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Thursday, September 10, 2020

अमृतसर आ गया है - भीष्म साहनी (Amritsar Aa Gaya Hai by Bhisham Sahni)


गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफिर नहीं थे। मेरे सामने वाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे। वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे और बात-बात पर खी-खी करके हँसते और गोरे फौजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे। डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे, उनमें से एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपरवाली बर्थ पर लेटा हुआ था। वह आदमी बड़ा हँसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथवाली सीट पर बैठे एक दुबले-से बाबू के साथ उसका मजाक चल रहा था। वह दुबला बाबू पेशावर का रहनेवाला जान पड़ता था क्योंकि किसी-किसी वक्त वे आपस में पश्तो में बातें करने लगते थे। मेरे सामने दाईं ओर कोने में, एक बुढ़िया मुँह-सिर ढाँपे बैठा थी और देर से माला जप रही थी। यही कुछ लोग रहे होंगे। संभव है दो-एक और मुसाफिर भी रहे हों, पर वे स्पष्टतः मुझे याद नहीं।

गाड़ी धीमी रफ्तार से चली जा रही थी, और गाड़ी में बैठे मुसाफिर बतिया रहे थे और बाहर गेहूँ के खेतों में हल्की-हल्की लहरियाँ उठ रही थीं, और मैं मन-ही-मन बड़ा खुश था क्योंकि मैं दिल्ली में होने वाला स्वतंत्रता-दिवस समारोह देखने जा रहा था।

उन दिनों के बारे में सोचता हूँ, तो लगता है, हम किसी झुटपुटे में जी रहे हैं। शायद समय बीत जाने पर अतीत का सारा व्यापार ही झुटपुटे में बीता जान पड़ता है। ज्यों-ज्यों भविष्य के पट खुलते जाते हैं, यह झुटपुटा और भी गहराता चला जाता है।

उन्हीं दिनों पाकिस्तान के बनाए जाने का ऐलान किया गया था और लोग तरह-तरह के अनुमान लगाने लगे थे कि भविष्य में जीवन की रूपरेखा कैसी होगी। पर किसी की भी कल्पना बहुत दूर तक नहीं जा पाती थी। मेरे सामने बैठे सरदार जी बार-बार मुझसे पूछ रहे थे कि पाकिस्तान बन जाने पर जिन्ना साहिब बंबई में ही रहेंगे या पाकिस्तान में जा कर बस जाएँगे, और मेरा हर बार यही जवाब होता – “बंबई क्यों छोड़ेंगे, पाकिस्तान में आते-जाते रहेंगे, बंबई छोड़ देने में क्या तुक है!”

लाहौर और गुरदासपुर के बारे में भी अनुमान लगाए जा रहे थे कि कौन-सा शहर किस ओर जाएगा। मिल बैठने के ढंग में, गप-शप में, हँसी-मजाक में कोई विशेष अंतर नहीं आया था। कुछ लोग अपने घर छोड़ कर जा रहे थे, जबकि अन्य लोग उनका मजाक उड़ा रहे थे। कोई नहीं जानता था कि कौन-सा कदम ठीक होगा और कौन-सा गलत। एक ओर पाकिस्तान बन जाने का जोश था तो दूसरी ओर हिंदुस्तान के आजाद हो जाने का जोश। जगह-जगह दंगे भी हो रहे थे, और योम-ए-आजादी की तैयारियाँ भी चल रही थीं। इस पूष्ठभूमि में लगता, देश आजाद हो जाने पर दंगे अपने-आप बंद हो जाएँगे। वातावरण में इस झुटपुट में आजादी की सुनहरी धूल-सी उड़ रही थी और साथ-ही-साथ अनिश्चय भी डोल रहा था, और इसी अनिश्चय की स्थिति में किसी-किसी वक्त भावी रिश्तों की रूपरेखा झलक दे जाती थी।

शायद जेहलम का स्टेशन पीछे छूट चुका था जब ऊपर वाली बर्थ पर बैठे पठान ने एक पोटली खोल ली और उसमें से उबला हुआ मांस और नान-रोटी के टुकड़े निकाल-निकाल कर अपने साथियों को देने लगा। फिर वह हँसी-मजाक के बीच मेरी बगल में बैठे बाबू की ओर भी नान का टुकड़ा और मांस की बोटी बढ़ा कर खाने का आग्रह करने लगा था – “का ले, बाबू, ताकत आएगी। अम जैसा ओ जाएगा। बीवी बी तेरे सात कुश रएगी। काले दालकोर, तू दाल काता ए, इसलिए दुबला ए…”

डिब्बे में लोग हँसने लगे थे। बाबू ने पश्तो में कुछ जवाब दिया और फिर मुस्कराता सिर हिलाता रहा।

इस पर दूसरे पठान ने हँस कर कहा – “ओ जालिम, अमारे हाथ से नई लेता ए तो अपने हाथ से उठा ले। खुदा कसम बकरे का गोश्त ए, और किसी चीज का नईए।”

ऊपर बैठा पठान चहक कर बोला – “ओ खंजीर के तुम, इदर तुमें कौन देखता ए? अम तेरी बीवी को नई बोलेगा। ओ तू अमारे साथ बोटी तोड़। अम तेरे साथ दाल पिएगा…”

इस पर कहकहा उठा, पर दुबला-पतला बाबू हँसता, सिर हिलाता रहा और कभी-कभी दो शब्द पश्तो में भी कह देता।

“ओ कितना बुरा बात ए, अम खाता ए, और तू अमारा मुँ देखता ए…” सभी पठान मगन थे।

“यह इसलिए नहीं लेता कि तुमने हाथ नहीं धोए हैं”, स्थूलकाय सरदार जी बोले और बोलते ही खी-खी करने लगे! अधलेटी मुद्रा में बैठे सरदार जी की आधी तोंद सीट के नीचे लटक रही थी – “तुम अभी सो कर उठे हो और उठते ही पोटली खोल कर खाने लग गए हो, इसीलिए बाबू जी तुम्हारे हाथ से नहीं लेते, और कोई बात नहीं।” और सरदार जी ने मेरी ओर देख कर आँख मारी और फिर खी-खी करने लगे।

“मांस नई खाता ए, बाबू तो जाओ जनाना डब्बे में बैटो, इदर क्या करता ए?” फिर कहकहा उठा।

डब्बे में और भी अनेक मुसाफिर थे लेकिन पुराने मुसाफिर यही थे जो सफर शुरू होने में गाड़ी में बैठे थे। बाकी मुसाफिर उतरते-चढ़ते रहे थे। पुराने मुसाफिर होने के नाते उनमें एक तरह की बेतकल्लुफी आ गई थी।

“ओ इदर आ कर बैठो। तुम अमारे साथ बैटो। आओ जालिम, किस्सा-खानी की बातें करेंगे।”

तभी किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी और नए मुसाफिरों का रेला अंदर आ गया था। बहुत-से मुसाफिर एक साथ अंदर घुसते चले आए थे।

“कौन-सा स्टेशन है?” किसी ने पूछा।

“वजीराबाद है शायद,” मैंने बाहर की ओर देख कर कहा।

गाड़ी वहाँ थोड़ी देर के लिए खड़ी रही। पर छूटने से पहले एक छोटी-सी घटना घटी। एक आदमी साथ वाले डिब्बे में से पानी लेने उतरा और नल पर जा कर पानी लोटे में भर रहा था तभी वह भाग कर अपने डिब्बे की ओर लौट आया। छलछलाते लोटे में से पानी गिर रहा था। लेकिन जिस ढंग से वह भागा था, उसी ने बहुत कुछ बता दिया था। नल पर खड़े और लोग भी, तीन-चार आदमी रहे होंगे – इधर-उधर अपने-अपने डिब्बे की ओर भाग गए थे। इस तरह घबरा कर भागते लोगों को मैं देख चुका था। देखते-ही-देखते प्लेटफार्म खाली हो गया। मगर डिब्बे के अंदर अभी भी हँसी-मजाक चल रहा था।

“कहीं कोई गड़बड़ है”, मेरे पास बैठे दुबले बाबू ने कहा।

कहीं कुछ था, लेकिन क्या था, कोई भी स्पष्ट नहीं जानता था। मैं अनेक दंगे देख चुका था इसलिए वातावरण में होने वाली छोटी-सी तबदील को भी भाँप गया था। भागते व्यक्ति, खटाक से बंद होते दरवाजे, घरों की छतों पर खड़े लोग, चुप्पी और सन्नाटा, सभी दंगों के चिह्न थे।

तभी पिछले दरवाजे की ओर से, जो प्लेटफार्म की ओर न खुल कर दूसरी ओर खुलता था, हल्का-सा शोर हुआ। कोई मुसाफिर अंदर घुसना चाह रहा था।

“कहाँ घुसा आ रहा है, नहीं है जगह! बोल दिया जगह नहीं है,” किसी ने कहा।

“बंद करो जी दरवाजा। यों ही मुँह उठाए घुसे आते हैं।” आवाजें आ रही थीं।

जितनी देर कोई मुसाफिर डिब्बे के बाहर खड़ा अंदर आने की चेष्टा करता रहे, अंदर बैठे मुसाफिर उसका विरोध करते रहते हैं। पर एक बार जैसे-तैसे वह अंदर जा जाए तो विरोध खत्म हो जाता है, और वह मुसाफिर जल्दी ही डिब्बे की दुनिया का निवासी बन जाता है, और अगले स्टेशन पर वही सबसे पहले बाहर खड़े मुसाफिरों पर चिल्लाने लगता है – नहीं है जगह, अगले डिब्बे में जाओ… घुसे आते हैं…

दरवाजे पर शोर बढ़ता जा रहा था। तभी मैले-कुचैले कपड़ों और लटकती मूँछों वाला एक आदमी दरवाजे में से अंदर घुसता दिखाई दिया। चीकट, मैले कपड़े, जरूर कहीं हलवाई की दुकान करता होगा। वह लोगों की शिकायतों-आवाजों की ओर ध्यान दिए बिना दरवाजे की ओर घूम कर बड़ा-सा काले रंग का संदूक अंदर की ओर घसीटने लगा।

“आ जाओ, आ जाओ, तुम भी चढ़ जाओ! वह अपने पीछे किसी से कहे जा रहा था। तभी दरवाजे में एक पतली सूखी-सी औरत नजर आई और उससे पीछे सोलह-सतरह बरस की साँवली-सी एक लड़की अंदर आ गई। लोग अभी भी चिल्लाए जा रहे थे। सरदार जी को कूल्हों के बल उठ कर बैठना पड़ा।”

“बंद करो जी दरवाजा, बिना पूछे चढ़े आते हैं, अपने बाप का घर समझ रखा है। मत घुसने दो जी, क्या करते हो, धकेल दो पीछे…” और लोग भी चिल्ला रहे थे।

वह आदमी अपना सामान अंदर घसीटे जा रहा था और उसकी पत्नी और बेटी संडास के दरवाजे के साथ लग कर खड़े थे।

“और कोई डिब्बा नहीं मिला? औरत जात को भी यहाँ उठा लाया है?”

