Sunday, January 14, 2024

यही सच है - मन्नू भंडारी


कानपुर

सामने आँगन में फैली धूप सिमटकर दीवारों पर चढ़ गई और कंधे पर बस्ता लटकाए नन्हे-नन्हे बच्चों के झुंड-के-झुंड दिखाई दिए, तो एकाएक ही मुझे समय का आभास हुआ। घंटा भर हो गया यहाँ खड़े-खड़े और संजय का अभी तक पता नहीं! झुँझलाती-सी मैं कमरे में आती हूँ। कोने में रखी मेज पर किताबें बिखरी पड़ी हैं, कुछ खुली, कुछ बंद। एक क्षण मैं उन्हें देखती रहती हूँ, फिर निरुद्देश्य-सी कपड़ों की अलमारी खोलकर सरसरी-सी नजर से कपड़े देखती हूँ। सब बिखरे पड़े हैं। इतनी देर यों ही व्यर्थ खड़ी रही, इन्हें ही ठीक कर लेती। पर मन नहीं करता और फिर बंद कर देती हूँ।

नहीं आना था तो व्यर्थ ही मुझे समय क्यों दिया? फिर यह कोई आज ही की बात है! हमेशा संजय अपने बताए हुए समय से घंटे-दो घंटे देरी करके आता है, और मैं हूँ कि उसी क्षण से प्रतीक्षा करने लगती हूँ। उसके बाद लाख कोशिश करके भी तो किसी काम में अपना मन नहीं लगा पाती। वह क्यों नहीं समझता कि मेरा समय बहुत अमूल्य है, थीसिस पूरी करने के लिए अब मुझे अपना सारा समय पढ़ाई में ही लगाना चाहिए। पर यह बात उसे कैसे समझाऊँ!

मेज पर बैठकर मैं फिर पढ़ने का उपक्रम करने लगती हूँ, पर मन है कि लगता ही नहीं। पर्दे के जरा-से हिलने से दिल की धड़कन बढ़ जाती है और बार-बार नजर घड़ी के सरकते हुए काँटों पर दौड़ जाती है। हर समय यही लगता है, वह आया! वह आया!


तभी मेहता साहब की पाँच साल की छोटी बच्ची झिझकती-सी कमरे में आती है, “आंटी, हमें कहानी सुनाओगी?”

“नहीं, अभी नहीं, पीछे आना!” मैं रुखाई से जवाब देती हूँ। वह भाग जाती है।

ये मिसेज मेहता भी एक ही हैं! यों तो महीनों शायद मेरी सूरत नहीं देखतीं, पर बच्ची को जब-तब मेरा सिर खाने को भेज देती हैं। मेहता साहब तो फिर भी कभी-कभी आठ-दस दिन में खैरियत पूछ ही लेते हैं, पर वे तो बेहद अकड़ू मालूम होती हैं। अच्छा ही है, ज्यादा दिलचस्पी दिखातीं तो क्या मैं इतनी आजादी से घूम-फिर सकती थी!

खट.. खट.. खट वही परिचित पदध्वनि! तो आ गया संजय। मैं बरबस ही अपना सारा ध्यान पुस्तक में केंद्रित कर लेती हूँ। रजनीगंधा के ढेर सारे फूल लिए संजय मुस्कुराता-सा दरवाजे पर खड़ा है। मैं देखती हूँ, पर मुस्कुराकर स्वागत नहीं करती। हँसता हुआ वह आगे बढ़ता है और फूलों को मेज पर पटककर, पीछे से मेरे दोनों कंधे दबाता हुआ पूछता है, “बहुत नाराज हो?”

रजनीगंधा की महक से जैसे सारा कमरा महकने लगता है।

“मुझे क्या करना है नाराज होकर?” रुखाई से मैं कहती हूँ।

वह कुर्सी सहित मुझे घुमाकर अपने सामने कर लेता है, और बड़े दुलार के साथ ठोड़ी उठाकर कहता है, “तुम्हीं बताओ क्या करता? क्वालिटी में दोस्तों के बीच फँसा था। बहुत कोशिश करके भी उठ नहीं पाया। सबको नाराज करके आना अच्छा भी नहीं लगता।”

इच्छा होती है, कह दूँ – ‘तुम्हें दोस्तों का खयाल है, उनके बुरा मानने की चिंता है, बस मेरी ही नहीं!’ पर कुछ कह नहीं पाती, एकटक उसके चेहरे की ओर देखती रहती हूँ… उसके साँवले चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही हैं। कोई और समय होता तो मैंने अपने आँचल से इन्हें पोंछ दिया होता, पर आज नहीं। वह मंद-मंद मुस्कुरा रहा है, उसकी आँखें क्षमा-याचना कर रही हैं, पर मैं क्या करूँ? तभी वह अपनी आदत के अनुसार कुर्सी के हत्थे पर बैठकर मेरे गाल सहलाने लगता है। मुझे उसकी इसी बात पर गुस्सा आता है। हमेशा इसी तरह करेगा और फिर दुनिया-भर का लाड़-दुलार दिखलाएगा। वह जानता जो है कि इसके आगे मेरा क्रोध टिक नहीं पाता। फिर उठकर वह फूलदान के पुराने फूल फेंक देता है, और नए फूल लगाता है। फूल सजाने में वह कितना कुशल है! एक बार मैंने यों ही कह दिया था कि मुझे रजनीगंधा के फूल बड़े पसंद हैं, तो उसने नियम ही बना लिया कि हर चौथे दिन ढेर-सारे फूल लाकर मेरे कमरे में लगा देता है। और अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढ़ने में मन लगता है, न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं।

थोड़ी देर बाद हम घूमने निकल जाते हैं। एकाएक ही मुझे इरा के पत्र की बात याद आती है। जो बात सुनने के लिए मैं सवेरे से ही आतुर थी, इस गुस्सेबाजी में जाने कैसे उसे ही भूल गई!

“सुनो, इरा ने लिखा है कि किसी दिन भी मेरे पास इंटरव्यू का बुलावा आ सकता है, मुझे तैयार रहना चाहिए।”

“कहाँ, कलकत्ता से?” कुछ याद करते हुए संजय पूछता है, और फिर एकाएक ही उछल पड़ता है, “यदि तुम्हें वह जॉब मिल जाए तो मजा आ जाए, दीपा, मजा आ जाए!”

