुछ पेट में डाल लेगा, किंतु वह दुपहर से पहले नहीं खुलती थी। सच पूछा जाए, तो उसने अंतिम खाना कल शाम फ्रेंकफर्ट की एयरपोर्ट में खाया था और जब रात को लंदन पहुँचा था, तो अपने होटल की बॉर में पीता रहा था। तीसरे गिलास के बाद उसने जेब से नोटबुक निकाली, नंबर देखा और बॉर के टेलीफोन बूथ में जा कर फोन मिलाया था…

पहली बार में पता नहीं चला, उसकी पत्नी की आवाज है या बच्ची की। उसकी पत्नी ने फोन उठाया होगा, क्योंकि कुछ देर तक फोन का सन्नाटा उसके कान में झनझनाता रहा, फिर उसने सुना, वह ऊपर से बच्ची को बुला रही है। और तब उसने घड़ी देखी; उसे अचानक ध्यान आया, इस समय वह सो रही होगी, और वह फोन नीचे रखना चाहता था, किंतु उसी समय उसे बच्ची का स्वर सुनाई दिया; वह आधी नींद में थी। उसे कुछ देर तक पता ही नहीं चला कि वह इंडिया से बोल रहा है या फ्रेंकफर्ट से या लंदन से… वह उसे अपनी स्थिति समझा ही रहा था कि तीन मिनट खत्म हो गए और उसके पास इतनी ‘चेंज’ भी नहीं थी कि वह लाइन को कटने से बचा सके, तसल्ली सिर्फ इतनी थी कि वह नींद, घबराहट और नशे के बीच यह बताने में सफल हो गया कि वह कल उनके शहर पहँच रहा है… कल यानी आज।

वे अच्छे क्षण थे। बाहर इंग्लैंड की पीली और मुलायम धूप फैली थी। वह घर के भीतर था। उसके भीतर गरमाई की लहरें उठने लगी थीं। हवाई अड्डों की भाग-दौड़, होटलों की हील-हुज्जत, ट्रेन-टैक्सियों की हड़बड़ाहट – वह सबसे परे हो गया था। वह घर के भीतर था; उसका अपना घर न सही, फिर भी एक घर – कुर्सियाँ, परदे, सोफा, टी.वी.। वह अर्से से इन चीजों के बीच रहा था और हर चीज के इतिहास को जानता था। हर दो-तीन साल बाद जब वह आता था, तो सोचता था – बच्ची कितनी बड़ी हो गई होगी और पत्नी? वह कितनी बदल गई होगी! लेकिन ये चीजें उस दिन से एक जगह ठहरी थीं, जिस दिन उसने घर छोड़ा था; वे उसके साथ जाती थीं, उसके साथ लौट आती थीं…

‘पापा, तुमने चाय नहीं डाली?’ वह किचन से दो प्लेटें ले कर आई, एक में टोस्ट और मक्खन थे, दूसरे में तले हुए सॉसेज।

‘मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था।’

‘चाय डालो, नहीं तो बिल्कुल ठंडी हो जाएगी।’

वह उसके साथ सोफा पर बैठ गई। ‘टी.वी. खोल दूँ… देखोगे?’

‘अभी नहीं… सुनो, तुम्हें मेरे स्टैंप्स मिल गए थे?’

‘हाँ, पापा, थैंक्स!’ वह टोस्ट्स पर मक्खन लगा रही थी।

‘लेकिन तुमने चिट्ठी एक भी नहीं लिखी!’

‘मैंने एक लिखी थी, लेकिन जब तुम्हारा टेलीग्राम आया, तो मैंने सोचा, अब तुम आ रहे हो तो चिट्ठी भेजने की क्या जरूरत?’

‘तुम सचमुच गागा हो।’

लड़की ने उसकी ओर देखा और हँसने लगी। यह उसका चिढ़ाऊ नाम था, जो बाप ने बरसों पहले उसे दिया था, जब वह उसके साथ घर में रहता था, वह बहुत छोटी थी और उसने हिंदुस्तान का नाम भी नहीं सुना था।

बच्ची की हँसी का फायदा उठाते हुए वह उसके पास झुक आया जैसे कोई चंचल चिड़िया हो, जिसे केवल सुरक्षा के भ्रामक क्षण में ही पकड़ा जा सकता है, ‘ममी कब लौटेंगी?’

प्रश्न इतना अचानक था कि लड़की झूठ नहीं बोल सकी, ‘वह ऊपर अपने कमरे में हैं।’

‘ऊपर? लेकिन तुमने तो कहा था…’

किरच, किरच, किरच – वह चाकू से जले हुए टोस्ट को कुरेद रही थी मानो उसके साथ-साथ वह उसके प्रश्न को भी काट डालना चाहती हो। हँसी अब भी थी, लेकिन अब वह बर्फ में जमे कीड़े की तरह उसके होंठों पर चिपकी थी।

‘क्या उन्हें मालूम है कि मैं यहाँ हूँ?’

लड़की ने टोस्ट पर मक्खन लगाया, फिर जैम – फिर उसके आगे प्लेट रख दी।

‘हाँ, मालूम है।’ उसने कहा।

‘क्या वह नीचे आ कर हमारे साथ चाय नहीं पिएँगी?’

लड़की दूसरी प्लेट पर सॉसेज सजाने लगी – फिर उसे कुछ याद आया। वह रसोई में गई और अपने साथ मस्टर्ड और कैचुप की बोतलें ले आई।

‘मैं ऊपर जा कर पूछ आता हूँ।’ उसने लड़की की तरफ देखा, जैसे उससे अपनी कार्यवाही का समर्थन पाना चाहता हो। जब वह कुछ नहीं बोली, तो वह जीने की तरफ जाने लगा।

‘प्लीज, पापा!’

उसके पाँव ठिठक गए।

‘आप फिर उनसे लड़ना चाहते हैं?’ लड़की ने कुछ गुस्से में उसे देखा।

‘लड़ना!’ वह शर्म से भीगा हुआ हँसने लगा, ‘मैं यहाँ दो हजार मील उनसे लड़ने आया हूँ?’

‘फिर आप मेरे पास बैठिए।’ लड़की का स्वर भरा हुआ था। वह अपनी माँ के साथ थी, लेकिन बाप के प्रति क्रूर नहीं थी। वह उसे पुरचाती निगाहों से निहार रही थी, ‘मैं तुम्हारे पास हूँ, क्या यह काफी नहीं है?’

वह खाने लगा, टोस्ट, सॉसेज, टिन के उबले हुए मटर। उसकी भूख उड़ गई थी, लेकिन लड़की की आँखें उस पर थीं। वह उसे देख रही थी, और कुछ सोच रही थी, कभी-कभी टोस्ट का एक टुकड़ा मुँह में डाल लेती और फिर चाय पीने लगती। फिर उसकी ओर देखती और चुपचाप मुस्कराने लगती, उसे दिलासा-सी देती, सब कुछ ठीक है, तुम्हारी जिम्मेदारी मुझ पर है और जब तक मैं हूँ, डरने की कोई बात नहीं।

डर नहीं था। टेबलेट का असर रहा होगा, या यात्रा की थकान – वह कुछ देर के लिए लड़की की निगाहों से हटना चाहता था। वह अपने को हटाना चाहता था। ‘मैं अभी आता हूँ।’ उसने कहा। लड़की ने सशंकित आँखों से उसे देखा, ‘क्या बाथरूम जाएँगे?’ वह उसके साथ-साथ गुसलखाने तक चली आई और जब उसने दरवाजा बंद कर लिया, तो भी उसे लगता रहा, वह दरवाजे के पीछे खड़ी है…

उसने बेसिनी में अपना मुँह डाल दिया और नलका खोल दिया। पानी झर-झर उसके चेहरे पर बहने लगा – और वह सिसकने-सा लगा, आधे बने हुए शब्द उसकी छाती के खोखल से बाहर निकलने लगे, जैसे भीतर जमी हुई काई उलट रहा हो, उलटी, जो सीधी दिल से बाहर आती है – वह टेबलेट जो कुछ देर पहले खाई थी, अब पीले चूरे-सी बेसिनी के संगमरमर पर तैर रही थी। फिर उसने नल बंद कर दिया और रूमाल निकाल कर मुँह पोंछा। बाथरूम की खूँटी पर स्त्री के मैले कपड़े टँगे थे – प्लास्टिक की एक चौड़ी बाल्टी में अंडरवियर और ब्रेसियर साबुन में डूबे थे… खिड़की खुली थी और बाग का पिछवाड़ा धूप में चमक रहा था। कहीं किसी दूसरे बाग से घास कटने की उनींदी-सी घुर्र-घुर्र पास आ रही थी…

वह जल्दी से बाथरूम का दरवाजा बंद करके कमरे में चला आया। सारे घर में सन्नाटा था। वह किचन में आया, तो लड़की दिखाई नहीं दी। वह ड्राइंगरूम में लौटा, तो वह भी खाली पड़ा था। उसे संदेह हुआ कि वह ऊपरवाले कमरे में अपनी माँ के पास बैठी है। एक अजीब आतंक ने उसे पकड़ लिया। घर जितना शांत था, उतना ही खतरे से अटा जान पड़ा। वह कोने में गया, जहाँ उसका सूटकेस रखा था, वह जल्दी-जल्दी उसे खोलने लगा। उसने अपने कान्फ्रेंस के नोट्स और कागज अलग किए, उनके नीचे से वह सारा सामान निकालने लगा, जो वह दिल्ली से अपने साथ लाया था – एंपोरियम का राजस्थानी लहँगा (लड़की के लिए), ताँबे और पीतल के ट्रिंकेट्स, जो उसने जनपथ पर तिब्बती लामा हिप्पियों से खरीदे थे, पशमीने की कश्मीरी शॉल (बच्ची की माँ के लिए), एक लाल गुजराती जरीदार स्लीपर, जिसे बच्ची और माँ दोनों पहन सकते थे, हैंडलूम के बेडकवर, हिंदुस्तानी टिकटों का अल्बम – और एक बहुत बड़ी सचित्र किताब ‘बनारस : द एटर्नल सिटी।’ फर्श पर धीरे-धीरे एक छोटा-सा हिंदुस्तान जमा हो गया था जिसे वह हर बार यूरोप आते समय अपने साथ ढो लाता था।

सहसा उसके हाथ ठिठक गए। वह कुछ देर तक चीजों के ढेर को देखता रहा। कमरे के फर्श पर बिखरी हुई वे बिल्कुल अनाथ और दयनीय दिखाई दे रही थीं। एक पागल-सी इच्छा हुई कि वह उन्हें कमरे में जैसे का तैसा छोड़ कर भाग खड़ा हो। किसी को पता भी न चलेगा, वह कहाँ चला गया? लड़की थोड़ा-बहुत जरूर हैरान होगी, किंतु बरसों से वह उससे ऐसे ही अचानक मिलती रही थी और बिना कारण बिछुड़ती रही थी, ‘यू आर ए कमिंग मैन एंड ए गोइंग मैन’, वह उससे कहा करती थी, पहले विषाद में और बाद में कुछ-कुछ हँसी में… उसे कमरे में न बैठा देख कर लड़की को ज्यादा सदमा नहीं पहुँचेगा। वह ऊपर जाएगी और माँ से कहेगी, ‘अब तुम नीचे आ सकती हो; वह चले गए।’ फिर वे दोनों एक-साथ नीचे आएँगी, और उन्हें राहत मिलेगी कि अब उन दोनों के अलावा घर में कोई नहीं है।

‘पापा!’

वह चौंक गया, जैसे रँगे हाथों पकड़ा गया हो। खिसियानी-सी मुस्कराहट में लड़की को देखा – वह कमरे की चौखट पर खड़ी थी और खुले हुए सूटकेस को ऐसे देख रही थी, जैसे वह कोई जादू की पिटारी हो, जिसने अपने पेट से अचानक रंग-बिरंगी चीजों को उगल दिया हो, लेकिन उसकी आँखों में कोई खुशी नहीं थी; एक शर्म-सी थी, जब बच्चे अपने बड़ों को कोई ऐसी ट्रिक करते हुए देखते हैं जिसका भेद उन्हें पहले से मालूम होता है; वे अपने संकोच को छिपाने के लिए कुछ ज्यादा ही उत्सुक हो जाते हैं।

‘इतनी चीजें?’ वह आदमी के सामने कुर्सी पर बैठ गई, ‘कैसे लाने दीं? सुना है, आजकल कस्टमवाले बहुत तंग करते हैं!’

‘नहीं, इस बार उन्होंने कुछ नहीं किया,’ आदमी ने उत्साह में आ कर कहा, ‘शायद इसलिए कि मैं सीधे फ्रेंकफर्ट से आ रहा था। उन्हें सिर्फ एक चीज पर शक हुआ था।’ उसने मुस्कराते हुए लड़की की ओर देखा।

‘किस चीज पर?’ लड़की ने इस बार सच्ची उत्सुकता से पूछा।

उसने अपने बैग से दालबीजी का डिब्बा निकाला और उसे खोल कर मेज पर रख दिया। लड़की ने झिझकते हुए दो-चार दाने उठाए और उन्हें सूँघने लगी, ‘क्या है यह?’ उसने जिज्ञासा से आदमी को देखा।

‘वे भी इसी तरह सूँघ रहे थे,’ वह हँसने लगा, ‘उन्हें डर था कि कहीं इसमें चरस-गाँजा तो नहीं है।’

‘हैश?’ लड़की की आँखें फैल गईं, ‘क्या इसमें सचमुच हैश मिली है?’

‘खा कर देखो।’

लड़की ने कुछ दालमोठ मुँह में डाले और उन्हें चबाने लगी, फिर हलाट-सी हो कर सी-सी करने लगी।

‘मिर्चें होंगी – थूक दो!’ आदमी ने कुछ घबरा कर कहा।

किंतु लड़की ने उन्हें निगल लिया और छलछलाई आँखों से बाप को देखने लगी।

‘तुम भी पागल हो… सब निगल बैठीं।’ आदमी ने जल्दी से उसे पानी का गिलास दिया, जो वह उसके लिए लाई थी।

‘मुझे पसंद है।’ लड़की ने जल्दी से पानी पिया और अपनी कमीज की मुड़ी हुई बाँहों से आँखें पोंछने लगी। फिर मुस्कराते हुए आदमी की ओर देखा, ‘आई लव इट।’ वह कई बातें सिर्फ आदमी का मन रखने के लिए करती थी। उनके बीच बहुत कम मुहलत रहती थी और वह उसके निकट पहुँचने के लिए ऐसे शॉर्टकट लेती थी, जिसे दूसरे बच्चे महीनों में पार करते हैं।

‘क्या उन्होंने भी इसे चख कर देखा था?’ लड़की ने पूछा।

‘नहीं, उनमें इतनी हिम्मत कहाँ थी! उन्होंने सिर्फ मेरा सूटकेस खोला, मेरे कागजों को उल्टा-पलटा और जब उन्हें पता चला कि मैं कान्फ्रेंस से आ रहा हूँ तो उन्होंने कहा, ‘मिस्टर, यू मे गो।’ ‘

‘क्या कहा उन्होंने?’ लड़की हँस रही थी।

‘उन्होंने कहा, ‘मिस्टर यू मे गो, लाइक एन इंडियन क्रो!’ आदमी ने भेदभरी निगाहों से उसे देखा। ‘क्या है यह?’

लड़की हँसती रही – जब वह बहुत छोटी थी और आदमी के साथ पार्क में घूमने जाती थी, तो वे यह सिरफिरा खेल खेलते थे। वह पेड़ की ओर देख कर पूछता था, ओ डियर, इज देयर एनीथिंग टू सी? और लड़की चारों तरफ देख कर कहती थी, येस डियर, देयर इज ए क्रो ओवर द ट्री। आदमी विस्मय से उसकी ओर देखता। क्या है यह? और वह विजयोल्लास में कहती – पोयम!

ए पोयम! बढ़ती हुई उम्र में छूटते हुए बचपन की छाया सरक आई – पार्क की हवा, पेड़, हँसी। वह बाप की उँगली पकड़ कर सहसा एक ऐसी जगह आ गई, जिसे वह मुद्दत पहले छोड़ चुकी थी, जो कभी-कभार रात को सोते हुए सपनों में दिखाई दे जाती थी…

‘मैं तुम्हारे लिए कुछ इंडियन सिक्के लाया था… तुमने पिछली बार कहा था न!’

