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Friday, September 18, 2020

खोई हुई दिशाएँ - कमलेश्वर (Khoi Hui Dishayen by Kamleshwar)


सड़क के मोड़ पर लगी रेलिंग के सहारे चंदर खड़ा था। सामने, दाएँ-बाएँ आदमियों का सैलाब था। शाम हो रही थी और कनॉट प्लेस की बत्तियाँ जगमगाने लगी थीं। थकान से उसके पैर जवाब दे रहे थे। कहीं दूर आया-गया भी तो नहीं, फिर भी थकान सारे शरीर में भरी हुई थी। दिल और दिमाग इतना थका हुआ था कि लगता था, वही थकान धीरे-धीरे उतरकर तन में फैलती जा रही है। 


पूरा दिन बरबाद हो गया। यही खड़ा सोच रहा था। घर लौटने को भी मन नहीं कर रहा था। आती-जाती एक-सी औरतों को देखकर मन और भी ऊबने लगता था। 


भूख...पता नहीं लगी है या नहीं। वह दिमाग पर ज़ोर डालता है–सवेरे आठ बजे घर से निकला था। एक प्याली कॉफी के अलावा तो कुछ पेट में गया नहीं।...और तब उसे अहसास हुआ कि थोड़ी-थोड़ी भूख लग रही है। दिमाग और पेट का साथ ऐसा हो गया है कि भूख भी सोचने से लगती है। 


निगाह दूर आसमान पर अटक जाती है, जहाँ चीलें उड़ रही हैं और मोज़े की शक्ल में कटा हुआ आसमान दिखाई दे रहा है। उस गंदले आसमान के नीचे जामा मस्जिद का गुम्बद और मीनार दिखाई पड़ रही है, उनकी नोंकें बड़ी अजीब-सी लग रही हैं।


पीछेवाली दुकान के बाहर चोलियों का विज्ञापन है। रीगल बस स्टॉप के नीम के पेड़ों से धीरे-धीरे पत्तियाँ झड़ रही हैं। बसें जूं-जूं करती आती हैं–एक क्षण ठिठकती हैं–एक ओर से सवारियों को उगलती हैं और दूसरी ओर से निगलकर आगे बढ़ जाती हैं। चौराहे पर बत्तियाँ लगी हैं। बत्तियों की आँखें लाल-पीली हो रही हैं। आस-पास से सैकड़ों लोग गुज़रते हैं, पर कोई उसे नहीं पहचानता। हर आदमी या औरत लापरवाही से दूसरों को नकारता या झूठे दर्प में डूबा हुआ गुज़र जाता है। 


और तब उसे अपना वह शहर याद आता है जहाँ से तीन साल पहले वह चला आया था–गंगा के सुनसान किनारे पर भी अगर कोई अनजान मिल जाता तो उसकी नज़रों में पहचान की एक झलक तैर जाती थी। 


और यह राजधानी ! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है...पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। 


तमाम सड़कें हैं जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचातीं। उन सड़कों के किनारे घर हैं, बस्तियाँ हैं, पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। उन घरों के बाहर फाटक हैं, जिन पर कुत्तों से सावधान रहने की चेतावनी है, फूल तोड़ने की मनाही है और घण्टी बजाकर इंतज़ार करने की मज़बूरी है। 


...घर पर निर्मला इंतज़ार कर रही होगी। वहाँ पहुँचकर भी पहले मेहमान की तरह कुर्सी पर बैठना होगा, क्योंकि बिस्तर पर कमरे का पूरा सामान सजा होगा और वह हीटर पर खाना पका रही होगी। उन्मुक्त होकर वह हवा के झोंके की तरह कमरे में घुस भी नहीं सकता और न उसे बांहों में लेकर प्यार ही कर सकता है, क्योंकि गुप्ताजी अभी मिल से लौटे नहीं होंगे और मिसेज गुप्ता बेकारी में बैठी गप लड़ा रही होंगी या किसी स्वेटर की बुनाई सीख रही होंगी। अगर वह चला भी गया तो कमरे में बहुत अदब से घुसेगा, फिर मिसेज गुप्ता से इधर-उधर की दो-चार बातें करेगा। तब बीवी खाना खाने की बात कहेगी। और खाने की बात सुनकर मिसेज गुप्ता घर जाने के लिए उठेंगी... 


और फिर उसके बाद बड़ी खिड़की का परदा खिसकाना पड़ेगा। किसी बहाने खुराना की तरफ वाली खिड़की को बंद करना पड़ेगा। घूमकर मेज़ के पास पहुँचना होगा और तब पानी का एक गिलास मांगने के बहाने वह पत्नी को बुलाएगा, और तब उसे बांहों में लेकर प्यार से यह कह सकने का मौका आएगा–‘बहुत थक गया हूँ।’ 


लेकिन ऐसा होगा नहीं। इतनी लम्बी प्रक्रिया से गुज़रने के पहले ही उसका मन झुँझला उठेगा और यह कहने पर मज़बूर हो जाएगा, ‘‘अरे भई, खाने में कितनी देर है,’’ सारा प्यार और समूची पहचान न जाने कहाँ छिप चुकी होगी, अजीब-सा बेगानापन होगा। बेकरीवालों के यहाँ भर्रायी आवाज़ में रेडियो गा रहा होगा और गुलाटी के थके कदमों की खोखली आवाज़ जीने पर सुनाई पड़ेगी। 


गली में कोई स्कूटर आकर रुकेगा और उसमें से कोई बिन-पहचाना आदमी किसी और के घर में चला जाएगा। मोटरों की मरम्मत करने वाले गैरेज का मालिक सरदार चाबियाँ लेकर घर जाने के इंतज़ार में आधी रात तक बैठा रहेगा क्योंकि उसे पन्द्रह साल पुराने मेकैनिक पर भी शायद विश्वास नहीं है। 


और सामने रहनेवाले बिशन कपूर के आने की आहट-भर मिलेगी। पिछले दो साल से उसने सिर्फ उसके नाम की प्लेट देखी है–बिशन कपूर, जर्नलिस्ट और उसकी शक्ल के बारे में वह सिर्फ यह जानता है कि सामने वाली खिड़की से जब बिजली की रोशनी छनने लगती है और सिगरेट का धुआँ सलाखों से लिपट-लिपटकर बाहर के अंधेरे में डूब जाता है तो बिशन कपूर नाम का एक आदमी भीतर होता है और सुबह जब उसकी खिड़की के नीचे अंडे का छिलका, डबलरोटी का रैपर और जली हुई सिगरेटें, तीलियाँ और राख बिखरी हुई होती हैं तो बिशन कपूर नाम का आदमी जा चुका होता है।


सोचते-सोचते उसे लगा कि मोज़े की बदबू और भी तेज होती जा रही है और अब रेलिंग के पास खड़ा रहना मुश्किल है। जेब से डायरी निकालकर उसने अगले दिन की मुलाकातों के बारे में जान लेना चाहा। 


...अंग्रेज़ी दैनिक में पहले फोन करना है फिर समय तय करके मिलना है। रेडियो में एक चक्कर लगाना है। पिछला चेक रिज़र्व बैंक से कैश कराना है और घर एक मनीअॉर्डर भेजना है। कल का पूरा वक्त भी इसी में निकल जाएगा, क्योंकि अखबार का सम्पादक परिचित नहीं है जो फौरन बुला ले और खुलकर बात कर ले और कोई बात तय हो जाए। रेडियो में भी कोई बात दस मिनिट में तय नहीं हो सकती और रिजर्व बैंक के काउंटर पर इलाहाबाद वाला अमरनाथ नहीं है जो फौरन चेक लेकर रुपया ला दे। डाकखाने पर व्यापारियों के चपरासियों की भीड़ होगी जो दस-दस मनीऑर्डर के फार्म लिए लाइन में खड़े होंगे और एक कागज़ पर पूरी रकम और मनीऑर्डर कमीशन का मीज़ान लगाने में मशगूल होंगे। उनमें से कोई भी उसे नहीं पहचानता होगा। 


एक क्षण की जान-पहचान का सिलसिला सिर्फ पेन होगा, जो कोई-न-कोई दो हरफ लिखने के लिए मांगेगा और लिख चुकने के बाद अपना खत पढ़ते हुए वह बाएं हाथ से उसे कलम लौटाकर शायद धीरे से थैंक्यू कहेगा और टिकट वाले काउंटर की ओर बढ़ जाएगा। 


और तब उसे झुंझलाहट-सी हुई। डायरी हाथ में थी और उसकी निगाहें फिर दूर की ऊँची इमारत पर अटक गई थीं, जिस पर बिजली के मुकुट जगमगा रहे थे और उन नामों में से वह किसी को नहीं जानता था। इलाहाबाद में सबसे बड़े कपड़ेवाले के बारे में इतना तो मालूम था कि पहले वह बहुत गरीब था और कंधे पर कपड़ा रखकर फेरी लगाता था और अब उसका लड़का विदेश पढ़ने गया हुआ है और वह खुद बहुत धार्मिक आदमी है, जो अब माथे पर छापा-तिलक लगाकर मनमाना मुनाफा वसूल करता है और कॉर्पोरेशन का चुनाव लड़ने की तैयारियाँ कर रहा है। यहाँ कुछ भी पता नहीं चलता, किसी के बारे में कुछ भी मालूम नहीं पड़ता। 


कनॉट प्लेस में खुले हुए लॉन हैं। तनहा पेड़ हैं और उन दूर-दूर खड़े तनहा पेड़ों के नीचे नगर निगम की बेंचें हैं, जिन पर थके हुए लोग बैठे हैं और लॉन में एकाध बच्चे दौड़ रहे हैं। बच्चों की शक्लें और शरारतें तो बहुत पहचानी-सी लगती हैं, पर गोलगप्पे खाती हुई उनकी मम्मी अजनबी है, क्योंकि उसकी आँखों में मासूमियत और गरिमा से भरा प्यार नहीं है। उसके शरीर में मातृत्व का सौन्दर्य और दर्प भी नहीं है, उसमें सिर्फ एक खुमार है और एक बहुत बेमानी और पिटी हुई ललकार है, जिसे न तो नकारा जा सकता है और न स्वीकार किया जा सकता है–वह ललकार सब कानों में गूंजती है और सब बहरों की तरह गुज़र जाते हैं। 


लॉन पर कुछ क्षण बैठने को मन हुआ पर उसे लगा कि वहाँ भी कोई ठिकाना नहीं, अभी कल ही तो चोर की तरह दबे पांव घास में बहता हुआ पानी आया था और उसके कपड़े भीग आए थे। 


तनहा खड़े पेड़ों और उनके नीचे सिमटते अँधेरे में अजीब-सा खालीपन है। तनहाई ही सही पर उसमें अपनापन तो हो। वह तनहाई भी किसी की नहीं है क्योंकि हर दस मिनट बाद पुलिस का आदमी उधर से घूमता हुआ निकल जाता है। झाड़ियों की सूखी टहनियों में आइसक्रीम के खाली कागज़ और चने की खाली पुड़ियाँ उलझी हुई हैं या कोई बेघरबार आदमी शराब की खाली बोतल फेंककर चला गया है। 


डायरी पर फिर उसकी नज़र जम जाती है,...और शोर-शराबे से भरे उस सैलाब में वह बहुत अकेला-सा महसूस करता है और लगता है कि इन तीन सालों में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जो उसका अपना हो, जिसकी कचोट अभी तक हो, खुशी या दर्द अब भी मौज़ूद हो, रेगिस्तान की तरह फैली हुई तनहाई है, अनजान सागर तटों की खामोशी और सूनापन है और पछाड़ खाती हुई लहरों का शोर-भर है, जिससे वह खामोशी और भी गहरी होती है। 


मोज़े की शक्ल में कटा हुआ आसमान है और जामा मस्जिद के गुम्बद के ऊपर चक्कर काटती हुई चीलें हैं। औरतों का पीछा करते हुए फूल बेचने वाले और यतीम बच्चों के हाथ में शाम की खबरों के अखबार हैं। 


...और तभी चंदर को लगा कि एक अरसा हो गया, एक ज़माना गुज़र गया, वह खुद अपने से नहीं मिल पाया। अपने से बातें करने का वक्त ही नहीं मिला। यह भी नहीं पूछा कि आखिर तेरा हाल-चाल क्या है और तुझे क्या चाहिए ! हल्की-सी मुसकराहट उसके होंठों पर आई और उसने हर शुक्रवार के आगे नोट किया–खुद से मिलना है। शाम सात बजे से नौ बजे तक।’ ...और आज भी तो शुक्रवार ही है। यह मुलाकात आज होनी चाहिए। घड़ी पर नज़र जाती है, सात बजा है। पर मन का चोर हावी हो जाता है। क्यों न पहले टी-हाउस में एक प्याला चाय पी ली जाए ? न जाने क्यों मन अपने से मिलने में घबराता है। रह-रहकर कतराता है। 


तभी उस पार से आता हुआ आनन्द दिखाई देता है। वह उससे भी नहीं मिलना चाहता। बड़ा बुरा मर्ज़ है आनन्द को। वह उस छूत से बचा रहना चाहता है। आनन्द दुनिया में दोस्त खोजता है, ऐसे दोस्त जो ज़िन्दगी में गहरे न उतरें पर उसके साथ कुछ देर रह सकें और बात कर सकें। उसकी बातों में अजीब-सा बनावटीपन है, वह बनावटीपन जो आदमी किताबों से सीखता है। और उसे लगता है कि वही बनावटीपन खुद उसमें भी कहीं-न-कहीं है...जब कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दर्जों में बैठ-बैठकर वह किताबों से ज़िन्दगियों के मरे हुए ब्योरे पढ़ रहा था। 


और अब आज उसे लगता है कि वह सारा वक्त बड़ी बेरहमी से बरबाद किया गया है। उसने उन खंडहरों में समय बरबाद किया है जिनकी कथाएं अधपढ़े गाइडों की जबान पर रहती हैं, जो हर बार उन मरी हुई कहानियों को हर दर्शक के सामने दोहराते जाते हैं–यह दीवानेखास है, ज़रा नक्काशी देखिए–यहाँ हीरे जवाहरातों से जड़ा सिंहासन था, यह जनाना हमाम है और यह वह जगह है जहाँ से बादशाह अपनी रिआया को दर्शन देते थे, यह महल सर्दियों का है, यह बरसात का और यह हवादार महल गरमियों का और इधर आइए संभल के, यह वह जगह है जहाँ फांसी दी जाती थी। 


चंदर को लगा, ज़िन्दगी के पचीस साल वह उन गाइडों के साथ खंडहरों में बिताकर आया है जिनकी जीवन्त कथाओं को वह कभी नहीं जान पाया, सिर्फ दीवाने-खास उसे दिखाया गया, नक्काशी दिखाई गई और जनाने हमाम में घुमाकर गाइड ने उसे फांसी वाले अंधेरे और बदबूदार कमरे में छोड़ दिया, जहाँ चमगादड़ लटके हुए बिलबिला रहे हैं और एक बहुत पुरानी ऐतिहासिक रस्सी लटक रही है जिसका फंदा गरदन में कस जाता है और आदमी झूल जाता है। और उसके बाद अन्धे कुएँ में फेंकी गई सिर्फ वे लाशें रह जाती हैं। 


उसमें और उनमें कोई अंतर नहीं है। 


और आनन्द भी उनसे अलग नहीं है। चंदर कतरा जाना चाहता था, क्योंकि आनन्द आते ही किताबी तरीके से कहेगा, ‘‘यार, तुम्हारे बाल बहुत खूबसूरत हैं, ब्रिलक्रीम लगाते हो ? लड़कियाँ तो तबाह हो जाती होंगी।’’ 


और तभी चंदर को सामने पाकर आनन्द रुक जाता है, ‘‘हलो, यहाँ कैसे ? क्यों लड़कियों पर जुल्म ढा रहे हो।’’ सुनकर उसे हँसी आ जाती है। 


‘‘किधर से आ रहे हो ?’’ डायरी जेब में रखते हुए पूछता है। 


‘‘आज तो यूं ही फंस गए, आओ एक प्याली कॉफी हो जाए।’’ आनन्द कहता है, फिर एक क्षण रुककर वह दूसरी बात सुझाता है, ‘‘या और कुछ...’’ 