हम सड़क पर हैं, नहीं तो अवश्य ही उसने आवेश में आकर कोई हरकत कर डाली होती। जाने क्यों, मुझे उसका इस प्रकार प्रसन्न होना अच्छा नहीं लगता। क्या वह चाहता है कि मैं कलकत्ता चली जाऊँ, उससे दूर…

तभी सुनाई देता है, “तुम्हें यह जॉब मिल जाए तो मैं भी अपना तबादला कलकत्ता ही करवा लूँ, हेड ऑफिस में। यहाँ की रोज की किच-किच से तो मेरा मन ऊब गया है। कितनी ही बार सोचा कि तबादले की कोशिश करूँ, पर तुम्हारे खयाल ने हमेशा मुझे बाँध लिया। ऑफिस में शांति हो जाएगी, पर मेरी शामें कितनी वीरान हो जाएँगी!”

उसके स्वर की आर्द्रता ने मुझे छू लिया। एकाएक ही मुझे लगने लगा कि रात बड़ी सुहावनी हो चली है।

हम दूर निकलकर अपनी प्रिय टेकरी पर जाकर बैठ जाते हैं। दूर-दूर तक हल्की-सी चाँदनी फैली हुई है और शहर की तरह यहाँ का वातावरण धुएँ से भरा हुआ नहीं है। वह दोनों पैर फैलाकर बैठ जाता है और घंटों मुझे अपने ऑफिस के झगड़े की बात सुनाता है और फिर कलकत्ता जाकर साथ जीवन बिताने की योजनाएँ बनाता है। मैं कुछ नहीं बोलती, बस एकटक उसे देखती हूँ, देखती रहती हूँ।

जब वह चुप हो जाता है तो बोलती हूँ, “मुझे तो इंटरव्यू में जाते हुए बड़ा डर लगता है। पता नहीं, कैसे क्या पूछते होंगे! मेरे लिए तो यह पहला ही मौका है।”

वह खिलखिलाकर हँस पड़ता है।

“तुम भी एक ही मूर्ख हो! घर से दूर, यहाँ कमरा लेकर अकेली रहती हो, रिसर्च कर रही हो, दुनिया-भर में घूमती-फिरती हो और इंटरव्यू के नाम से डर लगता है। क्यों?” और गाल पर हल्की-सी चपत जमा देता है। फिर समझाता हुआ कहता है, “और देखो, आजकल ये इंटरव्यू आदि तो सब दिखावा मात्र होते हैं। वहाँ किसी जान-पहचान वाले से इन्फ्लुएंस डलवाना जाकर!”

“पर कलकत्ता तो मेरे लिए एकदम नई जगह है। वहाँ इरा को छोड़कर मैं किसी को जानती भी नहीं। अब उन लोगों की कोई जान-पहचान हो तो बात दूसरी है,” असहाय-सी मैं कहती हूँ।

“और किसी को नहीं जानतीं?” फिर मेरे चेहरे पर नजरें गड़ाकर पूछता है, “निशीथ भी तो वहीं है?”

“होगा, मुझे क्या करना है उससे?” मैं एकदम ही भन्नाकर जवाब देती हूँ। पता नहीं क्यों, मुझे लग ही रहा था कि अब वह यही बात कहेगा।

“कुछ नहीं करना?” वह छेड़ने के लहजे में कहता है।

और मैं भभक पड़ती हूँ, “देखो संजय, मैं हजार बार तुमसे कह चुकी हूँ कि उसे लेकर मुझसे मजाक मत किया करो! मुझे इस तरह का मजाक जरा भी पसंद नहीं है!”

वह खिलखिलाकर हँस पड़ता है, पर मेरा तो मूड ही खराब हो जाता है।

हम लौट पड़ते हैं। वह मुझे खुश करने के इरादे से मेरे कंधे पर हाथ रख देता है। मैं झपटकर हाथ हटा देती हूँ, “क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?”

“कौन है यहाँ जो देख लेगा? और देख लेगा तो देख ले, आप ही कुढ़ेगा।”

“नहीं, हमें पसंद नहीं हैं यह बेशर्मी!” और सच ही मुझे रास्ते में ऐसी हरकतें पसंद नहीं हैं चाहे रास्ता निर्जन ही क्यों न हो, पर है तो रास्ता ही, फिर कानपुर जैसी जगह।

कमरे में लौटकर मैं उसे बैठने को कहती हूँ, पर वह बैठता नहीं, बस बाँहों में भरकर एक बार चूम लेता है। यह भी जैसे उसका रोज का नियम है।

वह चला जाता है। मैं बाहर बालकनी में निकलकर उसे देखती रहती हूँ। उसका आकार छोटा होते-होते सड़क के मोड़ पर जाकर लुप्त हो जाता है। मैं उधर ही देखती रहती हूँ – निरुद्देश्य-सी, खोई-खोई-सी। फिर आकर पढ़ने बैठ जाती हूँ।

रात में सोती हूँ तो देर तक मेरी आँखें मेज पर लगे रजनीगंधा के फूलों को ही निहारती रहती हैं। जाने क्यों, अक्सर मुझे भ्रम हो जाता है कि ये फूल नहीं हैं, मानो संजय की अनेकानेक आँखें हैं, जो मुझे देख रही हैं, सहला रही हैं, दुलरा रही हैं। और अपने को यों असंख्य आँखों से निरंतर देखे जाने की कल्पना से ही मैं लजा जाती हूँ।

मैंने संजय को भी एक बार यह बात बताई थी, तो वह खूब हँसा था और फिर मेरे गालों को सहलाते हुए उसने कहा था कि मैं पागल हूँ, निरी मूर्खा हूँ!

कौन जाने, शायद उसका कहना ही ठीक हो, शायद मैं पागल ही होऊँ!