‘दिखाओ, कहाँ हैं?’ लड़की ने कुछ जरूरत से ज्यादा ही ललकते हुए पूछा।

आदमी ने सलमे-सितारों से जड़ी एक लाल थैली उठाई – जिसे हिप्पी लोग अपने पासपोर्ट के लिए खरीदते थे। लड़की ने उसे उसके हाथ से छीन लिया और हवा में झुलाने लगी। भीतर रखी चवन्नियाँ, अठन्नियाँ चहचहाने लगीं, फिर उसने थैली का मुँह खोला और सारे पैसों को मेज पर बिखेर दिया।

‘हिंदुस्तान में क्या सब लोगों के पास ऐसे ही सिक्के होते हैं?’

वह हँसने लगा, ‘और क्या सबके लिए अलग-अलग बनेंगे?’ उसने कहा।

‘लेकिन गरीब लोग?’ उसने आदमी को देखा, ‘मैंने एक रात टी.वी. में उन्हें देखा था…।’ वह सिक्कों को भूल गई और कुछ असमंजस में फर्श पर बिखरी चीजों को देखने लगी। तब पहली बार आदमी को लगा – वह लड़की जो उसके सामने बैठी है, कोई दूसरी है। पहचान का फ्रेम वही है जो उसने दो साल पहले देखा था लेकिन बीच की तस्वीर बदल गई है। किंतु वह बदली नहीं थी, वह सिर्फ कहीं और चली गई थी। वे माँ-बाप जो अपने बच्चों के साथ हमेशा नहीं रहते, उन गोपनीय मंजिलों के बारे में कुछ नहीं जानते जो उनके अभाव की नींव पर ऊपर ही ऊपर बनती रहती हैं, लड़की अपने बचपन की बेसमेंट में जा कर ही पिता से मिल पाती थी… लेकिन कभी-कभी उसे छोड़ कर दूसरे कमरों में चली जाती थी, जिसके बारे में आदमी को कुछ भी मालूम नहीं था।

‘पापा!’ लड़की ने उसकी ओर देखा, ‘क्या मैं इन चीजों को समेट कर रख दूँ?’

‘क्यों, इतनी जल्दी क्या है?’

‘नहीं, जल्दी नहीं… लेकिन मामा आ कर देखेंगी तो…!’ उसके स्वर में हल्की-सी घबराहट थी, जैसे वह हवा में किसी अदृश्य खतरे को सूँघ रही हो।

‘आएँगी तो क्या?’ आदमी ने कुछ विस्मय से लड़की की ओर देखा।

‘पापा, धीरे बोलो…!’ लड़की ने ऊपर कमरे की तरफ देखा, ऊपर सन्नाटा था, जैसे घर की एक देह हो, दो में बँटी हुई, जिसका एक हिस्सा सुन्न और निस्पंद पड़ा हो, दूसरे में वे दोनों बैठे थे। और तब उसे भ्रम हुआ कि लड़की कोई कठपुतली का नाटक कर रही है। ऊपर के धागे से बँधी हुई, जैसे वह खिंचता है, वैसे वह हिलती है, लेकिन वह न धागे को देख सकता है, न उसे, जो उसे हिलाता है…

वह उठ खड़ा हुआ। लड़की ने आतंकित हो कर उसे देखा, ‘आप कहाँ जा रहे हैं?’

‘वह नीचे नहीं आएँगी?’ उसने पूछा।

‘उन्हें मालूम है, आप यहाँ हैं।’ लड़की ने कुछ खीज कर कहा।

‘इसीलिए वह नहीं आना चाहतीं?’

‘नहीं…।’ लड़की ने कहा, ‘इसीलिए वह कभी भी आ सकती हैं।’

कैसे पागल हैं! इतनी छोटी-सी बात नहीं समझ सकते। ‘आप बैठिए, मैं अभी इन सब चीजों को समेट लेती हूँ।’

वह फर्श पर उकड़ूँ बैठ गई; बड़ी सफाई से हर चीज को उठा कर कोने में रखने लगी। मखमल की जूती, पशमीने की शॉल, गुजरात एंपोरियम का बेडकवर। उसकी पीठ पिता की ओर थी, किंतु वह उसके हाथ देख सकता था, पतले और साँवले, बिल्कुल अपनी माँ की तरह, वैसे ही निस्संग और ठंडे, जो उसकी लाई चीजों को आत्मीयता से पकड़ते नहीं थे, सिर्फ अनमने भाव से अलग ठेल देते थे। वे एक ऐसी बच्ची के हाथ थे, जिसने सिर्फ माँ के सीमित और सुरक्षित स्नेह को छूना सीखा था, मर्द के उत्सुक और पीड़ित उन्माद को नहीं जो पिता के सेक्स की काली कंदरा से उमड़ता हुआ बाहर आता है।

अचानक लड़की के हाथ ठिठक गए। उसे लगा, कोई दरवाजे की घंटी बजा रहा है लेकिन दूसरे ही क्षण फोन का ध्यान आया जो जीने के नीचे कोटर में था और जंजीर से बँधे पिल्ले की तरह जोर-जोर से चीख रहा था। लड़की ने चीजें वैसे ही छोड़ दीं और लपकते हुए सीढ़ियों के पास गई, फोन उठाया, एक क्षण तक कुछ सुनाई नहीं दिया। फिर वह चिल्लाई –

‘मामा, आपका फोन!’

बच्ची बेनिस्टर के सहारे खड़ी थी, हाथ में फोन झुलाती हुई। ऊपर का दरवाजा खुला और जीना हिलने लगा। कोई नीचे आ रहा था, फिर एक सिर लड़की के चेहरे पर झुका, गुँथा हुआ जूड़ा और फोन के बीच एक पूरा चेहरा उभर आया…

‘किसका है?’ औरत ने अपने लटकते हुए जूड़े को पीछे धकेल दिया और लड़की के हाथ से फोन खींच लिया। आदमी कुर्सी से उठा… लड़की ने उसकी ओर देखा। ‘हलो,’ औरत ने कहा। ‘हलो, हलो,’ औरत की आवाज ऊपर उठी और तब उसे पता चला, कि यह उस स्त्री की आवाज है, जो उसकी पत्नी थी; वह उसे बरसों बाद भी सैकड़ों आवाजों की भीड़ में पहचान सकता था… ऊँची पिच पर हल्के-से काँपती हुई, हमेशा से सख्त, आहत, परेशान, उसकी देह की एकमात्र चीज, जो देह से परे आदमी की आत्मा पर खून की खरोंच खींच जाती थी… वह जैसे उठा था, वैसे ही बैठ गया।

लड़की मुस्करा रही थी।

वह हैंगर के आईने से आदमी का चेहरा देख रही थी – और वह चेहरा कुछ वैसा ही बेडौल दिखाई दे रहा था जैसे उम्र के आईने से औरत की आवाज – उल्टा, टेढ़ा, पहेली-सा रहस्यमय! वे तीनों व्यक्ति अनजाने में चार में बँट गए थे – लड़की, उसकी माँ, वह और उसकी पत्नी… घर जब गृहस्थी में बदलता है, तो अपने-आप फैलता जाता है…

‘तुम जेनी से बात करोगी?’ औरत ने लड़की से कहा और बच्ची जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी। वह उछल कर ऊपरी सीढ़ी पर आई और माँ से टेलीफोन ले लिया, ‘हलो जेनी, इट इज मी!’

वह दो सीढ़ियाँ नीचे उतरी; अब आदमी उसे पूरा-का-पूरा देख सकता था।

‘बैठो…’ आदमी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसके स्वर में एक बेबस-सा अनुनय था, मानो उसे डर हो कि कहीं उसे देख कर वह उल्टे पाँव न लौट जाए।

वह एक क्षण अनिश्चय में खड़ी रही। अब वापस मुड़ना निरर्थक था, लेकिन इस तरह उसके सामने खड़े रहने का भी कोई तुक नहीं था। वह स्टूल खींच कर टी.वी. के आगे बैठ गई।

‘कब आए?’ उसका स्वर इतना धीमा था कि आदमी को लगा, टेलीफोन पर कोई दूसरी औरत बोल रही थी।

‘काफी देर हो गई… मुझे तो पता भी न था कि तुम ऊपर के कमरे में हो!’

स्त्री चुपचाप उसे देखती रही।

आदमी ने जेब से रूमाल निकाला, पसीना पोंछा, मुस्कराने की कोशिश में मुस्कराने लगा। ‘मैं बहुत देर तक बाहर खड़ा रहा, मुझे पता नहीं था, घंटी खराब है। गैरेज खाली पड़ा था, मैंने सोचा, तुम दोनों कहीं बाहर गए हो… तुम्हारी कार?’ उसे मालूम था, फिर भी उसने पूछा।

‘सर्विसिंग के लिए गई है!’ स्त्री ने कहा। वह हमेशा से उसकी छोटी, बेकार की बातों से नफरत करती आई थी, जबकि आदमी के लिए वे कुछ ऐसे तिनके थे, जिन्हें पकड़ कर डूबने से बचा जा सकता था। कम-से-कम कुछ देर के लिए…

‘तुम्हें मेरा टेलीग्राम मिल गया था? मैं फ्रेंकफर्ट आया था, उसी टिकट पर यहाँ आ गया; कुछ पौंड ज्यादा देने पड़े। मैंने तुम्हें वहाँ से फोन भी किया, लेकिन तुम दोनों कहीं बाहर थे…’

‘कब?’ औरत ने हल्की जिज्ञासा से उसकी ओर देखा, ‘हम दोनों घर में थे।’

‘घंटी बज रही थी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं। हो सकता है, आपरेटर मेरी अंग्रेजी नहीं समझ सकी और गलत नंबर दे दिया हो! लेकिन सुनो।’ वह हँसने लगा, ‘एक अजीब बात हुई। हीथ्रो पर मुझे एक औरत मिली, जो पीछे से बिल्कुल तुम्हारी तरह दिखाई दे रही थी, यह तो अच्छा हुआ, मैंने उसे बुलाया नहीं… हिंदुस्तान के बाहर हिंदुस्तानी औरतें एक जैसी ही दिखाई देती हैं…।’ वह बोले जा रहा था। वह उस आदमी की तरह था जो आँखों पर पट्टी बाँध कर हवा में तनी हुई रस्सी पर चलता है, स्त्री कहीं बहुत नीचे थी, एक सपने में, जिसे वह बहुत पहले कभी जानता था, किंतु अब उसे याद नहीं आ रहा था कि वह उसके सामने क्यों बैठा था?

वह चुप हो गया। उसे खयाल आया, इतनी देर से वह सिर्फ अपनी आवाज सुन रहा है, उसके सामने बैठी स्त्री बिल्कुल चुप बैठी थी। उसकी ओर बहुत ठंडी और हताश निगाहों से देख रही थी।

‘क्या बात है?’ आदमी ने कुछ भयभीत-सा हो कर पूछा।

‘मैंने तुमसे मना किया था; तुम समझते क्यों नहीं?’

‘किसके लिए? तुमने किसके लिए मना किया था?’

‘मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती… मेरे घर तुम ये सब क्यों लाते हो? क्या फायदा है इनका?’

पहले क्षण वह नहीं समझा, कौन-सी चीजें? फिर उसकी निगाहें फर्श पर गईं… शांति-निकेतन का पर्स, डाक टिकटों का अल्बम, दालबीजी का डिब्बा – वे अब बिल्कुल लुटी-पिटी दिखाई दे रही थीं, जैसे वह कुर्सी पर बैठा हुआ था, वैसी वे फर्श पर बिखरी हुई। ‘कौन-सी ज्यादा हैं?’ उसने खिसियाते हुए कहा, ‘इन्हें न लाता तो आधा सूटकेस खाली पड़ा रहता।’

‘लेकिन मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती… तुम क्या इतनी-सी बात नहीं समझ सकते?’

स्त्री की आवाज काँपती हुई ऊपर उठी, जिसके पीछे न जाने कितनी लड़ाइयों की पीड़ा, कितने नरकों का पानी भरा था, जो बाँध टूटते ही उसके पास आने लगा, एक-एक इंच आगे बढ़ता हुआ। उसने जेब से रूमाल निकाला और अपने लथपथ चेहरे को पोंछने लगा।

‘क्या तुम्हें इतनी देर के लिए आना भी बुरा लगता है?’

‘हाँ…।’ उसका चेहरा तन गया, फिर अजीब हताशा में वह ढीली पड़ गई, ‘मैं तुम्हें देखना नहीं चाहती – बस!’

क्या यह इतना आसान है? वह जिद्दी लड़के की तरह उसे देखने लगा, जो सवाल समझ लेने के बाद भी बहाना करता है कि उसे कुछ समझ में नहीं आया।

‘वुक्कू!’ उसने धीरे से कहा, ‘प्लीज!’

‘मुझे माफ करो…।’ औरत ने कहा।

‘तुम चाहती क्या हो?’

‘लीव मी अलोन…। इससे ज्यादा मैं कुछ और नहीं चाहती।’

‘मैं बच्ची से भी मिलने नहीं आ सकता?’

‘इस घर में नहीं, तुम उससे कहीं बाहर मिल सकते हो?’

‘बाहर!’ आदमी ने हकबका कर सिर उठाया, ‘बाहर कहाँ?’

उस क्षण वह भूल गया कि बाहर सारी दुनिया फैली है, पार्क, सड़कें, होटल के कमरे – उसका अपना संसार – बच्ची कहाँ-कहाँ उसके साथ घिसटेगी?

वह फोन पर हँस रही थी। कुछ कह रही थी, ‘नहीं, आज मैं नहीं आ सकती। डैडी घर में हैं, अभी-अभी आ रहे हैं… नहीं, मुझे मालूम नहीं। मैंने पूछा नहीं…।’ क्या नहीं मालूम? शायद उसकी सहेली ने पूछा था, वह कितने दिन रहेगा? सामने बैठी स्त्री भी शायद यह जानना चाहती थी, कितना समय, कितनी घड़ियाँ, कितनी यातना अभी और उसके साथ भोगनी पड़ेगी?

शाम की आखिरी धूप भीतर आ रही थी। टी.वी. का स्क्रीन चमक रहा था, लेकिन वह खाली था और उसमें सिर्फ स्त्री की छाया बैठी थी, जैसे खबरें शुरू होने से पहले एनांउसर की छवि दिखाई देती है, पहले कमजोर और धुँधली, फिर धीरे-धीरे ‘ब्राइट’ होती हुई… वह साँस रोके प्रतीक्षा कर रहा था कि वह कुछ कहेगी हालाँकि उसे मालूम था कि पिछले वर्षों से सिर्फ एक न्यूज-रील है जो हर बार मिलने पर एक पुरानी पीड़ा का टेप खोलने लगती है, जिसका संबंध किसी दूसरी जिंदगी से है… चीजें और आदमी कितनी अलग हैं! बरसों बाद भी घर, किताबें, कमरे वैसे ही रहते हैं, जैसा तुम छोड़ गए थे; लेकिन लोग? वे उसी दिन से मरने लगते हैं, जिस दिन से अलग हो जाते हैं… मरते नहीं, एक दूसरी जिंदगी जीने लगते हैं, जो धीरे-धीरे उस जिंदगी का गला घोंट देती है, जो तुमने साथ गुजारी थी…

‘मैं सिर्फ बच्ची से नहीं…’ वह हकलाने लगा, ‘मैं तुमसे भी मिलने आया था।’

‘मुझसे?’ औरत के चेहरे पर हँसी, हिकारत, हैरानी एक साथ उमड़ आईं, ‘तुम्हारी झूठ की आदत अभी तक नहीं गई!’

‘तुमसे झूठ बोल कर अब मुझे क्या मिलेगा?’