चंदर इसका मतलब समझकर न कर देता है। वह ज़ोर देता है, ‘‘चलो फिर आज तो हो ही जाए, क्या रखा है इस ज़िन्दगी में !’’ कहते हुए वह झूठी हँसी हँसता है और धीरे से हाथ दबाकर पूछता है, ‘‘प्लीज़ इफ यू डोण्ट माइण्ड, कुछ पैसे हैं ?’’ उसके कहने में कोई हिचक नहीं है और न उसे शरम ही आती है। बड़ी सीधी-सी बात है, पैसे कम हैं। 


‘‘अच्छा पार्टनर, मैं अभी इंतज़ाम करके आया,’’ वह विश्वास को गहराता हुआ कहता, ‘‘यहीं रुकना, चले मत जाना।’’ और वह जाता है तो फिर नहीं आता। 


चंदर यह पहले से जानता है। 


कुछ देर बाद वह टी-हाउस में घुस जाता है और मेज़ों के पास चक्कर काटता हुआ कोने वाले काउंटर से सिगरेट का पैकेट लेकर एक मेज़ पर जम जाता है। 


‘‘हलो !’’ कोई एक अधजाना चेहरा कहता है, ‘‘बहुत दिनों बाद इधर आना हुआ।’’ और वह भी वहीं बैठ जाता है। दोनों के पास बात करने के लिए कुछ भी नहीं है। 


टी-हाउस में बेपनाह शोर है। खोखली हँसी के ठहाके हैं और दीवार पर एक घड़ी है जो हमेशा वक्त से आगे चलती है। तीन रास्ते बाहर से आने और जाने के लिए हैं और चौथा रास्ता बाथरूम जाता है। बाथरूम के पॉट्स में फिनाइल की गोलियाँ पड़ी हैं और गैलरी में एक शीशा लगा हुआ है। हर वह आदमी जो बाथरूम जाता है, उस शीशे में अपना मुँह देखकर लौटता है। 


गेलार्ड में डिनर डांस की तैयारी हो रही है। कुर्सियों की तीन कतारें बाहर निकालकर रख दी गई हैं। उधर वोल्गा पर विदेशियों की भीड़ बढ़ रही होगी। 


और तभी एक जोड़ा भीतर आता है। महिला सजी-धजी है और जूड़े में फूल भी हैं। आदमी के चेहरे पर अजीब-सा गरूर है और वे दोनों फैमिली वाली सीट पर आमने-सामने बैठ जाते हैं। बैठने से पहले उनमें कोई ताल्लुक नज़र नहीं आ रहा था। सिर्फ इतना-भर कि जब महिला बैठने के लिए मुड़ी थी तो साथ वाले आदमी ने उसकी कमर पर हाथ रखकर सहारा-भर दिया था। इतना-सा साथ था दोनों में। 


उनके पास भी बात करने के लिए शायद कुछ नहीं है। 


महिला अपना जूड़ा ठीक करते हुए औरों को देख रही है और साथ वाला आदमी पानी के गिलास को देख रहा है। किसी के देखने में कोई मतलब नहीं है। आँखें हैं, इसलिए देखना पड़ता है। अगर न होतीं तो सवाल ही नहीं था। एक जगह देखते-देखते आँखों में पानी आ जाता है–इसलिए ज़रूरी है कि इधर-उधर देखा जाए। 


बेयरा उनकी मेज़ पर सामान रख जाता है और दोनों खाने में मशगूल हो जाते हैं। कोई बात नहीं करता। आदमी खाना खा के दाँत कुरेदने लगता है और वह महिला रूमाल निकालकर अंदाज़ से लिपस्टिक ठीक करती है। 


अंत में बेयरा आकर पैसे लौटाता है तो आदमी कुछ टिप छोड़ता है, जिसे महिला गौर से देखती है और दोनों लापरवाही से उठ खड़े होते हैं। फिर उन दोनों में हल्का-सा सम्बन्ध उसे नज़र आता है–वह आदमी ठिठककर साथ वाली महिला को आगे निकलने का इशारा करता है और उसके पीछे-पीछे चला जाता है। 


चंदर का मन और भारी हो जाता है। अकेलेपन का नागपाश और भी कस जाता है। अपने साथ बैठे हुए अनजान दोस्त की तरफ वह गहरी नज़रों से देखता है और सोचता है, अजनबी ही सही, पर इसने पहचाना तो। इतनी पहचान भी बड़ा सहारा देती है...चंदर को अपनी ओर देखते हुए वह साथ वाला दोस्त कुछ कहने को होता है पर जैसे उसे कुछ याद नहीं आता, फिर अपने को संभालकर उसने चंदर से पूछा, ‘‘आप...आप तो शायद कॉमर्स मिनिस्ट्री में हैं। मुझे याद पड़ता है कि...’’ कहते हुए वह रुक जाता है। 


चंदर का पूरा शरीर झनझना उठता है और एक घूंट में बची हुई कॉफी पीकर वह बड़े संयत स्वर में जवाब देता है, ‘‘नहीं, मैं कॉमर्स मिनिस्ट्री में कभी नहीं था...’’ 


वह आदमी आगे अटकलें भिड़ाने की कोशिश नहीं करता, सीधे-सीधे उस अनजान सम्बन्ध को मजबूत बनाते हुए कहता है, “ऑल राइट पार्टनर, फिर कभी मुलाकात होगी।’’ और सिगरेट सुलगाता हुआ उठ जाता है। 


चंदर बाहर निकलकर बस-स्टॉप की ओर बढ़ता है। मद्रास होटल के पीछे बस-स्टॉप पर चार-पांच लोग खड़े हैं और पुलिस वाला स्टॉप की छतरी के नीचे बैठा सिगरेट पी रहा है। 


चंदर वहीं आकर खड़ा हो जाता है। सब जानना चाहते हैं कि बस कब तक आएगी, पर कोई किसी से कुछ भी नहीं पूछता। पेड़ के अंधेरे में वह चुपचाप खड़ा है। नीचे पीले पत्ते पड़े हैं, जो उसके पैरों से दबकर चुरमुराने लगते हैं और पीले पत्तों की वह आवाज़़ उसे वर्षों पीछे खींच ले जाती है। इस आवाज़़ में एक बहुत गहरा अपनापन है, उसे बड़ी राहत-सी मिलती है। 


...ऐसे ही पीले पत्ते पड़े हुए थे। उस राह पर बहुत साल पहले इंद्रा के साथ एक दिन वह चला जा रहा था, कुछ भी नहीं था उसके सामने, वह खंडहरों में अपनी ज़िन्दगी खराब कर रहा था और तब इंद्रा ने ही उससे कहा था, ‘‘चंदर, तुम क्या नहीं कर सकते।’’ वही पहचानी हुई आवाज़ फिर उसके कानों से टकराती है, ‘‘तुम क्या नहीं कर सकते।’’ और यह कहते-कहते इंद्रा की आँखों में अदम्य विश्वास झलक आया था। 


और इंद्रा की उन प्यार-भरी आँखों में झाँकते हुए उसने कहा था, ‘‘मेरे पास है ही क्या? समझ में नहीं आता कि ज़िन्दगी कहाँ ले जाएगी इंद्रा ! इसीलिए मैं यह नहीं चाहता कि तुम अपनी ज़िन्दगी मेरी खातिर बिगाड़ लो। पता नहीं, मैं किस किनारे लगूँ, भूखा मरूँ या पागल हो जाऊंँ...’’ 


इंद्रा की आँखों में प्यार के बादल और गहरे हो आए थे और उसने कहा था, ‘‘ऐसी बातें क्यों करते हो चंदर, मैं तुम्हारे साथ हर हालत में सुखी रहूँगी !’’ 


चंदर ने उसे बहुत गौर से देखा था। इंद्रा की आँखों में नमी आ गई थी। उसकी कँटीली बरौनियों से विश्वास-भरी मासूमियत झलक रही थी। माथे पर आई हुई लट छूने को उसका मन हो आया था पर वह झिझककर रह गया था। इंद्रा के कानों में पड़े हुए कुण्डल पानी में तैरती मछलियों की तरह झलक जाते थे और तब उसने कहा था, ‘‘आओ, उधर पेड़ के नीचे बैठेंगे।’’ 


वे दोनों साथ-साथ चल दिए थे। सिरस के पेड़ के नीचे एक सीमेण्ट की बेंच बनी थी। राह पर पीली पत्तियाँ बिखरी हुई थीं। उनके कुचलने से ऐसी ही आवाज़़ आई थी जो अभी-अभी उसने सुनी थी...वही पहचान-भरी आवाज़। 


दोनों बेंच पर बैठ गए थे और चंदर धीरे से उसकी कलाई पर अंगुली से लकीरें खींचने लगा था। दोनों खामोश बैठे थे, बहुत-सी बातें थीं जो वे कह नहीं पा रहे थे। कुछ क्षणों बाद इंद्रा ने आँखें चुराते हुए उसे देखा था और शरमा गई थी, फिर उसी बात पर आ गई थी जैसे उसी एक बात में सारी बातें छिपी हों, ‘‘तुम ऐसा क्यों सोचते हो चंदर, मुझ पर भरोसा नहीं ?’’ 


तब चंदर ने कहा था, ‘‘भरोसा तो बहुत है इंद्रा, पर मैं खानाबदोशों की तरह ज़िन्दगी-भर भटकता रहूँगा...उन परेशानियों में तुम्हें खींचने की बात सोचता हूँ तो बरदाश्त नहीं कर पाता। तुम बहुत अच्छी और सुविधाओं से भरी ज़िन्दगी जी सकती हो। मैंने तो सिर पर कफन बाँधा है...मेरा क्या ठिकाना !’’ ‘‘


तुम चाहे जो कुछ बनो चंदर, अच्छे या बुरे, मेरे लिए एक-से रहोगे। कितना इंतज़ार करती हूँ तुम्हारा, पर तुम्हें कभी वक्त ही नहीं मिलता।’’ फिर कुछ देर मौन रहकर उसने पूछा था, ‘‘इधर कुछ लिखा ?’’ 


‘‘हाँ,’’ धीरे से चंदर ने कहा था। 

‘‘दिखाओ।’’ इंद्रा ने मांगा था। 


और तब चंदर ने पसीजे हुए हाथों से डायरी बढ़ा दी थी। इंद्रा ने तुरन्त उस डायरी को अपनी किताबों में रख लिया था और बोली थी, ‘‘अब यह कल मिलेगी, इस बहाने तो अब आओगे...’’ 


‘‘नहीं, नहीं...मैं डायरी अपने साथ ले जाऊँगा, मुझे वापस दो।’’ चंदर ने कहा था तो इंद्रा शैतानी से मुस्कराती रही थी और उसकी आँखों में प्यार की गहराइयाँ और बढ़ गई थीं।


हारकर चंदर वापस चला आया था और दूसरे दिन अपनी डायरी लेने पहुँचा था तो इंद्रा ने कहा था, ‘‘इसमें कुछ मैंने भी लिखा है, पढ़कर ज़रूर फाड़ देना।’’ 


‘‘मैं नहीं फाड़ूँगा।’’ 


‘‘तो कुट्टी हो जाएगी।’’ इंद्रा ने बच्चों की तरह बड़ी मासूमियत से कहा था और उस वक्त उसके मुँह से वह बेहद बचपने की बात भी बड़ी अच्छी लगी थी। 


और एक दिन... 


एक दिन इंद्रा घर आई थी। इधर-उधर से घूम-घामकर वह चंदर के कमरे में पहुँच गई थी और तब चंदर ने पहली बार उसे बिलकुल अपने पास महसूस किया था और उसके माथे पर रंग से बिन्दी बना दी थी और कई क्षणों तक मुग्ध-सा देखता रह गया था। और अनजाने ही उसने होंठ इंद्रा के माथे पर रख दिए थे। इंद्रा की पलकें झँप गई थीं और रोम-रोम से गंध फूट उठी थी। उसकी अँगुलियाँ चंदर की बाँहों पर थरथराने लगी थीं और माथे पर आया पसीना उसके होंठों ने सोख लिया था। रेशमी रोएँ पसीने से चिपक गए थे और उन उन्माद के क्षणों में दोनों ने ही प्रतिज्ञा की थी...वह प्रतिज्ञा जिसमें शब्द नहीं थे, जो होंठों तक भी नहीं आई थी! 


तब से उसे ये शब्द हमेशा याद रहते हैं, ‘तुम क्या नहीं कर सकते।’ 


और तभी एक दूसरे नम्बर की बस आती है और ठिठककर चली जाती है। चंदर को अहसास होता है कि वह बस-स्टॉप पर खड़ा है, वह गहरी पहचान... कहीं कोई तो है ...और वह बहुत दूर भी तो नहीं। 


इंद्रा भी तो यहीं है दिल्ली में... 


दो महीने पहले ही तो वह मिला था। तब भी इंद्रा की आँखों में वह चार बरस पहले की पहचान थी और उसने पति से किसी बात पर कहा था, ‘‘अरे, चंदर की आदतें मैं खूब जानती हूँ।’’ 


और इंद्रा के पति ने बड़े खुले दिल से कहा था, ‘‘तो फिर भई, इनकी खातिर-वातिर करो...’’ 

और इंद्रा ने मुस्कराते हुए चार बरस पहले की तरह चिढ़ाने के अंदाज़ में बयान किया था, ‘‘चंदर को दूध से चिढ़ है और कॉफी इन्हें धुआँ पीने की तरह लगती है, चाय में अगर दूसरा चम्मच चीनी डाल दी गई तो इनका गला खराब हो जाएगा।’’ कहकर वह खिलखिलाकर हँस दी थी और इस बात से उसने पिछली बातों की याद ताजी कर दी थी ...सचमुच चंदर दो चम्मच चीनी नहीं पी सकता।


बस आने का नाम नहीं ले रही थी। 


खड़े-खड़े चंदर को लगा कि इस अनजानी और बिन जान-पहचान से भरी नगरी में एक इंद्रा है जो उसे इतने सालों के बाद भी पहचानती है, अब तक जानती है। उसका मन अपने-आप इंद्रा से मिलने के लिए छटपटाने लगा, ताकि यह अजनबीपन किसी तरह टूट सके... 


तभी एक फटफटवाला आवाज़ लगाता हुआ आ जाता है, गुरद्वारा रोड... करोलबाग गुरद्वारा रोड ! चंदर एक कदम आगे बढ़ता है और वह सरदार उसे देखते ही जैसे एकदम पहचान जाता है, ‘‘आइए बाबूजी, करोलबाग गुरद्वारा रोड।’’ उसकी आँखों में पहचान की झलक देखकर चंदर का मन हलका हो जाता है। आखिर एक ने तो पहचाना। चंदर सरदार को पहचानता है, बहुत बार वह इसी सरदार के फटफट में बैठकर कनॉट प्लेस आया है। 


आँखों में पहचान देखते ही चंदर लपककर फटफट पर बैठ जाता है। तीन सवारियाँ और आ जाती हैं और दस मिनट बाद ही गुरुद्वारा रोड के चौराहे पर फटफट रुकता है। चंदर एक चवन्नी निकालकर सरदार की हथेली पर रख देता है और पहचान-भरी नज़रों से उसे देखता हुआ चलने लगता है। 


तभी पीछे से आवाज़ आती है, ‘‘ऐ बाबूजी, कितना पैसा दिया है ?’’ चंदर मुड़कर देखता है तो सरदार उसकी तरफ आता हुआ कहता है, ‘‘दो आना और दीजिए साहब !’’ 