कानपुर

मैं जानती हूँ, संजय का मन निशीथ को लेकर जब-तब सशंकित हो उठता है, पर मैं उसे कैसे विश्वास दिलाऊँ कि मैं निशीथ से नफरत करती हूँ, उसकी याद-मात्र से मेरा मन घृणा से भर उठता है। फिर अठारह वर्ष की आयु में किया हुआ प्यार भी कोई प्यार होता है भला! निरा बचपन होता है, महज पागलपन! उसमें आवेश रहता है पर स्थायित्व नहीं, गति रहती है पर गहराई नहीं। जिस वेग से वह आरंभ होता है, जरा-सा झटका लगने पर उसी वेग से टूट भी जाता है। और उसके बाद आहों, आँसुओं और सिसकियों का एक दौर, सारी दुनिया की निस्सारता और आत्महत्या करने के अनेकानेक संकल्प और फिर एक तीखी घृणा। जैसे ही जीवन को दूसरा आधार मिल जाता है, उन सबको भूलने में एक दिन भी नहीं लगता। फिर तो वह सब ऐसी बेवकूफी लगती है, जिस पर बैठकर घंटों हँसने की तबीयत होती है। तब एकाएक ही इस बात का अहसास होता है कि ये सारे आँसू, ये सारी आहें उस प्रेमी के लिए नहीं थीं, वरन जीवन की उस रिक्तता और शून्यता के लिए थीं, जिसने जीवन को नीरस बनाकर बोझिल कर दिया था।

तभी तो संजय को पाते ही मैं निशीथ को भूल गई। मेरे आँसू हँसी में बदल गए और आहों की जगह किलकारियाँ गूँजने लगीं। पर संजय है कि जब-तब निशीथ की बात को लेकर व्यर्थ ही खिन्न-सा हो उठता है। मेरे कुछ कहने पर वह खिलखिला अवश्य पड़ता है, पर मैं जानती हूँ, वह पूर्ण रूप से आश्वस्त नहीं है।

उसे कैसे बताऊँ कि मेरे प्यार का, मेरी कोमल भावनाओं का, भविष्य की मेरी अनेकानेक योजनाओं का एकमात्र केंद्र संजय ही है। यह बात दूसरी है कि चाँदनी रात में, किसी निर्जन स्थान में, पेड़ तले बैठकर भी मैं अपनी थीसिस की बात करती हूँ या वह अपने ऑफिस की, मित्रों की बातें करता है, या हम किसी और विषय पर बात करने लगते हैं पर इस सबका यह मतलब तो नहीं कि हम प्रेम नहीं करते! वह क्यों नहीं समझता कि आज हमारी भावुकता यथार्थ में बदल गई है, सपनों की जगह हम वास्तविकता में जीते हैं! हमारे प्रेम को परिपक्वता मिल गई है, जिसका आधार पाकर वह अधिक गहरा हो गया है, स्थायी हो गया है।

पर संजय को कैसे समझाऊँ यह सब? कैसे उसे समझाऊँ कि निशीथ ने मेरा अपमान किया है, ऐसा अपमान, जिसकी कचोट से मैं आज भी तिलमिला जाती हूँ। संबंध तोड़ने से पहले एक बार तो उसने मुझे बताया होता कि आखिर मैंने ऐसा कौन-सा अपराध कर डाला था, जिसके कारण उसने मुझे इतना कठोर दंड दे डाला? सारी दुनिया की भर्त्सना, तिरस्कार, परिहास और दया का विष मुझे पीना पड़ा। विश्वासघाती! नीच कहीं का! और संजय सोचता है कि आज भी मेरे मन में उसके लिए कोई कोमल स्थान है! छिः! मैं उससे नफरत करती हूँ! और सच पूछो तो अपने को भाग्यशालिनी समझती हूँ कि मैं एक ऐसे व्यक्ति के चंगुल में फँसने से बच गई, जिसके लिए प्रेम महज एक खिलवाड़ है।

संजय, यह तो सोचो कि यदि ऐसी कोई भी बात होती, तो क्या मैं तुम्हारे आगे, तुम्हारी हर उचित-अनुचित चेष्टा के आगे, यों आत्मसमर्पण करती? तुम्हारे चुंबनों और आलिंगनों में अपने को यों बिखरने देती? जानते हो, विवाह से पहले कोई भी लड़की किसी को इन सबका अधिकार नहीं देती। पर मैंने दिया। क्या केवल इसीलिए नहीं कि मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, बहुत-बहुत प्यार करती हूँ? विश्वास करो संजय, तुम्हारा-मेरा प्यार ही सच है। निशीथ का प्यार तो मात्र छल था, भ्रम था, झूठ था।

कानपुर

परसों मुझे कलकत्ता जाना है। बड़ा डर लग रहा है। कैसे क्या होगा? मान लो, इंटरव्यू में बहुत नर्वस हो गई तो? संजय को कह रही हूँ कि वह भी साथ चले, पर उसे ऑफिस से छुट्टी नहीं मिल सकती। एक तो नया शहर, फिर इंटरव्यू! अपना कोई साथ होता तो बड़ा सहारा मिल जाता। मैं कमरा लेकर अकेली रहती हूँ, यों अकेली घूम-फिर भी लेती हूँ तो संजय सोचता है, मुझमें बड़ी हिम्मत है, पर सच, बड़ा डर लग रहा है।

बार-बार मैं यह मान लेती हूँ कि मुझे नौकरी मिल गई है और मैं संजय के साथ वहाँ रहने लगी हूँ। कितनी सुंदर कल्पना है, कितनी मादक! पर इंटरव्यू का भय मादकता से भरे इस स्वप्नजाल को छिन्न-भिन्न कर देता है।

काश, संजय भी किसी तरह मेरे साथ चल पाता!

कलकत्ता

गाड़ी जब हावड़ा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर प्रवेश करती है तो जाने कैसी विचित्र आशंका, विचित्र-से भय से मेरा मन भर जाता है। प्लेटफॉर्म पर खड़े असंख्य नर-नारियों में मैं इरा को ढूँढती हूँ। वह कहीं दिखाई नहीं देती। नीचे उतरने के बजाय खिड़की में से ही दूर-दूर तक नजरें दौड़ाती हूँ। आखिर एक कुली को बुलाकर, अपना छोटा-सा सूटकेस और बिस्तर उतारने का आदेश दे, मैं नीचे उतर पड़ती हूँ। उस भीड़ को देखकर मेरी दहशत जैसे और बढ़ जाती है। तभी किसी के हाथ के स्पर्श से मैं बुरी तरह चौंक जाती हूँ। पीछे देखती हूँ तो इरा खड़ी है।

रूमाल से चेहरे का पसीना पोंछते हुए कहती हूँ, “ओफ! तुझे न देखकर मैं घबरा रही थी कि तुम्हारे घर भी कैसे पहुँचूँगी!”