‘मालूम नहीं, तुम्हें क्या मिलेगा – मुझे जो मिला है, उसे मैं भोग रही हूँ।’ उसने एक ठहरी ठंडी निगाह से बाहर देखा। ‘मुझे अगर तुम्हारे बारे में पहले से ही कुछ मालूम होता, तो मैं कुछ कर सकती थी।’

‘क्या कर सकती थीं?’ एक ठंडी-सी झुरझुरी ने आदमी को पकड़ लिया।

‘कुछ भी। मैं तुम्हारी तरह अकेली नहीं रह सकती; लेकिन अब इस उम्र में… अब कोई मुझे देखता भी नहीं।’

‘वुक्कू…!’ उसने हाथ पकड़ लिया।

‘मेरा नाम मत लो… वह सब खत्म हो गया।’

वह रो रही थी; बिल्कुल निस्संग, जिसका गुजरे हुए आदमी और आनेवाली उम्मीद – दोनों से कोई सरोकार नहीं थी। आँसू, जो एक कारण से नहीं, पूरा पत्थर हट जाने से आते हैं, एक ढलुआ जिंदगी पर नाले की तरह बहते हुए; औरत बार-बार उन्हें अपने हाथ से झटक देती थी…

बच्ची कब से फोन के पास चुप बैठी थी। वह जीने की सबसे निचली सीढ़ी पर बैठी थी और सूखी आँखों से रोती माँ को देख रही थी। उसके सब प्रयत्न निष्फल हो गए थे, किंतु उसके चेहरे पर निराशा नहीं थी। हर परिवार के अपने दुःस्वप्न होते हैं, जो एक अनवरत पहिए में घूमते हैं; वह उसमें हाथ नहीं डालती थी। इतनी कम उम्र में वह इतना बड़ा सत्य जान गई थी कि मनुष्य के मन और बाहर की सृष्टि में एक अद्भुत समानता है – वे जब तक अपना चक्कर पूरा नहीं कर लेते, उन्हें बीच में रोकना बेमानी है…।

वह बिना आदमी को देखे माँ के पास गई; कुछ कहा, जो उसके लिए नहीं था। औरत ने उसे अपने पास बैठा लिया, बिल्कुल अपने से सटा कर। काउच पर बैठी वे दोनों दो बहनों-सी लग रही थीं। वे उसे भूल गई थीं। कुछ देर पहले जो ज्वार उठा था, उसमें घर डूब गया था लेकिन अब पानी वापस लौट गया था और अब आदमी वहाँ था, जहाँ उसे होना चाहिए था – किनारे पर। उसे यह ईश्वर का वरदान जैसा जान पड़ा; वह दोनों के बीच बैठा है – अदृश्य! बरसों से उसकी यह साध रही थी कि वह माँ और बेटी के बीच अदृश्य बैठा रहे। सिर्फ ईश्वर ही अपनी दया में अदृश्य होता है – यह उसे मालूम था। किंतु जो आदमी गढ़हे की सबसे निचली सतह पर जीता है, उसे भी कोई नहीं देख सकता। माँ और बच्ची ने उसे अलग छोड़ दिया था; यह उसकी उपेक्षा नहीं थी। उसकी तरफ से मुँह मोड़ कर उन्होंने उसे अपने पर छोड़ दिया था – ठीक वहीं – जहाँ उसने बरसों पहले घर छोड़ा था।

लड़की माँ को छोड़ कर उसके पास आ कर बैठ गई।

‘हमारा बाग देखने चलोगे?’ उसने कहा।

‘अभी?’ उसने कुछ विस्मय से लड़की को देखा। वह कुछ अधीर और उतावली-सी दिखाई दे रही थी, जैसे वह उससे कुछ कहना चाहती हो, जिसे कमरे के भीतर कहना असंभव हो।

‘चलो,’ आदमी ने उठते हुए कहा, ‘लेकिन पहले इन चीजों को ऊपर ले जाओ।’

‘हम इन्हें बाद में समेट लेंगे।’

‘बाद में कब?’ आदमी ने कुछ सशंकित हो कर पूछा।

‘आप चलिए तो!’ लड़की ने लगभग उसे घसीटते हुए कहा।

‘इनसे कहो, अपना सामान सूटकेस में रख लें।’ स्त्री की आवाज सुनाई दी।

उसे लगा, किसी ने अचानक पीछे से धक्का दिया हो। वह चमक कर पीछे मुड़ा, ‘क्यों?’

‘मुझे इनकी कोई जरूरत नहीं है।’

उसके भीतर एक लपलपाता अंधड़ उठने लगा, ‘मैं नहीं ले जाऊँगा, तुम चाहो तो इन्हें बाहर फेंक सकती हो।’

‘बाहर?’ स्त्री की आवाज थरथरा रही थी, ‘मैं इनके साथ तुम्हें भी बाहर फेंक सकती हूँ।’ रोने के बाद उसकी आँखें चमक रही थीं; गालों का गीलापन सूखे काँच-सा जम गया था, जो पोंछे हुए नहीं, सूखे हुए आँसुओं से उभर कर आता है।

‘क्या हम बाग देखने नहीं चलेंगे?’ बच्ची ने उसका हाथ खींचा – और वह उसके साथ चलने लगा। वह कुछ भी नहीं देख रहा था। घास, क्यारियाँ और पेड़ एक गूँगी फिल्म की तरह चल रहे थे। सिर्फ उसकी पत्नी की आवाज एक भुतैली कमेंट्री की तरह गूँज रही थी – बाहर, बाहर!

‘आप ममी के साथ बहस क्यों करते हैं?’ लड़की ने कहा।

‘मैंने बहस कहाँ की?’ उसने बच्ची को देखा – जैसे वह भी उसकी दुश्मन हो।

‘आप करते हैं।’ लड़की का स्वर अजीब-सा हठीला हो आया था। वह अंग्रेजी में ‘यू’ कहती थी, जिसका मतलब प्यार में ‘तुम’ होता था और नाराजगी में ‘आप’। अंग्रेजी सर्वनाम की यह संदिग्धता बाप-बेटी के रिश्ते को हवा में टाँगे रहती थी, कभी बहुत पास, कभी बहुत पराया – जिसका सही अंदाज उसे सिर्फ लड़की की टोन में टटोलना पड़ता था। एक अजीब-से भय ने आदमी को पकड़ लिया। वह एक ही समय में माँ और बच्ची दोनों को नहीं खोना चाहता था।

‘बड़ा प्यारा बाग है,’ उसने फुसलाते हुए कहा, ‘क्या माली आता है?’

‘नहीं, माली नहीं।’ लड़की ने उत्साह से कहा, ‘मैं शाम को पानी देती हूँ और छुट्टी के दिन ममी घास काटती हैं… इधर आओ, मैं तुम्हें एक चीज दिखाती हूँ।’

वह उसके पीछे-पीछे चलने लगा। लॉन बहुत छोटा था – हरा, पीला, मखमली। पीछे गैराज था और दोनों तरफ झाड़ियों की फेंस लगी थी। बीच में एक घना, बूढ़ा, विलो खड़ा था। लड़की पेड़ के पीछे छिप-सी गई, फिर उसकी आवाज सुनाई दी, ‘कहाँ हो तुम?’

वह चुपचाप, दबे-पाँवों से पेड़ के पीछे चला आया और हैरान-सा खड़ा रहा। विलो और फेंस के बीच काली लकड़ी का बाड़ा था, जिसके दरवाजे से एक खरगोश बाहर झाँक रहा था; दूसरा खरगोश लड़की की गोद में था। वह उसे ऐसे सहला रही थी, जैसे वह ऊन का गोला हो, जो कभी भी हाथ से छूट कर झाड़ियों में गुम हो जाएगा।

‘ये हमने अभी पाले हैं… पहले दो थे, अब चार।’

‘बाकी कहाँ हैं?’

‘बाड़े के भीतर… वे अभी बहुत छोटे हैं।’

पहले उसका मन भी खरगोश को छूने के लिए हुआ, किंतु उसका हाथ अपने-आप बच्ची के सिर पर चला गया और वह धीरे-धीरे उसके भूरे, छोटे बालों से खेलने लगा। लड़की चुप खड़ी रही और खरगोश अपनी नाक सिकोड़ता हुआ उसकी ओर ताक रहा था।

‘पापा?’ लड़की ने बिना सिर उठाए धीरे से कहा, ‘क्या आपने डे-रिटर्न का टिकट लिया है?’

‘नहीं; क्यों?’

‘ऐसे ही; यहाँ वापसी का टिकट बहुत सस्ता मिल जाता है।’

क्या उसने यही पूछने के लिए उसे यहाँ बुलाया था? उसने धीरे से अपना हाथ लड़की के सिर से हटा लिया।

‘आप रात को कहाँ रहेंगे?’ लड़की का स्वर बिल्कुल भावहीन था।

‘अगर मैं यहीं रहूँ तो?’

लड़की ने धीरे से खरगोश को बाड़े में रख दिया और खट से दरवाजा बंद कर दिया।

‘मैं हँसी कर रहा था,’ उसने हँस कर कहा, ‘मैं आखिरी ट्रेन से लौट जाऊँगा।’

लड़की ने मुड़ कर उसकी ओर देखा, ‘यहाँ दो-तीन अच्छे होटल भी हैं…। मैं अभी फोन करके पूछ लेती हूँ।’ बच्ची का स्वर बहुत कोमल हो आया। यह जानते ही कि वह रात को घर में नहीं ठहरेगा, वह माँ से हट कर आदमी के साथ हो गई; धीरे से उसका हाथ पकड़ा, उसे वैसे ही सहलाने लगी, जैसे अभी कुछ देर पहले खरगोश को सहला रही थी। लेकिन आदमी का हाथ पसीने से तरबतर था।

‘सुनो, मैं अगली छुट्टियों में इंडिया आऊँगी – इस बार पक्का है।’

उसे कुछ आश्चर्य हुआ कि आदमी ने कुछ नहीं कहा; सिर्फ बाड़े में खरगोशों की खटर-पटर सुनाई दे रही थी।

‘पापा… तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?’

‘तुम हर साल यही कहती हो।’

‘कहती हूँ… लेकिन इस बार मैं आऊँगी, डोंट यू बिलीव मी?… भीतर चलें? ममी हैरान हो रही होंगी कि हम कहाँ रह गए।’

अगस्त का अँधेरा चुपचाप चला आया था। हवा में विलो की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। कमरों के परदे गिरा दिए गए थे, लेकिन रसोई का दरवाजा खुला था। लड़की भागते हुए भीतर गई और सिंक का नल खोल कर हाथ धोने लगी। वह उसके पीछे आ कर खड़ा हो गया; सिंक के ऊपर आईने में उसने अपना चेहरा देखा – रूखी गर्द और बढ़ी हुई दाढ़ी और सुर्ख आँखों के बीच उसकी ओर हैरत में ताकता हुआ – नहीं, तुम्हारे लिए कोई उम्मीद नहीं…

पापा, क्या तुम अब भी अपने-आपसे बोलते हो?’ लड़की ने पानी में भीगा अपना चेहरा उठाया – वह शीशे में उसे देख रही थी।

‘हाँ, लेकिन अब मुझे कोई सुनता नहीं…।’ उसने धीरे से बच्ची के कंधे पर हाथ रखा, ‘क्या फ्रिज में सोडा होगा?’

‘तुम भीतर चलो, मैं अभी लाती हूँ।’

कमरे में कोई न था। उसकी चीजें बटोर दी गई थीं। सूटकेस कोने में खड़ा था; जब वे बाग में थे, उसकी पत्नी ने शायद उन सब चीजों को देखा होगा; उन्हें छुआ होगा। वह उससे चाहे कितनी नाराज क्यों न हो – चीजों की बात अलग थी। वह उन्हें ऊपर नहीं ले गई थी, लेकिन दुबारा सूटकेस में डालने की हिम्मत नहीं की थी… उसने उन्हें अपने भाग्य पर छोड़ दिया था।

कुछ देर बाद जब बच्ची सोडा और गिलास ले कर आई, तो उसे सहसा पता नहीं चला कि वह कहाँ बैठा है। कमरे में अँधेरा था – पूरा अँधेरा नहीं – सिर्फ इतना, जिसमें कमरे में बैठा आदमी चीजों के बीच चीज-जैसा दिखाई देता है, ‘पापा… तुमने बत्ती नहीं जलाई?’

‘अभी जलाता हूँ…।’ वह उठा और स्विच को ढूँढ़ने लगा, बच्ची ने सोडा और गिलास मेज पर रख दिया और टेबुल लैंप जला दिया।

‘ममी कहाँ हैं?’

‘वह नहा रही हैं, अभी आती होंगी।’

उसने अपने बैग से व्हिस्की निकाली, जो उसने फ्रेंकफर्ट के एयरपोर्ट पर खरीदी थी… गिलास में डालते हुए उसके हाथ ठिठक गए, ‘तुम्हारी जिंजर-एल कहाँ है?’

‘मैं अब असली बियर पीती हूँ।’ लड़की ने हँस कर उसकी ओर देखा, ‘तुम्हें बर्फ चाहिए?’

‘नहीं… लेकिन तुम जा कहाँ रही हो?’

‘बाड़े में खाना डालने… नहीं तो वे एक-दूसरे को मार खाएँगे।’

वह बाहर गई तो खुले दरवाजे से बाग का अँधेरा दिखाई दिया – तारों की पीली तलछट में झिलमिलाता हुआ। हवा नहीं था। बाहर का सन्नाटा घर की अदृश्य आवाजों के भीतर से छन कर आता था। उसे लगा, वह अपने घर में बैठा है और जो कभी बरसों पहले होता था, वह अब हो रहा है। वह शॉवर के नीचे गुनगुनाती रहती थी और जब वह बालों पर तौलिया साफे की तरह बाँध कर बाहर निकलती थी, तब पानी की बूँदें बाथरूम से ले कर उसके कमरे तक एक लकीर बनाती जाती थीं – पता नहीं वह लकीर कहाँ बीच में सूख गई? कौन-सी जगह, किस खास मोड़ पर वह चीज हाथ से छूट गई, जिसे वह कभी दोबारा नहीं पकड़ सका?

उसने कुछ और व्हिस्की डाली; हालाँकि गिलास अभी खाली नहीं हुआ था। उसे कुछ अजीब लगा कि पिछली रात भी यही घड़ी थी जब वह पी रहा था, लेकिन तब वह हवा में था। जब उसे एयर-होस्टेज की आवाज सुनाई दी कि हम चैनल पार कर रहे हैं तो उसने हवाई जहाज की खिड़की से नीचे देखा – कुछ भी दिखाई नहीं देता था – न समुद्र, न लाइटहाउस, सिर्फ अँधेरा, अँधेरे में बहता हुआ अँधेरा – फिर कुछ भी नहीं। और तब नीचे अँधेरे में झाँकते हुए उसे खयाल आया कि वह चैनल जो नीचे कहीं दिखाई नहीं देता था, असल में कहीं भीतर है – उसकी एक जिंदगी से दूसरी जिंदगी तक फैला हुआ; जिसे वह हमेशा पार करता रहेगा, कभी इधर, कभी उधर, कहीं का भी नहीं, न कहीं से आता हुआ, न कहीं पहुँचता हुआ…।

‘बिंदु कहाँ है?’ उसने चौंक कर ऊपर देखा, वह वहाँ कब से खड़ी थी, उसे पता नहीं चला था। ‘बाहर बाग में,’ उसने कहा, ‘खरगोशों को खाना देने।’

वह अलग खड़ी थी, बेनिस्टर के नीचे। नहाने के बाद उसने एक लंबी मैक्सी पहन ली थी…। बाल खुले थे। चेहरा बहुत धुला और चमकीला-सा लग रहा था। वह मेज पर रखे उसके गिलास को देख रही थी। उसका चेहरा शांत था; शॉवर ने जैसे न केवल उसके चेहरे को, बल्कि उसके संताप को भी धो डाला था।

‘बर्फ भी रखी है।’ उसने कहा।

‘नहीं, मैंने सोडा ले लिया; तुम्हारे लिए एक बना दूँ?’

उसने सिर हिलाया, जिसका मतलब कुछ भी था, उसे मालूम था कि गर्म पानी से नहाने के बाद उसे कुछ ठंडा पीना अच्छा लगता था। अर्से बाद भी वह उसकी आदतें नहीं भूला था, बल्कि उन आदतों के सहारे ही दोनों के बीच पुरानी पहचान लौट आती थी। वह रसोई में गया और उसके लिए एक गिलास ले आया। उसमें थोड़ी-सी बर्फ डाली। जब व्हिस्की मिलाने लगा, तो उसकी आवाज सुनाई दी, ‘बस, इतनी काफी है।’

वह धुली हुई आवाज थी, जिसमें कोई रंग नहीं था, न स्नेह का, न नाराजगी का – एक शांत और तटस्थ आवाज। वह सीढ़ियों से हट कर कुर्सी के पास चली आई थी।

‘तुम बैठोगी नहीं?’ उसने कुछ चिंतित हो कर पूछा।

उसने अपना गिलास उठाया और वहीं स्टूल पर बैठ गई, जहाँ दुपहर को बैठी थी। टी.वी. के पास लेकिन टेबुल-लैंप से दूर – जहाँ सिर्फ रोशनी की एक पतली-सी झाँई, उस तक पहुँच रही थी।

कुछ देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला, फिर स्त्री की आवाज सुनाई दी, ‘घर में सब लोग कैसे हैं?’