‘‘हमेशा चार आने लगते हैं सरदारजी ?’’ चंदर पहचान जताता हुआ कहता है, पर सरदार की आँखों में पहचान की परछाईं तक नहीं है। वह फिर कहता है, ‘‘सरदार जी, आपके फटफट पर ही बीसों बार चार आने देकर आया हूँ।’’


‘‘किसी होर ने लये होणगे चार आने...असी ते छै आने तों घट नहीं लेंदे बादशाहो !’’ सरदार इस बार पंजाबी में बोला था और उसकी हथेली फैली हुई थी। 


बात दो आने की नहीं थी। चंदर ने बाकी पैसे उसकी हथेली पर रख दिए और इंद्रा के घर की तरफ मुड़ गया। 


और इंद्रा उसे मिली तो वैसे ही। वह अपने पति का इंतज़ार कर रही थी। बड़ी अच्छी तरह उसने चंदर को बैठाया और बोली, ‘‘इधर कैसे भूल पड़े आज ?’’ फिर आँखों में वही पहचान की परछाईं तैर गई थी। कुछ क्षणों बाद इंद्रा ने कहा था, ‘‘अब तो नौ बज रहे हैं, ये आठ ही बजे फैक्ट्री बन्द करके लौट आते हैं, पता नहीं आज क्यों देर हो गई, अच्छा चाय तो पियोगे ?’’ 


‘‘चाय के लिए इनकार तो नहीं की जा सकती।’’ चंदर ने बड़े उत्साह से कहा था और कुरसी पर आराम से टाँगें फैलाकर बैठ गया था। उसकी सारी थकान उतर गई थी और मन का अकेलापन डूब गया था। 


नौकरानी आकर चाय रख गई। इंद्रा ने प्याले सीधे करके चाय बनाई तो वह उसकी बाँहों, चेहरे और हाथों को देखता रहा। सब कुछ वही था, वैसा ही था...चिर-परिचित, तभी इंद्रा ने पूछा, ‘‘चीनी कितनी दूँ?’’ 


और एक झटके से सब कुछ बिखर गया, उसका गला सूखने-सा लगा और शरीर फिर थकान से भारी हो गया। माथे पर पसीना आ गया। फिर भी उसने पहचान का रिश्ता जोड़ने की एक नाकाम कोशिश की और बोला, ‘‘दो चम्मच।’’ और उसे लगा कि अभी इंद्रा को सब कुछ याद आ जाएगा और वह कहेगी कि दो चम्मच चीनी से अब गला खराब नहीं होता ?


पर इंद्रा ने प्याले में दो चम्मच चीनी और डाल दी और उसकी और बढ़ा दिया। ज़हर के घूँटों की तरह वो चाय पीता रहा। इंद्रा इधर-उधर की बातें करती रही पर उनमें उसे मेहमानबाजी की बू लग रही थी और चन्दर का मन कर रहा था कि इंद्रा के पास से किसी भी तरह भाग जाए और किसी दीवार पर अपना सिर पटक दे। 


जैसे-तैसे उसने चाय पी और पसीना पोंछता हुआ बाहर निकल आया। इंद्रा ने क्या-क्या बातें कहीं, उसे बिलकुल याद नहीं। 


सड़क पर निकलकर वह एक गहरी साँस लेता है और कुछ क्षणों के लिए खड़ा रह जाता है। उसका गला बुरी तरह सूख रहा है और मुँह का स्वाद बेहद बिगड़ा हुआ है। 


चौराहे पर कुछ टैक्सी ड्राइवर नशे में गालियाँ बक रहे हैं और एक कुत्ता दूर सड़क पर भगा चला जा रहा है। मछलियाँ तलने की गंध यहाँ तक आ रही है और पान वाले की दूकान पर कुछ जवान लोग कोकोकोला की बोतलें मुँह में लगाए खड़े हैं। स्कूटरों में कुछ लोग भागे जा रहे हैं।। और शहर से दूर जाने वाले लोग बस-स्टॉप पर खड़े अब भी प्रतीक्षा कर रहे है।  


कारें, टैक्सियां, बसें और स्कूटर आ-जा रहे हैं।  चौराहे पर लगी बत्तियों की आँखें अब भी लाल-पीली हो रही हैं। 


चन्दर थका-सा अपने घर की और लौट रहा है। अँगुलियों पर जूता काट रहा है और मोज़े की बदबू और भी तेज़ हो गयी है। 


आखिर वह थका-हारा घर पँहुचता है और मेहमान की कुर्सी पर बैठ जाता है। यह कोई नयी बात नहीं है।  निर्मला उसे देखकर मुस्कुराती है और धीरे से बाँहों पर हाथ रखकर पूछती है, "बहुत थक गए?"


"हाँ।" चन्दर कहता है और उसे बहुत प्यार से देखता है। उसका मन भीतर से उमड़ पड़ता है। वह किराये का मकान भी उस क्षण उसे राहत देता है और लगता है कि वह उसी का है। 


निर्मला खाना लगते हुए कहती है, "हाथ-मुँह धोलो... "


"अभी खाने का मन नहीं है। " चन्दर कहता है तो वह बहुत प्यार से देखते हुए पूछती है, "क्यों, क्या बात है, सुबह भी तो खाके नहीं गए थे, दोपहर में कुछ खाया था?"


"हाँ।" वह कहता है और निर्मला को देखता रह जाता है। 


निर्मल कुछ अचकचाती है और कुछ देर बाद थकी-सी उसके पास बैठ जाती है। 


चन्दर कुछ देर खोई-खोई नज़रों से कमरे की हर चीज़ को देखता रहता है और बीच बीच में बड़ी गहरी नज़रों से निर्मला को ताकता है। निर्मला कोई किताब खोलकर पढ़ने लगती है और चन्दर उसे देखे जा रहा है। 


पीछे से पड़ती हुई रौशनी में निर्मला के बल रेशम की तरह चमक रहे हैं, उसकी बरौनियाँ मुलायम काँटों की तरह लग रही हैं और कनपटी के पास रेशमी बालों के सिरे अपने-आप घूम गए हैं। पलक के नीचे पड़ती हुई परछाईं बहुत पहचानी-सी लग रही है। उसने कड़ा आधी कलाई तक सरका लिया है। 


चन्दर की निगाहें उसके अंग-प्रत्यंग में पुरानी पहचान खोज रही हैं, उसके नाख़ून, अंगुलियाँ और कानों की गुदारी लबें...


उठकर वह परदे खींच देता है और आराम से लेट जाता है। उसे लगता है कि वह अकेला नहीं है। अजनबी और तनहा नहीं है।  सामने वाला गुलदस्ता उसक अपना है, पड़े हुए कपडे उसके अपने हैं, उनकी गंध वह पहचानता है। 


इन सभी चीज़ों में एक गहरी पहचान है। घोर अँधेरी रात में भी वह उन्हें टटोलकर पहचान सकता है। किसी भी दरवाज़े से बिना टकराये निकल सकता है।


...तभी जीने पर गुलाटी के थके क़दमों की खोखली आहट सुनाई पड़ती है और उसे घबाहत-सी होती है। वह धीरे-से निर्मला को अपने पास बुला लेता है। उसे लिटाकर छाती पर हाथ रख लेता है। 


कई क्षणों तक वह उसकी साँस से उठती-बैठती छाती को महसूस करता है... और चाहता है कि निर्मला के शरीर का अंग-अंग और मन की हर धड़कन उसे पहचान की साक्षी दें... गहरी आत्मीयता और निर्बंध एकता का एहसास दें... 


अँधेरे ही में वह उसके नाखूनों को टटोलता है, उसकी पलकों को छूता है, उसकी गर्दन में मुँह छिपाकर खो जाना चाहता है, धुले हुए बालों की चिर-परिचित गंध उसके रंध्र-रंध्र में रिसने लगती है और उसके हाथ पहचान के लिए पोर-पोर पर थरथराते हुए सरकते हैं। निर्मला की साँस भारी हो जाती है। 


वह उसकी मांसल बाँहों को महसूस करता है और गुदरे कन्धों पर हाथ से थपथपाता रहता है, निर्मला के शरीर का अंग-अंग अनूठे अनुराग से खींचता-सा आता है। उसका रोम-रोम उसे पहचान रहा था, जोड़-जोड़ कसाव से पूरित था, तन के भीतर गरम रक्त से ज्वर उठ रहे थे और हर साँस पास खींचती जा रही थी। अंग-प्रत्यंग में, पोर-पोर में गहरी पहचान थी।।। 


तभी बिशन कपूर की खिड़की में उजाला होता है और धुआ सलाखों से लिपट-लिपटकर गली के अँधेरे में डूबने लगता है। 


और उसका तनहा मन तन्हाइयों को छोड़कर उन परिचित गंध, परिचित साँसों और पहचाने स्पर्शों में डूबता जाता है। उसे और कुछ भी नहीं चाहिए... परिचय की एक मांग है और उस अँधेरे में वह साँसों से, गंध से, तन के टुकड़े-टुकड़े से पहचान चाहता है, पुरानी प्रतीति चाहता है। 


चारों तरफ सन्नाटा छा जाता है। 


और ख़ामोशी में वह आश्वस्त होता है ... वह दोनों बाँहों में उसे भर लेता है।  ज्वार और उठता है। तन की गर्माहट और बढ़ती है और रंध्र-रंध्र में एकता का सागर लहराने लगता है।।


धीरे-धीरे निर्मला की तेज़ साँसें धीमी पड़ती हैं और चुम्कीय कशिश ढीली पड़ जाती है।। खिंचाव टूटने लगता है और अंगों के ज्वार उतरने लगते हैं।।। 


चन्दर कसकर उसकी बाँहों को जकड़े रहता है... उतरता हुआ ज्वार उसे फिर अकेला छोड़े जा रहा है... अनजान तटों पर छोड़ी हुई सीपी की तरह... 


निर्मला अपनी दबी हुई बाँह निकाल लेती है और गहरी साँस लेकर ढीली-सी लेट जाती है।। 


धीरे-धीरे सब कुछ सो जाता है और रात बहुत नीचे उतर आती है। कहीं कोई आवाज़ नहीं, कोई आहट नहीं। 


धीरे-से निर्मला करवट बदलती है और दूसरी और मुंह करके गहरी नींद में डूब जाती है। 


करवट बदलकर लेती हुई निर्मला को वह अलसाया-सा देखता रहता है... और चन्दर फिर अपने को बेहद अकेला महसूस करता है... वह निर्मला के कंधे पर हाथ रखता है, चाहता है की उसकी करवट बदल दे, पर उसकी अंगुलियाँ बेजान होकर रह जाती हैं… कुछ क्षण वह अँधेरे में ही निर्मला को उधर मुँह किये लेता हुआ देखता है और हताश-सा खुद भी लेट जाता है। 


और फिर कुछ देर बाद थाने का घड़ियाल दो के घंटे बजता है और उसकी नींद उचट जाती है। नींद के खुमार में ही वह चौंक पड़ता है। कमरे की ख़ामोशी और सूनेपन से उसे डर-सा लगता है। अँधेरे में ही वह निर्मला को टटोलता है, तकिये पर बिखरे उसके बालों पर उसका हाथ पड़ता है और वह उन बालों की चिकनाई को महसूस करता है... सर झुककर वह उन्हें सूंघता है...


फिर निर्मला पर हाथ रखता है - उसके गोल कन्धों को छूटा है... वह स्पर्श भी पहचाना हुआ है... धीरे-धीरे वह उसके पूरे शरीर को पहचानने के लिए टटोलता है और उसकी साँसों की हलकी आवाज़ को सुनने और पहचानने की कोशिश करता है। 


निर्मला अब भी करवट लिए पड़ी थी। वह धीरे से नींद में कुनमुनाती है। चन्दर का दिल धक्-से रह जाता है। कहीं निर्मला जाग न जाए, अनजाने ही इस स्पर्श से अजनबियों की तरह चौंक न जाये।  


निर्मल सोते-सोते एक बार रुक-रूककर साँस लेती है, जैसे उसे डर सा लग रहा हो…. या कोई भयंकर सपना देख रही हो… चन्दर सुन्न-सा रह जाता है... क्या वह उसके स्पर्श को नहीं पहचानती ?


और फिर निर्मला को झकझोर कर वह उठता है, "निर्मला... निर्मला… वह बदहवासी में कहता है।


निर्मला चौंककर उठती है और आँखें मलते हुए प्रकृतिस्थ होने की कोशिश करती है। 


और बिजली जलाकर वह निर्मला को दोनों कन्धों से पकड़कर अपना मुँह उसके सामने करके डरी हुई आवाज़ में पूछता है, "मुझे पहचानती हो? मुझे पहचानती हो निर्मला?"


निर्मला आँखें फाड़े देखती रह जाती है, धीरे से आश्चर्य-भरे स्वर में कहती है, "क्या हुआ?" 

 

और वह निर्मला को ताकता रह जाता है। उसकी आँखें उसके चेहरे पर कुछ खोजती रह जाती हैं। 

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कमलेश्वर जी के कहानी संग्रह का लिंक :





Monday, September 7, 2020

दिल्ली में एक मौत - कमलेश्वर (Dilli Mein Ek Maut by Kamleshwar)

 

मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है... पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।

चारों तरफ कुहरा छाया हुआ है। सुबह के नौ बजे हैं, लेकिन पूरी दिल्ली धुँध में लिपटी हुई है। सडकें नम हैं। पेड भीगे हुए हैं। कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता। जिंदगी की हलचल का पता आवाजों से लग रहा है। ये आवाजें कानों में बस गई हैं। घर के हर हिस्से से आवाजें आ रही हैं। वासवानी के नौकर ने रोज की तरह स्टोव जला दिया है, उसकी सनसनाहट दीवार के पार से आ रही है। बगल वाले कमरे में अतुल मवानी जूते पर पालिश कर रहा है... ऊपर सरदारजी मूँछों पर फिक्सो लगा रहे हैं... उनकी खिडकी के परदे के पार जलता हुआ बल्ब बडे मोती की तरह चमक रहा है। सब दरवाजे बंद हैं, सब खिडकियों पर परदे हैं, लेकिन हर हिस्से में जिंदगी की खनक है। तिमंजिले पर वासवानी ने बाथरूम का दरवाजा बंद किया है और पाइप खोल दिया है...