बाहर आकर हम टैक्सी में बैठते हैं। अभी तक मैं स्वस्थ नहीं हो पाई हूँ। जैसे ही हावड़ा-पुल पर गाड़ी पहुँचती है, हुगली के जल को स्पर्श करती हुई ठंडी हवाएँ तन-मन को एक ताजगी से भर देती हैं। इरा मुझे इस पुल की विशेषता बताती है और मैं विस्मित-सी उस पुल को देखती हूँ, दूर-दूर तक फैले हुगली के विस्तार को देखती हूँ, उसकी छाती पर खड़ी और विहार करती अनेक नौकाओं को देखती हूँ, बड़े-बड़े जहाजों को देखती हूँ।

उसके बाद बहुत ही भीड़-भरी सड़कों पर हमारी टैक्सी रुकती-रुकती चलती है। ऊँची-ऊँची इमारतों और चारों ओर के वातावरण से कुछ विचित्र-सी विराटता का आभास होता है, और इस सबके बीच जैसे मैं अपने को बड़ा खोया-खोया-सा महसूस करती हूँ। कहाँ पटना और कानपुर और कहाँ यह कलकत्ता! मैंने तो आज तक कभी बहुत बड़े शहर देखे ही नहीं!

सारी भीड़ को चीरकर हम रेड रोड पर आ जाते हैं। चौड़ी शांत सड़क। मेरे दोनों ओर लंबे-चौड़े खुले मैदान।

“क्यों इरा, कौन-कौन लोग होंगे इंटरव्यू में? मुझे तो बड़ा डर लग रहा है।”

“अरे, सब ठीक हो जाएगा! तू और डर? हम जैसे डरें तो कोई बात भी है। जिसने अपना सारा कैरियर अपने-आप बनाया, वह भला इंटरव्यू में डरे! फिर कुछ देर ठहरकर कहती है, “अच्छा, भैया-भाभी तो पटना ही होंगे? जाती है कभी उनके पास भी या नहीं?”

“कानपुर आने के बाद एक बार गई थी। कभी-कभी यों ही पत्र लिख देती हूँ।”

“भई कमाल के लोग हैं! बहन को भी नहीं निभा सके!”

मुझे यह प्रसंग कतई पसंद नहीं। मैं नहीं चाहती कि कोई इस विषय पर बात करे। मैं मौन ही रहती हूँ।

इरा का छोटा-सा घर है, सुंदर ढंग से सजाया हुआ। उसके पति के दौरे पर जाने की बात सुनकर पहले तो मुझे अफसोस हुआ था, वे होते तो कुछ मदद ही करते! पर फिर एकाएक लगा कि उनकी अनुपस्थिति में मैं शायद अधिक स्वतंत्रता का अनुभव कर सकूँ। उनका बच्चा भी बड़ा प्यारा है।

शाम को इरा मुझे कॉफी-हाउस ले जाती है। अचानक मुझे वहाँ निशीथ दिखाई देता है। मैं सकपकाकर नजर घुमा लेती हूँ। पर वह हमारी मेज पर ही आ पहुँचता है। विवश होकर मुझे उधर देखना पड़ता है, नमस्कार भी करना पड़ता है, इरा का परिचय भी करवाना पड़ता है। इरा पास की कुर्सी पर बैठने का निमंत्रण दे देती है। मुझे लगता है, मेरी साँस रुक जाएगी।

“कब आईं?”

“आज सवेरे ही।”

“अभी ठहरोगी? ठहरी कहाँ हो?”

जवाब इरा देती है। मैं देख रही हूँ, निशीथ बहुत बदल गया है। उसने कवियों की तरह बाल बढ़ा लिए हैं। यह क्या शौक चर्राया? उसका रंग स्याह पड़ गया है। वह दुबला भी हो गया है।

विशेष बातचीत नहीं होती और हम लोग उठ पड़ते हैं। इरा को मुन्नू की चिंता सता रही थी, और मैं स्वयं भी घर पहुँचने को उतावली हो रही थी। कॉफी-हाउस से धर्मतल्ला तक वह पैदल चलता हुआ हमारे साथ आता है। इरा उससे बात कर रही है, मानो वह इरा का ही मित्र हो! इरा अपना पता समझा देती है और वह दूसरे दिन नौ बजे आने का वायदा करके चला जाता है।

पूरे तीन साल बाद निशीथ का यों मिलना! न चाहकर भी जैसे सारा अतीत आँखों के सामने खुल जाता है। बहुत दुबला हो गया है निशीथ! लगता है, जैसे मन में कहीं कोई गहरी पीड़ा छिपाए बैठा है।

मुझसे अलग होने का दुख तो नहीं साल रहा है इसे?

कल्पना चाहे कितनी भी मधुर क्यों न हो, एक तृप्ति-युक्त आनंद देनेवाली क्यों न हो, पर मैं जानती हूँ, यह झूठ है। यदि ऐसा ही था तो कौन उसे कहने गया था कि तुम इस संबंध को तोड़ दो? उसने अपनी इच्छा से ही तो यह सब किया था।

एकाएक ही मेरा मन कटु हो उठता है। यही तो है वह व्यक्ति जिसने मुझे अपमानित करके सारी दुनिया के सामने छोड़ दिया था, महज उपहास का पात्र बनाकर! ओह, क्यों नहीं मैंने उसे पहचानने से इनकार कर दिया? जब वह मेज के पास आकर खड़ा हुआ, तो क्यों नहीं मैंने कह दिया कि माफ कीजिए, मैं आपको पहचानती नहीं। जरा उसका खिसियाना तो देखती! वह कल भी आएगा। मुझे उसे साफ-साफ मना कर देना चाहिए था कि मैं उसकी सूरत भी नहीं देखना चाहती, मैं उससे नफरत करती हूँ!

अच्छा है, आए कल! मैं उसे बता दूँगी कि जल्दी ही मैं संजय से विवाह करने वाली हूँ। यह भी बता दूँगी कि मैं पिछला सब कुछ भूल चुकी हूँ। यह भी बता दूँगी कि मैं उससे घृणा करती हूँ और उसे जिन्दगी में कभी माफ नहीं कर सकती।

यह सब सोचने के साथ-साथ जाने क्यों, मेरे मन में यह बात भी उठ रही थी कि तीन साल हो गए, अभी तक निशीथ ने विवाह क्यों नहीं किया? करे न करे, मुझे क्या?

क्या वह आज भी मुझसे कुछ उम्मीद रखता है? हूँ! मूर्ख कहीं का!

संजय! मैंने तुमसे कितना कहा था कि तुम मेरे साथ चलो, पर तुम नहीं आए। इस समय जबकि मुझे तुम्हारी इतनी-इतनी याद आ रही है, बताओ मैं क्या करूँ?