‘ठीक हैं… ये सब चीजें उन्होंने ही भेजी हैं।’

‘मुझे मालूम है,’ औरत ने कुछ थके स्वर में कहा, ‘क्यों उन बेचारों को तंग करते हो? तुम ढो-ढो कर इन चीजों को लाते हो और वे यहाँ बेकार पड़ी रहती हैं।’

‘वे यही कर सकते हैं,’ उसने कहा, ‘तुम बरसों से वहाँ गई नहीं; वे बहुत याद करते हैं।’

‘अब जाने का कोई फायदा है?’ उसने गिलास से लंबा घूँट लिया, ‘मेरा अब उनसे कोई रिश्ता नहीं।’

‘तुम बच्ची के साथ तो आ सकती हो, उसने अभी तक हिंदुस्तान नहीं देखा।’

वह कुछ देर चुप रही… फिर धीरे से कहा, ‘अगले साल वह चौदह वर्ष की हो जाएगी… कानून के मुताबिक तब वह कहीं भी जा सकती है।’

‘मैं कानून की बात नहीं कर रहा; तुम्हारे बिना वह कहीं नहीं जाएगी।’

स्त्री ने गिलास की भीगी सतह से आदमी को देखा, ‘मेरा बस चले तो उसे वहाँ कभी न भेजूँ।’

‘क्यों?’ आदमी ने उसकी ओर देखा।

वह धीरे से हँसी, ‘क्या हम दो हिंदुस्तानी उसके लिए काफी नहीं हैं?’

वह बैठा रहा। कुछ देर बाद रसोई का दरवाजा खुला, लड़की भीतर आई, चुपचाप दोनों को देखा और फिर जीने के पास चली गई जहाँ टेलीफोन रखा था।

‘किसे कर रही हो?’ औरत ने पूछा।

लड़की चुप रही, फोन का डायल घुमाने लगी।

आदमी उठा, उसकी ओर देखा, ‘थोड़ा-सा और लोगी?’

‘नहीं…।’ उसने सिर हिलाया। आदमी धीरे-धीरे अपने गिलास में डालने लगा।

‘क्या बहुत पीने लगे हो?’ औरत ने कहा।

‘नहीं…।’ आदमी ने सिर हिलाया, ‘सफर में कुछ ज्यादा ही हो जाता है।’

‘मैंने सोचा था, अब तक तुमने घर बसा लिया होगा।’

‘कैसे?’ उसने स्त्री को देखा, ‘तुम्हें यह कैसे भ्रम हुआ?’

औरत कुछ देर तक नीरव आँखों से उसे देखती रही, ‘क्यों, उस लड़की का क्या हुआ? वह तुम्हारे साथ नहीं रहती?’ स्त्री के स्वर में कोई उत्तेजना नहीं थी, न क्लेश की कोई छाया थी… जैसे दो व्यक्ति मुद्दत बाद किसी ऐसी घटना की चर्चा कर रहे हों जिसने एक झटके से दोनों को अलग छोरों पर फेंक दिया था।

‘मैं अकेला रहता हूँ… माँ के साथ।’ उसने कहा।

औरत ने तनिक विस्मय से उसे देखा, ‘क्या बात हुई?’

‘कुछ नहीं… मैं शायद साथ रहने के काबिल नहीं हूँ।’ उसका स्वर असाधारण रूप से धीमा हो आया, जैसे वह उसे अपनी किसी गुप्त बीमारी के बारे में बता रहा हो, ‘तुम हैरान हो? लेकिन ऐसे लोग होते हैं…’ वह कुछ और कहना चाहता था, प्रेम के बारे में, वफादारी के बारे में, विश्वास और धोखे के बारे में; कोई बड़ा सत्य, जो बहुत-से झूठों से मिल कर बनता है, व्हिस्की की धुंध में बिजली की तरह कौंधता है और दूसरे क्षण हमेशा के लिए अँधेरे में लोप हो जाता है…

लड़की शायद इस क्षण की ही प्रतीक्षा कर रही थी; वह टेलीफोन से उठ कर आदमी के पास आई, एक बार माँ को देखा, वह टेबुल-लैंप के पीछे अँधेरे के आधे कोने में छिप गई थीं, और आदमी? वह गिलास के पीछे सिर्फ एक डबडबाता-सा धब्बा बन कर रह गया था।

‘पापा,’ लड़की के हाथ में कागज का पुरजा था, ‘यह होटल का नाम है, टैक्सी तुम्हें सिर्फ दस मिनट में पहुँचा देगी।’

उसने लड़की को अपने पास खींच लिया और कागज जेब में रख लिया। कुछ देर तक तीनों चुप बैठे रहे, जैसे बरसों पहले यात्रा पर निकलने से पहले घर के सब प्राणी एक साथ सिमट कर चुप बैठ जाते थे। बाहर बहुत-से तारे निकल आए थे, जिसमें बूढ़ी, विलो, झाड़ियाँ और खरगोशों का बाड़ा एक निस्पंद पीले आलोक में पास-पास सरक आए थे।

उसने अपना गिलास मेज पर रखा, फिर धीरे से लड़की को चूमा, अपना सूटकेस उठाया और जब लड़की ने दरवाजा खोला, तो वह क्षण भर देहरी पर ठिठक गया, ‘मैं चलता हूँ।’ उसने कहा। पता नहीं, यह बात उसने किससे कही थी, किंतु जहाँ वह बैठी थी, वहाँ से कोई आवाज नहीं आई। वहाँ उतनी ही घनी चुप्पी थी, जितनी बाहर अँधेरे में, जहाँ वह जा रहा था।

Monday, September 7, 2020

अँधेरे में - निर्मल वर्मा (Andhere Mein by Nirmal Verma )


बीच की तीन पगडंडियों को पार कर बानो आती थी। आते ही पूछती थी, “कुछ पता चला?” मेरा मन झूठ बोलने के लिए मचल उठता। सोचता, कह दूँ-“हाँ, पता चल गया..हम दिल्ली जा रहे हैं।“ लेकिन बानो झूठ ताड़ जाएगी, इसलिए आँखें मूँदे रहता।

बानो मेरे माथे पर हाथ रखती। जब उसका हाथ ठंडा लगता, मैं जान जाता कि अभी बुखार है, जब गरम लगता तो मन उल्लसित हो उठता। आँखें खोलकर पूछता-“कैसा लगता है बानो? और बानो निराश भरे स्वर में कहती, “अभी तो कम है, लेकिन शाम तक जरूर चढ़ जाएगा।” बानो समझती थी कि जब तक बुखार रहेगा, हम उसके संग शिमले में ही रहेंगे- बुखार उतरने लगता, तो उसे निराशा होती। जब कभी बानो की आहट मिल जाती, मैं जान बूझकर पास रखे ठंडे पानी से अपना माथा रगड़ लेता। जब वह आती तो उसका हाथ अपने माथे पर रखकर पूछता, “देखो तो बानो, कितना ठंडा है।“ बानो गुमसुम-सी खिड़की के बाहर देखती रहती।

खिड़की के बाहर नीले जंगल हैं, ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ है, पेड़ों के घने झुरमुट हैं। जब हवा का झोंका परदे को डुलाता हुआ भीतर आता है, दूर दिगंत की एक स्वप्निल-सी खूशबू कमरे में बिखर जाती है।

“इन पहाड़ों के पीछे दिल्ली है, है न बानो?”  मैं पूछता।

बानो ने चुपचाप सिर हिला दिया- उसे दिल्ली की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कभी-कभी मुझे उस पर काफी तरस आता- उस बेचारी ने अब तक दिल्ली नहीं देखी थी। उसके अब्बा का दफ्तर बारहों महीने शिमले रहता  था।

“मैं आज गयी थी-अपने घर,” बानो ने कहा। जिस ‘अपने घर’ का नाम सुनकर मैं सबकुछ भूल जाता था, आज उसके प्रति मेरे मन में कोई उत्सुकता नहीं जगी।

“मेरे अलूचे तुम ले लेना… बानो,” मैं आँखें मूँदे लेटा रहा।

“तुम्हारे गले-सड़े अलूचे कौन खाएगा, जब दिल्ली जाओगे, अपनी पोटली में बाँधकर ले जाना।“ बानो खीजकर बाहर बरामदे में भाग गयी।

मुझे गुस्सा लगा। लेकिन बीमारी में गुस्सा भी टूटा-फूटा आता है, कोई भी भाव अंत तक नहीं पहुँच पाता, बीच रास्ते में ही सूख जाता है। जब रोने को जी करता है, तो रोना नहीं आता, आँखें ही बिफरी-सी रह जाती हैं। जब खुशी होती है, तो दिल तेजी से नहीं धड़कता, केवल होंठ काँपकर रह जाते हैं।

इन दिनों मेरे कमरे में आने से पहले बानो की तलाशी ली जाती थी कि कहीं वह खट्टे अलूचे और कच्ची खूबानियाँ लुक-छिपकर भीतर न ले आए। उसके दुपट्टे के सिरे में नमक-मिर्च की पुड़िया बंधी रहती-बीमारी से पहले अलूचों को उनमें भिगोकर हम चटनी बनाया करते थे।

बानो ने जिसे अभी ‘अपने घर’ कहा था, वह पड़ोस में एक भुतहा मकान था, जो बारहों महीने खाली-उजाड़ पड़ा रहता रहता था। कहते थे, वहाँ एक मेम ने अपने हाथों से अपने को जान से मार लिया था। उस मकान का एक कमरा गुसलखाने में खुलता था- वहीं मैं और बानो अपनी कच्ची-पक्की खूबानियों और अलूचों का खजाना छिपाकर रखते थे। यह एक गुप्त व्यापार था, जिसकी खबर अभी तक किसी तीसरे व्यक्ति के कान में नहीं पड़ी थी।

बानो बाहर बरामदे में देर तक झूला झूलती रही। जब वह झोटा लेकर झूला ऊपर लाती है, उसकी सलवार गुब्बारे-सी फूल जाती है। झूले को ऊपर-नीचे घूमता देखते हुए मेरी आँखें झपकने लगीं। कब आँख लग गयी, याद नहीं आता। सपना आया था। दुपहर को सोते हुए जो सपना आता है, वह मुझे हमेशा याद रहता है। दफ्तर से बाबू के टिफिन लेने के लिए चपरासी आया है। उसने हँसते हुए बताया है कि हम दिल्ली जा रहे हैं। भुतहा मकान के कमरे की खिड़की से बानो मेरे अलूचों को बाहर फेंक रही है, और दूर पहाड़ियों में कालका-शिमला की रेल में वही मेम बैठी है, जिसने आत्महत्या की थी। बानो जो अलूचे बाहर फेंटी है, रेल के डिब्बे से वही मेम खिड़की से हाथ बाहर निकालकर उन्हें पकड़ती जा रही है।

जब मेरी आँख खुली तो बानो कब की जा चुकी थी।

शाम को माँ चाय लेकर आयी, तो मैंने पूछा-“चपरासी आया था?” माँ ने हैरान होकर कहा, “हाँ, आया था, क्यों?” “कुछ कहता था?” मैंने पूछा। माँ ने कहा, “नहीं-क्यों, क्या बात है?” मैं कुछ नहीं बोला और तकिये के सहारे अधलेटा-सा चाय पीने लगा।

माँ ने थर्मामीटर लगाकर देखा, फिर झटक दिया। पहले मैं अपना बुखार पूछ लिया करता था, किन्तु जब देखा कि माँ झूठ बताती हैं, तो पूछना छोड़कर केवल उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश किया करता था। कभी-कभी माँ मेरे गंभीर चेहरे को देखकर कहतीं-“जल्दी ठीक हो जाओ, फिर दिल्ली चलेंगे।“ वह इस निश्छल, हल्के ढंग से कहतीं, मानो ठीक होना मेरे वश की बात है, जैसे मैं जान बूझकर जिद किए हुए बीमार पड़ा हूँ और वह मुझे ठीक होने के लिए फुसला-मना रही हैं। इससे मुझे गुस्सा आता और मैं करवट बदलकर खिड़की की ओर मुँह मोड लेता। किन्तु उन्हें काफी देर तक पता नहीं चला कि मैं गुस्सा किये हूँ। मैं अपने पाँव ऐंठ लेता, दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बंद कर लेता और दांतों को भींचता हुआ जोर-जोर से साँस लेने लगता। माँ जो खिड़की से बाहर देख रही होतीं, एकदम घबरा उठतीं। मेरे चेहरे को देखतीं, फिर एक ठंडी साँस लेकर सिरहाने बैठ जातीं। न जाने मैं कैसे जान लेता कि वह मेरे अभिनय को भांप गयी हैं। किन्तु ऊपर से वह कुछ नहीं बतलातीं… धीरे से आलमारी से कैडबरी चाकलेट निकालकर मेरे तकिये के नीचे रख देतीं। “बाबू को मत बताना,” उन्होंने मेरे बालों को उँगलियों से सहलाते हुए कहा। दूसरे क्षण वह मुझे भूल गयीं। उनकी उँगलियों के अनिश्चित, अर्ध-सोये स्पर्श से मुझे पता चल जाता है कि वह स्वयं मुझसे कोसों दूर खो गयी हैं। चाकलेट जो मुझे दी है, वह मुझे रिझाने को नहीं, बल्कि मुझसे छुटकारा पाने के लिए, जिससे वह बिना किसी विघ्न-बाधा के अपने में सिमटी रह सकें। ऐसे क्षणों में मैं चुपचाप उनकी ओर देखता रहता। वह नहीं जानतीं कि मैं उनकी ओर देख रहा हूँ। उनके चेहरे के बल ढीले पड़ जाते, सब उतार-चढ़ाव मिट जाते और एक शून्य-सी समतलता बिछ जाती। मुझे लगता जैसे उनकी आँखों में सूखी तपिश की  गरमाई-सी फ़ाइल गयी है, किन्तु दूसरे ही क्षण भ्रम होता कि उनमें धुंधला-सा गीलापन है, जो चमक रहा है। मुझे अक्सर यह खुशफहमी होती कि वह मेरी बीमारी के संबंध में सोच रही हैं-हालांकि भीतर-ही-भीतर मुझे मालूम था कि ऐसे क्षणों में उनके ख्यालों से मेरा दूर का भी वास्ता नहीं है।

तब मैंने धीरे-से उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। वह एकदम हड़बड़ाकर चौंक गयीं। मुझे लगा जैसे मैं उन्हें जबर्दस्ती कहीं बहुत दूर से खींच लाया हूँ। वह मुझे कुछ देर तक घूरती रहीं। फिर अचानक मेरे होंठों को चूम लिया। मैंने कमीज की बांह से अपने होंठों को पोंछा, वह मुस्कराने लगीं।

“बच्ची, एक बात पूछूँ?

“क्या?”

“अगर मैं कहीं चली जाऊँ, तो क्या तुम मुझे समझोगे?”

माँ अपलक एकटक मुझे देख रही हैं।

 “क्या मैं भी तुम्हारे संग चलूँगा?”

“न”-उन्होंने सिर हिलाया।

 “बाबू के संग जाओगी?”