वह आदमी पसीने से तर था और हाँफता हुआ सामान अंदर घसीटे जा रहा था। संदूक के बाद रस्सियों से बँधी खाट की पाटियाँ अंदर खींचने लगा।

“टिकट है जी मेरे पास, मैं बेटिकट नहीं हूँ।” इस पर डिब्बे में बैठे बहुत-से लोग चुप हो गए, पर बर्थ पर बैठा पठान उचक कर बोला – “निकल जाओ इदर से, देखता नई ए, इदर जगा नई ए।”

और पठान ने आव देखा न ताव, आगे बढ़ कर ऊपर से ही उस मुसाफिर के लात जमा दी, पर लात उस आदमी को लगने के बजाए उसकी पत्नी के कलेजे में लगी और वहीं ‘हाय-हाय’ करती बैठ गई।

उस आदमी के पास मुसाफिरों के साथ उलझने के लिए वक्त नहीं था। वह बराबर अपना सामान अंदर घसीटे जा रहा था। पर डिब्बे में मौन छा गया। खाट की पाटियों के बाद बड़ी-बड़ी गठरियाँ आईं। इस पर ऊपर बैठे पठान की सहन-क्षमता चुक गई- “निकालो इसे, कौन ए ये?” वह चिल्लाया।

इस पर दूसरे पठान ने, जो नीचे की सीट पर बैठा था, उस आदमी का संदूक दरवाजे में से नीचे धकेल दिया, जहाँ लाल वर्दीवाला एक कुली खड़ा सामान अंदर पहुँचा रहा था।

उसकी पत्नी के चोट लगने पर कुछ मुसाफिर चुप हो गए थे। केवल कोने में बैठी बुढ़िया करलाए जा रही थी – “ए नेकबख्तो, बैठने दो। आ जा बेटी, तू मेरे पास आ जा। जैसे-तैसे सफर काट लेंगे। छोड़ो बे जालिमो, बैठने दो।”

अभी आधा सामान ही अंदर आ पाया होगा जब सहसा गाड़ी सरकने लगी।

“छूट गया! सामान छूट गया।” वह आदमी बदहवास-सा हो कर चिल्लाया।

“पिताजी, सामान छूट गया।” संडास के दरवाजे के पास खड़ी लड़की सिर से पाँव तक काँप रही थी और चिल्लाए जा रही थी।

“उतरो, नीचे उतरो”, वह आदमी हड़बड़ा कर चिल्लाया और आगे बढ़ कर खाट की पाटियाँ और गठरियाँ बाहर फेंकते हुए दरवाजे का डंडहरा पकड़ कर नीचे उतर गया। उसके पीछे उसकी व्याकुल बेटी और फिर उसकी पत्नी, कलेजे को दोनों हाथों से दबाए हाय-हाय करती नीचे उतर गई।

“बहुत बुरा किया है तुम लोगों ने, बहुत बुरा किया है।” बुढ़िया ऊँचा-ऊँचा बोल रही थी -“तुम्हारे दिल में दर्द मर गया है। छोटी-सी बच्ची उसके साथ थी। बेरहमो, तुमने बहुत बुरा किया है, धक्के दे कर उतार दिया है।”

गाड़ी सूने प्लेटफार्म को लाँघती आगे बढ़ गई। डिब्बे में व्याकुल-सी चुप्पी छा गई। बुढ़िया ने बोलना बंद कर दिया था। पठानों का विरोध कर पाने की हिम्मत नहीं हुई।

तभी मेरी बगल में बैठे दुबले बाबू ने मेरे बाजू पर हाथ रख कर कहा – “आग है, देखो आग लगी है।”

गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ कर आगे निकल आई थी और शहर पीछे छूट रहा था। तभी शहर की ओर से उठते धुएँ के बादल और उनमें लपलपाती आग के शोले नजर आने लगे।

“दंगा हुआ है। स्टेशन पर भी लोग भाग रहे थे। कहीं दंगा हुआ है।”

शहर में आग लगी थी। बात डिब्बे-भर के मुसाफिरों को पता चल गई और वे लपक-लपक कर खिड़कियों में से आग का दृश्य देखने लगे।

जब गाड़ी शहर छोड़ कर आगे बढ़ गई तो डिब्बे में सन्नाटा छा गया। मैंने घूम कर डिब्बे के अंदर देखा, दुबले बाबू का चेहरा पीला पड़ गया था और माथे पर पसीने की परत किसी मुर्दे के माथे की तरह चमक रही थी। मुझे लगा, जैसे अपनी-अपनी जगह बैठे सभी मुसाफिरों ने अपने आसपास बैठे लोगों का जायजा ले लिया है। सरदार जी उठ कर मेरी सीट पर आ बैठे। नीचे वाली सीट पर बैठा पठान उठा और अपने दो साथी पठानों के साथ ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गया। यही क्रिया शायद रेलगाड़ी के अन्य डिब्बों में भी चल रही थी। डिब्बे में तनाव आ गया। लोगों ने बतियाना बंद कर दिया। तीनों-के-तीनों पठान ऊपरवाली बर्थ पर एक साथ बैठे चुपचाप नीचे की ओर देखे जा रहे थे। सभी मुसाफिरों की आँखें पहले से ज्यादा खुली-खुली, ज्यादा शंकित-सी लगीं। यही स्थिति सम्भवतः गाड़ी के सभी डिब्बों में व्याप्त हो रही थी।

“कौन-सा स्टेशन था यह?” डिब्बे में किसी ने पूछा।

“वजीराबाद,” किसी ने उत्तर दिया।

जवाब मिलने पर डिब्बे में एक और प्रतिक्रिया हुई। पठानों के मन का तनाव फौरन ढीला पड़ गया। जबकि हिंदू-सिक्ख मुसाफिरों की चुप्पी और ज्यादा गहरी हो गई। एक पठान ने अपनी वास्कट की जेब में से नसवार की डिबिया निकाली और नाक में नसवार चढ़ाने लगा। अन्य पठान भी अपनी-अपनी डिबिया निकाल कर नसवार चढ़ाने लगे। बुढ़िया बराबर माला जपे जा रही थी। किसी-किसी वक्त उसके बुदबुदाते होंठ नजर आते, लगता, उनमें से कोई खोखली-सी आवाज निकल रही है।

अगले स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो वहाँ भी सन्नाटा था। कोई परिंदा तक नहीं फड़क रहा था। हाँ, एक भिश्ती, पीठ पर पानी की मशकल लादे, प्लेटफार्म लाँघ कर आया और मुसाफिरों को पानी पिलाने लगा।

“लो, पियो पानी, पियो पानी।” औरतों के डिब्बे में से औरतों और बच्चों के अनेक हाथ बाहर निकल आए थे।

“बहुत मार-काट हुई है, बहुत लोग मरे हैं।” लगता था, वह इस मार-काट में अकेला पुण्य कमाने चला आया है।

गाड़ी सरकी तो सहसा खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जाने लगे। दूर-दूर तक, पहियों की गड़गड़ाहट के साथ, खिड़कियों के पल्ले चढ़ाने की आवाज आने लगी।

किसी अज्ञात आशंकावश दुबला बाबू मेरे पासवाली सीट पर से उठा और दो सीटों के बीच फर्श पर लेट गया। उसका चेहरा अभी भी मुर्दे जैसा पीला हो रहा था। इस पर बर्थ पर बैठा पठान उसकी ठिठोली करने लगा – “ओ बेगैरत, तुम मर्द ए कि औरत ए? सीट पर से उट कर नीचे लेटता ए। तुम मर्द के नाम को बदनाम करता ए।” वह बोल रहा था और बार-बार हँसे जा रहा था। फिर वह उससे पश्तो में कुछ कहने लगा। बाबू चुप बना लेटा रहा। अन्य सभी मुसाफिर चुप थे। डिब्बे का वातावरण बोझिल बना हुआ था।

“ऐसे आदमी को अम डिब्बे में नईं बैठने देगा। ओ बाबू, अगले स्टेशन पर उतर जाओ, और जनाना डब्बे में बैटो।”

मगर बाबू की हाजिरजवाबी अपने कंठ में सूख चली थी। हकला कर चुप हो रहा। पर थोड़ी देर बाद वह अपने आप उठ कर सीट पर जा बैठा और देर तक अपने कपड़ों की धूल झाड़ता रहा। वह क्यों उठ कर फर्श पर लेट गया था? शायद उसे डर था कि बाहर से गाड़ी पर पथराव होगा या गोली चलेगी, शायद इसी कारण खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जा रहे थे।