कलकत्ता

नौकरी पाना इतना मुश्किल है, इसका मुझे गुमान तक नहीं था। इरा कहती है कि डेढ़ सौ की नौकरी के लिए खुद मिनिस्टर तक सिफारिश करने पहुँच जाते हैं, फिर यह तो तीन सौ का जॉब है। निशीथ सवेरे से शाम तक इसी चक्कर में भटका है, यहाँ तक कि उसने अपने ऑफिस से भी छुट्टी ले ली है। वह क्यों मेरे काम में इतनी दिलचस्पी ले रहा है?

उसका परिचय बड़े-बड़े लोगों से है और वह कहता है कि जैसे भी होगा, वह यह काम मुझे दिलाकर ही मानेगा। पर आखिर क्यों?

कल मैंने सोचा था कि अपने व्यवहार की रुखाई से मैं स्पष्ट कर दूँगी कि अब वह मेरे पास न आए। पौने नौ बजे के करीब, जब मैं अपने टूटे हुए बाल फेंकने खिड़की पर गई, तो देखा, घर से थोड़ी दूर पर निशीथ टहल रहा है। वही लंबे बाल, कुरता-पाजामा। तो वह समय से पहले ही आ गया! संजय होता तो ग्यारह के पहले नहीं पहुँचता, समय पर पहुँचना तो वह जानता ही नहीं।

उसे यों चक्कर काटते देख मेरा मन जाने कैसा हो आया। और जब वह आया तो मैं चाहकर भी कटु नहीं हो सकी। मैंने उसे कलकत्ता आने का मकसद बताया, तो लगा कि वह बड़ा प्रसन्न हुआ। वहीं बैठे-बैठे फोन करके उसने इस नौकरी के संबंध में सारी जानकारी प्राप्त कर ली, कैसे क्या करना होगा, उसकी योजना भी बना डाली, बैठे-बैठे फोन से ऑफिस को सूचना भी दे दी कि आज वह ऑफिस नहीं आएगा।

विचित्र स्थिति मेरी हो रही थी। उसके इस अपनत्व-भरे व्यवहार को मैं स्वीकार भी नहीं कर पाती थी, नकार भी नहीं पाती थी। सारा दिन मैं उसके साथ घूमती रही, पर काम की बात के अतिरिक्त उसने एक भी बात नहीं की। मैंने कई बार चाहा कि संजय की बात बता दूँ, पर बता नहीं सकी। सोचा, कहीं यह सब सुनकर वह दिलचस्पी लेना कम न कर दे। उसके आज-भर के प्रयत्नों से ही मुझे काफी उम्मीद हो चली थी। यह नौकरी मेरे लिए कितनी आवश्यक है, मिल जाए तो संजय कितना प्रसन्न होगा, हमारे विवाहित जीवन के आरंभिक दिन कितने सुख में बीतेंगे!

शाम को हम घर लौटते हैं। मैं उसे बैठने को कहती हूँ, पर वह बैठता नहीं, बस खड़ा ही रहता है। उसके चौड़े ललाट पर पसीने की बूँदें चमक रही हैं। एकाएक ही मुझे लगता है, इस समय संजय होता, तो? मैं अपने आँचल से उसका पसीना पोंछ देती, और वह क्या बिना बाँहों में भरे, बिना प्यार किए यों ही चला जाता?

“अच्छा, तो चलता हूँ।”

यंत्रचालित-से मेरे हाथ जुड़ जाते हैं, वह लौट पड़ता है और मैं ठगी-सी देखती रहती हूँ।

सोते समय मेरी आदत है कि संजय के लाए हुए फूलों को निहारती रहती हूँ। यहाँ वे फूल नहीं हैं तो बड़ा सूना-सूना सा लग रहा है।

पता नहीं संजय, तुम इस समय क्या कर रहे हो! तीन दिन हो गए, किसी ने बाँहों में भरकर प्यार तक नहीं किया।

कलकत्ता

आज सवेरे मेरा इंटरव्यू हो गया है। मैं शायद बहुत नर्वस हो गई थी और जैसे उत्तर मुझे देने चाहिए, वैसे नहीं दे पाई। पर निशीथ ने आकर बताया कि मेरा चुना जाना करीब-करीब तय हो गया है। मैं जानती हूँ, यह सब निशीथ की वजह से ही हुआ।

ढलते सूरज की धूप निशीथ के बाएँ गाल पर पड़ रही थी और सामने बैठा निशीथ इतने दिन बाद एक बार फिर मुझे बड़ा प्यारा-सा लगा।

मैंने देखा, मुझसे ज्यादा वह प्रसन्न है। वह कभी किसी का अहसान नहीं लेता, पर मेरी खातिर उसने न जाने कितने लोगों का अहसान लिया। आखिर क्यों? क्या वह चाहता है कि मैं कलकत्ता आकर रहूँ उसके साथ, उसके पास? एक अजीब-सी पुलक से मेरा तन-मन सिहर उठता है। वह ऐसा क्यों चाहता है? उसका ऐसा चाहना बहुत गलत है, बहुत अनुचित है! मैं अपने मन को समझाती हूँ, ऐसी कोई बात नहीं है, शायद वह केवल मेरे प्रति किए गए अन्याय का प्रतिकार करने के लिए यह सब कर रहा है! पर क्या वह समझता है कि उसकी मदद से नौकरी पाकर मैं उसे क्षमा कर दूँगी, या जो कुछ उसने किया है, उसे भूल जाऊँगी? असंभव! मैं कल ही उसे संजय की बात बता दूँगी।

“आज तो इस खुशी में पार्टी हो जाए!”

काम की बात के अलावा यह पहला वाक्य मैं उसके मुँह से सुनती हूँ, मैं इरा की ओर देखती हूँ। वह प्रस्ताव का समर्थन करके भी मुन्नू की तबीयत का बहाना लेकर अपने को काट लेती है। अकेले जाना मुझे कुछ अटपटा-सा लगता है। अभी तक तो काम का बहाना लेकर घूम रही थी, पर अब? फिर भी मैं मना नहीं कर पाती। अंदर जाकर तैयार होती हूँ। मुझे याद आता है, निशीथ को नीला रंग बहुत पसंद था, मैं नीली साड़ी ही पहनती हूँ। बड़े चाव और सतर्कता से अपना प्रसाधन करती हूँ, और बार-बार अपने को टोकती जाती हूँ – किसको रिझाने के लिए यह सब हो रहा है? क्या यह निरा पागलपन नहीं है?