कुहरे में बसें दौड रही हैं। जूँ-जूँ करते भारी टायरों की आवाजें दूर से नजदीक आती हैं और फिर दूर होती जाती हैं। मोटर-रिक्शे बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं। टैक्सी का मीटर अभी किसी ने डाउन किया है। पडोस के डॉक्टर के यहाँ फोन की घंटी बज रही है। और पिछवाडे गली से गुजरती हुई कुछ लडकियाँ सुबह की शिफ्ट पर जा रही हैं।

सख्त सर्दी है। सडकें ठिठुरी हुई हैं और कोहरे के बादलों को चीरती हुई कारें और बसें हॉर्न बजाती हुई भाग रही हैं। सडकों और पटरियों पर भीड है,पर कुहरे में लिपटा हुआ हर आदमी भटकती हुई रूह की तरह लग रहा है।

वे रूहें चुपचाप धुँध के समुद्र में बढती जा रही हैं... बसों में भीड है। लोग ठंडी सीटों पर सिकुडे हुए बैठे हैं और कुछ लोग बीच में ही ईसा की तरह सलीब पर लटके हुए हैं बाँहें पसारे, उनकी हथेलियों में कीलें नहीं, बस की बर्फीली, चमकदार छडें हैं।

और ऐसे में दूर से एक अर्थी सडक पर चली आ रही है। इस अर्थी की खबर अखबार में है। मैंने अभी-अभी पढी है। इसी मौत की खबर होगी। अखबार में छपा है आज रात करोलबाग के मशहूर और लोकप्रिय बिजनेस मैगनेट सेठ दीवानचंद की मौत इरविन अस्पताल में हो गई। उनका शव कोठी पर ले आया गया है। कल सुबह नौ बजे उनकी अर्थी आर्य समाज रोड से होती हुई पंचकुइयाँ श्मशान-भूमि में दाह-संस्कार के लिए जाएगी।

और इस वक्त सडक पर आती हुई यह अर्थी उन्हीं की होगी। कुछ लोग टोपियाँ लगाए और मफलर बाँधे हुए खामोशी से पीछे-पीछे आ रहे हैं। उनकी चाल बहुत धीमी है। कुछ दिखाई पड रहा है, कुछ नहीं दिखाई पड रहा है, पर मुझे ऐसा लगता है अर्थी के पीछे कुछ आदमी हैं।

मेरे दरवाजे पर दस्तक होती है। मैं अखबार एक तरफ रखकर दरवाजा खोलता हूँ। अतुल मवानी सामने खडा है। 'यार, क्या मुसीबत है, आज कोई आयरन करने वाला भी नहीं आया, जरा अपना आयरन देना। अतुल कहता है तो मुझे तसल्ली होती है। नहीं तो उसका चेहरा देखते ही मुझे खटका हुआ था कि कहीं शवयात्रा में जाने का बवाल न खडा कर दे। मैं उसे फौरन आयरन दे देता हूँ और निश्चिंत हो जाता हूँ कि अतुल अब अपनी पेंट पर लोहा करेगा और दूतावासों के चक्कर काटने के लिए निकल जाएगा।

जब से मैंने अखबार में सेठ दीवानचंद की मौत की खबर पढी थी, मुझे हर क्षण यही खटका लगा था कि कहीं कोई आकर इस सर्दी में शव के साथ जाने की बात न कह दे। बिल्डिंग के सभी लोग उनसे परिचित थे और सभी शरीफ, दुनियादार आदमी थे।

तभी सरदारजी का नौकर जीने से भडभडाता हुआ आया और दरवाजा खोलकर बाहर जाने लगा। अपने मन को और सहारा देने के लिए मैंने उसे पुकारा, 'धर्मा! कहाँ जा रहा है? 'सरदारजी के लिए मक्खन लेने, उसने वहीं से जवाब दिया तो लगे हाथों लपककर मैंने भी अपनी सिगरेट मँगवाने के लिए उसे पैसे थमा दिए।

सरदारजी नाश्ते के लिए मक्खन मँगवा रहे हैं, इसका मतलब है वे भी शवयात्रा में शामिल नहीं हो रहे हैं। मुझे कुछ और राहत मिली। जब अतुल मवानी और सरदारजी का इरादा शवयात्रा में जाने का नहीं है तो मेरा कोई सवाल ही नहीं उठता। इन दोनों का या वासवानी परिवार का ही सेठ दीवानचंद के यहाँ ज्यादा आना-जाना था। मेरी तो चार-पाँच बार की मुलाकात भर थी। अगर ये लोग ही शामिल नहीं हो रहे हैं तो मेरा सवाल ही नहीं उठता।

सामने बारजे पर मुझे मिसेस वासवानी दिखाई पडती हैं। उनके खूबसूरत चेहरे पर अजीब-सी सफेदी और होंठों पर पिछली शाम की लिपस्टिक की हल्की लाली अभी भी मौजूद थी। गाउन पहने हुए ही वे निकली हैं और अपना जूडा बाँध रही हैं। उनकी आवाज सुनाई पडती है, 'डार्लिंग, जरा मुझे पेस्ट देना, प्लीज...

मुझे और राहत मिलती है। इसका मतलब है कि मिस्टर वासवानी भी मैयत में शामिल नहीं हो रहे हैं।

दूर आर्य समाज रोड पर वह अर्थी बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बढती आ रही है...

अतुल मवानी मुझे आयरन लौटाने आता है। मैं आयरन लेकर दरवाजा बंद कर लेना चाहता हूँ, पर वह भीतर आकर खडा हो जाता है और कहता है, 'तुमने सुना, दीवानचंदजी की कल मौत हो गई है।

'मैंने अभी अखबार में पढा है, मैं सीधा-सा जवाब देता हूँ, ताकि मौत की बात आगे न बढे। अतुल मवानी के चेहरे पर सफेदी झलक रही है, वह शेव कर चुका है। वह आगे कहता है, 'बडे भले आदमी थे दीवानचंद।

यह सुनकर मुझे लगता है कि अगर बात आगे बढ गई तो अभी शवयात्रा में शामिल होने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाएगी, इसलिए मैं कहता हूँ, 'तुम्हारे उस काम का क्या हुआ?

'बस, मशीन आने भर की देर है। आते ही अपना कमीशन तो खडा हो जाएगा। यह कमीशन का काम भी बडा बेहूदा है। पर किया क्या जाए? आठ-दस मशीनें मेरे थ्रू निकल गईं तो अपना बिजनेस शुरू कर दूँगा। अतुल मवानी कह रहा है, 'भई, शुरू-शुरू में जब मैं यहाँ आया था तो दीवानचंदजी ने बडी मदद की थी मेरी। उन्हीं की वजह से कुछ काम-धाम मिल गया था। लोग बहुत मानते थे उन्हें।

फिर दीवानचंद का नाम सुनते ही मेरे कान खडे हो जाते हैं। तभी खिडकी से सरदारजी सिर निकालकर पूछने लगते हैं, 'मिस्टर मवानी! कितने बजे चलना है?

'वक्त तो नौ बजे का था, शायद सर्दी और कुहरे की वजह से कुछ देर हो जाए। वह कह रहा है और मुझे लगता है कि यह बात शवयात्रा के बारे में ही है।

सरदारजी का नौकर धर्मा मुझे सिगरेट देकर जा चुका है और ऊपर मेज पर चाय लगा रहा है। तभी मिसेज वासवानी की आवाज सुनाई पडती है, 'मेरे खयाल से प्रमिला वहाँ जरूर पहुँचेगी, क्यों डार्लिंग?

'पहुँचना तो चाहिए। ...तुम जरा जल्दी तैयार हो जाओ। कहते हुए मिस्टर वासवानी बारजे से गुजर गए हैं।

अतुल मुझसे पूछ रहा है, 'शाम को कॉफी-हाउस की तरफ आना होगा?

'शायद चला आऊँ, कहते हुए मैं कम्बल लपेट लेता हूँ और वह वापस अपने कमरे में चला जाता है। आधे मिनट बाद ही उसकी आवाज फिर आती है, 'भई, बिजली आ रही है? मैं जवाब दे देता हूँ, 'हाँ, आ रही है। मैं जानता हूँ कि वह इलेक्ट्रिक रॉड से पानी गर्म कर रहा है, इसीलिए उसने यह पूछा है।

'पॉलिश! बूट पॉलिश वाला लडका हर रोज की तरह अदब से आवाज लगाता है और सरदारजी उसे ऊपर पुकार लेते हैं। लडका बाहर बैठकर पॉलिश करने लगता है और वह अपने नौकर को हिदायतें दे रहे हैं, 'खाना ठीक एक बजे लेकर आना।... पापड भूनकर लाना और सलाद भी बना लेना...। मैं जानता हूँ सरदारजी का नौकर कभी वक्त से खाना नहीं पहुँचाता और न उनके मन की चीजें ही पकाता है।

बाहर सडक पर कुहरा अभी भी घना है। सूरज की किरणों का पता नहीं है। कुलचे-छोलेवाले वैष्णव ने अपनी रेढी लाकर खडी कर ली है। रोज की तरह वह प्लेटें सजा रहा है, उनकी खनखनाहट की आवाज आ रही है।

सात नंबर की बस छूट रही है। सूलियों पर लटके ईसा उसमें चले जा रहे हैं और क्यू में खडे और लोगों को कंडक्टर पेशगी टिकट बाँट रहा है। हर बार जब भी वह पैसे वापस करता है तो रेजगारी की खनक यहाँ तक आती है। धँध में लिपटी रूहों के बीच काली वर्दी वाला कंडक्टर शैतान की तरह लग रहा है।

और अर्थी अब कुछ और पास आ गई है।

'नीली साडी पहन लूँ? मिसेज वासवानी पूछ रही हैं।

वासवानी के जवाब देने की घुटी-घुटी आवाज से लग रहा है कि वह टाई की नॉट ठीक कर रहा है।

सरदारजी के नौकर ने उनका सूट ब्रुश से साफ करके हैंगर पर लटका दिया है। और सरदारजी शीशे के सामने खडे पगडी बाँध रहे हैं।

अतुल मवानी फिर मेरे सामने से निकला है। पोर्टफोलियो उसके हाथ में है। पिछले महीने बनवाया हुआ सूट उसने पहन रखा है। उसके चेहरे पर ताजगी है और जूतों पर चमक। आते ही वह मुझे पूछता है, 'तुम नहीं चल रहे हो? और मैं जब तक पूछूँ कि कहाँ चलने को वह पूछ रहा है, वह सरदारजी को आवाज लगाता है, 'आइए, सरदारजी! अब देर हो रही है। दस बज चुका है।

दो मिनट बाद ही सरदारजी तैयार होकर नीचे आते हैं कि वासवानी ऊपर से ही मवानी का सूट देखकर पूछता है, 'ये सूट किधर सिलवाया?

'उधर खान मार्केट में।

'बहुत अच्छा सिला है। टेलर का पता हमें भी देना। फिर वह अपनी मिसेज को पुकारता है, 'अब आ जाओ, डियर!... अच्छा मैं नीचे खडा हूँ तुम आओ। कहता हुआ वह भी मवानी और सरदारजी के पास आ जाता है और सूट को हाथ लगाते हुए पूछता है, 'लाइनिंग इंडियन है।

'इंग्लिश!

'बहुत अच्छा फिटिंग है! कहते हुए वह टेलर का पता डायरी में नोट करता है। मिसेज वासवानी बारजे पर दिखाई पडती हैं।

अर्थी अब सडक पर ठीक मेरे कमरे के नीचे है। उसके साथ कुछेक आदमी हैं, एक-दो कारें भी हैं, जो धीरे-धीरे रेंग रही हैं। लोग बातों में मशगूल हैं।

मिसेज वासवानी जूडे में फूल लगाते हुए नीचे उतरती हैं तो सरदारजी अपनी जेब का रुमाल ठीक करने लगते हैं। और इससे पहले कि वे लोग बाहर जाएँ वासवानी मुझसे पूछता है, 'आप नहीं चल रहे?

'आप चलिए मैं आ रहा हूँ मैं कहता हूँ पर दूसरे ही क्षण मुझे लगता है कि उसने मुझसे कहाँ चलने को कहा है? मैं अभी खडा सोच ही रहा रहा हूँ कि वे चारों घर के बाहर हो जाते हैं। अर्थी कुछ और आगे निकल गई है। एक कार पीछे से आती है और अर्थी के पास धीमी होती है। चलाने वाले साहब शवयात्रा में पैदल चलने वाले एक आदमी से कुछ बात करते हैं और कार सर्र से आगे बढ जाती है। अर्थी के साथ पीछे जाने वाली दोनों कारें भी उसी कार के पीछे सरसराती हुई चली जाती हैं।

मिसेज वासवानी और वे तीनों लोग टैक्सी स्टैंड की ओर जा रहे हैं। मैं उन्हें देखता रहता हूँ। मिसेज वासवानी ने फर-कालर डाल रखा है। और शायद सरदारजी अपने चमडे के दास्ताने पहने हैं और वे चारों टैक्सी में बैठ जाते हैं। अब टैक्सी इधर ही आ रही है और उसमें से खिलखिलाने की आवाज मुझे सुनाई पड रही है। वासवानी आगे सडक पर जाती अर्थी की ओर इशारा करते हुए ड्राइवर को कुछ बता रहा है।...

मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है... पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।

उन चारों की टैक्सी अर्थी के पास धीमी होती है। मवानी गर्दन निकालकर कुछ कहता है और दाहिने से रास्ता काटते हुए टैक्सी आगे बढ जाती है।

मुझे धक्का-सा लगता है और मैं ओवरकोट पहनकर, चप्पलें डालकर नीचे उतर आता हूँ। मुझे मेरे कदम अपने आप अर्थी के पास पहुँचा देते हैं, और मैं चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगता हूँ। चार आदमी कंधा दिए हुए हैं और सात आदमी साथ चल रहे हैं सातवाँ मैं ही हूँ।और मैं सोच रहा हूँ कि आदमी के मरते ही कितना फर्क पड जाता है। पिछले साल ही दीवानचंद ने अपनी लडकी की शादी की थी तो हजारों की भीड थी। कोठी के बाहर कारों की लाइन लगी हुई थी... मैं अर्थी के साथ-साथ लिंक रोड पर पहुँच चुका हूँ। अगले मोड पर ही पंचकुइयाँ श्मशान भूमि है।

और जैसे ही अर्थी मोड पर घूमती है, लोगों की भीड और कारों की कतार मुझे दिखाई देने लगती है। कुछ स्कूटर भी खडे हैं। औरतों की भीड एक तरफ खडी है। उनकी बातों की ऊँची ध्वनियाँ सुनाई पड रही हैं। उनके खडे होने में वही लचक है जो कनॉट प्लेस में दिखाई पडती है। सभी के जूडों के स्टाइल अलग-अलग हैं। मर्दों की भीड से सिगरेट का धुआँ उठ-उठकर कुहरे में घुला जा रहा है और बात करती हुई औरतों के लाल-लाल होंठ और सफेद दाँत चमक रहे हैं और उनकी आँखों में एक गरूर है...