“न”

“फिर?” मैं विस्मित-सा उनकी ओर देखता रहा।

वह हँसने लगीं और मेरे संग पलंग पर लेट गयीं।

मैंने अपने गाल उनके गालों से सटा लिए। माँ बहुत खूबसूरत हैं। घर में सब उनसे डरते हैं; मुझे कभी-कभी काफी आश्चर्य होता है कि उनमें कौन-सी ऐसी बात है जो सबको इतना आतंकित किए रहती है। वैसे डर मुझे भी लगता है-उनकी आँखों से, जब वह मेरे पास बैठकर मुझे देखती हैं।

मैं बहुत दिन पहले बाबू के संग उनके एक मित्र के घर गया था। वापिस आते हुए हमें पहाड़ी नाले के संग-संग ऊपर चढ़ना पड़ा था। ऊपर आकर हम पेड़ों के घने अँधेरे झुरमुट के बीच कुछ देर के लिए सुस्ताने खड़े हो गए थे। मैं उस जगह की वीरान चुप्पी से डर गया था।

आज जब कभी मैं माँ की आँखों को देखता हूँ, तो न जाने क्यों मुझे उस रात जंगल के झुरमुट का घना-घना-सा अँधेरा याद आ जाता है।

संगमरमर-सी चिकनी सफेद उनकी बाँहें हैं, जिन्हें मैं शरमाते-शरमाते छूता हूँ। वह अपने बालों को बहुत कसकर बाँधती हैं, इसलिए उनका माथा इतना चौड़ा दिखायी देता है। बालों के बीचोंबीच सीधी मांग है-जिसे देखकर मैं उदास हो जाता हूँ। उनके कान बहुत छोटे-छोटे हैं, गुड़िया के कानों-से-जिन्हें वे अपने बालों के भीतर छिपाये रखती हैं। जब कभी वे मुझसे सटकर लेटती हैं, मैं उनके कानों को बालों के भीतर से निकाल लेता हूँ। मुझे बानो की बात याद आती है, और मेरे सारे शरीर में एक हल्की-सी झुरझुरी फैलने लगती है। “जिनके कान छोटे होते हैं,” बानो ने एक दिन कहा था, “वे लोग बहुत जल्दी मार जाते हैं।“ मैंने यह बात माँ को नहीं बतायी है, सोचता हूँ, जब वह मरने लगेंगी तो कह दूंगा कि वह अपने छोटे-छोटे कानों की वजह से ही मर रही हैं।

कभी-कभी मुझे लगता है कि उन्हें मेरी बीमारी की विशेष चिंता नहीं है। मुझे लगता है कि वह यह भी भूल जातीं हैं कि मैं बीमार हूँ। एक दिन जब मैंने केक खाने की इच्छा प्रकट की, तो उन्होंने बुआ अथवा बाबा की तरह मेरी नाजायज मांग का कोई विरोध नहीं किया। चुपचाप आलमारी से केक का एक टुकड़ा तश्तरी पर रखकर मेरे सामने धर दिया और खुद आँखें मूंदकर कुर्सी पर लेटी रहीं। मुझे कुछ बुरा लगा और केक खाने की मेरी इच्छा उसी क्षण मर गई। मुझे भी था कि कुछ भी कहा लेने से मेरी बीमारी लंबी हो जाएगी, और तब दिल्ली जाने का दिन और भी पीछे टल जाएगा।

मुझे मालूम है-माँ दिल्ली नहीं जाना चाहतीं। इसका कारण मुझे आज भी समझ में नहीं आता, किन्तु एक बार उन्होंने यह बात बीरेन चाचा से कही थी।

कभी-कभी चोरी-चुपके से मैं माँ के कमरे में जाता हूँ। पिछले कुछ महीनों से माँ और बाबू अलग-अलग, अपने-अपने कमरों में सोते हैं। पहले मुझे यह बात कुछ अजीब-सी लगी थी-किन्तु कुछ चीजें हैं, जिन्हें मैं किसी से नहीं पूछता, मन का एक कोना है, जिसमें सबकी आँखों से छिपाकर उन्हें दबा देता हूँ।

माँ का कमरा छज्जे के अंतिम सिरे पर है। मुझे अपने कमरे से उनके कमरे की दो खिड़कियां दिखाई देती हैं-खिड़कियों के बीच दीवार का छोटा-सा टुकड़ा है, जिस पर, पत्तों की जालीदार छाया हर शाम सिमट आती है। कभी-कभी खिड़की का नीला पर्दा उड़कर दीवार से चिपक जाता है, तब पत्तों की जाली दीवार से उठकर परदे पर मँडराने लगती है। खुली खिड़की से माँ का सिर दिखायी देता है। जब वह सिर जरा ऊपर उठाती हैं, तो धूप में उनका जूड़ा सुनहरा-सा होकर चमक उठता है। मैं समझ जाता हूँ, माँ खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी पढ़ रही हैं।

मैं कई बार माँ के कमरे में गया हूँ-सोफ़े पर, उनके पलंग पर तकिये के पास, पलंग के नीचे किताबें बिखरी रहती हैं। माँ को शायद बहुत कम नींद आती है-रात को अनेक बार मैंने उनके कमरे में बत्ती का प्रकाश देखा है। सोचता हूँ, वह इन्हीं किताबों को पढ़ती रहती होंगी।

एक बार मैंने कोई किताब खोली थी, उस पर छोटे-छोटे, टेढ़े-नीले अक्षरों में बीरेन चाचा का नाम लिखा था-मैं मंत्रमुग्ध-सा उन अक्षरों में खो गया था। बाद में वह नाम मैंने माँ के कमरे में रखी अनेक किताबों पर देखा था।

मुझे बीरेन चाचा की छोटी-सी कॉटेज याद आती है, जहाँ एक दिन मैं माँ के संग गया था। एक बड़े कमरे में छत तक किताबें चुनी रखी थीं। हर शेल्फ के नीचे छोटी-छोटी सीढ़ियाँ खड़ी थीं, जिन पर चढ़कर किताबों को उतारना पड़ता था। दूसरे कमरे में टेढ़ी-मेढ़ी बेडौल शक्लों के अजीब चित्र टंगे थे, जिन्हें देखकर मैं स्तंभित-स खड़ा रह गया था। बाबू बताते हैं कि लड़ाई से पहले बीरेन चाचा ने इन चित्रों को यूरोप में खरीदा था। मुझे बीरेन चाचा पर कभी अचंभा होता, कभी दया आती- वह बारहों महीने सर्दी, गर्मी में इस निर्जन, अकेले मकान में कैसे रह पाते होंगे।

बाबू के मित्रों में शायद बीरेन चाचा का स्थान सबसे अलग है। बाबू केवल उनके संग मेरे कमरे में चाय पीते हैं-उनके अन्य मित्र बाहर बैठक में बैठते हैं। जब वह आते हैं, उस शाम मुझे जल्दी सोने के लिए मजबूर नहीं किया जाता- देर तक मेरे कमरे में ही बातचीत होती है। मेरे लिए ये रातें बहुत सुखद होती हैं।

एक शाम बीरेन चाचा जब हमारे घर आए, तो उनकी वेशभूषा देखकर उन्हें एकदम नहीं पहचान सका। घुटनों तक लंबे बूट, कंधे पर खाकी थैला, दूसरे पर कैमरा और सिर पर सोला हैट—इस पोशाक में उनकी छोटी-सी दाढ़ी बड़ी बेमेल और कृत्रिम लग रही है। पैंट की दोनों जेबों में किताबें ठूंस रखी थीं।

वह मेरे पलंग के पास आए और मुझसे हाथ मिलाया। वह मुझसे ऐसे पेश आते हैं, जैसे मैं बीमार हूँ ही नहीं, और न कभी मेरी तबीयत ही पूछते हैं।

माँ पास की कुर्सी पर बैठी बुन रही थीं—एक बार उन्होंने बीरेन चाचा को देखा और फिर सिर झुका लिया।

उन्होंने बताया कि वह एक रात के लिए कुफ़री जा रहे हैं, रेस्ट हाउस में ही ठहरेंगे और अगले दिन शाम तक वापिस लौट आएंगे।

“कहते हैं, रेस्ट हाउस का चौकीदार बड़ा काबिल आदमी है। वह पिछले तीस साल से कुफ़री में रह रहा है-उसे शायद कुफ़री के बारे में बहुत-सी बातें मालूम होंगी,” बीरेन चाचा ने कहा।

माँ के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान सिमट आयी, मानो उनकी आँखों में बीरेन चाचा की बात रत्ती भर मूल्य नहीं रखती।

“इस तरह के इंटरव्यू तुम कितने बरसों से ले रहे हो।“ माँ ने आँखें झुकाए बुनते हुए कहा।

“ओह, तुम्हें विश्वास नहीं होता-लेकिन तुम्हें मेरे नोट्स देखने चाहिए।“ बीरेन चाचा की नीली आँखें चमक उठीं। वह जब कभी अपनी किताब ‘शिमला का इतिहास’ का जिक्र छेड़ते हैं, माँ ऐसे ही हँसती हैं।

“कभी-कभी इस किताब के सिलसिले में खोज करते हुए अजीब चीजें मिल जाती हैं।“

“कैसी चीजें, बीरेन चाचा,” मैं बीरेन चाचा की किताब के बारे में काफी उत्सुकता दिखलाता हूँ। मुझे मालूम है, इससे उन्हें काफी प्रसन्नता होती है।

 “एक बहुत पुरानी फोटो मिली थी-किसी अंग्रेज ने ली होगी।“

“क्या था फोटो में?” इस बार माँ की आँखें सलाइयों से ऊपर उठ जाती हैं।

“रेसकोर्स की भीड़ दिखाई गई है….  बहुत-से लोग भीड़ में खो गए हैं, लेकिन एक अंग्रेज लड़की का चेहरा बिल्कुल साफ दिखता है-वह पवेलियन के पास छाता लिए खड़ी है-जबकि और सब लोगों की आँखें भागते हुए घोड़ों पर जमी हैं… वह गहरी उत्सुक आँखों से पीछे की ओर देख रही है—उसका इस तरह पीछे मुड़कर देखना मुझे काफी अजीब-सा लगा।“

बीरेन चाचा अचानक चुप हो गए-माँ के हाथों में सलाइयाँ चलती-चलती ठहर गयीं।

“फोटो के नीचे लिखा था—“एननडेल, शिमला, 1903… पचास साल गुजर गए और वह वैसे ही छाता लिए पीछे मुड़कर देख रही है..।“

बीरेन चाचा धीरे-से हँसने लगे, मानो उन्हें अपनी बात काफी बेतुकी-सी जान पड़ी हो। माँ गुमसुम-सी उनकी ओर देख रही हैं और मुझे आश्चर्य होता है कि बीरेन चाचा कभी-कभी इस प्रकार की अर्थहीन-सी बातें क्यों करते हैं।

“कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि लोगों की अपेक्षा शहरों की कहानी लिखना बहुत कठिन है—मेरे पास शिमला के बारे में इतने पुराने फोटो नोट्स, किताबें, टूरिस्टों के यात्रा-लेख जमा हैं, किन्तु मुझे लगता है कि मैं किताब शायद कभी नहीं लिख पाऊँगा।“

 “क्यों?” माँ ने पूछा।

“शहर… हर शहर—अपने में हमेशा इतना चुप जो रहता है।“ बीरेन चाचा उठ खड़े हुए—धीरे से उन्होंने मेरा माथा छुआ।

“रास्ते में डॉक्टर मिले थे-कहते थे, दो-चार दिनों में तुम घूमने-फिरने लगोगे।“ उन्होंने तनिक झुककर मुझसे कहा।

“जरा बैठ जाओ-देखूँ, तुम्हारा फोटो कैसा आता है!“ उन्होंने अपने कंधे से कैमरा उतार लिया। मेरा फोटो लेने के बाद वह अपनी छड़ी उठाकर जाने लगे।

 “कब वापिस लौटोगे?” माँ ने पहली बार सीधे उनकी ओर देखा।

“शायद कल शाम तक-कुछ देर के लिए आऊँगा,” बीरेन चाचा जब माँ की ओर देखते हैं, तो उनकी आँखें चौंधिया-सी जाती हैं-और वह अपना मुँह दूसरी ओर मोड़ लेते हैं।

 “बीरेन चाचा…” मैं बुरी तरह शरमा रहा हूँ।

 “क्या बच्ची?” उन्होंने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

 “एक फोटो मैं खींचूँगा।“

बीरेन चाचा ने मुस्कराकर कैमरा मेरे हाथों में थमा दिया।

मैं माँ की ओर देखता हूँ।

 “नहीं बच्ची, मेरी नहीं…” माँ एकदम झुँझला-सी उठती हैं।

 “सिर्फ तुम नहीं… बीरेन चाचा भी रहेंगे।“ मैंने कहा। बीरेन चाचा का चेहरा क्षण-भर के लिए म्लान-सा हो उठा-वह माँ की ओर देखते हैं। माँ ने इस बार विरोध नहीं किया, वह कुर्सी से उठ खड़ी हुईं, “बच्ची, तुम बहुत जिद्दी हो,” उन्होंने कहा।

“बीरेन चाचा, तुम जंगले के पास खड़े हो जाओ, वहाँ धूप आ रही है, और माँ, तुम उधर दायीं तरफ।“ मैं पलंग से उतरकर दीवार के सहारे खड़ा हो गया हूँ। मेरा सिर चकरा रहा है, लेकिन फोटो ठीक आता है। आज भी वह फोटो मेरे पास है..।

कमरे में शाम का धुंधलका कब चुपके-से घिर आया, पता नहीं चला। बीरेन चाचा बहुत पहले जा चुके थे। माँ मेरे पलंग के पास कुर्सी पर बैठी हैं-जब से बीरेन चाचा गए हैं, तब से वह वैसे ही चुपचाप बिना हिले-डुले उस कुर्सी पर अधलेटी-सी पड़ी हैं। मैं बत्ती नहीं जलाता, मुझे कमरे में अँधेरे का धीरे-धीरे आना अच्छा लगता है।

मेरी आँखों के सामने बहुत दिन पहले की एक शाम घूम जाती है-तब मैं बीमार नहीं पड़ा था। माँ उस शाम मुझे बीरेन चाचा के घर ले गयीं थीं।

हमें देखकर बीरेन चाचा हैरान-से हो गए थे। फाटक खोलकर वह माँ के सामने ठिठक गए।

“पोनों, तुम… “ एक क्षण के लिए वह खोए-से खड़े रहे। पहली बार उन्होंने मेरे सामने माँ को उनके नाम से पुकारा था। उनके मुँह से माँ का नाम सुनकर मुझे बहुत अजीब-सा लगा था। माँ हँसने लगीं और न जाने क्यों मुझे माँ की वह हँसी अच्छी नहीं लगी-एक घुटा-घुटा-सा डर मेरे मन में समा गया।

“यूँ ही सैर को निकले थे, सोचा तुमसे मिलते चलें,” माँ ने कहा। पहली बार मैंने माँ को झूठ बोलते देखा था।

बीरेन चाचा की नीली आँखों में हल्का-सा विस्मय घिर आया। उन्होंने मेरी उँगली पकड़ी और चुपचाप कॉटेज के भीतर चले आए।

वहीं मैंने पहली बार उनकी लाइब्रेरी देखी थी। उन्होंने मुझे अपनी अलबमों में शिमले की पहाड़ियों, घाटियों और झरनों के फोटो दिखलाये, जो उन्होंने अपनी किताब के लिए जमा किए थे। मेज पर ढेर-सी किताबों के पास हल्के रंग की शेड से ढँका टेबिल-लैम्प जल रहा था। उन्होंने जब दो चाकलेटें मुझे दीं, तो मैं कुछ हैरान-सा हो गया। उन्होंने हँसते हुए कहा-“मेरे पास बहुत-सी रखी हैं, बर्फ के दिनों में बाहर जाना नहीं होता, इसलिए जमा कर रखता हूँ।“ मैं क्षण-भर उन्हें देखता रह जाता हूँ। बीरेन चाचा बाबू से कितने लग हैं—उनमें वह तनाव, बोझिल गंभीरता अथवा भारीपन नहीं है, जो मैं बाबू में देखता हूँ। हर चीज पर उनका स्पर्श एक स्निग्ध कोमलता लिए रहता है। उनकी छोटी-सी दाढ़ी के ऊपर जो आँखें हैं, उन्हें देखकर मुझे हमेशा लगता है, जैसे वह धीमे-धीमे कुछ कह रहीं हों, मानो जिस वस्तु पर वे टिक जायेंगी, वह अपने आप सँवर-निखर जायेगी।

 “तुमने कभी बहुत पास से किसी पहाड़ी की चोटी पर बर्फ देखी है?” उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने सिर हिल दिया।

“वहाँ से बर्फ का रंग बिल्कुल नीला दिखता है। मैंने एक कलर्ड फोटो लिया है…” वह उस फोटो को लाने के लिए दूसरे कमरे में चले गए। मैं मेज पर रखी अलबमों को उलटने-पलटने लगा। हर फोटो में शिमले का कोई-न-कोई दृश्य था: ग्लैन, जाखू ,चैटविक फॉल। मैंने इन सब स्थानों को आसानी से पहचान लिया। कुछ देर बाद जब बीरेन चाचा नहीं आये, तो मैं ऊब गया। पास किताबों के शेल्फ पर एक छोटा-सा अलबम कोने में रखा था, मैंने उसे खोला और खोलते ही एक क्षण के लिए मुझे लगा-यह चेहरा मैंने कहीं देखा है, किन्तु दूसरे ही क्षण मेरी आँखें स्तब्ध-सी स्थिर हो गयीं। फोटो माँ का था।

क्या माँ कभी ऐसी थीं? मेरे भीतर कहीं एक गहरा-सा साँस उखड़ आया। वही चौड़ा-सा माथा, किन्तु उस पर छोटी-सी बिंदी लगी थी, जो माँ अब नहीं लगातीं, दोनों चोटियाँ कंधे के नीचे लटक रही थीं, पूरे स्लीव का स्वेटर पहन रखा था और बालों के भीतर वही छोटे-छोटे कान छिपे थे। सहसा मुझे आभास हुआ कि इस चेहरे में कुछ ऐसा है, जिसका मुझसे कोई संबंध नहीं, बाबू से कोई संबंध नहीं।

फोटो माँ का था, लेकिन उसमें माँ कहाँ थीं?