सीढ़ियों पर निशीथ हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ कहता है, “इस साड़ी में तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”

मेरा चेहरा तमतमा जाता है, कनपटियाँ सुर्ख हो जाती हैं। मैं सचमुच ही इस वाक्य के लिए तैयार नहीं थी। यह सदा चुप रहनेवाला निशीथ बोला भी तो ऐसी बात।

मुझे ऐसी बातें सुनने की जरा भी आदत नहीं है। संजय न कभी मेरे कपड़ों पर ध्यान देता है, न ऐसी बातें करता है, जब कि उसे पूरा अधिकार है। और यह बिना अधिकार ऐसी बातें करे?…

पर जाने क्या है कि मैं उस पर नाराज नहीं हो पाती हूँ, बल्कि एक पुलकमय सिहरन महसूस करती हूँ। सच, संजय के मुँह से ऐसा वाक्य सुनने को मेरा मन तरसता रहता है, पर उसने कभी ऐसी बात नहीं की। पिछले ढाई साल से मैं संजय के साथ रह रही हूँ। रोज ही शाम को हम घूमने जाते हैं। कितनी ही बार मैंने शृंगार किया, अच्छे कपड़े पहने, पर प्रशंसा का एक शब्द भी उसके मुँह से नहीं सुना। इन बातों पर उसका ध्यान ही नहीं जाता, वह देखकर भी जैसे यह सब नहीं देख पाता। इस वाक्य को सुनने के लिए तरसता हुआ मेरा मन जैसे रस से नहा जाता है। पर निशीथ ने यह बात क्यों कही? उसे क्या अधिकार है?

क्या सचमुच ही उसे अधिकार नहीं है? नहीं है?

जाने कैसी मजबूरी है, कैसी विवशता है कि मैं इस बात का जवाब नहीं दे पाती हूँ। निश्चयात्मक दृढ़ता से नहीं कह पाती कि साथ चलते इस व्यक्ति को सचमुच ही मेरे विषय में ऐसी अवांछित बात कहने का कोई अधिकार नहीं है।

हम दोनों टैक्सी में बैठते हैं। मैं सोचती हूँ, आज मैं इसे संजय की बात बता दूँगी।

“स्काई-रूम!” निशीथ टैक्सीवाले को आदेश देता है।

‘टुन’ की घंटी के साथ मीटर डाउन होता है और टैक्सी हवा से बातें करने लगती है। निशीथ बहुत सतर्कता से कोने में बैठा है, बीच में इतनी जगह छोड़कर कि यदि हिचकोला खाकर भी टैक्सी रुके, तो हमारा स्पर्श न हो। हवा के झोंके से मेरी रेशमी साड़ी का पल्लू उसके समूचे बदन को स्पर्श करता हुआ उसकी गोदी में पड़कर फरफराता है। वह उसे हटाता नहीं है। मुझे लगता है, यह रेशमी, सुवासित पल्लू उसके तन-मन को रस से भिगो रहा है, यह स्पर्श उसे पुलकित कर रहा है, मैं विजय के अकथनीय आह्लाद से भर जाती हूँ।

आज भी मैं संजय की बात नहीं कह पाती। चाहकर भी नहीं कह पाती। अपनी इस विवशता पर मुझे खीझ भी आती है, पर मेरा मुँह है कि खुलता ही नहीं। मुझे लगता है कि मैं जैसे कोई बहुत बड़ा अपराध कर रही होऊँ, पर फिर भी मैं कुछ नहीं कह सकी।

यह निशीथ कुछ बोलता क्यों नहीं? उसका यों कोने में दुबककर निर्विकार भाव से बैठे रहना मुझे कतई अच्छा नहीं लगता। एकाएक ही मुझे संजय की याद आने लगती है। इस समय वह यहाँ होता तो उसका हाथ मेरी कमर में लिपटा होता! यों सड़क पर ऐसी हरकतें मुझे स्वयं पसंद नहीं, पर जाने क्यों, किसी की बाँहों की लपेट के लिए मेरा मन ललक उठता है। मैं जानती हूँ कि जब निशीथ बगल में बैठा हो, उस समय ऐसी इच्छा करना, या ऐसी बात सोचना भी कितना अनुचित है। पर मैं क्या करूँ? जितनी द्रुत-गति से टैक्सी चली जा रही है, मुझे लगता है, उतनी ही द्रुत-गति से मैं भी बही जा रही हूँ, अनुचित, अवांछित दिशाओं की ओर।

टैक्सी झटका खाकर रुकती है तो मेरी चेतना लौटती है। मैं जल्दी से दाहिनी ओर का फाटक खोलकर कुछ इस हड़बड़ी से नीचे उतर पड़ती हूँ, मानो अंदर निशीथ मेरे साथ कोई बदतमीजी कर रहा हो।

“अजी, इधर से उतरना चाहिए कभी?” टैक्सीवाला कहता है तो मुझे अपनी गलती का भान होता है। उधर निशीथ खड़ा है, इधर मैं, बीच में टैक्सी!

पैसे लेकर टैक्सी चली जाती है तो हम दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने हो जाते हैं। एकाएक ही मुझे खयाल आता है कि टैक्सी के पैसे तो मुझे ही देने चाहिए थे। पर अब क्या हो सकता था! चुपचाप हम दोनों अंदर जाते हैं। आस-पास बहुत कुछ है, चहल-पहल, रौशनी, रौनक। पर मेरे लिए जैसे सबका अस्तित्व ही मिट जाता है। मैं अपने को सबकी नजरों से ऐसे बचाकर चलती हूँ, मानो मैंने कोई अपराध कर डाला हो, और कोई मुझे पकड़ न ले।

क्या सचमुच ही मुझसे कोई अपराध हो गया है?