कुछ भी कहना कठिन था। मुमकिन है किसी एक मुसाफिर ने किसी कारण से खिड़की का पल्ला चढ़ाया हो। उसकी देखा-देखी, बिना सोचे-समझे, धड़ाधड़ खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जाने लगे थे।

बोझिल अनिश्चत-से वातावरण में सफर कटने लगा। रात गहराने लगी थी। डिब्बे के मुसाफिर स्तब्ध और शंकित ज्यों-के-त्यों बैठे थे। कभी गाड़ी की रफ्तार सहसा टूट कर धीमी पड़ जाती तो लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगते। कभी रास्ते में ही रुक जाती तो डिब्बे के अंदर का सन्नाटा और भी गहरा हो उठता। केवल पठान निश्चित बैठे थे। हाँ, उन्होंने भी बतियाना छोड़ दिया था, क्योंकि उनकी बातचीत में कोई भी शामिल होने वाला नहीं था।

धीरे-धीरे पठान ऊँघने लगे जबकि अन्य मुसाफिर फटी-फटी आँखों से शून्य में देखे जा रहे थे। बुढ़िया मुँह-सिर लपेटे, टाँगें सीट पर चढ़ाए, बैठा-बैठा सो गई थी। ऊपरवाली बर्थ पर एक पठान ने, अधलेटे ही, कुर्ते की जेब में से काले मनकों की तसबीह निकाल ली और उसे धीरे-धीरे हाथ में चलाने लगा।

खिड़की के बाहर आकाश में चाँद निकल आया और चाँदनी में बाहर की दुनिया और भी अनिश्चित, और भी अधिक रहस्यमयी हो उठी। किसी-किसी वक्त दूर किसी ओर आग के शोले उठते नजर आते, कोई नगर जल रहा था। गाड़ी किसी वक्त चिंघाड़ती हुई आगे बढ़ने लगती, फिर किसी वक्त उसकी रफ्तार धीमी पड़ जाती और मीलों तक धीमी रफ्तार से ही चलती रहती।

सहसा दुबला बाबू खिड़की में से बाहर देख कर ऊँची आवाज में बोला – “हरबंसपुरा निकल गया है।” उसकी आवाज में उत्तेजना थी, वह जैसे चीख कर बोला था। डिब्बे के सभी लोग उसकी आवाज सुन कर चौंक गए। उसी वक्त डिब्बे के अधिकांश मुसाफिरों ने मानो उसकी आवाज को ही सुन कर करवट बदली।

“ओ बाबू, चिल्लाता क्यों ए?”, तसबीह वाला पठान चौंक कर बोला – “इदर उतरेगा तुम? जंजीर खींचूँ?” अैर खी-खी करके हँस दिया। जाहिर है वह हरबंसपुरा की स्थिति से अथवा उसके नाम से अनभिज्ञ था।

बाबू ने कोई उत्तर नहीं दिया, केवल सिर हिला दिया और एक-आध बार पठान की ओर देख कर फिर खिड़की के बाहर झाँकने लगा।

डब्बे में फिर मौन छा गया। तभी इंजन ने सीटी दी और उसकी एकरस रफ्तार टूट गई। थोड़ी ही देर बाद खटाक-का-सा शब्द भी हुआ। शायद गाड़ी ने लाइन बदली थी। बाबू ने झाँक कर उस दिशा में देखा जिस ओर गाड़ी बढ़ी जा रही थी।

“शहर आ गया है।” वह फिर ऊँची आवाज में चिल्लाया – “अमृतसर आ गया है।” उसने फिर से कहा और उछल कर खड़ा हो गया, और ऊपर वाली बर्थ पर लेटे पठान को संबोधित करके चिल्लाया – “ओ बे पठान के बच्चे! नीचे उतर तेरी माँ की… नीचे उतर, तेरी उस पठान बनानेवाले की मैं…”

बाबू चिल्लाने लगा और चीख-चीख कर गालियाँ बकने लगा था। तसबीह वाले पठान ने करवट बदली और बाबू की ओर देख कर बोला -“ओ क्या ए बाबू? अमको कुच बोला?”

बाबू को उत्तेजित देख कर अन्य मुसाफिर भी उठ बैठे।

“नीचे उतर, तेरी मैं… हिंदू औरत को लात मारता है! हरामजादे! तेरी उस…।”

“ओ बाबू, बक-बकर नई करो। ओ खजीर के तुख्म, गाली मत बको, अमने बोल दिया। अम तुम्हारा जबान खींच लेगा।”

“गाली देता है मादर…।” बाबू चिल्लाया और उछल कर सीट पर चढ़ गया। वह सिर से पाँव तक काँप रहा था।

“बस-बस।” सरदार जी बोले – “यह लड़ने की जगह नहीं है। थोड़ी देर का सफर बाकी है, आराम से बैठो।”

“तेरी मैं लात न तोड़ूँ तो कहना, गाड़ी तेरे बाप की है?” बाबू चिल्लाया।

“ओ अमने क्या बोला! सबी लोग उसको निकालता था, अमने बी निकाला। ये इदर अमको गाली देता ए। अम इसका जबान खींच लेगा।”

बुढ़िया बीच में फिर बोले उठी – “वे जीण जोगयो, अराम नाल बैठो। वे रब्ब दिए बंदयो, कुछ होश करो।”

उसके होंठ किसी प्रेत की तरह फड़फड़ाए जा रहे थे और उनमें से क्षीण-सी फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी।

बाबू चिल्लाए जा रहा था – “अपने घर में शेर बनता था। अब बोल, तेरी मैं उस पठान बनानेवाले की…।”

तभी गाड़ी अमृतसर के प्लेटफार्म पर रुकी। प्लेटफार्म लोगों से खचाखच भरा था। प्लेटफार्म पर खड़े लोग झाँक-झाँक कर डिब्बों के अंदर देखने लगे। बार-बार लोग एक ही सवाल पूछ रहे थे – “पीछे क्या हुआ है? कहाँ पर दंगा हुआ है?”

खचाखच भरे प्लेटफार्म पर शायद इसी बात की चर्चा चल रही थी कि पीछे क्या हुआ है। प्लेटफार्म पर खड़े दो-तीन खोमचे वालों पर मुसाफिर टूटे पड़ रहे थे। सभी को सहसा भूख और प्यास परेशान करने लगी थी। इसी दौरान तीन-चार पठान हमारे डिब्बे के बाहर प्रकट हो गए और खिड़की में से झाँक-झाँक कर अंदर देखने लगे। अपने पठान साथियों पर नजर पड़ते ही वे उनसे पश्तो में कुछ बोलने लगे। मैंने घूम कर देखा, बाबू डिब्बे में नहीं था। न जाने कब वह डिब्बे में से निकल गया था। मेरा माथा ठिनका। गुस्से में वह पागल हुआ जा रहा था। न जाने क्या कर बैठे! पर इस बीच डिब्बे के तीनों पठान, अपनी-अपनी गठरी उठा कर बाहर निकल गए और अपने पठान साथियों के साथ गाड़ी के अगले डिब्बे की ओर बढ़ गए। जो विभाजन पहले प्रत्येक डिब्बे के भीतर होता रहा था, अब सारी गाड़ी के स्तर पर होने लगा था।

खोमचेवालों के इर्द-गिर्द भीड़ छँटने लगी। लोग अपने-अपने डिब्बों में लौटने लगे। तभी सहसा एक ओर से मुझे वह बाबू आता दिखाई दिया। उसका चेहरा अभी भी बहुत पीला था और माथे पर बालों की लट झूल रही थी। नजदीक पहुँचा, तो मैंने देखा, उसने अपने दाएँ हाथ में लोहे की एक छड़ उठा रखी थी। जाने वह उसे कहाँ मिल गई थी! डिब्बे में घुसते समय उसने छड़ को अपनी पीठ के पीछे कर लिया और मेरे साथ वाली सीट पर बैठने से पहले उसने हौले से छड़ को सीट के नीचे सरका दिया। सीट पर बैठते ही उसकी आँखें पठान को देख पाने के लिए ऊपर को उठीं। पर डिब्बे में पठानों को न पा कर वह हड़बड़ा कर चारों ओर देखने लगा।

“निकल गए हरामी, मादर… सब-के-सब निकल गए!” फिर वह सिटपिटा कर उठ खड़ा हुआ चिल्ला कर बोला – “तुमने उन्हें जाने क्यों दिया? तुम सब नामर्द हो, बुजदिल!”