अचानक मुझे बीरेन चाचा के पैरों की आहट सुनाई दी। न जाने मेरे भीतर क्या चोर छिपा था कि मैंने डरकर झटपट वह अलबम किताबों में छिपा दी।

जब हम वापिस लॉन में आए तो हल्का, फीका-फीका-सा अँधेरा छाने लगा था। माँ शॉल में दुबकी हुई पत्थर की बेंच पर बैठी थीं।

“इतनी देर कहाँ लगा दी?” उन्होंने मुझे खींचकर अपने से सटा लिया। बीरेन चाचा माँ के पैरों के निकट घास पर बैठ गए। मेरी आँखें माँ के चेहरे पर टिकी रहीं, मानो मैं कुछ खोज रहा हूँ, माँ की आँखें, मुँह, माथा हर चीज अलग-अलग देखो तो वैसी ही थीं, किन्तु आपस में मिलकर जो भाव बनता था, वह उस चेहरे से बिल्कुल अलग था, जो मैंने अभी कुछ देर पहले बीरेन चाचा की अलबम में देखा था।

जो अंतर है-उसे समझा नहीं सकता, उस पर उँगली नहीं रख पाता… वह कैसा भाव था जो किसी लंबी दूरी को हमारे पास ले आता है, लेकिन अपने को दूर ही रहने देता है।

“बच्ची क्या बात है-?” माँ मेरे बालों को धीरे-धीरे अपनी उँगलियों में उलझाने लगीं।

मैंने सिटपिटाकर मुँह फेर लिया।

माँ ने आगे कुछ नहीं पूछा। हम तीनों इसी तरह अपने-अपने में सिमटे चुप बैठे रहे। जब से हम आए थे, बीरेन चाचा ने माँ से कोई बात नहीं की थी। मुझे शुरू-शुरू में कुछ आश्चर्य-सा हुआ था, किन्तु मैंने उस पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

लॉन पर नीला-नीला-सा अँधेरा घिर आया। दूर पहाड़ियों के बीच छोटे-छोटे जुगनुओं-सी बत्तियाँ बिखरी थीं-और अँधेरे में पहाड़ियों के छिप जाने से लगता था कि आकाश बहुत नीचे सरक आया है, कभी-कभी तो पता भी नहीं चलता कि तारों और बत्तियों में कौन-सी बत्तियाँ और कौन-से तारे हैं।

बीमारी के दिनों में मुझे अक्सर वह शाम याद आ जाती है-हालाँकि उस शाम कोई भी ऐसी बात नहीं हुई थी, जिसे याद रखा जाता। जब हम वापिस लौटने लगे, तो बीरेन चाचा कुछ दूर हमारे संग आए थे। फिर माँ के कहने पर कि हम खुद चले जाएँगे, वापिस मुड़ गए थे। मैं और माँ कुछ देर ऊपर की सड़क पर चुपचाप चढ़ते रहे। मैं तेज कदमों से माँ के आगे-आगे चल रहा था। कुछ दूर चलने के बाद सहसा मेरे पाँव ठिठक गये। मुझे लगा, माँ मेरे पीछे नहीं आ रही हैं। मैं वापिस मुड़कर पीछे की ओर चलने लगा। अँधेरे में मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

कुछ दूर नीचे उतरकर अचानक मेरे पाँव रुक गए-मैं अँधेरे में आँखें फाड़ता हुआ हतबुद्धि-सा खड़ा रहा। माँ सड़क के मोड़ पर खड़ी थीं, किनारे पर लगी तार पर झुकी हुई-उनकी साड़ी का आँचल हवा से उड़कर कंधे पर आ गिरा था-अपने में बिल्कुल खोयी-सी वह अपलक नीचे देख रही थीं…

उतराई के नीचे थी—बीरेन चाचा की कॉटेज, जो शाम के धुंधलके में बिल्कुल सूनी और निर्जन दिखाई दे रही थी। लाइब्रेरी की खिड़की से आती हुई मद्धिम-सी प्रकाश-रेखा में लॉन की घास झिलमिला रही थी।

कुछ देर तक शाम के झुटपुटे में हम बिल्कुल खामोश खड़े रहे, फिर माँ अचानक आगे मुड़कर चलने लगीं-उनकी चाल इतनी धीमी थी कि एक क्षण मुझे लगा, मानो वह सोते हुए चल रही हों।

वह मेरे पास आ गयीं-आँखें ऊपर उठाकर एक लंबे क्षण तक अपनी आकुल, विवश निगाहों से मुझे निहारती रहीं, फिर झपटकर उन्होंने मुझे अपने पास घसीट लिया और बार-बार अपने ठंडे, सूखे होंठों से मुझे चूमने लगीं।

कुछ दिनों बाद एक सुबह मुझे अपने मुँह का स्वाद कुछ अच्छा-सा लगा। अंगों में एक हल्की-सी स्फूर्ति का आभास हुआ। पहले मैं धूप से बचने के लिए खिड़की बंद किए रहता था, अँधेरे कमरे में आँखें मूंदकर लेटना भला लगता था। अब मैंने खिड़की खोलकर परदों को उठा दिया। बाहर की गर्म, ऊनी धूप मेरे पलंग को चारों ओर से घेर लेती है। मैं बिस्तर से उतरकर मेज के सहारे खड़ा हो जाता हूँ। सिर पहले की तरह नहीं चकराता, मैं पायदान की ओर कुछ कदम बढ़ाता हूँ और मुझे लगता है, मानो मैंने ज़िंदगी में पहली बार अपने आप चलना सीखा हो।

मैं चुपके से बाहर बरामदे में आ जाता हूँ। कुछ दूर पर बुआ गीली धोती काठ के जंगले पर सुखा रही हैं-मैं उनकी आँख बचाकर बाबू के कमरे के पीछेवाले छज्जे पर चला जाता हूँ। कमरे के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद हैं, भीतर के लाल परदे नीचे गिरे हुए हैं। जब माँ मौसी के घर चली जाती हैं, तो बाबू उस कमरे को बंद कर देते हैं। अपनी सारी चीजें ऊपर छत पर ‘स्टडी’ में ले जाते हैं और रात को वहीं सोते हैं।

छज्जा निपट सूना है। नीचे ‘आउट हाउस’ के क्वॉर्टरों की छतों के चौड़े नीले टिन के पटरों पर बड़ियाँ चमक रही हैं, जो पहाड़ी खानसामा की औरत हीरा ने सुखाने रख छोड़ी है। सामने मदरसे के छोटे-से मैदान में लड़के बस्ता घुमाते हुए चार-चार की पाँत में खड़े नकियाते अलसाये स्वर में प्रार्थना कर रहे हैं-“लब पे आयी है दुआ बनके तमन्ना तेरी।“

उनकी तीखी-रूखी आवाज को सुनकर जब मैं ऊब जाता हूँ, तो मेरी आँखें खड्ड के ऊपर मेम के उस रहस्यमय बंगले पर टिक जाती है, जहाँ हम कच्चे अलूचे छिपाकर रखते थे। उससे जरा दूर पेड़ों और झाड़ियों से घिरी हुई एक पगडंडी साँप की तरह बलखाती हुई बानो के मकान के ऊबड़-खाबड़ अहाते में जाकर गुम हो गयी है। मैं अपने कमरे से बाबू की पुरानी छड़ी ले आता हूँ, जिसके सिरे पर मैंने माँ की लाल साड़ी का चिथड़ा बाँध रखा है। मैं जंगले से बाहर गर्दन निकालकर छड़ी को हवा में दायें-बायें घुमाता हूँ-लाल रेशम की झंडी हवा में फरफराती है। बानो ने मेरी लाल झंडी को देख लिया है-उसने हाथ उठाकर कुछ कहा है, जिसे मैं कुछ भी सुन-समझ नहीं पाता। यह मेरा और बानो का पुराना और प्रिय खेल है। हमारे और उसके मकान के बीच ढलान पर कई कोठियाँ और दुकानें हैं, किन्तु ऊँचाई पर होने के कारण हम एक-दूसरे को छज्जे से देख पाते हैं-हालाँकि हम चाहे कितना भी चिल्लाकर क्यों न बोलें, एक दूसरे की बात नहीं सुन पाते। इसलिए इशारों से बात करने के लिए मैं बाबू की छड़ी से सिगनल का उपयोग करता हूँ।

बानो अपनी अम्मी को भीतर से बरामदे में खींच लायी है-अम्मी ने हाथ उठाकर मुझे बुलाया है। अम्मी मुझे इतनी दूर से नहीं देख पातीं, फिर भी मैं शरमा जाता हूँ और छड़ी को बरामदे में फेंककर अपने कमरे में भाग आता हूँ।

कमरे की देहरी पर सहसा मेरे पाँव ठिठक गये-बाबू का स्वर सुनाई दिया। नौकर ने आकर बताया कि बाबू अपने कमरे में मुझे बुलाते हैं।

मेरे दिल में खुशी की लहर-सी दौड़ गयी। ऐसा बहुत कम होता है कि बाबू मुझे अपने कमरे में बुलाकर मुझसे बातें करें-अक्सर वह हाल-चाल पूछने मेरे कमरे में ही आ जाते हैं। मैं झटपट अपने नाखून दांतों से काट लेता हूँ, क्योंकि बाबू हमेशा सबसे पहले मेरे दोनों हाथों को देखते हैं। आँखों को गीले तौलिए से पोंछ लेता हूँ और हाथों को मुँह पर रखकर फूँक मारता हूँ, और फिर उन्हें सूँघता हूँ-यह देखने के लिए कि मुँह साफ है या नहीं। फिर शीशे में मुँह देखकर कंघी करता हूँ (माँ के न होने से पिछले कुछ दिनों से मुझे ये सब काम खुद करने पड़ते हैं) और जब कंघे से अपने बालों को झरता हुआ देखता हूँ, तो न जाने क्यों मुझे अपने ऊपर गहरी-सी दया आने लगती है, और मेरी आँखों में आँसू भर आते हैं।

ड्राइंग रूम (जिसे उन दिनों हम हॉल कहते हैं-क्योंकि वह हमारे घर का सबसे बड़ा कमरा था) के कालीन पर पैरों की आहट नहीं होती, फिर भी मैं बहुत हौले-हौले दबे पाँवों से बाबू के कमरे की ओर जाता हूँ। सुबह मैं ठीक था, किन्तु अब सिर चकराता है, मानो कनपटियों से धुएं की दो लकीरें ऊपर उठती हुई सिर के बीचोंबीच मिलने की चेष्टा कर रही हों और बीच में रुई का एक घुटा-घुटा-सा बादल इन दोनों के बीच आकर अड़ गया हो।

मैं उनके कमरे की देहरी पर खड़ा हूँ-परदों के रिंग हाथ लगाने से धीरे-धीरे बजते हैं। वह बिना मेरी ओर देखे मुझे भीतर बुलाते हैं। मैं और आगे खिसक आता हूँ। बाबू के कमरे को पहचानना कितना आसान है-सिगार के धुएं की गर्म-गर्म-सी गंध, चारों ओर फैली गहरी बोझिल-सी चुप्पी, एक अजीब धुंधली-सी रोशनी, जो दिन और रात दोनों समय एक-सी रहती है। और एक खट्टी और भीनी-सी बू, जो मेरी दवा की बू से मिलती हुई भी कहीं दूर जाकर उससे अलग हो जाती है। उसके बारे में मैं कभी तय नहीं कर पाता कि वह मुझे अच्छी लगती है या बुरी-लगता है, वह बू नहीं है, महज एक हल्का-सा रंग है, जो बाबू के कमरे की हवा में तिरता रहता है।

“बाहर क्या कर रहे थे!” मैं उनकी आवाज पहचानता हूँ-उसमें गुस्सा नहीं है।

“बानो को देख रहा था—“ और मैं सकुचाकर चुप हो जाता हूँ।

“बाबू.. “

उनकी आँखें ऊपर उठ आयीं।

“आज मैं ठीक हूँ… बुखार नहीं है।“

बाबू ने मेरे दोनों हाथों को अपनी गोद में रख लिया। “अभी कुछ दिन तुम्हें बिस्तर पर लेटना होगा…” उन्होंने मेरे हाथों को एक दूसरे के ऊपर रख दिया, और उन्हें अपने खुरदरे बालों से भरे हाथों में समेट लिया।

“बाबू-हम दिल्ली कब जा रहे हैं?” जब कभी मुझे उनसे बात करने का मौका मिलता है, मैं हर बार उनसे यह प्रश्न करता हूँ।

उन्होंने सिगार को मुँह से निकालकर अंगुलियों में थाम लिया। वह कुछ देर तक चुपचाप दीवार के बेल-बूटोंवाले कागज को देखते रहे, मानो उस पर कुछ लिखा है, जिसे वह बड़े गौर से पढ़ रहे हों।

“बच्ची, तुम्हें डर तो नहीं लगता?”

“डर?” मैं विस्मित-सा होकर उनकी ओर देखने लगा। उनकी आँखें दीवार से उतरकर मुझ पर टिक गयीं।

“माँ घर में नहीं हैं… शायद इसलिए…”

“लेकिन वह तो कुछ दिनों में आ जायेंगी?” मैं चाहता था कि बाबू मेरी बात का समर्थन करें, किन्तु वह चुपचाप मेरी ओर देखते रहे।

“हाँ-वह आयेंगी,” बाबू का स्वर इतना धीमा, इतना सोया-सा था मानो वह यह बात मुझसे न कहकर अपने से कह रहे हों।

“बच्ची.?”

“क्या बाबू?”

“तुम क्या उन्हें देखना चाहोगे?”