आमने-सामने हम दोनों बैठ जाते हैं। मैं होस्ट हूँ, फिर भी उसका पार्ट वही अदा कर रहा है। वही ऑर्डर देता है। बाहर की हलचल और उससे अधिक मन की हलचल में मैं अपने को खोया-खोया-सा महसूस करती हूँ।

हम दोनों के सामने बैरा कोल्ड-कॉफी के गिलास और खाने का कुछ सामान रख जाता है। मुझे बार-बार लगता है कि निशीथ कुछ कहना चाह रहा है। मैं उसके होंठों की धड़कन तक महसूस करती हूँ। वह जल्दी से कॉफी का स्ट्रॉ मुँह से लगा लेता है।

मूर्ख कहीं का! वह सोचता है, मैं बेवकूफ हूँ। मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि इस समय वह क्या सोच रहा है।

तीन दिन साथ रहकर भी हमने उस प्रसंग को नहीं छेड़ा। शायद नौकरी की बात ही हमारे दिमागों पर छाई हुई थी। पर आज… आज अवश्य ही वह बात आएगी! न आए, यह कितना अस्वाभाविक है! पर नहीं, स्वाभाविक शायद यही है। तीन साल पहले जो अध्याय सदा के लिए बंद हो गया, उसे उलटकर देखने का साहस शायद हम दोनों में से किसी में नहीं है। जो संबंध टूट गए, टूट गए। अब उन पर कौन बात करे? मैं तो कभी नहीं करूँगी। पर उसे तो करना चाहिए। तोड़ा उसने था, बात भी वही आरंभ करे। मैं क्यों करूँ, और मुझे क्या पड़ी है? मैं तो जल्दी ही संजय से विवाह करनेवाली हूँ। क्यों नहीं मैं इसे अभी संजय की बात बता देती? पर जाने कैसी विवशता है, जाने कैसा मोह है कि मैं मुँह नहीं खोल पाती। एकाएक मुझे लगता है जैसे उसने कुछ कहा

“आपने कुछ कहा?”

“नहीं तो!”

मैं खिसिया जाती हूँ।

फिर वही मौन! खाने में मेरा जरा भी मन नहीं लग रहा है, पर यंत्रचालित-सी मैं खा रही हूँ। शायद वह भी ऐसे ही खा रहा है। मुझे फिर लगता है कि उसके होंठ फड़क रहे हैं, और स्ट्रॉ पकड़े हुए उँगलियाँ काँप रही हैं। मैं जानती हूँ, वह पूछना चाहता है, ‘दीपा, तुमने मुझे माफ तो कर दिया न?’

वह पूछ ही क्यों नहीं लेता? मान लो, यदि पूछ ही ले, तो क्या मैं कह सकूँगी कि मैं तुम्हें जिंदगी-भर माफ नहीं कर सकती, मैं तुमसे नफरत करती हूँ, मैं तुम्हारे साथ घूम-फिर ली, या कॉफी पी ली, तो यह मत समझो कि मैं तुम्हारे विश्वासघात की बात को भूल गई हूँ?

और एकाएक ही पिछला सब कुछ मेरी आँखों के आगे तैरने लगता है। पर यह क्या? असह्य अपमानजनित पीड़ा, क्रोध और कटुता क्यों नहीं याद आती? मेरे सामने तो पटना में गुजारी सुहानी संध्याओं और चाँदनी रातों के वे चित्र उभर आते हैं, जब घंटों समीप बैठ, मौन भाव से हम एक-दूसरे को निहारा करते थे। बिना स्पर्श किए भी जाने कैसी मादकता तन-मन को विभोर किए रहती थी, जाने कैसी तन्मयता में हम डूबे रहते थे… एक विचित्र-सी, स्वप्निल दुनिया में! …मैं कुछ बोलना भी चाहती तो वह मेरे मुँह पर उँगली रखकर कहता, “आत्मीयता के ये क्षण अनकहे ही रहने दो, दीप!”

आज भी तो हम मौन ही हैं, एक-दूसरे के निकट ही हैं। क्या आज भी हम आत्मीयता के उन्हीं क्षणों में गुजर रहे हैं? मैं अपनी सारी शक्ति लगाकर चीख पड़ना चाहती हूँ, नहीं!… नहीं!… नहीं!… पर कॉफी सिप करने के अतिरिक्त मैं कुछ नहीं कर पाती। मेरा यह विरोध हृदय की न जाने कौन-सी अतल गहराइयों में डूब जाता है!

निशीथ मुझे बिल नहीं देने देता। एक विचित्र-सी भावना मेरे मन में उठती है कि छीना-झपटी में किसी तरह मेरा हाथ इसके हाथ से छू जाए! मैं अपने स्पर्श से उसके मन के तारों को झनझना देना चाहती हूँ। पर वैसा अवसर नहीं आता। बिल वही देता है, मुझसे तो विरोध भी नहीं किया जाता।

मन में प्रचंड तूफान! पर फिर भी निर्विकार भाव से मैं टैक्सी में आकर बैठती हूँ… फिर वही मौन, वही दूरी। पर जाने क्या है कि मुझे लगता है कि निशीथ मेरे बहुत निकट आ गया है, बहुत ही निकट! बार-बार मेरा मन करता है कि क्यों नहीं निशीथ मेरा हाथ पकड़ लेता, क्यों नहीं मेरे कंधे पर हाथ रख देता? मैं जरा भी बुरा नहीं मानूँगी, जरा भी नहीं! पर वह कुछ भी नहीं करता।

सोते समय रोज की तरह मैं आज भी संजय का ध्यान करते हुए ही सोना चाहती हूँ, पर निशीथ है कि बार-बार संजय की आकृति को हटाकर स्वयं आ खड़ा होता है।

कलकत्ता

अपनी मजबूरी पर खीझ-खीझ जाती हूँ। आज कितना अच्छा मौका था सारी बात बता देने का! पर मैं जाने कहाँ भटकी थी कि कुछ भी नहीं बता पाई।

शाम को मुझे निशीथ अपने साथ ‘लेक’ ले गया। पानी के किनारे हम घास पर बैठ गए। कुछ दूर पर काफी भीड़-भाड़ और चहल-पहल थी, पर यह स्थान अपेक्षाकृत शांत था। सामने लेक के पानी में छोटी-छोटी लहरें उठ रही थीं। चारों ओर के वातावरण का कुछ विचित्र-सा भाव मन पर पड़ रहा था।

“अब तो तुम यहाँ आ जाओगी!” मेरी ओर देखकर उसने कहा।

“हाँ!”

“नौकरी के बाद क्या इरादा है?”

मैंने देखा, उसकी आँखों में कुछ जानने की आतुरता फैलती जा रही है, शायद कुछ कहने की भी। मुझसे कुछ जानकर वह अपनी बात कहेगा।

“कुछ नहीं!” जाने क्यों मैं यह कह गई। कोई है जो मुझे कचोटे डाल रहा है। क्यों नहीं मैं बता देती कि नौकरी के बाद मैं संजय से विवाह करूँगी, मैं संजय से प्रेम करती हूँ, वह मुझसे प्रेम करता है? वह बहुत अच्छा है, बहुत ही! वह मुझे तुम्हारी तरह धोखा नहीं देगा।

पर मैं कुछ भी तो नहीं कह पाती। अपनी इस बेबसी पर मेरी आँखें छलछला आती हैं। मैं दूसरी ओर मुँह फेर लेती हूँ।

“तुम्हारे यहाँ आने से मैं बहुत खुश हूँ!”