पर गाड़ी में भीड़ बहुत थी। बहुत-से नए मुसाफिर आ गए थे। किसी ने उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया।

गाड़ी सरकने लगी तो वह फिर मेरी वाली सीट पर आ बैठा, पर वह बड़ा उत्तेजित था और बराबर बड़बड़ाए जा रहा था।

धीरे-धीरे हिचकोले खाती गाड़ी आगे बढ़ने लगी। डिब्बे में पुराने मुसाफिरों ने भरपेट पूरियाँ खा ली थीं और पानी पी लिया था और गाड़ी उस इलाके में आगे बढ़ने लगी थी, जहाँ उनके जान-माल को खतरा नहीं था।

नए मुसाफिर बतिया रहे थे। धीरे-धीरे गाड़ी फिर समतल गति से चलने लगी थी। कुछ ही देर बाद लोग ऊँघने भी लगे थे। मगर बाबू अभी भी फटी-फटी आँखों से सामने की ओर देखे जा रहा था। बार-बार मुझसे पूछता कि पठान डिब्बे में से निकल कर किस ओर को गए हैं। उसके सिर पर जुनून सवार था।

गाड़ी के हिचकोलों में मैं खुद ऊँघने लगा था। डिब्बे में लेट पाने के लिए जगह नहीं थी। बैठे-बैठे ही नींद में मेरा सिर कभी एक ओर को लुढ़क जाता, कभी दूसरी ओर को। किसी-किसी वक्त झटके से मेरी नींद टूटती, और मुझे सामने की सीट पर अस्त-व्यस्त से पड़े सरदार जी के खर्राटे सुनाई देते। अमृतसर पहुँचने के बाद सरदार जी फिर से सामनेवाली सीट पर टाँगे पसार कर लेट गए थे। डिब्बे में तरह-तरह की आड़ी-तिरछी मुद्राओं में मुसाफिर पड़े थे। उनकी वीभत्स मुद्राओं को देख कर लगता, डिब्बा लाशों से भरा है। पास बैठे बाबू पर नजर पड़ती तो कभी तो वह खिड़की के बाहर मुँह किए देख रहा होता, कभी दीवार से पीठ लगाए तन कर बैठा नजर आता।

किसी-किसी वक्त गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकती तो पहियों की गड़गड़ाहट बंद होने पर निस्तब्धता-सी छा जाती। तभी लगता, जैसे प्लेटफार्म पर कुछ गिरा है, या जैसे कोई मुसाफिर गाड़ी में से उतरा है और मैं झटके से उठ कर बैठ जाता।

इसी तरह जब एक बार मेरी नींद टूटी तो गाड़ी की रफ्तार धीमी पड़ गई थी, और डिब्बे में अँधेरा था। मैंने उसी तरह अधलेटे खिड़की में से बाहर देखा। दूर, पीछे की ओर किसी स्टेशन के सिगनल के लाल कुमकुमे चमक रहे थे। स्पष्टतः गाड़ी कोई स्टेशन लाँघ कर आई थी। पर अभी तक उसने रफ्तार नहीं पकड़ी थी।

डिब्बे के बाहर मुझे धीमे-से अस्फुट स्वर सुनाई दिए। दूर ही एक धूमिल-सा काला पुंज नजर आया। नींद की खुमारी में मेरी आँखें कुछ देर तक उस पर लगी रहीं, फिर मैंने उसे समझ पाने का विचार छोड़ दिया। डिब्बे के अंदर अँधेरा था, बत्तियाँ बुझी हुई थीं, लेकिन बाहर लगता था, पौ फटने वाली है।

मेरी पीठ-पीछे, डिब्बे के बाहर किसी चीज को खरोंचने की-सी आवाज आई। मैंने दरवाजे की ओर घूम कर देखा। डिब्बे का दरवाजा बंद था। मुझे फिर से दरवाजा खरोंचने की आवाज सुनाई दी। फिर, मैंने साफ-साफ सुना, लाठी से कोई डिब्बे का दरवाजा पटपटा रहा था। मैंने झाँक कर खिड़की के बाहर देखा। सचमुच एक आदमी डिब्बे की दो सीढ़ियाँ चढ़ आया था। उसके कंधे पर एक गठरी झूल रही थी, और हाथ में लाठी थी और उसने बदरंग-से कपड़े पहन रखे थे और उसके दाढ़ी भी थी। फिर मेरी नजर बाहर नीचे की ओर आ गई। गाड़ी के साथ-साथ एक औरत भागती चली आ रही थी, नंगे पाँव, और उसने दो गठरियाँ उठा रखी थीं। बोझ के कारण उससे दौड़ा नहीं जा रहा था। डिब्बे के पायदान पर खड़ा आदमी बार-बार उसकी ओर मुड़ कर देख रहा था और हाँफता हुआ कहे जा रहा था – “आ जा, आ जा, तू भी चढ़ आ, आ जा!”

दरवाजे पर फिर से लाठी पटपटाने की आवाज आई – “खोलो जी दरवाजा, खुदा के वास्ते दरवाजा खोलो।”

वह आदमी हाँफ रहा था – “खुदा के लिए दरवाजा खोलो। मेरे साथ में औरतजात है। गाड़ी निकल जाएगी…”

सहसा मैंने देखा, बाबू हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ और दरवाजे के पास जा कर दरवाजे में लगी खिड़की में से मुँह बाहर निकाल कर बोला – “कौन है? इधर जगह नहीं है।”

बाहर खड़ा आदमी फिर गिड़गिड़ाने लगा – “खुदा के वास्ते दरवाजा खोलो। गाड़ी निकल जाएगी…”

और वह आदमी खिड़की में से अपना हाथ अंदर डाल कर दरवाजा खोल पाने के लिए सिटकनी टटोलने लगा।

“नहीं है जगह, बोल दिया, उतर जाओ गाड़ी पर से।” बाबू चिल्लाया और उसी क्षण लपक कर दरवाजा खोल दिया।

“या अल्लाह! उस आदमी के अस्फुट-से शब्द सुनाई दिए। दरवाजा खुलने पर जैसे उसने इत्मीनान की साँस ली हो।”

और उसी वक्त मैंने बाबू के हाथ में छड़ चमकते देखा। एक ही भरपूर वार बाबू ने उस मुसाफिर के सिर पर किया था। मैं देखते ही डर गया और मेरी टाँगें लरज गईं। मुझे लगा, जैसे छड़ के वार का उस आदमी पर कोई असर नहीं हुआ। उसके दोनों हाथ अभी भी जोर से डंडहरे को पकड़े हुए थे। कंधे पर से लटकती गठरी खिसट कर उसकी कोहनी पर आ गई थी।

तभी सहसा उसके चेहरे पर लहू की दो-तीन धारें एक साथ फूट पड़ीं। मुझे उसके खुले होंठ और चमकते दाँत नजर आए। वह दो-एक बार ‘या अल्लाह!’ बुदबुदाया, फिर उसके पैर लड़खड़ा गए। उसकी आँखों ने बाबू की ओर देखा, अधमुँदी-सी आँखें, जो धीर-धीरे सिकुड़ती जा रही थीं, मानो उसे पहचानने की कोशिश कर रही हों कि वह कौन है और उससे किस अदावत का बदला ले रहा है। इस बीच अँधेरा कुछ और छन गया था। उसके होंठ फिर से फड़फड़ाए और उनमें सफेद दाँत फिर से झलक उठे। मुझे लगा, जैसे वह मुस्कराया है, पर वास्तव में केवल क्षय के ही कारण होंठों में बल पड़ने लगे थे।

नीचे पटरी के साथ-साथ भागती औरत बड़बड़ाए और कोसे जा रही थी। उसे अभी भी मालूम नहीं हो पाया था कि क्या हुआ है। वह अभी भी शायद यह समझ रही थी कि गठरी के कारण उसका पति गाड़ी पर ठीक तरह से चढ़ नहीं पा रहा है, कि उसका पैर जम नहीं पा रहा है। वह गाड़ी के साथ-साथ भागती हुई, अपनी दो गठरियों के बावजूद अपने पति के पैर पकड़-पकड़ कर सीढ़ी पर टिकाने की कोशिश कर रही थी।

तभी सहसा डंडहरे से उस आदमी के दोनों हाथ छूट गए और वह कटे पेड़ की भाँति नीचे जा गिरा। और उसके गिरते ही औरत ने भागना बंद कर दिया, मानो दोनों का सफर एक साथ ही खत्म हो गया हो।

बाबू अभी भी मेरे निकट, डिब्बे के खुले दरवाजे में बुत-का-बुत बना खड़ा था, लोहे की छड़ अभी भी उसके हाथ में थी। मुझे लगा, जैसे वह छड़ को फेंक देना चाहता है लेकिन उसे फेंक नहीं पा रहा, उसका हाथ जैसे उठ नहीं रहा था। मेरी साँस अभी भी फूली हुई थी और डिब्बे के अँधियारे कोने में मैं खिड़की के साथ सट कर बैठा उसकी ओर देखे जा रहा था।

फिर वह आदमी खड़े-खड़े हिला। किसी अज्ञात प्रेरणावश वह एक कदम आगे बढ़ आया और दरवाजे में से बाहर पीछे की ओर देखने लगा। गाड़ी आगे निकलती जा रही थी। दूर, पटरी के किनारे अँधियारा पुंज-सा नजर आ रहा था।

बाबू का शरीर हरकत में आया। एक झटके में उसने छड़ को डिब्बे के बाहर फेंक दिया। फिर घूम कर डिब्बे के अंदर दाएँ-बाएँ देखने लगा। सभी मुसाफिर सोए पड़े थे। मेरी ओर उसकी नजर नहीं उठी।

थोड़ी देर तक वह खड़ा डोलता रहा, फिर उसने घूम कर दरवाजा बंद कर दिया। उसने ध्यान से अपने कपड़ों की ओर देखा, अपने दोनों हाथों की ओर देखा, फिर एक-एक करके अपने दोनों हाथों को नाक के पास ले जा कर उन्हें सूँघा, मानो जानना चाहता हो कि उसके हाथों से खून की बू तो नहीं आ रही है। फिर वह दबे पाँव चलता हुआ आया और मेरी बगलवाली सीट पर बैठ गया।

धीरे-धीरे झुटपुटा छँटने लगा, दिन खुलने लगा। साफ-सुथरी-सी रोशनी चारों ओर फैलने लगी। किसी ने जंजीर खींच कर गाड़ी को खड़ा नहीं किया था, छड़ खा कर गिरी उसकी देह मीलों पीछे छूट चुकी थी। सामने गेहूँ के खेतों में फिर से हल्की-हल्की लहरियाँ उठने लगी थीं।

सरदार जी बदन खुजलाते उठ बैठे। मेरी बगल में बैठा बाबू दोनों हाथ सिर के पीछे रखे सामने की ओर देखे जा रहा था। रात-भर में उसके चेहरे पर दाढ़ी के छोटे-छोटे बाल उग आए थे। अपने सामने बैठा देख कर सरदार उसके साथ बतियाने लगा – “बड़े जीवट वाले हो बाबू, दुबले-पतले हो, पर बड़े गुर्दे वाले हो। बड़ी हिम्मत दिखाई है। तुमसे डर कर ही वे पठान डिब्बे में से निकल गए। यहाँ बने रहते तो एक-न-एक की खोपड़ी तुम जरूर दुरुस्त कर देते…” और सरदार जी हँसने लगे।