बाबू का स्वर एकदम भारी-सा हो आया। उनका यह प्रश्न मुझे काफी  विचित्र और निरर्थक-सा लगा था-सोचा, कह दूँ, हाँ… उनके पास जाऊँगा; और दूसरे ही क्षण मुझे लगा कि बाबू मुझसे इस उत्तर की आशा नहीं कर रहे हैं, जैसे वह सच जानते हुए भी जान-बूझकर मुझसे झूठ कहलवाना चाह रहे हों।

मैंने ‘नहीं’ में सिर हिला दिया। हैरत-भरी दृष्टि से वह मुझे देखते रहे-फिर धीरे-से उन्होंने मेरे हाथों को अपनी गोद से हटा दिया।

“अच्छा, अब अपने कमरे में जाओ-अभी दो-तीन दिन तक बाहर खेलने मत जाना।“

वह कुर्सी से उठ खड़े हुए और मेरी ओर से मुँह मोड़कर खिड़की से बाहर देखने लगे।

कुछ देर तक मैं वहाँ चुपचाप खड़ा रहा। मेरे मन में अचानक बाबू के प्रति भीगी-भीगी-सी सहानुभूति उमड़ने लगी। माँ के संग मेरा संबंध अधिक सहज और सीधा था। बाबू के संग जो संकोच और तनाव रहता है, वह माँ के संग बिल्कुल नहीं है। वह कोई भी प्रतिवाद किए बिना मेरी हर फरमायश को चुपचाप मान लेती हैं-किन्तु इतना सब करने पर भी वह मुझसे हमेशा दूर रहती हैं, कभी न मिटनेवाला एक अलगाव बनाये रखती हैं। उनके सामने मुझे लगता है कि मैं एक बहुत ही छोटा, बेडौल और निरर्थक-सा प्राणी बन गया हूँ। किन्तु बाबू की बात दूसरी है। मैं उनसे डरता हूँ, कोई भी फरमायश करते समय मेरा दिल धड़कने लगता है, कभी खुलकर उनसे मैंने अपने मन की बात नहीं की-इसके बावजूद वह मुझे अपने अधिक निकट और जाने-पहचाने लगते हैं। कुछ ऐसा है, जो हम दोनों को माँ से अलग कर देता है, इसलिए माँ को चाहते हुए भी उनपर कभी सहानुभूति नहीं होती और बाबू से डरते हुए भी उन्हें देखकर कभी-कभी मेरे भीतर कुछ रूआँसा हो जाता है।

बाबू ने पीछे मुड़कर मुझे देखा और एकटक देखते रहे। मुझे लगा जैसे वह कुछ देर के लिए मेरी उपस्थिति बिल्कुल भूल गए थे और अब सहसा मुझे अपने सम्मुख देखकर समझ न पा रहे हों कि मैं कौन हूँ, उनके कमरे में कैसे खड़ा हूँ।

मैं कमरे से बाहर चला आया। कुछ देर तक बड़े कमरे की दीवार से सटकर बाबू के कमरे की देहरी पर खड़ा रहा। सोचा था, बाबू बाहर आकर मुझसे कुछ कहेंगे, किन्तु यह मेरा भ्रम था। उनके कमरे में सिर्फ सन्नाटा था-एक घना गहरा-सा सन्नाटा जो हमारे सारे घर पर घिर आया था।

और तब उस क्षण मुझे लगा कि मैं बहुत अकेला हूँ, बाबू भी अपने में बहुत अकेले हैं। माँ के बिना हर कमरा साँय-साँय-सा करता प्रतीत होता है।

मैं दीवार से सटकर आँखें मूँद लेता हूँ।

जिस दिन माँ मौसी के घर मुझसे मिले बिना चली गयीं, उससे एक दिन पहले आधी रात को मेरी आँख खुल गयी थी।

कमरे में अँधेरा था। हवा से खिड़की का परदा मेरे तकिये के ऊपर जोर-जोर से फड़फड़ा उठता था। कुछ देर तक मेरे मन में अजीब-सा भ्रम मंडराता रहा। मुझे लगा कि इस कमरे में-जहाँ मैं लेटा हूँ-हर चीज अपने पुराने स्थान को छोड़कर नए कोनों में उठ आयी है। मुझे लगा कि जो खिड़की मेरे बायीं ओर होती थी, वह अँधेरे में चुपचाप खिसककर बिल्कुल मेरे सामने आ गयी है। मेरे पलंग से दो गज की दूरी पर जहाँ पहले दीवार थी, वहाँ दरवाजा सिमट आया है। दरवाजा आधा खुला हुआ था। उसके भीतर से बाबू के कमरे की रोशनी थर्मामीटर की तरह चमकती हुई पारे की रेखा-सी फर्श पर खिंच आयी थी-इतनी महीन, इतनी म्लान मानो हाथ से छूते ही टूट जायेगी, चारों ओर पानी-सी बिखर जायेगी।

अचानक वह दरवाजा दोनों बड़े-बड़े काले पंखों-सा फड़फड़ाता हुआ खुल गया, प्रकाश की पतली-सी रेखा फर्श पर तेजी से लपकती हुई सामने की दीवार पर चढ़ गयी। दरवाजे के पीछे छोटे-से गलियारे में कोई जोर-जोर से हाँफ रहा था। पहले क्षण मुझे लगा कि दरवाजा हवा के झोंके से खुल गया है-किन्तु माँ उसे बंद करने आयी हैं। किन्तु कुछ देर तक कोई भीतर नहीं आया। दरवाजे के पीछे गलियारे में उखड़ी हुई साँसों का एक हल्का-सा बवंडर उठता था और फिर दब जाता था। कुछ सहमे हुए शब्द सुनाई देते थे-कभी दूर से-इतने दूर से कि शब्दों के बजाय आहट ही मुझ तक पहुँच पाती थी, कभी पास से, इतने पास से मानो कोई मेरे कानों में फुसफुसा रहा हो।

“नहीं, तुम भीतर नहीं जाओगी,” मैंने बाबूजी का स्वर पहचान लिया।

एक पतली-सी चीख चमकीले कांच के टुकड़ों-सी अँधेरे को छील गयी। माँ को क्या हो गया है? वह इस अजीब ढंग से चीख क्यों रही हैं?

“छोड़ो… मेरा हाथ छोड़ दो।“

“पोनो…. तुम भीतर नहीं जाओगी।“

“कौन हो तुम मुझे रोकनेवाले-छि:, शर्म नहीं आती?”

“पोनो … वह सो रहा है… इस तरह मत चिल्लाओ।“

“मैं चिल्लाऊँगी नहीं, मुझे भीतर जाने दो।“

“नहीं… इस वक्त नहीं।“

“तुम समझते हो, मैं पागल हूँ… उसे सबकुछ बता दूँगी?”

“पोनो… अपने कमरे में चलो… यहाँ मैं कुछ नहीं सुनूँगा। इस वक्त तुम होश में नहीं हो।“

किन्तु बाबू अपनी बात पूरी नहीं कह पाए-बीच में ही किसी ने झपटकर परदा हटा दिया-गलियारे की रोशनी में मेरा बिस्तर चमक उठा, पलंग और खिड़की के बीच की दीवार अँधेरे से बाहर निकल आयी।

मैंने देखा-संगमरमर-सी सफेद दो बाँहें परदे के बाहर हवा में फैली है। पीछे एक छाया है, भूखी, फटी-फटी-सी दो आँखें हैं… परदे को नोचती हुई लंबी-पतली काँपती अँगुलियाँ हैं और बिजली में चमचमाती नाक की लौंग, जो बार-बार फड़फड़ाते होंठों के ऊपर तारे-सी टिकी है… यह सबकुछ मैंने एक छोटे-से क्षण में देखा था-दूसरे क्षण मुझे लगा मानो परदा अपनी जगह वापिस खींच लिया गया है, सिर्फ एक भर्रायी-सी आवाज सुनायी दे जाती है, जो ऊपर उठने से पहले ही दबा दी जाती है, मानो किसी ने अपने हाथ से उसे भींच रखा हो।

तब जो मैंने सुना, उस पर एकाएक विश्वास नहीं हो पाया। मुझे लगा परदे के पीछे कोई धीरे-धीरे हँस रहा है। नहीं, यह माँ नहीं हो सकती। माँ को जब कभी फिट आता है, तब केवल उनके दाँत कटकटाते हैं। मैंने उन्हें इतने विचित्र ढंग से हँसते हुए कभी नहीं सुना। फिर भी मैं जानता था कि यह माँ की ही आवाज है-मैं आगे कुछ भी नहीं सुन पाता-लगता है मानो कमरे का अँधेरा कमरे से अलग होकर एक मैले चीथड़े की तरह मेरी आँखों के चारों ओर घूम रहा है। संगमरमर-सी सफेद दो बाँहें काली झील से ऊपर उठी हैं-कातर-सी होकर मुझे बुलाती हैं-बार-बार अपनी ओर खींचती हैं।

उस रात देर तक मैं बिस्तर पर बैठा-बैठा काँपता रहा। एक अजीब-सी आवाज हवा के संग खिड़की से भीतर आती थी और मेरे चेहरे को छूती-सहलाती धीरे-धीरे हँसने लगती थी।

बानो टैरेस के नीचे गिरी हुई खूबानियाँ बीन रही है।

बानो…

मैं हौले से कहता हूँ… बानो।

शिमले की एक दुपहर-जब मैं टैरेस पर लेटा हूँ-बीमारी के बाद के दिन हैं, जब हमें कोई नहीं पूछता। सब निश्चिंत से हो गए हैं, बाबू अब मेरे कमरे में हर शाम नहीं आते, बीरेन चाचा एक लंबे अर्से से दिखायी नहीं दिये। मेरे ठीक होने पर अगर दुख है तो शायद बानो को-मैं अगर बीमार बना रहता, तो दिल्ली जाने के दिन टलते रहते।

टैरेस के पीछे दो छोटी-छोटी पहाड़ियाँ खुली हुई कैंची की तरह आकाश की ओर उठी है-उनके बीच पेड़ों की लंबी शृंखला दूर तक चली गयी है। जब कभी कालका जानेवाली ट्रेन वहाँ से गुजरती है, तो धुएँ की एक लट आकाश के चेहरे पर उड़ जाती है।

बानो… हम दिल्ली जा रहे हैं।

दिल्ली ! इस एक शब्द में कितनी स्मृतियाँ छिपी हैं-शिमला-कालका की साँप-सी बलखाती टेढ़ी-मेढ़ी लाइन, लंबी-लंबी अँधेरी सुरंगे और रेल के डिब्बे की खिड़की से बाहर हवा में फिसलते तारे… शाम हो जाती और मैं ऊँघ जाता। माँ कन्धा झकझोरकर जगातीं, “बच्ची, उठो !” मैं हड़बड़ाकर बैठता। बाहर अँधेरे मैदान में दूर-दूर तक कालका की झिलमिल-झिलमिल-सी रोशनियों को देखकर लगता मानो ढेर से तारे आकाश से उतरकर जमीन पर बिखर गए हों।

बानो सीढ़ियाँ चढ़कर कब टैरेस पर आ गयी, मुझे पता नहीं लगा। उसने अपनी फ्रॉक को उठाकर झोला बना लिया है, जिसमें ठसाठस खूबानियाँ भरी हैं। नंगे पेट के चारों ओर जाँघिये के नेफे के निशान जहाँ-तहाँ छोटी-छोटी मछलियों से उभर आए हैं।

वह फ्रॉक नीची करके खूबानियाँ बिखेर देती है-कच्ची, पक्की खूबानियाँ हैं, हरी, पीली, कुछ-कुछ लाल…

“लो खाओ।“ वह एक पकी हुई पीले रंग की खूबानी मेरे आगे कर देती है।

मैंने सिर हिला दिया। बाबू ने बाहर की कोई भी चीज खाने से मना किया है।

“यह कच्ची नहीं है, इससे कुछ नहीं होगा,” किन्तु उसने मेरी स्वीकृति की प्रतीक्षा नहीं की और जो खूबानी वह मुझे दे रही थी, उसे निश्चिंत होकर खुद खाने लगी।

खाने को खूबानी खा लेता, बाबू का तो बहाना है। असली कारण दूसरा है, जो कोई नहीं जानता, बानो बेचारी तो बिल्कुल नहीं जानती। जब से बुखार उतरा है, मुझे लगता है, जैसे मैं सब लोगों से भिन्न हूँ, अलग हूँ। कमजोरी के कारण जब कभी सिर चकराता है, पाँव काँपते हैं तो अच्छा लगता है, मन में अजीब-सी खुशी होती है, अपने पर गर्व होता है, लगता है, मुझमें एक अद्भुत परिवर्तन हो गया है और मैं असाधारण हूँ। पहले-बीमारी से पहले, माँ के मौसी के घर जाने से पहले-मेरा अपना घेरा था, जिसमें बानो और माँ, बीरेन चाचा और बाबू सब कोई थी। न मालूम, बीमारी के इस लंबे अर्से में कौन-सा क्षण आया था, जब यह घेरा टूट गया था। पिछले कुछ दिनों से मैं जिस चीज को जैसे देखता हूँ, वैसे शायद कोई नहीं देखता। पहले मैं हर चीज को दूसरों की आँखों से देखता था-और निश्चिंतता थी। अब उनके पीछे एक रहस्य है, डर है, जो मेरा अपना है, और जिसे कोई नहीं जानता।

टैरेस के पास पवेलियन की छत पर खटखटाहट होती है। लगता है जैसे टपाटप बूंदें गिर रही हों। मैं जँगले के बाहर हाथ निकालकर देखता हूँ-बारिश नहीं है, केवल कुछ पहाड़ी चिड़ियाँ हैं, जो छत पर एक कोने से दूसरे कोने तक फुदक-फुदककर उड़ती हैं।

बानो खूबानी को गाल के भीतर लट्टू की तरह घुमाती है-उसका कहना है कि इस तरह मुँह का सारा थूक खूबानी के भीतर जाकर रस बन जाता है।

“दिल्ली जाना पक्का हो गया?”

“माँ आ जायें, तब !”

“कहाँ गयी हैं तुम्हारी माँ?”

“मौसी के घर।“

“तुम्हें पक्का मालूम है कि वह मौसी के घर गयी हैं?” बानो ने रहस्य-भरी आँखों से मेरी ओर देखा।

मैं विस्मय से बानो की ओर देखता हूँ-“क्या बात है बानो?”

“कुछ नहीं, ऐसे ही पूछा था,” बानो ने थूक में भीगी खूबानी को होंठों पर रगड़ते हुए कहा।

“अम्मी ने मना किया है-कहा है तुमसे कुछ न कहूँ।“

मैं चुपचाप लापरवाही से मुस्कराता हूँ। बानो पर मुझे बेहद गुस्सा है। मुझे जब बहुत गुस्सा आता है, तो मैं हमेशा मुस्कराता हूँ, ताकि कोई यह न समझे कि मेरा मन इतना कच्चा और छोटा है।

सुर्मई रंग के बादल नीचे झुके आ रहे हैं। टैरेस के पीछे पहाड़ियाँ काली, भूरी-सी हो गयी हैं। जब कभी बादलों की ओर से सूरज का मुँह बाहर निकलता है, तो पतली-दुबली छायायें पूर्व से पश्चिम की ओर भागने लगती हैं।

टैरेस पर- चारों ओर आस-पास अब सन्नाटा है। बरसों पहले एक मेम यहाँ रहती थी। उसके मार जाने के बाद अब यहाँ कोई नहीं रहता। बारहों महीने-गर्मी, सर्दी- कमरे बंद रहते हैं। बरामदा और उसके आगे लंबा गलियारा सूना पड़ा रहता है। हम गेस्ट हाउस के पिछवाड़े सीढ़ियाँ चढ़कर पवेलियन पर चोरी-चुपके चले जाते हैं और वहीं एक कोने में अपने अलूचे और खूबानियों का खजाना जमा करते हैं।

कौन-सी बात है, जो बानो मुझसे छिपा रही है, क्या सचमुच उसकी अम्मी ने मना किया है, या वह सिर्फ मुझे चिढ़ाने के लिए बहका रही है।

मैं टैरेस पर लेटे-लेटे अधमुँदी आँखों से अपने घर की छत देखता हूँ। दायीं ओर छज्जे के सिरे पर माँ के कमरे की खिड़की दिखायी देती है-माँ जब घर में नहीं होतीं, तो वह हमेशा बंद रहती है। वह अभी तक वापिस क्यों नहीं लौटीं? मौसी के घर वह इतने दिन कभी नहीं रहती थीं। क्या वह जानती हैं कि मैं अब चल-फिर लेता हूँ और बाबू ने मुझे अब यहाँ- मेम के भुतहे मकान तक आने की अनुमति दे दी है।

उस रात से मैंने उन्हें नहीं देखा जब वह चीखती हुई मेरे दरवाजे तक आयी थीं और बाबू ने उन्हें भीतर आने से रोक दिया था। मैं निश्चय नहीं कर पाता कि क्या ऐसा सचमुच हुआ था, या मैंने सिर्फ कोई सपना देखा है।

“दिल्ली पहाड़ों के ऊपर है या नीचे?” बानो ने पूछा।

“दिल्ली मैदान में है-वहाँ जाने के लिए नीचे उतरना पड़ता है,” मैंने सुनी-सुनायी बात बड़े गर्व से कह दी।

बानो ने अविश्वास भरी दृष्टि से मुझे देखा।

“नीचे तो एननडेल का मैदान है और उसके नीचे खड्ड है-दिल्ली क्या खड्ड के नीचे है?”