अर्थी को बाहर बने चबूतरे पर रख दिया गया है। अब खामोशी छा गई है। इधर-उधर बिखरी हुई भीड शव के इर्द-गिर्द जमा हो गई है और कारों के शोफर हाथों में फूलों के गुलदस्ते और मालाएँ लिए अपनी मालकिनों की नजरों का इंतजार कर रहे हैं।

मेरी नजर वासवानी पर पडती है। वह अपनी मिसेज को आँख के इशारे से शव के पास जाने को कह रहा है और वह है कि एक औरत के साथ खडी बात कर रही है। सरदारजी और अतुल मवानी भी वहीं खडे हुए हैं।

शव का मुँह खोल दिया गया है और अब औरतें फूल और मालाएँ उसके इर्द-गिर्द रखती जा रही हैं। शोफर खाली होकर अब कारों के पास खडे सिगरेट पी रहे हैं।

एक महिला माला रखकर कोट की जेब से रुमाल निकालती है और आँखों पर रखकर नाक सुरसुराने लगती है और पीछे हट जाती है।

और अब सभी औरतों ने रुमाल निकाल लिए हैं और उनकी नाकों से आवाजें आ रही हैं।

कुछ आदमियों ने अगरबत्तियाँ जलाकर शव के सिरहाने रख दी हैं। वे निश्चल खडे हैं।

आवाजों से लग रहा है औरतों के दिल को ज्यादा सदमा पहुँचा है।

अतुल मवानी अपने पोर्टफोलियो से कोई कागज निकालकर वासवानी को दिखा रहा है। मेरे खयाल से वह पासपोर्ट का फॉर्म है।

अब शव को भीतर श्मशान भूमि में ले जाया जा रहा है। भीड फाटक के बाहर खडी देख रही है। शोफरों ने सिगरेटें या तो पी ली हैं या बुझा दी हैं और वे अपनी-अपनी कारों के पास तैनात हैं।

शव अब भीतर पहुँच चुका है।

मातमपुरसी के लिए आए हुए आदमी और औरतें अब बाहर की तरफ लौट रहे हैं। कारों के दरवाजे खुलने और बंद होने की आवाजें आ रही हैं। स्कूटर स्टार्ट हो रहे हैं। और कुछ लोग रीडिंग रोड, बस-स्टॉप की ओर बढ रहे हैं।

कुहरा अभी भी घना है। सडक से बसें गुजर रही हैं और मिसेज वासवानी कह रही हैं, 'प्रमिला ने शाम को बुलाया है, चलोगे न डियर? कार आ जाएगी। ठीक है न?

वासवानी स्वीकृति में सिर हिला रहा है।

कारों में जाती हुई औरतें मुस्कराते हुए एक-दूसरे से बिदा ले रही हैं और बाय-बाय की कुछेक आवाजें आ रही हैं। कारें स्टार्ट होकर जा रही हैं।

अतुल मवानी और सरदारजी भी रीडिंग रोड, बस स्टॉप की ओर बढ गए हैं और मैं खडा सोच रहा हूँ कि अगर मैं भी तैयार होकर आया होता तो यहीं से सीधा काम पर निकल जाता। लेकिन अब तो साढे ग्यारह बज चुके हैं।

चिता में आग लगा दी गई है और चार-पाँच आदमी पेड के नीचे पडी बैंच पर बैठे हुए हैं। मेरी तरह वे भी यूँ ही चले आए हैं। उन्होंने जरूर छुट्टी ले रखी होगी, नहीं तो वे भी तैयार होकर आते।

मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि घर जाकर तैयार होकर दफ्तर जाऊँ या अब एक मौत का बहाना बनाकर आज की छुट्टी ले लूँ आखिर मौत तो हुई ही है और मैं शवयात्रा में शामिल भी हुआ हूँ।

नीली झील - कमलेश्वर (Neeli Jheel by Kamleshwar)


बहुत दूर से ही वह नीली झील दिखाई पड़ने लगती है। सपाट मैदानों के छोर पर, पेड़ों के झुरमुट के पीछे, ऐसा मालूम पड़ता है, जैसे धरती एकदम ढालू होकर छिप गया हो, लेकिन गौर से देखने पर ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच से एक बहुत बड़ा शीशा झलकता दिखाई पड़ता है।

यही वह झील है।

और इसी झील पर जल-पक्षियों के शिकार के लिए आए हुए अँग्रेज-कलक्टर ने कहा था, “कितनी खूबसूरत है यह झील ! जैसे जमीन में हार जड़ा हो-झील तक पहुँचने के लिए पक्का रास्ता होना चाहिए।”

यह तीस साल पहले की बात है।

और तब बस्ती से झील तक रास्ता बनाने के लिए आए मजदूरों की टोली में वह भी आया था और अँग्रेज साहब की मेम की आखों को देखकर उसने कहा था, 'कित्ती खूबसूरत है मेम ! इसकी आँखें नीली झील की तरह लगती हैं।'

तगड़े और बदसूरत मजदूरों ने तब आँखें बचाकर गन्दे इशारे किए थे। और गहरी और भीगी जमीन में कार के पहिए फँसते ही वह सबसे पहले दौड़कर उस ओर धक्का लगाने के लिए जुट गया था, जिधर मेम बैठी थीं...उसका मन होता था कि बहाने से हाथ डालकर फूल-सी मेम को छुए, पर हिम्मत नहीं पड़ती थी। और मजदूरों को उसकी इस सीनाजोरी पर बड़ा गुस्सा आया था और वे भीतर-ही-भीतर चाहते थे कि उसकी मरम्मत हो जाए।

रात को जब पेड़ तले बीनी हुई लकड़ियों के साले चूल्हे जले और उस वीराने में मजदूरों के मुँह आग की ली में शैतानों की तरह चमकने लगे, तो भजनू ने काँख से तमाखू का बटुआ निकालते हुए कहा, “इस साले को मेट से कहकर निकलवाया जाए ! मेम जान पाती तो चमड़ी उतर जाती !...साला आशिक बनता है !”

“बनने दो, तुम्हारा का लेता है?” भूख से क्लान्त और जल्दी-जल्दी बाटियाँ सेंकते हुए होरी ने बात तोड़ देनी चाही।

“हम सबकी रोज़ी जायेगी।” आग कुरेदते हुए एक और ने जोड़ा ।

तभी दूसरे पेड़-तले से बड़ी भद्दी और मोटी आवाज़ में एक गीत का बोल उभरा-

“होए मेमिया तोरी अँखियाँ बड़ो जुलुम ढायो री...”

और पीतल की धाली ठनक उठी थी और महेसा शैतान की तरह नाच रहा था। बाटियाँ पकाते साथियों की हँसी और वाहवाही से शोर मच गया था। भूखे और थके मज़दूरों की आँखों में एक वहशी चमक आ गयी थी और एक क्षण के लिए वे जैसे तन की पीड़ा भूल गये थे। महेसा गा-गाकर कुछ देर तक नाचता रहा। ...पेड़ों की पत्तियाँ आग की दमक में ताँबे की तरह लग रही थीं और उनके काले, पपोटेदार तने अजगरों की तरह झिलमिला रहे थे। आसमान सीप की पीठ की तरह धुँधला और काला था और झील की ओर से अजीब तरह के सूने-सूने स्वर आ रहे थे।

इसी समय तीखी आवाज़ में चीखता एक सारस गुज़र गया। उसके बड़े-बड़े पंखों से निःश्वास-सा निकल रहा था। सारस की चीख़ की प्रतिध्वनि कुछ क्षण तक आती रही और महेसा का स्वांग रुक गया।

“अब सीधा होके बैठ, रोटी खा ले!” काने मेट की आवाज़ थी यह। नाराज़ साथियों को मेट का इस तरह अपनेपन से बोलना अच्छा नहीं लगा। भजनू ने धीरे से कहा, “बदमाश ने मेट को खुस कर लिया है! काना भी ऐबी है न, उसे भी मज़ा आता है!”

गुदारी बाटियों और उड़द की पकी हुई दाल की महक से सबकी भूख चमक आयी थी। बड़ी रात तक बतकही के बीच खाना चलता रहा। धीरे-धीरे चूल्हों की आग मझाकर राख में दुबक गयी और पेड़ों का अँधियारा घना हो गया। सुबह काम शुरू होते ही सैलानियों की एक पार्टी वहाँ आकर रुक गयी। कुछ हिन्दुस्तानी साहब थे और साथ में कुछ अच्छी-अच्छी औरतें। औरतों के कन्धों पर कैमरे लटक रहे थे और साहबों के कन्धों पर एयरगन और कारतूसों की पेटियाँ। खाने-पीने का सामान कंडियों में था और वह बोझ उनसे चल नहीं रहा था। औरतों के खूबसूरत चेहरों पर पसीने का पनीलापन था और साड़ियों के छोर कमर में खुँसे हुए थे। धूल से बचाने के लिए साड़ियाँ एक तरफ़ से कुछ ऊँची कर ली गयी थीं। उन्हें देखते ही मज़दूरों ने रुकने का मतलब भाँप लिया था और वे अपने काम में इतने मशगूल हो गये थे जैसे उन लोगों की उपस्थिति का उन्हें एहसास ही न हो। पर महेसा हाथ रोककर, फेंटा कसने के बहाने कनखियों से उन्हें ताक रहा था। वही इसी इन्तज़ार में लगता था कि अभी उनमें से कोई औरत सामान उठाने के लिए कहेगी और वह मेट की मर्ज़ी देखकर निश्चय ही उनकी सहायता के लिए तैयार हो जायेगा।

साहब लोग भी किसी मज़दूर से आँखें मिलने की ताड़ में थे। बाक़ी सब आँख बचा रहे थे, सिर्फ़ महेसा आँख मिलाने के लिए उतावला था; पर साहबों से नहीं। जैसे उसने यही तय किया था कि नीली साड़ी वाली औरत अगर कहेगी तो वह फावड़ा छोड़कर सामान उठा लेगा। वह बार-बार उसे ही हैरत से ताक रहा था कि नीली साड़ी वाली औरत ने ही मौका पाकर बड़ी मीठी आवाज़ में कहा, “कोई मज़दूर मिल जायेगा यहाँ?”

महेसा को यह बात नहीं जँची । “मज़दूर ही चाहती हैं तो खोज लें!” उसने ठसक से कहा, “हम लोग सरकारी गैंग के आदमी हैं!” कुछ इस तरह जैसे सरकार से रुपया पाकर मज़दूरी करना कुछ ऊँची बात हो।

“अरे, ज़रा-सी मदद के लिए चाहिए। ...यह सामान झील तक पहुँचाना है।” उसी नीली साड़ी वाली की मीठी आवाज़ थी।

महेसा का दिल बहक उठा। बड़प्पन और शान से बोला, “मदद मिल सकती है, ऐसे बोलिए!”

महेसा के तुच्छ-से गर्व को लक्ष्य करके वह धीरे-से हँसी। और महेसा एक क्षण के लिए अपलक उसके साफ़ दाँतों को देखता रहा। फिर दौड़कर मेट के पास पहुँचा और सामान उठाने की इजाज़त माँगकर चला आया।

आते ही उसने गर्व से उनका सामान उठाया और नीली साड़ी वाली के कन्धे में लटके थरमस को माँगने के बहाने बोला, “यह बोतल भी दे दीजिए।”

मीठी आवाज़ वाली औरत ने कुछ जवाब नहीं दिया। पर वह ऐसे मानने वाला नहीं था। चलते-चलते उसने फिर पूछा, “आप लोग शिकार के लिए आये हैं? कहाँ से आये हैं?

लेकिन वह नीली साड़ी वाली औरत एक आदमी से मुस्करा-मुस्कराकर बातें कर रही थी। महेसा को यह अच्छा नहीं लग रहा था। एक अजीब तरह की परेशानी उसे हो रही थी। कुछ दूर तो उसने बर्दाश्त किया, फिर उसका मन हुआ कि सामान पटककर उसी आदमी से कहे कि उठाइए अपना तामझाम! मैं मजूर नहीं हूँ! पर उनके साथ चल सकना भी उसे कम भला न लग रहा था। उसे बोलने का फिर मौक़ा मिला, गलत रास्ते पर मुड़ते देख वह लपककर नीली साड़ी वाली के पास पहुँचा और एकदम उनके अज्ञान पर जैसे चीख़ पड़ा, “आप लोगों को रास्ता नहीं मालूम, हमारे साथ आइए! इधर से दलदल पड़ेगा"

“दलदल! ओह !” नीली साड़ी वाली कुछ ज़्यादा चौंक गयी थी। उसका यह चौंकना महेसा को बहुत अच्छा लगा था। उसे अनिर्वचनीय सुख-सा मिला था। ...कानपुर में मिल से छुट्टी पाते ही वह चौराहे वाले कोने पर रुककर इसी तरह औरतों को देख-देखकर खुश होता था...

झुरमुट के पास पहुँचते ही सब लोग रुक गये। सामान वहीं उतरवा लिया गया। सभी औरतें हवा की ठण्डक में अपने बालों की लटें ऊपर करती हुई या साड़ियाँ सँभालती हुई बेफिक्री से बैठ गयीं।

हलकी-हलकी हवा झील की ओर से आ रही थी और छाया में कुछ सर्दी भी थी। झील के पानी के भीतर बादल तैर रहे थे और नरकुल धीरे-धीरे काँप रहे थे। ...दूर से जिधर पानी उथला था, देवहंसों, मुर्गाबियों और पतारी के झुण्डों के चुगने की और पंख फड़फड़ाने की आवाज़ें आ रही थीं। देवहंस शायद सिवार खा रहे थे और मुर्गाबी घोंघे या केकड़े खोजने में मशगूल थे। पेड़ों पर चिड़ियाँ चहक रही थीं।

सहसा नीली साड़ी वाली ने झील के पानी की ओर इशारा करते हुए हैरत से कहा, “पानी का साँप! साँप तैर रहा है!”

सभी कौतूहल से देखने लगे। महेसा खिलखिलाकर हँस पड़ा | कैसे समझाये इन साहबों को, वे इतना भी नहीं जानते! वह सिर्फ़ नीली साड़ी वाली को ही बताना चाहता था। एकदम बोला, “पनिया साँप नहीं है, एक चिड़िया है वह!”

“चिड़िया? बकता है!” नीली साड़ी वाली ने प्यार से कहा।

“न मानें तो देखती रहें!” फिर इधर-उधर नज़र दौड़ाकर बोला, “वह उस पानी में उगे ठूँठ को देख रही हैं? ...वह...उस पर जो काली चिड़िया बैठी है, उसी का साथी है यह, सरपपच्छी।”

“वह काली चिड़िया!” नीली साड़ी वाली उससे बात कर रही थी और वह तन्मय होकर बता रहा था, “हाँ-हाँ, वही! सरपपच्छी तैरने का बहुत शौकीन होता है। बस, भाले-सी काली चोंच निकालकर तैरता रहता है।”

“खाता क्‍या है?” उसने उत्सुकता से पूछा।

“मछली!” उसकी आँखों में चमक आती जा रही थी। और बात करने के लिए उसने बात जोड़ दी, “अभी जब थक जायेगा तो किसी ठूँठ पर पंख और दुम फैलाकर सुखायेगा।”

“अभी निकलेगा?” नीली साड़ी वाली का मुख खुला रह गया।

और उसके सफेद दाँतों को महेसा निहारता रहा... नकबा के सफेद पंखों की तरह धुले हुए व चमकदार! उसका मन जाने को नहीं हो रहा था, पर मेट ने कहा था जल्दी लौटना और फिर साथियों के कलेजे पर साँप लोट रहे होंगे!