बाबू जवाब में मुसकराया – एक वीभत्स-सी मुस्कान, और देर तक सरदार जी के चेहरे की ओर देखता रहा।

Monday, September 7, 2020

साग-मीट - भीष्म साहनी (Saag Meat by Bhisham Sahni)


साग-मीट बनाना क्‍या मुश्किल काम है। आज शाम खाना यहीं खाकर जाओ, मैं तुम्‍हारे सामने बनवाऊँगी, सीख भी लेना और खा भी लेना। रुकोगी न? इन्‍हें साग-मीट बहुत पसंद है। जब कभी दोस्‍तों का खाना करते हैं, तो साग-मीट जरूर बनवाते हैं। हाय, साग-मीट तो जग्‍गा बनाता था। वह होता, तो मैं उससे साग-मीट बनवाकर तुम्‍हें खिलाती। उसके हाथ में बड़ा रस था। वह उसमें घी डालता, लहसुन डालता, जाने क्‍या-क्‍या डालता। बड़े शौक से बनाता था। मेरे तो तीन-तीन डिब्‍बे घी के महीने में निकल जाते हैं। नौकरों के लिए डालडा रखा हुआ है, पर कौन जाने, मुए हमें डालडा खिलाते हों और खुद अच्‍छा घी हड़प जाते हो। आज के जमाने में किसी का इतबार नहीं किया जा सकता। मैं ताले तो नहीं लगा सकती। मुझसे ताले नहीं लगते। मैं कहती हूँ, खाते हैं तो खाएँ। कितना खा लेंगे! मुझसे अपनी जान नहीं सँभाली जाती, अब ताले कौन लगाए? यह मथरा सात रोटियाँ सवेरे और सात रोटियाँ गिनकर शाम को खाता है। बीच में इसे दो बार चाय भी चाहिए, और घर में जो मिठाई हो, वह भी इसे दो। पर मैं कहती हूँ, 'टिका हुआ तो है, आजकल किसी नौकर का भरोसा थोड़े है। किसी वक्‍त भी उठकर कह देते हैं - मैं जा रहा हूँ।'

ये भी मुझे यही कहते हैं, 'कुत्ते के मुँह में हड्डी दिए रहो तो नहीं भूँकेगा। सत्तर रुपये पर इसे रखा था, अब सौ लेता है। फिर भी इसके तेवर चढ़े रहते हैं।' पर जग्‍गा बड़ा नेक आदमी था। बड़ा नमकहलाल। वह नौकर थोड़े ही था, वह तो घर का आदमी था। वह इन्‍हें बहुत मानता था। एक बार ये कुछ कह दें, तो मजाल है, वह पूरा न करे। बड़ा वफादार था। ये भी तो नौकर को नौकर नहीं समझते। घर का आदमी समझते हैं। जब कभी सौ-पचास की उसे जरूरत होती, झट-से निकालकर दे देते। कहीं कोई लिखत नहीं, कोई हिसाब नहीं।

जग्‍गा बीवी ब्‍याह कर लाया, तो दो जोड़े और एक गर्म कोट सिलवाकर दिया। मैं इनसे कहूँ, 'जी, क्‍यों पैसे लुटाते हो। नौकर किसी के अपने नहीं होते। इसी को पाँच रुपये कहीं से ज्‍यादा मिल गए, तो यह पीठ फेर लेगा।' ये कहते, 'तू अपना काम देख, पानी निकालने से कुएँ खाली नहीं होते। यह हमें साग-मीट खिलाता रहे, मुझसे जो माँगेगा, दूँगा। इस-जैसा बावर्ची तो शहर-भर में नहीं होगा।'

मुझे वह दिन याद है, जब जग्‍गे को लेकर आए थे। बाहर से ही आवाज लगाई, 'ले समित्रा, तेरे लिए नौकर ले आया हूँ। तब भी ये मुझसे कहें, इसे चाय के साथ खाने के लिए जरूर कुछ दे दिया कर। एक मठरी ज्‍यादा दे देने से तेरा नुकसान नहीं होगा। इसे घर से मोह पड़ गया, तो वर्षों तक तेरे साथ बना रहेगा। तेरा सारा काम कर दिया करेगा।'

और जग्‍गा भी ऐसा, जैसे जंगल से हिरन पकड़ लाए हों। बड़ी-बड़ी उसकी आँखें, हिरन की तरह हैरान-सा देखता रहता। वही बात हुई। जग्‍गे को मोह हो गया। पर यह छोटी उम्र में होता है। बड़े-बड़े मुस्‍टंडे नौकर, जो सड़कों पर घूमते हैं, इन्‍हें क्‍या मोह होगा। बच्‍चे कोमल होते हैं, जैसा सिखाओ, सीख जाते हैं। जानवर सीख जाते हैं, तो ये क्‍यों न सीखेंगे? इन्‍हें बस में करने के बड़े ढंग आते हैं।

तुम्‍हें जैकी याद है ना? हाय, तुम्‍हें जैकी भूल गया है? जैकी कुत्ता, जिसे ये एक दोस्‍त के घर से उठा लाए थे। सभी को भूँकता फिरता था। पर इन्‍होंने उसे ऐसा हाथ में किया, इन्‍हीं के कदमों में चक्‍कर काटता फिरता था। उसे भी ऐसा ही मोह पड़ गया था इनके साथ। मैं तुम्‍हें क्‍या बताऊँ। दफ्तर से इनके लौटने का वक्‍त होता, तो जैकी के कान खड़े हो जाते। बाहर सारा वक्‍त दसियों मोटरें दौड़ती रहती हैं, पर जिस वक्‍त इनकी मोटर आती, तो इसे झट-से पता चल जाता और भागकर बाहर पहुँच जाता। सीधा गेट पर जा पहुँचता। वहीं पर एक दिन अपनी ही गाड़ी के नीचे कुचल गया। यह मोह बहुत बुरी चीज है।

ये काँटे कहाँ से बनवाए हैं? बड़े खूबसूरत हैं। हीरे कितने के आए? सच्‍चे हैं ना? आजकल हर चीज को आग लगी हुई है। मैंने यह नाक की लौंग बनवाई, इतना छोटा-सा हीरा इसमें लगा है, पर पूरे सात सौ खुल गए। अब तो मुझे पहनते भी डर लगता है। जब जग्‍गा था, तो मेरी जेवरों की पिटारी भी बाहर पड़ी रहती थी। कभी दो पैसे भी इधर-उधर नहीं हुए। ऐसी भुलक्‍कड़ हूँ, कभी चेन गुसलखाने में रह जाती, कभी तिपाई पर रह जाती, जग्‍गा उठाकर दे देता। पर अब तो ऐसे नौकर आए हैं, हरे राम, मैंने सारे जेवर उठाकर बैंक में रख दिए हैं।

मथरा से पहले एक नौकर था, मंसा नाम का। ऊपर से बड़ा शरीफ। लगता, उसके मुँह में जबान ही नहीं है। पर एक दिन मैं पिछवाड़े की तरफ से घर आ रही थी, तो क्‍या देखती हूँ, मंसा छत पर खड़ा है और गली में खड़े आदमी को ऊपर से एक-एक करके कपड़े फेंक रहा है। मुझे देखते ही दोनों चंपत हो गए। मंसा गली में कूद गया और वहीं से भाग गया। आजकल नौकर रखने का जमाना नहीं है। मैं तो घर के बाहर भी जाऊँ, तो डर लगा रहता है कि पीछे नौकर कहीं घर की सफाई ही न कर जाएँ। जग्‍गा था, तो मुझे कोई भी चिंता नहीं होती थी। वह हाथ का बड़ा साफ था।

तू कुछ खा भी ना। तू तो कुछ भी नहीं खाती। गर्म चाय मँगवाऊँ? इसे छोड़ दे, यह ठंडी पड़ गई होगी, यह केक का टुकड़ा ले। बाजारी है पर बहुत अच्‍छा है। केक तो बनाती है, कमला की सास, एक-से-एक बढ़िया। कभी उसमें चाकलेट डालती है, कभी कुछ, कभी कुछ। 'वेंगर' से लेने जाओ, तो जो केक मुए अठारह रुपये में बेचते हैं, कमला की सास पाँच रुपये में बना लेती है। बीच में अंडे भी, दूध-चीनी भी, किशमिश और बादाम भी, जाने क्‍या-क्‍या। मुझसे अपनी जान नहीं सँभाली जाती, मैं क्‍या करूँगी। केक जग्‍गा भी बहुत अच्‍छे बनाता था। पर उसकी किस्‍मत खोटी थी, नहीं तो आज तुम्‍हें उसी के हाथ का बना केक खिलाती। हर तीसरे-चौथे दिन केक बनाता था, पर खुद कभी नहीं खाता था। मैं उससे कहूँ, तू भी एक टुकड़ा खा ले, पर नहीं।' वह कहता, 'बीबीजी, यहाँ केक खाऊँगा, तो बाहर मुझे केक कौन देगा?