बानो कभी दिल्ली नहीं गयी, मुझे उस पर हमेशा तरस आता है। मैं उसकी जिज्ञासा को शांत करने का कोई प्रयत्न नहीं करता, और लापरवाही से सिर फेर लेता हूँ।

बानो ने खूबानियों की गुठलियाँ पवेलियन के पीछे गेस्ट-रूम में फेंक दीं और वहीं कुछ देर तक दरवाजे से सटकर खड़ी रही।

हवा से खूबानी के पेड़ की शाखाएं छतों पर झुकती हैं। खूबानियाँ झरती हैं-कुछ जमीन पर, कुछ पवेलियन की छत पर-खट-खट …

दुपहर और शाम के बीच सारा शिमला चुप हो जाता है, बस केवल खूबानियों की खट-खट आवाज पहाड़ी हवा में गूँजती है…

बानो ने हाथ के इशारे से मुझे अपने पास बुलाया है। गेस्ट-रूम के दरवाजे का एक शीशा टूटा हुआ था, उसी में अपना सिर डालकर वह कमरे के भीतर झाँक रही थी। उसके सिर के ऊपर जो जरा-सी खाली जगह बच गयी थी, वहीं मैंने खींचतान करके अपना सिर अड़ा दिया।

कमरा बिल्कुल खाली था। दीवार के बेल-बूटेदार कागजों का रंग फीका पड़ गया था। छत के एक कोने में मकड़ी का जाला धीरे-धीरे फैल रहा था। बासी हवा की गंध चारों ओर फैली थी। फर्श के बीचोंबीच मैली-सी रोशनी जाम गयी थी, जो कभी पीली हो जाती थी, कभी फीकी-फीकी-सी सफेद। कमरे के धुंधलके में यह सफेद धब्बा बड़ा अजीब और भयावह-सा लग रहा था।

“वह मेम यहाँ रहती होगी।“ बानो ने धीमे स्वर में कहा।

“और शायद यहीं मरी होगी।“ मैंने कहा, और मेरे सारे शरीर में एक हल्की-सी झुरझुरी फैल गयी। मुझे लगा, सामने दीवार के कटे-फटे, उखड़े पलस्तर पर एक बेडौल-सा चेहरा उभर आया है-जिसके जबड़े खुले हैं, फटी-फटी-सी आँखें हैं और जो मेरी ओर देखता हुआ हँस रहा है। मुझे लगता है कि वह चेहरा उस मेम का रहा होगा, जो बरसों पहले उस कमरे में न जाने क्यों अपने-आप मर गयी थी… और वह हँसी, उस रात जैसे दरवाजे के पीछे माँ हँस रही थीं…

टूटे हुए शीशे के भीतर झाँकता हुआ मेरा चेहरा बानो के सिर पर टिका है। मेरे मुँह के जरा नीचे बानो के अखरोटी रंग के बाल हैं, उन बालों की गंध पानी में भीगी मिट्टी की गंध से मिलती है। बालों के बीच छोटी-सी माँग है-माँ की माँग-जैसी, किन्तु माँ की माँग जरा लंबी थी और हमेशा बहुत उदास दिखती थीं।

“बानो…” मेरे होंठों पर सफेद कागज-सा थूक जाम गया।

“क्या?”

“अम्मी ने क्या तुमसे माँ के बारे में कुछ कहा था?”

“तुमसे क्या?” बानो ने ढीठ बनकर कहा।

हवा चलने से सूने, खाली मकान के दरवाजे खड़खड़ा उठते हैं। फर्श पर सिमटा हुआ सफेद धब्बा धीरे-धीरे सरक रहा है।

“बानो… जब मैं बीमार था, तो कभी-कभी बड़ा अजीब-सा लगता था..।“

“कैसा… बच्ची?”

“लगता था जैसे मैं भी माँ की तरह हूँ-जैसे उनकी कोई बात मुझमें भी है।“

“कैसी बात?”

“जिसे सब छिपाते हैं।“

बानो का सिर सिहर जाता है।

“एक सफेद छाया है बानो—जैसे बर्फ में लिपटी हो। वह अँधेरे में भी चमकती है और संगमरमर से सफेद उसके हाथ हैं, जो हमेशा हवा में खुले रहते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि पीछे से चुपचाप आकर उसने मुझे अपने में ओढ़ लिया है, और मैं अपने से ही अलग हो गया हूँ-सच बानो-लगता है जैसे मैं अपने से ही अलग हो गया हूँ…”

मुझे लगा कि बानो पत्ते-सी काँप रही है, भी से उसकी आँखें फैल गयी हैं।

मैं हँसने लगता हूँ।

“डर गयी बानो… ?”

बानो चुप है, उसकी गर्म साँसें मेरे सूखे होंठों को छूती हैं।

“बानो सच-मैं तुम्हें बहका रहा था-जो मैंने कहा वह बिल्कुल झूठ है।“ बानो कुछ नहीं कहती, वह दरवाजे को छोड़कर तेजी से टैरेस की सीढ़ियाँ उतरने लगती है।

“बानो..” मैंने एक-दो बार उसे बुलाया, किन्तु उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

बूंदें आती हैं, पवेलियन की छत टप-टप करती है… और मैं समझ नहीं पाता कि मेरे गालों पर जो बूँदें हैं, वे बादलों से आयी हैं-या पहले से ही वहाँ थीं…

घर का सामान बाँधा जा चुका है। संदूकों, थैलों और बिस्तरों पर लेबल चिपकाये जा रहे हैं, जिन पर मोटी-मोटी सुर्खियों में ‘शिमला-दिल्ली’ और उसके नीचे बाबू का नाम लिखा है। घर में बड़ी चहल-पहल मची है-नौकर, जमादार, कुली और बाबू के दफ्तर के चपरासी सब इधर से उधर भागते हुए दिखायी देते हैं।

माँ ऊपरवाले कमरे में हैं। वह इस बार कुछ काम नहीं कर रहीं-उनकी तबीयत शायद ठीक नहीं है, बाबू ने मुझे उनके पास जाने से मना किया है। जब से वह मौसी के घर से आयी हैं, मैंने उन्हें नहीं देखा, वह शायद रात को आयीं थीं, जब मैं सो रहा था।

सब अपने काम में जुटे थे। मैं ही अकेला एक ऐसा था, जिसे कोई काम नहीं था। कभी छज्जे में जाता था, कभी बरामदे में, किन्तु हर जगह अपनी व्यर्थता महसूस होती थी। खाली-खाली से कमरे, नंगी दीवारें, कोनों में कूड़ों के ढेर… मेरा दम घुटने सा लगा और मैं बाबू की आँख बचाकर बाहर चला आया।

पगडंडी से उतरकर मैं खड्ड के ऊपर नाले के किनारे-किनारे चलने लगा। कभी-कभी खड्ड के भीतर कोई बड़ा, मोटा-सा गेला मिल जाता तो उसे उठाकर जेब में रख लेता। रेल की खिड़की से मैं इन गेलों को छोटे-छोटे तालाबों में फेंका करता था। जब दोनों जेबें भर चुकीं तो देखा कि मैं घर से काफी दूर निकल आया हूँ। सूरज ढलने लगा था हालाँकि दूर की पहाड़ियों पर धूप अब भी थकी-माँदी-सी रेंग रही थी। मैं बीच रास्ते में मूड गया और एक छोटी-सी पगडंडी से घर की ओर चलने लगा।

कुछ दूर चला हूँगा कि अचानक पाँव ठिठक गए। दायीं ओर नीचे की तरफ बीरेन चाचा की कॉटेज दिखायी दे रही थी। पेड़ों के झुरमुट में चारों ओर झाड़-झंखाड़ से घिरे उस घर को देखकर मुझे सहसा वह शाम याद आ गयी, जब मैं माँ के संग यहाँ आया था। माँ भूली-सी, खोयी-सी नीचे देख रही थीं, और मैं चुपचाप उनके पीछे खड़ा था। जब से माँ मौसी के घर गयी थीं, बीरेन चाचा हमारे घर नहीं आए थे। एक बार उनके बारे में बाबू से पूछा था, किन्तु बाबू का चेहरा इतना कठोर, इतना भावहीन-सा हो आया था कि आगे उनसे कुछ भी पूछने का साहस नहीं हुआ।

ढलती धूप में कॉटेज की ढलुआँ छत लाल चमक रही थी। मैं धीरे-धीरे सड़क के किनारे लगी तार के संग नीचे उतरने लगा। फाटक खुला है। मैं दबे कदमों से भीतर चला आया हूँ। हवा आती है तो लॉन की घास पर छोटी-बड़ी सलवटें पड़ जाती हैं, झाड़ियों की सरसराहट आस-पास की नीरवता को और भी अधिक घनी बना जाती हैं। लॉन के किनारे वही पत्थर का बेंच है… जहाँ उस दिन माँ बैठी थीं।

सोचता हूँ, वापिस लौट जाऊँ, लेकिन पाँव बजरी की सड़क पर बँधे से खड़े रह जाते हैं।

दरवाजा खटकाता हूँ-धीरे-धीरे। “बीरेन चाचा… बीरेन चाचा”-मुझे अपनी आवाज उस अकेली, निस्तब्ध कॉटेज में गूँजती-सी सुनाई देती है। लगता है, यह कोई अजनबी आवाज है, जो मेरी आवाज के पीछे-पीछे दौड़ रही है।

“बच्ची, भीतर आ जाओ, दरवाजा खुला है।“ बीरेन चाचा का स्वर सुनाई दिया।

मेरे पाँव देहरी के भीतर जाते ही एक क्षण के लिए रुक गए हैं, टेबल लैम्प का मद्धिम-सा प्रकाश मेज पर बिखरे कागजों, किताबों पर गिर रहा है। एक-दो मिनट तक मैं बेवकूफ-सा देहरी पर खड़ा रहा-और तब सहसा आभास हुआ कि कमरा खाली नहीं है, कोने में ईजी चेयर पर बीरेन चाचा बैठे हैं। जहाँ वह बैठे थे, वहाँ अँधेरा था, इसलिए कमरे में घुसते ही वह मुझे एकदम दिखाई नहीं पड़े थे।

उन्होंने मुझे अपने पलंग पर बैठने के लिए कहा और अपनी कुर्सी मेरे नजदीक खींच ली।

“इतनी दूर अकेले आये हो?” उन्होंने मेरे हाथ को अपने हाथ में ले लिया और मुस्कराने लगे।

मेरी आँखें अनायास अपने निकट की फूली हुई जेबों पर टिक गयीं। संकोच से मेरा मुँह लाल हो गया।

“क्या भर रखा है इनमें—गेले हैं?”

मैंने चुपचाप सिर हिला दिया।

“क्या करोगे इनका?”

“रेल के लिए रखे हैं।“ मैंने अटपटा-सा उत्तर दे दिया।

“रेल के लिए?” बीरेन चाचा की प्रश्न-भरी दृष्टि मुझ पर टिक गयी। और तब सहसा मुझे ख्याल आया कि बीरेन चाचा को कुछ भी नहीं मालूम है। मुझे भीतर-ही-भीतर बहुत खुशी हुई कि मैं पहला व्यक्ति हूँ, जिससे उन्हें यह खबर मिलेगी।

“बीरेन चाचा-आज रात हम दिल्ली जा रहे हैं।“

वह कुछ देर तक अपलक मेरी ओर देखते रहे, मानो उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी। फिर वह कुर्सी से उठे और मेरी ओर कोई ध्यान दिए बिना खिड़की से बाहर देखने लगे।

कुछ देर तक कमरे में घुटा-घुटा-सा सन्नाटा छाया रहा। मुझे लगा मानो बीरेन चाचा को यह बात पहले से ही मालूम थी, तभी शायद उन्होंने कोई कौतूहल नहीं दिखाया।

तभी वह खिड़की से मुड़े। भूरी दाढ़ी के ऊपर उनकी नीली आँखें चमक रही थीं।

“तुमने उस दिन जो फोटो लिया था-वह धुल गया है… देखोगे?”

उन्होंने आलमारी से एक छोटा-सा लिफाफा निकालकर मेरे हाथ में रख दिया।

“तुम्हारा हाथ बहुत सधा हुआ है, फोटो बिल्कुल साफ आया है।“

मैंने फोटो निकाला और मुझे लगा मानो बहुत अर्से पहले की एक घड़ी-जिसे मैं बिल्कुल भूल चुका था-मेरी आँखों के सामने हू-ब-हू वैसी ही वापिस लौट आयी है।

छज्जे के पीछे जंगले पर माँ की साड़ी सूख रही है-उसके पीछे पहाड़ियों की धुंधली-सी रेखा है, बिजली के तार हैं, कोने में सिमटा आकाश का एक टुकड़ा है। आगे के हिस्से में बीरेन चाचा जंगले से सटे खड़े हैं। उनकी एक बाँह माँ की साड़ी से छू भर गयी है और माँ … न जाने क्यों उनकी आँखें मुँद-सी गयी हैं, दोनों होंठ मरी हुई तितली के परों के समान अधखुले रह गये हैं, मानो वे कुछ कहते-कहते अचानक रुक गये हों।

मैं न जाने कितनी देर तक फोटो को निहारता रहा।

अचानक ध्यान आया कि मुझे बहुत देर हो गयी है। स्टेशन जाने का समय पास सरक आया था। बाबू देर से मेरी प्रतीक्षा करते होंगे।

मैं झटपट पलंग से उतर आया।

“अच्छा बीरेन चाचा…“ मुझसे आगे और कुछ नहीं कहा गया।

बीरेन चाचा ने मुझे देखा-एकटक देखते रहे, फिर धीरे-से मेरे पास आये, अपने हाथों से मेरे बालों को छुआ और धीरे-से मेरे माथे को चूम लिया-बिल्कुल वैसे ही, जैसे उस रात माँ ने मुझे चूमा था।

उन्होंने दरवाजा खोला और हम बाहर बरामदे में आ गये।

“मैं तुम्हारे संग चलूँ-तुम्हें डर तो नहीं लगेगा?”

मैंने सिर हिलाकर मना कर दिया, मुझे घर का रास्ता मालूम था।

कुछ देर तक हम बरामदे में चुपचाप खड़े रहे।

“बच्ची…” बीरेन चाचा का स्वर सुनकर मैं चौंक-सा गया। मैंने उनकी ओर देखा।

“माँ ने एक किताब माँगी थी-मुझे याद नहीं रहा-“ वह झिझकते हुए चुप हो गए।

“आप मुझे दे दीजिए-मैं दे दूँगा।“

किताब देते हुए मुझे लगा मानो वह कुछ कहना चाह रहे हैं, किन्तु वह चुप रहे और मैं तेजी से फाटक की ओर चल पड़ा।

कॉटेज बहुत पीछे छूट गयी है। मैं एक संकरी-सी सुनसान सड़क पर चल रहा हूँ। सामने पहाड़ी के ऊपर पेड़ों की एक लंबी कतार चली गयी है। उसके पीछे डूबते सूरज की पीली, गुलाबी, सोनाली छायाएँ आकाश पर खिंच आयी हैं। चारों ओर एक हल्की, हरी-सी धुंध फैल गयी है। घर से कुछ दूर मैं लैम्प पोस्ट के नीचे खड़ा हो गया और किताब खोलकर देखने लगा।

मैंने देखा-पन्नों के बीच वही फोटोवाला लिफाफा रखा था।

किताब बहुत पुरानी है- आज भी उसके जर्द, भुरभुरे पन्ने याद आते हैं-फ्लाबेज लेटर्स टु जॉर्ज साँ। उन दिनों न मैं फ्लाबे को जानता था, न जॉर्ज साँ को। बरसों बाद जब मैंने उसे पढ़ा तो माँ नहीं थीं और बीरेन चाचा एक लंबे अर्से से इटली में जाकर बस गये थे।

किन्तु उस दिन मेरे लिए उस पुस्तक का कोई महत्व नहीं था। उसे हाथ में लिए मैं देर तक अँधेरे में खड़ा रहा-अपने घर के ऊपरवाले कमरे की ओर देखता रहा।

माँ के कमरे की खिड़की बंद थी, सफेद-पीली रोशनी खिड़की के शीशे पर बुझी-बुझी-सी झिलमिला रही थी।

वह शिमले में हमारी आखिरी शाम थी।

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