तभी एक साहब को बन्दूक सँभालते देख उसका मन उचाट हो गया। वह नीली साड़ी वाली भी अब बन्दूक की ओर ज़्यादा ध्यान दे रही थी।

उनके साथ के एक साहब ने उसे कुछ पैसे दिये और अभी एक क्षण पहले का महेसा अपना सारा आकर्षण भूलकर चल पड़ा। उसका मन भारी हो आया था। रह-रहकर उसकी आँखों के सामने वह बन्दूक घूम रही थी और कानों में चिड़िया का शोर समाया हुआ था। हर आवाज वह पहचानता था-उन पक्षियों की भी, जो सालभर इसी झील के किनारे रहते थे और उनकी भी, जो इस ऋतु में दूर पहाड़ों से उतरकर कुछ दिनों के लिए मेहमानों की तरह आते थे। उनकी हर आवाज़ का अर्थ वह समझता था-वे लड़ रहे हैं, या आनन्द से भरकर गा रहे हैं, या साथियों को ख़तरे का बिगुल सुना रहे हैं। झील के पानी में किलोलें करते हर पक्षी के पंखों की सरसराहट का एहसास है उसे, चाहे वह मुर्गाबी हो, सुरखाब, जंगली बत्तख, चाहे बगुला, सारस, नकटा, रेती, सरपपच्छी या सोनापतारी! उनकी सीटियों की मधुर आवाज़ें उसके कानों में बसी हुई हैं...और तभी उसका मन उस बन्दूक की याद से धड़कने लगा।

उधर बन्दूक चली थी और गोली की टूटती हुई आवाज़ बादलों में गूँज गयी थी। और उसके बाद पक्षियों का कातर शोर' मन पर चोट-सी लगी थी। उसका मन उदास हो आया था। दूरी पर साथी मज़दूर काम में लगे दिखाई पड़ रहे थे। एक क्षण ठिठककर उसने पीछे देखा, दलदल ख़ामोश था और ऊपर से उड़कर भागती हुई चिड़ियों की भयातुर आवाज़ को शालीनता से पीता जा रहा था। ...मुड़कर वह तेज़ कदमों से लौट आया और अपने काम में जुट गया।

रात को जब पेड़ों के नीचे साँझे चूल्हे जले, तो महेसा नहीं था। गाँव से प्याज और मसाला लाने वाले चरनसिंह ने बताया, “वह तो बदमास घी की चुपड़ी रोटी खायेगा आज।"

कहाँ? गाँव में है?” भजनू ने आश्चर्य से पूछा।

“वहीं पण्डिताइन के घर है। चबूतरे पर बैठा मिसकौट कर रहा था लुगाई से। ...और वह नासमारी मुस्करा-मुस्कराकर बतिया रही थी, पत्तीदार बाल काढ़े, और ज़ेवर पहने साथ बैठी थी। ...मरा साला!” कहकर चरनसिंह ने पिच्च से थूका और प्याज की गाँठ छीलकर खाने लगा।

“उससे कैसे आसनाई हो गयी?” भजनू ने तसले में आटा सँभालते हुए रहस्य-भरी आवाज में पूछा।

“तू चाहे तो तू कर ले! कौन मुस्किल है! ...लेकिन उस नरक में कूदे कौन? ...बखत था जब हमारे पीछे लग गयी थी...” आदत के मुताबिक चरनसिंह बात अपने से जोड़ रहा था।

“कुबड़ा न होता तो शायद ब्याह रचा लेती!” होरी ने जैसे चरनसिंह के कुबड़ेपन पर गहरा वार किया। “बैठ जा सीधी तरह, हूँ! ...तेरे पीछे लग गयी थी! गाँव के ठाकुर ने जान दे दी, पर नज़र नहीं मिलायी उसने!”

“असल में उसे पैसे का गरूर है!” भजनू ने रोटी गरम तवे पर डालते हुए कहा, “दस गाँव में ऐसी औरत नहीं मिलेगी! का रूप है और का काठी है! रामकसम !”

चरनसिंह ने सिसकारी भरी और भजनू की बात का मतलब साफ़ हो गया। चूल्हे की आँच में उसका कूबड़ कद्दू की तरह लग रहा था। होरी की आँख के नीचे लटका हुआ बड़ा-सा मांस का लोथड़ा सूजा हुआ था। “कीड़े ने काट लिया”, कहते हुए उसने सने हाथ से आँख के नीचे सहलाया और बोलता गया, “घी-मेवा खाती है, ठसक से रहती है पण्डिताइन!”

“चालीस की लगती नहीं,” भजनू ने रोटी पलटी । “महेसा की उमर कितनी होगी?” उसने दरयाफ़्त किया।

“होगा पच्चीस-छब्बीस का!” चरनसिंह बोला।

“फिर तो...” कहकर होरी शैतानी से हँस पड़ा।

झील तक वह सड़क तो पूरी नहीं बन पायी, पर महेसा गैंग से बिछुड़ गया। विधवा पण्डिताइन ने उससे शादी कर ली थी। लोगों ने तरह-तरह की बातें कहीं किसी का कहना था कि जवान देखकर पण्डिताइन ने फाँस लिया और कोई कहता था कि महेसा रुपया-पैसा देखकर ढरक गया... । जो भी हो, दोनों तरह से लोगों को यह अच्छा नहीं लगा था, क्योंकि किसी को बुरा देखकर लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते और अच्छा बनते देखना उनसे सहा नहीं जाता। लेकिन महेसा ने किसी की परवाह नहीं की। पण्डिताइन फिर से सुहागिन हुई थी और इतने दिनों बाद जब उसकी माँग में सेंदुर और गोरे माथे पर पत्तीदार बालों के बीच बिंदिया चमचमायी, तो उसका रूप दुगुना हो गया। दुहरे बदन की पण्डिताइन जब चाँदी की करधनी बाँधकर चलती और पैरों में झाँझें जब झन्‍न-झन्‍न बोलतीं तो लोगों के कलेजे दरक जाते। राह में साथ चलते महेसा से पारवती पण्डिताइन कहती, “तुम्हें तो जरा भी सऊर नहीं है! मरद घरवाली के आगे-आगे चलता है, साथ नहीं! ...लोग क्या कहेंगे? ...आगे चलो!”

और सर पर साफा बाँधे महेसा कहता, “बड़ी सरम आय रही है! सहर में मेम लोग इसी माफिक चलती हैं, बल्कि न बाँह में हाथ फँसा के"” और बस्ती के बाज़ार से ख़रीदा, चमकदार केलासन का जम्फर झिलमिलाता देख उसका माथा गर्व से उठ जाता। पारबती कित्ती खूबसूरत है।

और एक दिन देवियों की पूजा के लिए जब पारबती ने महावर लगाया, तो चमचे में घुला लाल रंग उँगली में लेकर उसने पारबती के होंठों पर लगा दिया। पारबती छुटाने लगी तो उसने अपनी कसम दे दी और नुमाइश से लाये शीशे को उसके सामने कर दिया। पारबती ने लजाते हुए अपने लाल होंठों को देखा, पर अपनी खूबसूरती की शोखी से भरकर बोली, “तुम तो मेम से सादी करते! लाली-पौडरवाली से ।” और वह अपने को खुद किसी मेम से कम नहीं लगी थी!

तभी महेसा ने उसकी गुदारी कलाई पकड़ते हुए कहा, “तुम किधर से कम हो! और हँसती पारबती के उजले दाँतों को देखकर उसका मन खिल गया। -पारबती के दाँत ठीक वैसे ही थे, जैसे उसने कभी देखे थे, हंस के पंखों की तरह धुले हुए!

पारबती के कहने से उसने कलमें बड़ी-बड़ी रखवायी थीं, चोटी में मोटी-सी गाँठ बाँधता था और मूँछें छोटी करवा ली थीं। मेले-तमाशे पर जाने के लिए बैलों की एक गोई और छोटा-सा रब्बा भी खरीद लाया था। बैलों को खूब सजाकर रखता था। उनके गलों में चालीस घुँघरुओं की माला थी और सींगों में पालिश । रब्बे की छत के लिए रंगीन झालर पारबती ने सी थी और गछियाँ वह दर्ज़ी से बनवा लावा था। पहियों के ऊपर रथ की तरह हाथा लगवाया था और सन की नहीं, सूत की रंगीन डोरियों से किनारे बुनवाये थे। सतरंगी रब्बा था महेसा का! एक दफ़ा दौड़ में दाँव लगा आया था और पारबती के पीछे पड़ गया था, “तुम साथ नहीं बैठोगी तो दौड़ में नहीं जाऊँगा।” उसने बहुत समझाया था, “हमारा तमासा दिखाओगे? ...बहुत लड़कपन है तुममें।”

महेसा हँस पड़ा था, “और तुम बूढ़ी हो गयी हो न! सरम नहीं आती हमारे सामने कहते? ...बतिया-बछरी-से दाँत हैं अभी, बात बड़ी-बूढ़ियों की तरह करोगी !”

और मेले की दौड़ के लिए जाते-जाते जब ऊसर से रब्बा गुज़र रहा था, तो पारबती ने चतुराई से उसे मना लिया था और मन में कोई मलाल लाये बिना महेसा मेला दिखाकर बगैर दौड़ में हिस्सा लिए लौट आया था।

बस्ती में हरदम महेसा और पारबती की बात होती, पर दोनों को किसी की चिन्ता नहीं थी। पारबती रुपये का लेन-देन करती और सबकी चोटी अपने पाँव के नीचे रखती। बस्ती में कौन ऐसा था, जिसे वक्‍त-बेवक्त चार पैसे की जरूरत नहीं पड़ती! इसलिए वे लोग भी जो पीठ-पीछे पारबती और महेसा को कोसते, सामने आकर चिकनी-चुपड़ी बातें करते।

इसका एहसास दोनों को था, पर दोनों इतने मुक्त थे कि कभी उन्होंने मन नहीं जलाया। महेसा अब निश्चिन्त हो गया था। काम-धाम करने की उसे ज़रूरत नहीं रह गयी थी। पर अब भी, जब वह सैलानी लोगों को झील की ओर जाते देखता और उनके साथ कोई सुन्दर औरत होती, तो वह अपने को रोक न पाता; पीछे-पीछे चला ही जाता और चाहता कि वह औरत उससे बात करे। और जब वह औरत उससे बात नहीं करती, तो वह चिड़ियों में मशगूल हो जाता, शान्त झील के किनारे-किनारे चक्कर काटता, नरकुलों के बीच साबुदाने की तरह फैले हुए मछलियों के अण्डों को देखता और नीलपक्षी के जोड़ों को निहारता...बगुले को ध्यानावस्थित खड़ा देखकर वह साँस रोककर ठहर जाता और उसके शिकार करने की प्रतीक्षा करता; देर हो जाती तो घर की याद आते ही लौट पड़ता।

एक बार वह दिन-भर नहीं आया, आधी रात को लौटा | पारबती ने नाराज़ होकर पूछा, तो सीधेपन से कह दिया, “जंगल तक गया था।”

“झील पर घूमके मन नहीं भरता?” पारबती ने उलाहना दिया, तो बड़ी सफ़ाई से उसने बता दिया, “जंगल में तीतर देखने गया था, ससुरे धूल से नहाते हैं!”

“तीतर-वीतर नहीं, तुम कहीं और गये थे। सच-सच बताओ मुझे !” पारबती कुछ कड़ी पड़ गयी, “तीतर देखना था तो बलदू के घर देख लेते, वह तो तीतर लड़ाता है।”

“पिंजरे में बन्द तीतर का क्‍या देखना!” महेसा ने कहा, “मुझे कोई पालना तो है नहीं, पता नहीं लोग कैसे चिड़ियों को पालते हैं!”

तभी ऊपर आकाश में कुछ पक्षियों का झुण्ड उड़ता गुज़र गया। उसकी आँखें आसमान में टँग गयीं। एकदम बोला, “यह वाक का झुण्ड है...देख पारबती, अब रात-भर ये मछली का शिकार करेंगे।”

पक्षियों के नरम पंखों की रेशमी आवाज़ दूर चली गयी थी।

“वो कुछ भी करें, तुम हमारी बात का जवाब दो। सच-सच बताओ कहाँ गये थे?”

“ईमान से बता दिया ।”

“लेकिन इत्ती रात तक तीतर ही देखते रहे?” पारबती के स्वर में शंका थी।

“हाँ-हाँ, पारबती माना करो! ...देखो, पैरों में कितने काँटे चुभ गये हैं। लड़ना है तो सवेरे लड़ेंगे।” कहकर वह आराम से टाँगें फैलाकर लेट गया।

पारबती ने बात बदल दी, “रुपया बहुत फैल गया है, वसूल नहीं होता, तुम ज़रा लोगों को डाँटो-डपटो ।"

“यह हमसे नहीं होगा ।”

“अच्छा सुनो! मेरा मन है कि कुछ रुपया लगा के यहाँ चबूतरे पर एक मन्दिर बनवा दिया जाये...और बन सके तो मुसाफ़िरों के लिए दो कोठरियाँ भी बन जायें। हारे-थके लोगों को आराम मिलेगा और कुछ रुपया धरम के कारज में लग जायेगा।”

“यह धरम-करम तुम्हें कब से सताने लगा?”

“बहुत दिन की साध है मन में! मिस्त्री को बुला के ज़मीन भी दिखायी थी, फिर कुछ हो नहीं पाया। ...मर जाऊँगी तो नाम का एक मन्दिर तो रहेगा, दस दिलों से असीस निकलेगी!” पारबती ने बड़ी सच्चाई से बात कही।

“बेबखत यह बात कैसे सूझ गयी तुम्हें?” महेसा ने पूछा।

“आज दिन-भर यही सब सोचती रही।”

महेसा ने ग़ौर से देखा पारबती को। चाँदनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। सचमुच पारबती बहुत बदली-सी लगी। आज उसे लगा कि सचमुच पारबती उससे बहुत बड़ी है। ...और उसके चेहरे पर नीली लकीरों का जाल बनना शुरू हो रहा है। बाँहों का खिंचाव ढीला पड़ गया है, कूल्हे पर भारीपन आ गया है। लेकिन फिर भी उसके पत्तीदार बाल उसे अच्छे लग रहे थे।...

“का देख रहे हो?” पारबती ने आँचल का खूँट ऊपर सरका लिया।

महेसा चुपचाप देखता रहा, बोला कुछ नहीं। पारबती ने फिर टोका तो महेसा ने यों ही कह दिया, “मन्दिर बनना ज़रूरी है?”

पारबती समझ गयी कि उसके मन की बात यह नहीं है। महेसा की आँखों में अभी जो सूनापन उसने देखा था, वह कुछ और ही कह रहा था। पारबती ने कुछ उदास स्वर में पूछा, “हमसे सादी करके पछताते तो नहीं हों?”

“ऐं ?” महेसा इस सवाल के लिए तैयार नहीं था।

“आज सोच-सोच के बड़ा दुःख हुआ। ...अपने सुख की ख़ातिर हमने तुम्हें ख़राब कर दिया।” पारबती की आँखों में पनीलापन था, “पछतावा तो होता होगा, सच-सच बताना!”

“काहे का पछतावा पारबती ?” महेसा ने कहा, “हमने कभी यह सब सोचा ही नहीं, जरूरत ही नहीं पड़ी।”

“तुमने कभी कुछ नहीं सोचा? सादी की बाबत भी नहीं सोचा था?” पारबती ने जैसे उसे कुरेदा, “अभी तुम अपने को आज़ाद समझते हो, बाल-बच्चे होते तो समझते!” कहते-कहते उसकी आवाज़ भारी हो आयी। चाँद पर बादल आ जाने से चाँदनी मटमैली हो गयी थी और पारबती का चेहरा धुँधला पड़ गया था। लालटेन चौखट में कुण्डी से लटकी थी और उसकी रोशनी में खाट की अरदावन परछाइयों की सलाखें बना रही थी।

महेसा को एकाएक लगा कि शादी के बाद सब घरों में बच्चे होते हैं, उसके घर में अभी तक कुछ नहीं हुआ। उसने गहरी नज़रों से पारबती को देखा। इस समय की बात वह समझ नहीं पा रहा था। आख़िर पारबती कहना क्या चाहती है? घर में चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। ऐसे सूनेपन में उसने पारबती के साथ कभी अकेलापन नहीं महसूस किया, पर आज वह इतनी अलग-सी क्‍यों मालूम हो रही है? हमेशा, रात हो या दिन, अकेलेपन में उसके मन में प्यार ही उमड़ा है, और उसने भी कभी ऐसी उखड़ी बातें नहीं कीं।

“तुम्हें हुआ का है?” महेसा ने शायद आज पहली बार इतना सोचकर कुछ पूछा था।

“पता नहीं का हुआ है! बस्ती का अस्पताल बहुत छोटा है, यहाँ मेरी देखभाल नहीं हो पायेगी |"

“अस्पताल! लेकिन अस्पताल की का ज़रूरत है?” महेसा और उलझ रहा था।

“तुम्हारी नासमझी के लिए का कहूँ! यहाँ घर पर मेरी देखभाल कौन करेगा? सगे-सम्बन्धी भी नहीं, जो ज़रूरत-बखत पर आ जाते। ...सुना है अस्पताल में तकलीफ़ भी नहीं होती, ऐसी दवा देते हैं डाकदरजी ।”

महेसा हँसा। अब समझ पाया था वह। उत्साह से भरकर बोला, “जिला अस्पताल में चली चलना! पैसा सब देखभाल करा देगा, भगवान का दिया सब-कुछ है!”