किसे मालूम था कि यों चला जाएगा। मैं तो अब भी कहती हूँ, बक देता, तो बच जाता। पर अपनी-अपनी किस्‍मत है, कोई क्‍या करे! इनके सामने उसने मुँह ही नहीं खोला। इन्‍हें बहुत मानता था। बोला इसलिए नहीं कि इनके दिल को ठेस पहुँचेगी। और क्‍या बात हो सकती थी? अब अंदर की बात इन्‍हें क्‍या मालूम? वह बताए, तो पता चले। वह तो मैं जानती थी। उसके मन में क्‍या था, उसने हवा तक नहीं लगने दी।

धीरे बोल... दोपहर के वक्‍त किसी को क्‍या मालूम, सोया आदमी तो मोए बराबर होता है, हमारे घर में तो उस वक्‍त चिड़ी नहीं फड़कती। किसी को क्‍या खबर, घर के पिछवाड़े में क्‍या हो रहा है? मुझसे अपनी जान नहीं सँभाली जाती। भगवान झूठ न बुलवाए, एक दिन दोपहर को मैं उठी। गुसलखाने की तरफ जा रही थी, जब मुझे खटका-सा हुआ। मुझे लगा, जैसे कोई जग्‍गे की कोठरी की तरफ जा रहा है। मुझे क्‍या खबर, कौन नहीं है। फिर भी मेरे अंदर से फुरनी फुरी - इस वक्‍त यहाँ कौन हो सकता है? जग्‍गे को तो इस वक्‍त ये अपने दफ्तर में बुला लेते हैं। जग्‍गा तो इस वक्‍त दफ्तर में काम करता है, इनके लिए चाय-पानी बनाता है, चपरासगीरी करता है। ये कहते थे कि घर के लिए कोई दूसरा नौकर मिल जाए, तो जग्‍गे को मैं दफ्तर में रख लूँगा। फिर इस वक्‍त यहाँ कौन हो सकता है?

मैंने खिड़की में से झाँककर देखा। हाय, यह तो बिक्‍की है, मेरा देवर। काला सूट पहने, दबे पाँव चला जा रहा था, और सीधा जग्‍गे की कोठरी में क्‍या करने गया है? फिर मैंने सोचा, किसी काम से आया होगा। पर जग्‍गे की कोठरी में उसका क्‍या काम? और यह इतना दबे पाँव क्‍यों जा रहा है? मन में आया, इसी से जाकर पूछूँ। पर मुझसे मेरी जान नहीं सँभाली जाती। मैं लौटकर फिर पलंग पर पड़ रही, पर ध्‍यान मेरा बार-बार उसी ओर जाए। भलेमानस घरों में ऐसे काम नहीं करते। जो ऐसे काम करने हैं, तो शादी क्‍यों नहीं कर लेता। किसी का घर क्‍यों खराब करता है?

तुमने जग्‍गे की घरवाली देखी थी ना? बड़ी भोली-सी लड़की थी, गोरी इतनी, हाथ लगाए मैली होती थी। यह कलमुँहा किसी बहाने दफ्तर से भाग आता था और उसकी कोठरी में जा घुसता था। उस दिन मेरी नजर पड़ गई। असील-सी गाँव की लड़की, सहमी-सहमी-सी, इस चंट के आगे क्‍या बोलती?

धीरे बोल... इनके घर में बदचलनी बहुत है। ये ही एक शरीफ हैं। इनके चाचा ने भी दो-दो रखैल रखी हुई थीं। इनकी चाची, बुढ़िया, दोपहर को अपने एक नौकर से पाँव दबवाती थी। मैंने खुद देखा है। खाना खाने के बाद अपने कमरे में घुस जाती और पीछे-पीछे मुस्‍टंडा शंकर पहुँच जाता।

अब ऐसी बातें छिपी तो नहीं रह सकतीं ना। एक दिन जग्‍गे ने ही देख लिया। इन्‍होंने थर्मस मँगवाने के लिए जग्‍गे को घर पर भेजा। मैंने उसे थर्मस दी और वह अपनी कोठरी की तरफ चला गया। अचानक मैंने खिड़की के बाहर झाँककर देखा। बिक्‍की, वही काला सूट पहने, जग्‍गे की कोठरी में से बाहर निकल रहा था। 'बिक्‍की बाबू...!' जग्‍गे ने कहा। फिर उसका मुँह जैसे बंद हो गया। फटी-फटी आँखों से उसे देखता रहा गया। उधर बिक्‍की, बिना उसकी ओर देखे, चुपचाप वहाँ से निकल गया। मेरा दिल धक-धक करने लगा। मैंने कहा, 'अब इसकी घरवाली की खैर नहीं। यह उसे धुन देगा। क्‍या मालूम, जान से ही मार डाले। इन लोगों का कुछ पता थोड़े ही लगता है। पर कोठरी के अंदर से न हूँ, न हाँ।'

मैं नहीं जानती, जग्‍गा कितनी देर तक अंदर रहा। उसने अपनी बीवी से कुछ कहा, या नहीं कहा। मैं तो जाकर लेट गई, पर मैंने मन-ही-मन कहा कि आज रात मैं इनसे बात करूँगी। या तो जग्‍गे को चलता करें, या उससे कहें कि अपनी घरवाली को गाँव छोड़ आए। यहाँ इसका रहना ठीक नहीं।

लेटे-लेटे भी मेरे कान कोठरी की ओर लगे रहे। अभी वहाँ से रोने-चिल्‍लाने, पीटने-रोने की आवाज आएगी। पर वहाँ बिल्‍कुल चुप! मैंने मन-ही-मन कहा, ऐसा शरीफ आदमी भी किस काम का, जो अपनी घरवाली को काबू में नहीं रख सकता। दो लप्‍पड़ उसके मुँह पर लगाता, वह अपने-आप सीधे रास्‍ते पर आ जाती। दस तरीके हैं, औरत को सीधे रास्‍ते पर लाने के। पर यहाँ न हूँ, न हाँ।

पलंग पर लेटे-लेटे ही मुझे ऐसी घबराहट हुई, कि मुझे बाथरूम जाने की हाजत हो आई। मुझे मुई कब्‍जी भी तो रहती है ना। रोज रात को ईसबगोल की भूसी दूध में डालकर लेती हूँ, तब जाकर सुबह पेट साफ होता है। कभी-कभी तो जान इतनी घबराती है कि क्‍या बताऊँ। एक बार पूरे पाँच दिन तक कब्‍ज रही। ये मजाक करते थे। कहते थे अब बाथरूम जाओगी, तो बाथरूम साफ करना मुश्किल हो जाएगा। हाय, अब तो हँसा भी नहीं जाता। हँसती हूँ, तो साँस फूलने लगती है। मुझे बवासीर की शिकायत भी तो रहती है ना। यहाँ एक मुसीबत थोड़े है। एक नहीं, बीस दवाइयाँ खा चुकी हूँ।

डाक्‍टर कहता है, 'चला-फिरा करो।' अब इस शरीर के साथ कौन चल-फिर सकता है? थोड़ा-सा भी चलूँ, तो साँस फूलने लगती है। डाक्‍टर कहता है, 'मिठाई मत खाया करे,' पर मुझसे हाथ रोका ही नहीं जाता। घर में दो-तीन डिब्‍बे मिठाई के हर वक्‍त मौजूद रहते हैं, पर बर्फी का टुकड़ा मुँह में डालने की देर है कि पेट में गुड़-गुड़ होने लगती है। डाक्‍टर मुआ बार-बार कहता है, 'मिठाई खाना छोड़ दो।' पर एक टुकड़ा भी मुँह में न डालूँ, तो फिर मुझे बैठे-बैइे ही ठीक कर दो। न मेरी मिठाई बंद करो, न मुझे घूमने को कहो। अगर मुझे सैर करके ही दुरुस्‍त होना है, तो मुझे तुम्‍हारी क्‍या जरूरत है? जब आते हो, पच्‍चास-पच्‍चास रुपये ले जाते हो। हम तुम्‍हें इतने पैसे भी दें, फिर भी तुम ठीक नहीं कर सको, तो फिर फीस किस बात की लेते हो? हम पांडी-मजूर थोड़े हैं कि घूमते फिरें।

मैंने डाँटकर कहा, तो डाक्‍टर अपने-आप सीधा हो गया। कहने लगा, 'कोई बात नहीं, खाना खाने के बाद दो बड़े चम्‍मच इस दवाई के पी लिया करो।' मैंने कहा, अब आया न सीधे रास्‍ते पर! अब दो चम्‍मच रोज पी लेती हूँ। डकार आनी तो बंद हो गई है, पर कोई बात इधर-उधर की हो जाए और मन घबराने लगे, तो बाथरूम की हाजत होने लगती है।

उस दिन क्‍लब में गई, तो हरचरन की बीवी औरतों पर बडद्या रोआब गाँठ रही थी। कह रही थी, 'मैं सात गोलियाँ रोज खाती हूँ।' मैंने सुना, पर चुप रही। मन में कहा, यह भी कोई ऐंठने की बात है? भगवान अहंकार न बुलवाए, पंद्रह-पंद्रह गोलियाँ भी रोज खाई हैं, पर बाहर जाकर ढिंढोरा नहीं पीटा कि दवाई की पंद्रह गोलियाँ रोज खाते हैं। डाक्‍टर घर का पक्‍का रखा हुआ है, तीन सौ रुपया बँधा-बँधाया उसे हर महीने देते हैं, घर में कोई बीमार हो गया नहीं हो, अभी भी खानेवाले मेज पर जाकर देखो, कुछ नहीं तो दस दवाइयों की शीशियाँ वहाँ पर रखी होंगी, कुछ ताकत की गालियाँ, कुछ हाजमे की, और तरह-तरह की। जग्‍गे को सब मालूम था कि कौन-सी गोली मुझे किस वक्‍त चाहिए। अपने-आप लाकर दे दिया करता था। वह गया, तो दवाइयों का सारा सिलसिला ही खराब हो गया। ...तुम कुछ लो ना, तुम तो कुछ भी नहीं खा रही हो।

उस दिन जो शाम को ये घर आए, तो आते ही कहने लगे, 'कहाँ है जग्‍गा? उससे कहो, पाँच आदमी रात को खाना खाने आएँगे, बढ़िया तरकारियाँ बनाए और साग-मीट बनाये।' जग्‍गा आया, तो गुमसुम इनके सामने आकर खड़ा हो गया। चेहरा ऐसा पीला, जैसा मुर्दे का होता है। इन्‍होंने बड़े लाड़ से पूछा, 'क्‍यों जग्‍गे क्‍या बात है, इतना चुप क्‍यों है? क्‍या गाँव से कोई बुरी खबर आई है?' पर जग्‍गा चुप, न हूँ, न हाँ। इन्‍हें कहता भी तो क्‍या? इनसे कैसे कहता कि आपका भाई मेरी घरवाली से मुँह काला कर रहा है। कोई गैरत भी तो होती है। इनके आगे तो वह आँख उठाकर भी नहीं देखता था। पर इनकी तबीयत को तो तुम जानती हो, बिगड़ जाएँ, तो सख्‍त बिगड़ते हैं, आगा-पीछा नहीं देखते। और-तो-और, मुझे भी नौकरों के सामने बेइज्‍जत कर देते हैं।

जब जग्‍गा कुछ नहीं बोला, तो इन्‍हें गुस्‍सा आ गया। जग्‍गा पत्‍थर की मूरत बना खड़ा था। जाने उसके मन में क्‍या था। बोल देता, तो अपने दिल का गुबार तो निकाल लेता। मगर वह चुप!