लेकिन पारबती उसकी ख़ुशी में हिस्सा नहीं बँटा पायी। उसके मन में जैसे डर समाया हुआ था। बोली, "एक बात कहूँ? ...हमें बड़ा डर लगता है, लगता है जान चली जायेगी ।”

“बेकार डरती हो तुम!”

“बेकार नहीं, न जाने मन में कैसी-कैसी बातें व्यापती हैं! बड़े डरावने सपने दिखाई पड़ते हैं! साँस रुकने लगती है!” पारबती ने बाँहें छाती पर कस ली थीं।

“तो हमारे साथ लेटा करो,” महेसा ने उपाय बता दिया।

'कुछ तो सोचा करो!”

“हम कहें कि आजकल तुम कतरायी-कतरायी काहे रहती हो! ...बेकार की बातें मन में मत लाया करो पारवती! आ, खाट टीन में कर लें।”

पारबती ने उठकर खाट पकड़ते हुए कहा, “अब इतना बाहर मत रहा करो, न जाने कब क्या हो जाये!”

महेसा ने खटिया से खटिया मिला ली और पाटी के पास सरककर हाथ उसकी बाँह पर रख दिया, “अब डर नहीं लगेगा तुम्हें।”

कुछ देर बाद पारबती सो गयी, पर महेसा को नींद नहीं आ रही थी। पारबती का पैर एकाएक हिला और साँस तेज़ हो आयी, जैसे वह डर रही हो। महेसा ने उठकर उसके माथे पर हाथ फेरा। बड़ी देर तक बैठा देखता रहा और जब उसे नींद आने लगी, तो लोहे का एक चाकू लाकर उसने पारबती के सिरहाने रखा और लेट गया, जैसे पारवती नन्‍हीं-सी बच्ची हो!

इन दिनों उसका मन बहुत भरा-भरा रहता। पारबती इस लायक नहीं थी कि उसे झील तक ले जाता, ख़ुद भी बैठता और उसे भी दिखाता वहाँ की सुन्दरता। इसलिए वह आसपास ही कुछ देर के लिए चला जाता। हाफ़िज़जी की बिसाती की दुकान पर अगर बैठ जाता, तो पारबती के लिए नाखूनों की लाली, कोई छोटा-सा शीशा या और कोई ऐसी चीज़ खरीद लाता जिसे हाफिज़जी नयी चाल की बता देते ...एक दफ़ा हाफ़िज़जी ने उसे फ़ोटो-फ्रेम दिखाकर कहा, “इसमें मियाँ-बीवी की तस्वीर लगती है। बड़े घरों में लोग इसे रखते हैं।” फ़ोटो-फ्रेम तो वह ले आया, पर तस्वीर नहीं थी। तीसरे ही दिन उसने पारबती को तैयार कराया, सारे गहने उसे पहनने को मजबूर किया और ख़ूब तेल लगाकर रामा फ़ोटोग्राफ़र की दुकान पर जा पहुँचा।

साथ-साथ बैठते हुए उसने पारबती के सर का पल्ला कानों के पीछे कर दिया और अपनी कमीज़ की जेब में सतरंगा रेशमी रूमाल रख लिया। अपने गले का तावीज़ भी खींचकर ऊपर कमीज़ पर निकाल लिया, ताकि तस्वीर में सब-कुछ दिखाई पड़े। अपने पीछे बाग का पर्दा लगवाया, जिसमें दो चिड़ियाँ चोंच से चोंच मिलाये बैठी थीं। पारबती को भी वह पर्दा पसन्द आया था।

लेकिन तस्वीर में और सब तो ठीक आ गया, अफ़सोस सिर्फ़ बालों का था।

“ससुरे ने हमें बूढ़ा बना दिया! काहे, पारबती ?”

“तुम्हें ही बड़ा शौक चर्राया था। एक रुपया ख़राब कर दिया!”

पर महेसा को इस बात का मलाल नहीं था। उसने तस्वीर को फ्रेम में लगाकर बरामदे वाली घरोंची पर सजा दिया। ऐसी तस्वीर मुश्किल से किसी के घर निकलेगी...मुख़्तार साहब के घर ही हो सकती है!

उस दिन भी वह हाफ़िज़जी की दुकान पर बैठकर लौट रहा था। पारबती के बालों में लगाने के लिए विलायती पिन लाया था। पिन के पत्ते पर बनी मेम को वह ताक रहा था कि पारबती ने पूछा, “मन्दिर के लिए मिस्त्री से बात हुई?”

“मिस्त्री तो नहीं मिले, पर एक नयी बात सुनने में आयी है।”

“का?” पारबती ने उत्सुकता से जानना चाहा।

“अपनी बस्ती में बिजली लग रही है; चुंगी वाले बड़ी कोशिश में हैं, पर पैसा पास नहीं है चुंगी के ।”

“तो बिजली का लगेगी?”

“सुना, चुंगी अपनी कुछ ज़मीनें बेचने की बात सोच रही है, ऐसी ज़मीनें जो उसके लिए बेकार हैं!” महेसा ने कहा तो पारबती एकदम बोली, “चुंगी अगर बेचे तो अपने चबूतरे के पास वाला कूड़ाख़ाना हम ख़रीद लें! ...चबूतरे पर मन्दिर हो जायेगा और उधर मुसाफ़िरों के लिए छोटी-सी धरमसाला! तुम ज़रा सच्ची बात पता लगाओ!”

“बात तो सच्ची है। हाफ़िज़जी का रोज़ चुंगी में आना-जाना लगा रहता है, गलत ख़बर नहीं लायेंगे, वो ही बता रहे थे।” महेसा ने जैसे उसे इत्मीनान दिलाया, “मौका लगा तो ख़रीद लेंगे।”

“का पता कब तक हो!”

झील की ओर से तभी चिड़ियों का कातर शोर सुनाई पड़ा और उसका मन बहक गया। एकदम बोला, “शायद शिकारी आये हैं।”

ऊपर आसमान से “आंग-आंग' करते चक्रवाकों के जोड़े गुज़र रहे थे। महेसा का मन ग्लानि से भर आया। बोला, “इन्हें मारने से फ़ायदा! इत्ती सुन्दर चिड़िया है, पर मुर्दा खाती है!”

“आजकल नयी-नयी चिड़ियाँ बहुत दिखाई पड़ती हैं, पहचान में भी नहीं आतीं,” पारबती ने कहा, “न जाने कहाँ से इतनी आ जाती हैं!”

“ये चिड़ियाँ मेहमान हैं। ...कातिक ख़त्म होते आती हैं और फागुन-चैत तक चली जाती हैं।” महेसा पारबती को बता रहा था, “हमने चिड़ियों के अंडे भी जमा किये हैं, तुझे नहीं बताया, नहीं तो घर से निकाल देती।”

“अब भी निकाल सकती हूँ।” पारबती कह ही रही थी कि 'दिखाऊँ' कहता हुआ महेसा उठकर गया और तरह-तरह के सफ़ेद, चितकबरे, हरियाले-से अंडे उठाकर ले आया।

“देख पारबती, यह वाक का अंडा है, यह सारस का और यह सोनापतारी का!” महेसा एक-एक अंडा उठाकर दिखाने लगा। वैसे तो पारबती नहीं छूती, पर उसने सोनापतारी का अंडा हाथ में ले ही लिया। घुमाकर देखते ही हाथ से छूटकर वह गिर पड़ा और टूट गया, तो पारबती के मुँह से चीख़ निकल गयी, “हाय दइया !!”

“टूट गया तो कया हुआ?” महेसा ने सरलता से कह दिया।

पर पारबती के चेहरे पर काले बादल-से छा गये थे, उसका दिल धक्‌-से रह गया था, बहुत धीमे स्वर में बोली, “असगुन हो गया,” और आँचल में मुँह छिपाकर रो पड़ी।

और पारबती उस दिन भविष्य के आशंकामय परिणामों को सोचकर रोयी थी “बिल्कुल वैसे ही करुणापूर्ण और असहायता से भरी उसकी आवाज़ जच्चा-बच्चा अस्पताल में थी...

महेसा को सब कुछ याद आता है। यह कैसे होता है कि आदमी हमेशा एक ही तरह से रोता है! ...पारबती की वह आवाज उसे भूलती नहीं, जब उसने अस्पताल के पलँग पर पड़े हुए महेसा को अपने पास बुलाया था, “इतने दिन चढ़ गये हैं, डॉक्टरनी कहती है कि चीरा लगाना पड़ेगा!” पारबती का रोम-रोम जैसे काँप रहा था चीरे का नाम सुनकर। आँखों में आँसू भरकर उसने महेसा की बाँह पकड़ ली थी और बड़े ही दर्द-भरे स्वर में कहा था, “अब मेरा कोई ठिकाना नहीं, पता नहीं ईश्वर को क्‍या मंजूर है!”

“दिल छोटा क्‍यों करती हो पारबती? तुम जीती-जागती घर पहुँचोगी। ...मैं मन्दिर बनवाऊँगा और मुसाफ़िरों के लिए धरमसाला!”

लेकिन पारबती जीती-जागती घर नहीं पहुँची। बच्चा पेट में मर गया था और ऑपरेशन के बाद भी उसकी बिगड़ती हालत को अकेली डॉक्टरनी संभाल नहीं पायी थी। ...सारा शरीर नीला पड़ गया था, पारबती के शरीर में ज़हर फैल गया था।

और महेसा को पारबती का हलका नीलापन लिये शरीर ठीक वैसा ही लगा था, जैसा कि उस दिन चाँदनी में उसने देखा धा। पारबती की साँसें धीमी पड़ती जा रही थीं, वह एकदम निश्चिन्त लग रही थी, और उसने महेसा को पास बुलाकर कहा था, “अब मन्दिर ज़रूर बनवा देना, पारबती मन्दिर!”

मन्दिर! सोचकर महेसा का कलेजा फट गया था। आख़िरी आस थी उसे, चीख़कर बोला था, “ऐसा मत कहो पारबती! बच्चा मर गया तो क्‍या हुआ, तू तो जीती-जागती है!”

“मुझे देख लो, अच्छी तरह देख लो!” पारबती की आँखों से आँसुओं की धार बह-बहकर कानों के पास से होते हुए नीचे गिर रही थी। ...फिर...फिर उससे नहीं देखा गया, जैसे पारबती के प्राण खिंच रहे थे और फिर पारबती के निचले होंठ सूखकर चटक गये थे।...

महेसा की दुनिया वीरान हो गयी और वीरानापन देखकर आदमी पगला जाता है।

बस्ती के आदमियों का यही कहना था कि महेसा पगला गया। जो आदमी, आदमी का ख़याल नहीं करता, वह पागल नहीं तो और क्‍या है? आदमी के दुःख-दर्द को जो नहीं समझता, उसे और क्या कहा जाये? महेसा, वह मुक्त और निश्चिन्त महेसा, एकदम बदल गया था!

उसे सिर्फ़ पैसे की फ़िक्र थी। पारबती का फैला हुआ रुपया वह बड़ी कड़ाई से वसूल कर रहा था। ...घर का अकेलापन उसे काटने दौड़ता। ...इतना प्यार पाकर अब जैसे उसकी आदत बिगड़ चुकी थी।

लोगों ने कहा, “महेसा पण्डित, दूसरी शादी कर लो। इतना रुपया-पैसा किस काम आयेगा? आस-औलाद भी तो नहीं!”

महेसा ने जवाब दे दिया, “पारबती के बराबर कोई मेरा ख़्याल करे तो सोचूँ भी...नहीं, तो भी न सोचूँ। ग़लत बात बोल गया। ...बेकार का मखौल मत किया करो! अब बूढ़ा हो चला ।”

यों पारबती से दस बरस छोटा था महेसा, पर पारबती की मौत के बाद वह उससे दस बरस बड़ा लगने लगा। कनपटियों पर तीन ही बरस में सफ़ेदी आ गयी और गरदन के नीचे की खाल झुर्रियों से भर गयी। सचमुच, आदमी बूढ़ा नहीं होता, वक़्त उसे बूढ़ा बना जाता है।

सूने घर में महेसा आठ-आठ आँसू रोता और उसे पारबती की एक-एक बात याद आती...चीज़ें देखता तो आँखों में आँसू भर आते...वह टीन का बक्सा, जिसमें उसके कपड़े रहते थे...और जिसमें पारवती अपने रुक्के और रुपये भी रखती थी...सन्दूक के ऊपर वाली कील में किनारी में बँधी चूड़ियों का लच्छा देखकर वह उस दिन रो पड़ा था। ...एक-एक चूड़ी उसने पहचानी थी...कौन-सी किस मेले में पहनायी थी उसने...और दूसरा जोड़ा पहनने के वक़्त उसने कब-कब इन चूड़ियों को उतारा था...भरी आँखों से वह देखता रहा। ...घर का सूनापन उसे अब काटने दौड़ता। ...दीवार पर सगनौती की लकीरें देखकर उसे फिर कुछ याद आया...जब एक बार वह दो दिन के लिए कहकर चार दिन बाद लौटा था, शायद तभी पारबती ने गेरू से यह सगनौती उठायी होगी...वह जो कुछ करती थी उसमें सिर्फ़ उसी के लिए तो सब कुछ था, और कौन था उसका? न पारबती का कोई था और न अब महेसा का कोई रह गया है!...

और जब वह जगन नाई के घर धरना देकर बैठ गया कि आज हिसाब मय मूल-व्याज के चुकता करके उठेगा, तो उसकी औरत ने भीतर से उकराकर कहा, “पण्डित, तुम जो इतने जालिम हो कि किसी की पत नहीं देखते! ...पारबती चाची मुँह से चाहे जितना बिगड़ें, पर आदमी की मरजाद और इज़्ज़त का तो ख़्याल करती थीं.”

“ये सब हम नहीं जानते! हम रुपया लेके उठेंगे आज! पूरा सौ रुपया है मय व्याज के!” महेसा ने कड़कती आवाज़ में कहा और चोटी की गाँठ खोल ली।

जगन नाई बहुत गिड़गिड़ाया, “महाराज, घर की नींव खुदवा लो तो भी इस बखत पच्चीस से एक पाई ज़्यादा नहीं निकलेगा। ...थोड़ी सी मोहलत और मिल जाये!”

आख़िर चार भले आदमियों ने आकर जब बहुत समझाया तो महेसा किसी तरह राम-राम करके उठा।

कुछ दिनों बाद महेसा, जो अब महेस पांडे के नाम से पुकारा जाता था, बस्ती से चला गया। सुना, चुनार-मिर्ज़ापुर की तरफ़ पत्थर की तलाश में गया है। कर्ज़दारों ने सुख की साँस ली थी, पर वह पन्द्रह दिन के भीतर-भीतर लौट आया। चौधरी के बाग़ में बैठकर बता रहा था, “पारबती मन्दिर के लिए सामान देखने गया था। सूरत-जयपुर से बनवाऊँगा ।”

लोगों का कहना था कि सोना-चाँदी मिलाकर कुल आठ-दस हज़ार की पूँजी है उसके पास। और जो दबा-दबाया हो सो अलग । इस बीच उसने काफ़ी बकाया रुपया वसूल कर लिया था।

धीरे-धीरे रुपये की उसकी तृष्णा भरती-सी लगी। हाफ़िज़जी की दुकान से गुज़रता तो आवाज़ सुनकर कह देता, “अब क्‍या करूँगा बैठके हाफ़िज़ मियाँ? -पहनने-ओढ़ने वाली तो चली गयी।”

एक दिन हाफ़िज़जी ने उसे हाथ पकड़कर बैठा लिया। बैठे-बैठे बात चल निकली, “सुना, मन्दिर बनवाने की फिकर में हो!”

“बस, यही एक काम करना है हाफिज़जी! किसी तरह मन्दिर और एक छोटी-सी धरमसाला बन जाये, तो मन को शान्ति मिले। पारबती यही कहती-कहती मरी थी।”

“यह तो धरम का काम है। बनाने खड़े होंगे तो दस आदमी हाथ बँटायेंगे। तुम शुरू तो करो ।” हाफ़िज़जी ने उसकी उदास नज़रें देखकर तसल्ली दी, “कभी ज़रूरत पड़े तो दस-बीस रुपये हमसे भी ले लेना।”

“रुपया पूरा नहीं है। लोग समझते हैं मेरे पास खत्ती खुदी है। पर सच हाफिज़जी, कुल चार हज़ार हैं, इतने में तो सीमेंट भी नहीं आयेगा ।”

ग्राहक आया देख हाफ़िज़जी भी उधर उलझ गये और महेस पांडे उठकर चल दिया । ऐसे ही एक दिन वह बस्ती की तरफ़ से घर जा रहा था कि झीलवाले रास्ते पर कुछ लोग दिखाई पड़े। उसके पैर उधर ही उठ गये। कुछ सैलानी थे, चार मर्द और दो औरतें। औरतें सुन्दर तो नहीं थीं, लेकिन फिर भी वह उनके पीछे-पीछे चल दिया। काफ़ी दिनों बाद आया था वह इधर।

नीली झील ख़ामोश थी। किनारों पर गीली आँखों की तरह नमी थी और घास की टहनियाँ हवा के साथ धीरे-धीरे पानी को सहला रही थीं। नरकुल की लम्बी पत्तियाँ, पक्षियों की कलगी की तरह काँप रही थीं और पानी में डूबी सिवार के सूतों से मछलियों के बच्चे कतरा-कतराकर निकल रहे थे। वह किनारे आकर बैठ गया। पानी के नन्‍हे-नन्‍हे बबूले नीचे से ऊपर सतह तक आये, तो लगा किसी मछली ने मोती उगल दिये हों। जलचरों की बारीक आवाजें झील के पानी में गूँज रही थीं और ऊपर पेड़ों पर पक्षियों के पंखों की सरसराहट और सीटियों की मद्धम आवाज़ें थीं।

काले सिर और श्वेत वक्ष वाली गंगाकुररी की हल्की-सी सीटी उसके कानों में पड़ी। आँखें उधर अटक गयीं। झील के ऊपर वह चक्कर काट रही थी, कुछ इस तरह, जैसे उसे चक्कर में उड़ाने वाली अदृश्य डोर किसी के हाथों में हो और वह बस घूमती ही जा रही हो। वह जानता है कि गंगाकुररी पेड़ पर नहीं बैठेगी। तभी वह तीर की तरह पानी के ऊपर गिरी और चमकदार मछली उसकी लम्बी चोंच में थी।

तभी संगीत की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। आये हुए सैलानी लोग कुछ गा-बजा रहे थे। नीली झील के शान्त पानी पर उनके स्वर तैरते हुए दूर तक जा रहे थे। उसे बड़ी शान्ति मिली।

फिर सवनहंसों का एक झुण्ड अपने राग का स्वर मिलाता हुआ झील के दूसरे किनारे पर उतर पड़ा और दो-चार हंस गेहूँ और चने के खेत में घुसकर अंकुर खाने लगे। गरदन उठा-उठाकर वे ऐसे देख रहे थे, जैसे अजनबी हों, और सचमुच वे अजनबी ही हैं। महेस पाण्डे का मन न जाने क्यों भर आया! वे सवनहंस अब आये हैं, चार-पाँच महीने रहकर पारबती की तरह चले जायेंगे, या फिर किसी शिकारी का शिकार हो जायेंगे, जैसे पारबती हो गयी। इनके धूसर पंख ख़ून की लकीरों से रंग जायेंगे और इनके पंखों को पकड़कर शिकारी ऐसे लटका ले जायेगा जैसे मुर्दा पारवती को अस्पताल के भंगी पलँग से उठाकर उस सूने बरामदे में ले आये थे।...

तभी करकर्रा बोला, सफ़ेद कलगी की शान में वह गरदन लपकाता हुआ चला जा रहा था। शायद आरामदेह, रेतीली ज़मीन खोज रहा है करकर्रा। ...फिर एक भयंकर धड़ाके की आवाज़ से वह चौंक उठा। बायीं ओर फैले दलदल से सारसनी की तुरही-सी तेज़ चीख़ आयी और गूँजती रही। वह बार-बार चीख़ रही थी और सारस अकुलाया-सा कुछ ऊपर चक्कर काट रहा था। कभी वह दलदल में उतरकर चीख़ता, कभी लम्बे-लम्बे डग भरकर इधर-उधर लपकता और वैसी ही तेज़ आवाज़ में चीख़ने लगता। गिरी हुई सारसनी की आवाज़ फट गयी थी और उसकी गरदन कुचले हुए साँप की तरह फड़फड़ा रही थी।

सवनहंसों का झुण्ड तट से भागकर खेतों में चला गया। ...अभी-अभी कुछ क्षण पहले का स्वप्निल वातावरण एकदम भयानक हो उठा था। झील का पानी सीमा में बद्ध जैसे थर्रा रहा था और भीगे किनारों पर निर्जीव स्वर टकरा रहे थे। पेड़ों में अभी-अभी सनसनाहट भर गयी थी। दलदल में घायल पड़े सारस को उठाकर लाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी किसी की।

महेस पाण्डे ने पास आकर उन सैलानियों को देखा। उसे उम्मीद थी कि पारबती की तरह ऐसे क्षण में इन औरतों की आँखों में पानी डबडबा आया होगा, पर उनमें तो शिकारी के निशाने की प्रशंसा भरी थी।

यह घर लौट आया। रात-भर उस अकेले घर में उसे बार-बार वही तेज़ आवाज़ सुनाई पड़ती रही। फिर जाने कहाँ से अस्पताल में चीख़ती पारबती की आवाजें आने लगीं। ...सुबह होते ही उससे रुका नहीं गया। वह सीधा झील पहुँचा । झील के ऊपर का धुआँ धीरे-धीरे साफ़ हो रहा था। कांद का जोड़ा किनारे पर बैठा काई खा रहा था। झील के शान्त सौन्दर्य ने उसे इस क्षण बिल्कुल प्रभावित नहीं किया। उसके पैर दलदल की ओर बढ़ रहे थे। उसे सारस दिखाई दिया। वह मृत पड़ी सारसनी के पंखों में चोंच गड़ा-गड़ाकर उसे जगा रहा था शायद, और जब सारसनी नहीं जगी, तो वह विलाप करता झील की ओर चला आया।

वहीं पेड़ के नीचे बैठकर वह देखता रहा-मानसरोवर और कैलास से आये देवहंसों को, जो गन्धर्वों के देश से आये थे, प्रवास के लिए...कोमल और पवित्र पक्षी! ...हलकी किरणों में सोनापतारी के स्वर्णपंख चमचमा उठे। उसका मन उदासी से भर गया । इन परदेसी पक्षियों से क्या नाता जोड़ना! बैठे-बैठे जब वह ऊब जाता, तो बस्ती की ओर चला आता।

बस्ती में नाप-जोख होने लगी तो लोगों को विश्वास हुआ कि अब बिजली लग जायेगी। महेस पाण्डे ने भी हाँ में हाँ मिलायी, “सुना, उत्तर की तरफ़ बहुत बिजली पैदा की जा रही है, वहीं से यहाँ आ रही है।”

तभी मुनादीवाला ऐलान करता सुनाई पड़ा, “ब-हुकुम चियरमन साहब के चुंगी की कुछ ज़मीनों का नीलाम ब-तारीख चार जनवरी सोमवार को चुंगी अहाते में सवेरे आठ बजे से होगा... । ज़मीनों के नकसे दफ़्तर चुंगी में ख़रीदारों के लिए लगे हैं! ...हर ख़ास व आम को ख़बर दी जाती है कि...” और मुनादी वाले ने तबले पर बाँस की खपच्चियों से चोट की और आगे बढ़ गया।

चार जनवरी में अभी बीस दिन थे। महेस पाण्डे के दिमाग़ में चबूतरे के पास वाली ज़मीन घूमने लगी। चुंगी को बिजली के लिए रुपये की ज़रूरत है और उसे धर्मशाला के लिए उस ज़मीन की।

मन्दिर और धर्मशाला की बात को लेकर वह सभी के पास पहुँचा, “धरम का काम है। सबसे ज़्यादा रुपया हम लगायेंगे, कुछ मदद आप लोग करें। धरमसाला पंचायती कर दी जायेगी। आप लोग दस-दस, बीस-बीस रुपये से भी मदद करें तो यह कारज हो सकता है।”

मारवाड़ी मिलवालों ने एकमुश्त पचास रुपया दे दिया, लेकिन उसका खाता डाकखाने में खुलवा दिया। महेस पाण्डे ने तीन हज़ार रुपया भी उसी खाते में जमा कर दिया। इन बीस दिनों के बीच वह घर-घर घूमा। मुख़्तारों के पास गया, हलवाइयों और वैद्यों के पास गया, कपड़े के आढ़तियों से लेकर अंग्रेज़ी डॉक्टरों तक पहुँचा और कुल मिलाकर एक हज़ार रुपया और जमा हो गया।

सबकी आँखों में महेस पाण्डे का रुतबा और सम्मान एकाएक बढ़ गया था। अब सिर पर वह गेरुआ साफ़ा बाँधने लगा था और हाथ में लाठी लेकर चलता था। शरीर कुछ शिथिल हो रहा था।

लेकिन इस ढलते शरीर के साथ भी वह दिन-भर घूमता और अपने साफे में किसी चिड़िया का गिरा हुआ सुन्दर-सा पर कलगी की तरह खोंस लेता। चुंगी दफ़्तर में जाकर वह नक्शे भी देख आया था। नीलाम का दिन पास आ रहा था, और जैसे-जैसे वह दिन निकट आता जाता, महेस पाण्डे की उदासी और बढ़ती जाती।

झील पर शिकार खेलने के लिए आदमियों की बहुत-सी टोलियाँ इस बीच आयीं और गयीं, और अपने घर पर बैठे या बस्ती में घूमते हुए उसने जब-जब चीत्कारें सुनीं और साहब शिकारियों को नरम पंख वाली चिड़ियों को लटकाये ले जाते देखा, तब-तब उसे पारबती की याद आयी बेतरह। उसकी हालत भी तो उस सारस के जोड़े की तरह ही थी...

घर में लेटता तो उड़ते पक्षियों के नरम, कोमल पंखों की सरसराहट उसे महसूस होती, जैसे पारबती केलासन की धोती पहने अदृश्य रूप से गुज़र गयी हो। ...पर्वतों से आये मेहमान पक्षियों के सफेद और सेमल की रूई-से सजीले पंख और पारबती के सफ़ेद दाँत!

सुबह उठा तो मन नहीं लगा और वह शान्ति पाने के लिए झील की ओर चला।

झील पर पहुँचकर अपनी लाठी से वह काई को छितराता रहा। सिवार के सूतों को उलझाकर उसने निकाला, नन्हे-नन्हे बीज चुनकर मुँह में डाल लिए और उठकर उधर चला गया, जिस ओर जलमंजरी खिली हुई थी। जलमंजरी के पास से ही दलदल शुरू हो जाता था। नारी की बेल पानी में तारों की तरह बिछी हुई थी और गाँठों के पास नन्हे-नन्हे घोंघे चिपके हुए थे। सूत-सी सफ़ेद नन्ही-नन्ही जड़ें मछली के उजले पंखों की तरह धीरे-धीरे काँप रही थीं। दलदल में घुसकर उसने जलमंजरी के फूल तोड़े और गुच्छा बनाकर लौटने लगा।

सोनापतारी का झुण्ड रात-भर चारा खाकर उड़ने ही वाला था कि एक गोली उस पार से छूटी और उड़ते सोनापतारी के झुण्ड में से एक पक्षी बिलबिलाकर छप्प-से झील के बीचोबीच गिर पड़ा। उसके सोने से पंख पानी पर छितरा गये और नीली झील के ख़ामोश पानी पर एक हलचल हुई। एक क्षण बाद ही लाल ख़ून की एक पतली-सी लकीर पानी पर खिंची और सोनापतारी तैरती हुई उस पार जाने की कोशिश करने लगी। उसके नरम पंख फड़फड़ा रहे थे और पानी पर ख़ून की लकीर उसका पीछा कर रही थी।

झुरमुट में से शिकारी निकले। उन्होंने देखा, पर वह पक्षी, तैरता हुआ उस किनारे निकलकर किसी झाड़ी में दुबककर ख़ामोश हो गया। शिकारियों ने बहुत खोजा पर पक्षी नहीं मिला। झील पर मिटती हुई लकीर के बीच एकाध पंख पड़ा था।

उसका मन उचाट हो गया । जलमंजरी के फूलों को वहीं फेंककर वह लौट आया।

पारबती की याद उसे फिर आयी और नीलामी वाले दिन उसने तीन हज़ार की बोली लगाकर चबूतरे के पास वाली ज़मीन नहीं, दलदली नीली झील ख़रीद ली। लोगों की आँखें फट गयीं। इसका दिमाग़ तो नहीं ख़राब हो गया?

“मन्दिर का नाम लेकर इसने धोखा दिया है। रुपया हजम कर गया है।”

लेकिन उसने किसी को कुछ भी जवाब नहीं दिया, और मन में लगता कि अब तो वह पारबती को भी जवाब नहीं दे सकता । उसके पास जवाब है ही क्या?

फागुन आते-आते मेहमान पक्षी उड़ गये। सवनहंस चले गये, सफ़ेद सुरखाब अपने पुराने घरों में लौट गये। मुअर, सन्‍द, करकर्रा और सरपपच्छी भी चले गये। ...झील बहुत सूनी हो गयी थी, पर महेस पाण्डे को विश्वास था कि ये फिर हमेशा की तरह अपने झुण्डों के साथ कातिक-अगहन तक वापस आवेंगे।

महेस पाण्डे लिखना-पढ़ना तो जानता नहीं था, बस झील वाले रास्ते के पहले पेड़ पर उसने एक तख्ती टाँग दी थी, जिस पर उसने लिखा था, 'यहाँ शिकार करना मना है।' और नीचे की पंक्ति थी, 'दस्तखत नीली झील का मालिक, महेस पाण्डे!'

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