ये उसे डाँटने लगे, तो मैंने रोक दिया। मैंने कहा - जी, मेहमान आनेवाले हैं, अभी सारा काम पड़ा है, जा जग्‍गा, तू रसोईघर में चल। वह उसी तरह गुमसुम रसोईघर में चला गया। थोड़ी देर बाद मैं रसोईघर में गई कि खाने-वाने का देखूँ, तो यह वैसे-का-वैसा गुमसुम खड़ा था। सरोईघर के बीचोंबीच, पत्‍थर की मूरत बना हुआ। मैंने कहा, इसकी बुद्धि पथरा गई है, यह कोई काम नहीं कर पायेगा। मैं उन्‍हीं कदमों से लौट आई। मैंने इनसे कहा - जी, इसे तो कुछ हो गया है। यह बोलता नहीं, मुझे तो डर लगता है। तुम बाहर से खाना मँगवा लो, और इसे आज के दिन छुट्टी दे दो।

मैंने इनसे कहा, तो ये खुद उठकर रसोईघर की तरफ चले गए। और बजाय उसे छुट्टी देने के, उसे फटकारने लगे। मैं थर-थर काँपने लगी। क्‍या मालूम, जग्‍गे ने कोई छुरा नेफे में छिपा रखा हो। इन लोगों का क्‍या भरोसा? 'बदजात बोलता क्‍यों नहीं?' ये ऐसे चिल्‍लाए, जैसा मैंने इन्‍हें कभी चिल्‍लाते नहीं सुना। मेरा तो ऊपर का साँस ऊपर और नीचे का साँस नीचे। मैं करूँ तो क्‍या करूँ? मैं भागकर इनके पास गई। मैंने सोचा, इन्‍हें खींचकर बाहर ले आऊँगी, पर इन्‍होंने मेरा हाथ झटक दिया। 'कमीने, मैं बार-बार पूछ रहा हूँ, बता क्‍या बात है, और तू बोलता तक नहीं। तेरी जबान घिसती है, मुझे जवाब देने में? निकल जा यहाँ से, अभी चला जा, मेरी आँखों से दूर हो जा।' और जग्‍गे को कान से पकड़कर रसोईघर के बाहर ले आए। मैं इन्‍हें समझाने लगी' कुछ न कहो जी घंटे-दो घंटे में मेहमान आनेवाले हैं, और अभी तक कुछ भी नहीं बना। यह चला जाएगा, तो खाना कौन बनाएगा। जा जग्‍गा, जा, तू रसोईघर में जा। और मैं इन्‍हें जैसे-तैसे खींच लायी।

रात को जब मेहमान चले गए... हाँ जी, बनाया जग्‍गे ने, सारा खाना बनाया। बड़ा अच्‍छा खाना बनाया, पर रहा गुमसुम, मुँह से एक लफ्ज नहीं बोला, खाना खाते-खाते इनका दिल भी पसीज गया! मेहमानों के सामने ही उससे कहने लगे, 'जग्‍गे! जा तेरी दस रुपये तरक्‍की! राय साहब कहते हैं, साग-मीट बहुत अच्‍छा बना है, शाबाश! जा तेरा कसूर माफ किया।' ये देने पर आएँ, तो मुँहमाँगी मुराद पूरी करते हैं। इनका दिल तो समंदर है।

रात को मुझसे नहीं रहा गया। मैंने कहा - जी, बिक्‍की बड़ा हो गया है, अब इसकी शादी की फिक्र करो। तो कहने लगे, 'तुम्‍हें इसकी शादी की क्‍या पड़ी है, अभी इसकी उम्र ही क्‍या है, अभी तो इसके मुँह पर से दूध भी नहीं सूखा।' मैंने कहा 'जी, शादी नहीं करोगे तो खूँटा तुड़ाए साँड़ की तरह जगह-जगह मुँह मारेगा। मैंने गोल-मोल शब्‍दों में कहा। पर बिक्‍की से उन्‍हें बहुत प्‍यार है, इसे अपने बच्‍चे की तरह इन्‍होंने पाला है। उसकी बुराई ये नहीं सुन सकते। मैंने फिर से उसकी शादी की बात चलाई, तो कहने लगे, 'मार ले जितना मुँह मारता है, अभी उसकी उम्र ही क्‍या है, दो दिन हँस-खेल ले, ब्‍याह के बंधन में तो एक दिन बँध ही जाएगा।'

मैंने कहा - जी, जवान लड़का है, गलत रास्‍ते पर भी पड़ सकता है। इसका तो जितनी जल्‍दी हो, ब्‍याह कर दो। इस पर कहने लगे, 'अभी तो इसने पढ़ाई भी पूरी नहीं कि। कुछ नहीं तो तीस-चालीस हजार इसकी पढ़ाई पर खर्च कर चुका हूँ। इसकी शादी करूँ, तो कम-से-कम यह रकम तो वसूल हो। और अभी इसने बी.ए. पास भी नहीं किया।'

मर्द लोग बड़े समझदार होते हैं, इन्‍हें तो दस बातों का ध्‍यान रहता है। अब मैं और आगे क्‍या कहती। मैंने इतना-भर कहा, आप इसके कान खींचते रहा कीजिए, जवानी बड़ी मस्‍तानी होती है। इस पर ये बिगड़ उठे, 'तुम्‍हें कुछ मालूम है क्‍या? बोलती क्‍यों नहीं हो?' ये इतनी रुखाई से बोले कि मैं चुप हो गई। मैंने सोचा, फिर कभी मौका मिलेगा, तो बात करूँगी, इन्‍हें आराम से समझाऊँगी, पर मुझे क्‍या मालूम था कि दूसरे ही दिन गुल खिलनेवाला है।

दूसरे दिन सुबह, यही आठ-साढ़े आठ का वक्‍त होगा, मैं पिछले बरामदे में बैठी बाल सुखा रही थी। वहाँ धूप अच्‍छी पड़ती है। मैंने सोचा, बाल सूख जाएँ, तो उन्‍हें काला करूँ। जग्‍गे की घरवाली बड़े सँवारकर मेरे बाल बनाती थी। मैंने सोचा, बाल सूख जाएँ, तो उसे बुला लूँगी। यही आठ-साढ़े आठ का वक्‍त होगा। उसी वक्‍त फ्रंटियर मेल आती है। घर के पिछवाड़े थोड़ी दूर पर ही तो रेलवे लाइन है। अगर गाड़ियों को सिगनल नहीं मिले, तो यहीं पर रुक जाती हैं, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं। पर फ्रंटियर मेल यहाँ नहीं रुकती। वही एक गाड़ी है, जो यहाँ खड़ी नहीं होती।

जग्‍गे ने पहले से ही सबकुछ सोच रखा होगा। उधर से गाड़ी आई, तो जग्‍गा अपनी कोठरी में से निकला। मैंने कहा, जग्‍गे, सुरस्‍ताँ को मेरे पास भेज दे। पर मुझे लगा, जैसे उसने सुनाओ ही नहीं। वह भागकर पिछवाड़े की दीवार फाँद गया और रेलवे लाइन की ढलान चढ़ने लगा। यह सब पलक मारते हो गया। उसने मुड़कर पीछे देखा ही नहीं, मेरी भी अक्‍कल मारी गई, मुझे सूझा ही नहीं कि वह क्‍यों भागा जा रहा है। मैंने सोचा, किसी काम से जा रहा होगा। गाड़ी का तो मुझे खयाल ही नहीं आया। वरना मैं उसे रोक नहीं देती? ढलान चढ़ने के बाद मैंने नहीं देखा कि वह कहाँ गया है, किस तरह गया है!

झूठ क्‍यों बोलूँ, शाम का वक्‍त है। बस, फिर मुझे नजर नहीं आया। मुझे तो खटका तब भी नहीं हुआ, जब गाड़ी धम-धम करती आई और कुछ ही देर बाद पहिए घसीटती रुक गई। पहिए घिसटने की आवाज आती है ना, जैसे किसी ने चेन खींची हो। पर मैंने खयाल नहीं किया, यहाँ रोज गाड़ियाँ रुकती हैं। मैंने सोचा किसी ने चेन खींची होगी। थोड़ी देर में माली भागा-भागा आया। कहने लगा, कोई हादसा हो गया है, और वह भी पिछवाड़े की दीवार फाँदकर ढलान चढ़ने लगा। मुझे फिर भी शक नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद पड़ोसवाले नौकर ने चिल्‍लाकर कहा, 'जग्‍गा मारा गया है। जग्‍गा गाड़ी के नीचे कुचल गया है।'

मेरा दिल बुरी तरह से धक-धक करने लगा। उसके साथ उन्‍स थी ना। वह तो जैसे घर का आदमी था, कोई पराया थोड़े ही था। ये तो उसके साथ बेटे-जैसा सुलूक करते थे। वह भी इन्‍हें बाप की तरह मानता था। यही चीज उसे अंदर-ही-अंदर खा गई। मैं तो अब भी कहती हूँ, अगर जग्‍गा बोल पड़ता, तो बच जाता। ये जरूर कोई-न-कोई रास्‍ता ढूँढ़ निकालते। ये सब तरकीबें जानते हैं। बड़े समझदार हैं। पर वह बोला ही नहीं।

वह दिन तो ऐसा बुरा बीता, ऐसा बुरा कि तुम्‍हें क्‍या बताऊँ! बार-बार टेलिफोन आएँ, तीन बार तो पुलिस का इन्‍स्‍पेक्‍टर आया। बार-बार इन्‍हें बुलाता, बार-बार कोठरी में झाँककर देखता। अंदर बैठी थी, वह कुलच्‍छणी! मौका देखने के बहाने इन्‍स्‍पेक्‍टर बार-बार अंदर जाए। मर्द तो भेड़िए की तरह औरत को घूरते हैं ना। और वह अंदर बेहोश पड़ी थी। उसे बार-बार गश आ रहे थे। अब मैं किस काम की! मुझसे अपनी जान नहीं सँभाली जाती। दो-एक बार मन में आया भी कि जाऊँ, सुरस्‍ताँ को देख आऊँ। पर इन्‍होंने मना कर दिया, ये कहने लगे, फौजदारी का मामला है, इससे दूर ही रहो। जब तक पुलिस अपनी कार्रवाई न कर ले, कोठरी में कदम नहीं रखना। मर्द समझदार होते हैं ना, उन्‍होंने दुनिया देखी होती है। पुलिस ने इनसे पूछा, तो इन्‍होंने कहा 'वह पिछले दिन से ही पगलाया-पगलाया-सा लग रहा था। मियाँ-बीवी की आपस में कोई बात हुई हो, तो हम नहीं जानते। नौकरों की अंदर की बातों से मालिकों का क्‍या काम?' एक बार अंदर आए, तो मैंने इनसे कहा, 'जी, तुम बिक्‍की को कहीं बाहर भेज दो।' मैं कहूँ, इन्‍हें मालूम नहीं, पर आस-पास के किसी आदमी को मालूम हुआ, तो बखेड़ा उठ खड़ा होगा। पर इन्‍होंने समझदारी की। बिक्‍की को बाहर नहीं भेजा। मर्द लोग समझदार होते हैं, बिक्‍की लापता हो जाता, तो पुलिस को शक पड़ सकता था, ना।

एक मठरी और लो! लो ना! तुमने तो कुछ खाया ही नहीं। खाओगी तो सेहत बनी रहेगी, बस मुटियाना नहीं। मेरी तरह मोटी नहीं होना, मोटी देह किस काम की। तुम आ गईं, तो घंटा, आध घंटा, मन बहल गया। कभी-कभी आ जाया करो ना। तुम दूर तो नहीं रहती हो। कहो तो मोटर भेज दिया करूँ? अकेले में तो घर भाँय-भाँय करता है। ये तो दफ्तर से आते हैं, तो सीधे ब्रिज खेलने चले जाते हैं। जब तक तीन-चार घंटे ब्रिज न खेल लें, इन्‍हें चैन नहीं मिलता। यह ताश तो मेरी सौतन आई है, इस घर में जब से ब्‍याही आई हूँ, यह मेरा पीछा नहीं छोड़ती। रोज शाम को इन्‍हें उड़ा ले जाती है। हाय, अब तो हँस भी नहीं सकती हूँ। हँसती हूँ, तो साँस फूलने लगता है। छाती में शाँ-शाँ होती है। मैं इनसे कहूँ, तुम ताश बहुत न खेला करो जी। अपनी सेहत का भी कुछ खयाल किया करो। जानती हो, क्‍या कहते हैं? कहने लगे, 'इसी ताश के तुफैल ही से तो मेरे दस काम सँवरते हैं। पुलिस का बड़ा अफसर ताश का साथी था, तभी जग्‍गेवाला मामला रफा-दफा हो गया, वरना घर में से कोई खुदकुशी करे, तो पुलिसवाले क्‍या घरवालों को परेशान नहीं करेंगे?' मैंने कहा, 'ठीक है, मर्द लोग जानें, हम क्‍या जानें।' बस, वहीं दिन हमारा बुरा गुजरा। इनको दिन के वक्‍त सोने की आदत है, थोड़ा सो न लें, तो बदन भारी-भारी महसूस करने लगता है, पर कोई सोने दे तो! उस दिन वह भी नहीं हुआ। सोने के लिए लेटें, तो कभी टेलीफोन की घंटी बजने लगे, तो कभी कोई सरकारी आदमी आ जाए। पर दूसरे दिन से चैन हो गया। फिर कोई नहीं आया।

जब मामला रफा-दफा हो गया, तो एक दिन मैंने बिक्‍की की सारी करतूत इन्‍हें बात दी। ये कहने लगे, 'मुझे तो पहले दिन से मालूम था।' मैं हक्‍की-बक्‍की इनके मुँह की ओर देखने लगी। 'जवानी में सभी बेवकूफियाँ करते हैं, इसने कर ली, तो क्‍या हुआ। मैंने कहा, 'जी, बिक्‍की को समझा तो दिया होता।' कहने लगे, 'कोई बेसवा के पास तो नहीं गया, कोई बीमारी तो नहीं ले आया, हो गई बात जो होनी थी, आगे के लिए इसे खुद कान हो जाएँगे।' मैंने कहा - 'जी, पर बात तो अच्‍छी नहीं ना, ऐसा बिक्‍की को करना तो नहीं चाहिए था ना। बिक्‍की ने ऐसा नहीं किया होता, तो जग्‍गा जान पर तो नहीं खेल जाता ना।' तो कहने लगे, 'तुम क्‍या चाहती हो, भाई को पुलिस में दे देता?' 'पर जी, उसने जुर्म तो बहुत बड़ा किया है, ना।' ये और भी बिगड़ उठे, 'उसका जुर्म देखता या उसकी जान बचाता? तुम क्‍या चाहती हो, उसे काल-कोठरी में भिजवा देता?'

फिर थोड़ी देर बाद धीमे-से बोले, मुझे समझाने लगे, 'औव्‍वल तो कौन जाने, बिक्‍की अपने-आप अंदर गया था या जग्‍गे की घरवाली उसे इशारे करती रही थी। ताली एक हाथ से तो नहीं बजती। औरत बढ़ावा देती है, तभी मर्द बहकता है। लड़की इशारा भी कर दे, तो आदमी बौरा जाता है। कोठरी के बाहर पर्दा लगा रहता है। क्‍या मालूम पर्दे की ओट में उसे इशारे करती रही हो। औरत खुद न चाहती, तो क्‍या मजाल थी कि बिक्‍की उसके कमरे में जाता। ऐसे ही कोई किसी के कमरे में घुस जाता है? इतनी ही शरीफजादी थी, तो अंदर से कमरा बंद करके क्‍यों नहीं बैठती थी? अंदर से साँकल लगाकर बैठती। तेरा मर्द बाहर काम पर गया है, तू कोठरी में अकेली है, तू अंदर से कोठरी बंद करके बैठ। दरवाजा खोलकर बैठने का तेरा क्‍या मतलब है? दिन के वक्‍त तेरे पास आ सकती थी। उसे किसी ने मना किया था?'

मैं सुनती रही, मैं भी सोचूँ, किसी के दिल की कौन जानता है, लड़की के दिल में चोर था, या बिक्‍की के दिल में, भगवान जाने।

आखिर में जी, इन्‍होंने सारा मामला सँभाल लिया, इनसे सब संतुष्‍ट हो गए। इन्‍हें भगवान ने ऐसी समझदारी दी है, इनकी कोई कसम तक नहीं खाता। सभी इनके सामने हाथ जोड़ते हैं। ये जल्‍दी घबराना नहीं जानते ना, यही इनकी सबसे बड़ी खूबी है। कोई दूसरा होता, तो घबरा जाता। जग्‍गे का भाई गाँव से आया, बहुत रोया-धोया, उसे इन्‍होंने दो सौ रुपये निकालकर दे दिए। जग्‍गे की घरवाली का बाप आया। उसे भी इन्‍होंने पैसे दिए। मैंने इनसे कहा, 'जी, मामला रफा-दफा हो गया है, अब ये हमारे क्‍या लगते हैं, तुम पैसे लुटा रहे हो।' पर नहीं, ये कहने लगे, 'जग्‍गे ने दस साल तक हमारी सेवा की है। इसे हम कैसे भूल सकते हैं।' कहने लगे, 'सौ-पच्‍चास दे दो, तो गरीब का मुँह बंद हो जाता है।' ये सबका भला सोचते हैं, किसी का बुरा नहीं सोचते। हर किसी की मदद ही करेंगे।

यह जरा घंटी तो बजाना। मुए जानते भी हैं, रात पड़ गई है, मगर मजाल है, जो अपने-आप आकर बत्ती जलाएँ। बार-बार घंटी बजानी पड़ती है। कानों में तेल डाले पड़े रहते हैं। अब आई हो, तो खाना खाकर जाना। ये जाने कब लौटेंगे। कभी दस बजे आते हैं, कभी खाना खाकर आते हैं। मैं दिन-भर अकेली बैठी कौव्‍वे उड़ाती रहती हूँ। अब खाना खाए बिना तो मैं तुम्‍हें जाने ही नहीं दूँगी। तुम आ गईं, तो घड़ी-भर दिल बहल गया। हमने अपनी बातें तो अभी तक की ही नहीं। दोनों बैठी बातें करेंगी। तुमने साग-मीट का पूछा तो बीच में मुए जग्‍गे की बात चल पड़ी। मैं तुम्‍हें खाना खाए बिना तो जाने नहीं दूँगी...