मेरी साँस जहाँ-की-तहाँ रुक जाती है आगे के शब्द सुनने के लिए, पर शब्द नहीं आते। बड़ी कातर, करुण और याचना-भरी दृष्टि से मैं उसे देखती हूँ, मानो कह रही होऊँ कि तुम कह क्यों नहीं देते निशीथ, कि आज भी तुम मुझे प्यार करते हो, तुम मुझे सदा अपने पास रखना चाहते हो, जो कुछ हो गया है, उसे भूलकर तुम मुझसे विवाह करना चाहते हो? कह दो, निशीथ, कह दो! यह सुनने के लिए मेरा मन अकुला रहा है, छटपटा रहा है! मैं बुरा नहीं मानूँगी, जरा भी बुरा नहीं मानूँगी। मान ही कैसे सकती हूँ निशीथ! इतना सब हो जाने के बाद भी शायद मैं तुम्हें प्यार करती हूँ – शायद नहीं, सचमुच ही मैं तुम्हें प्यार करती हूँ!

मैं जानती हूँ – तुम कुछ नहीं कहोगे, सदा के ही मितभाषी जो हो। फिर भी कुछ सुनने की आतुरता लिए मैं तुम्हारी तरफ देखती रहती हूँ। पर तुम्हारी नजर तो लेक के पानी पर जमी हुई है… शांत, मौन!

आत्मीयता के ये क्षण अनकहे भले ही रह जाएँ पर अनबूझे नहीं रह सकते। तुम चाहे न कहो, पर मैं जानती हूँ, तुम आज भी मुझे प्यार करते हो, बहुत प्यार करते हो! मेरे कलकत्ता आ जाने के बाद इस टूटे संबंध को फिर से जोड़ने की बात ही तुम इस समय सोच रहे हो। तुम आज भी मुझे अपना ही समझते हो, तुम जानते हो, आज भी दीपा तुम्हारी है!… और मैं?

लगता है, इस प्रश्न का उत्तर देने का साहस मुझमें नहीं है। मुझे डर है कि जिस आधार पर मैं तुमसे नफरत करती थी, उसी आधार पर कहीं मुझे अपने से नफरत न करनी पड़े।

लगता है, रात आधी से भी अधिक ढल गई है।

कानपुर

मन में उत्कट अभिलाषा होते हुए भी निशीथ की आवश्यक मीटिंग की बात सुनकर मैंने कह दिया था कि तुम स्टेशन मत आना। इरा आई थी, पर गाड़ी पर बिठाकर ही चली गई, या कहूँ कि मैंने जबर्दस्ती ही उसे भेज दिया। मैं जानती थी कि लाख मना करने पर भी निशीथ आएगा और विदा के उन अंतिम क्षणों में मैं उसके साथ अकेली ही रहना चाहती थी। मन में एक दबी-सी आशा थी कि चलते समय ही शायद वह कुछ कह दे। गाड़ी चलने में जब दस मिनट रह गए तो देखा, बड़ी व्यग्रता से डिब्बों में झाँकता-झाँकता निशीथ आ रहा था। पागल! उसे इतना तो समझना चाहिए कि उसकी प्रतीक्षा में मैं यहाँ बाहर खड़ी हूँ!

मैं दौड़कर उसके पास जाती हूँ, “आप क्यों आए?” पर मुझे उसका आना बड़ा अच्छा लगता है! वह बहुत थका हुआ लग रहा है। शायद सारा दिन बहुत व्यस्त रहा और दौड़ता-दौड़ता मुझे सी-ऑफ करने यहाँ आ पहुँचा। मन करता है कुछ ऐसा करूँ, जिससे इसकी सारी थकान दूर हो जाए। पर क्या करूँ? हम डिब्बे के पास आ जाते हैं।

“जगह अच्छी मिल गई?” वह अंदर झाँकते हुए पूछता है।

“हाँ!”

“पानी-वानी तो है?”

“है।”

“बिस्तर फैला लिया?”

मैं खीझ पड़ती हूँ। वह शायद समझ जाता है, सो चुप हो जाता है। हम दोनों एक क्षण को एक-दूसरे की ओर देखते हैं। मैं उसकी आँखों में विचित्र-सी छायाएँ देखती हूँ, मानो कुछ है, जो उसके मन में घुट रहा है, उसे मथ रहा है, पर वह कह नहीं पा रहा है। वह क्यों नहीं कह देता? क्यों नहीं अपने मन की इस घुटन को हल्का कर लेता?

“आज भीड़ विशेष नहीं है,” चारों ओर नजर डालकर वह कहता है।

मैं भी एक बार चारों ओर देख लेती हूँ, पर नजर मेरी बार-बार घड़ी पर ही जा रही है। जैसे-जैसे समय सरक रहा है, मेरा मन किसी गहरे अवसाद में डूब रहा है। मुझे कभी उस पर दया आती है तो कभी खीझ। गाड़ी चलने में केवल तीन मिनट बाकी रह गए हैं। एक बार फिर हमारी नजरें मिलती हैं।

“ऊपर चढ़ जाओ, अब गाड़ी चलनेवाली है।”

बड़ी असहाय-सी नजर से मैं उसे देखती हूँ, मानो कह रही होऊँ, तुम्हीं चढ़ा दो। और फिर धीरे-धीरे चढ़ जाती हूँ। दरवाजे पर मैं खड़ी हूँ और वह नीचे प्लेटफॉर्म पर।

“जाकर पहुँचने की खबर देना। जैसे ही मुझे इधर कुछ निश्चित रूप से मालूम होगा, तुम्हें सूचना दूँगा।”

मैं कुछ बोलती नहीं, बस उसे देखती रहती हूँ

सीटी… हरी झंडी… फिर सीटी। मेरी आँखें छलछला आती हैं।

गाड़ी एक हल्के-से झटके के साथ सरकने लगती है। वह गाड़ी के साथ कदम आगे बढ़ाता है और मेरे हाथ पर धीरे-से अपना हाथ रख देता है। मेरा रोम-रोम सिहर उठता है। मन करता है चिल्ला पड़ूँ – मैं सब समझ गई, निशीथ, सब समझ गई! जो कुछ तुम इन चार दिनों में नहीं कह पाए, वह तुम्हारे इस क्षणिक स्पर्श ने कह दिया। विश्वास करो, यदि तुम मेरे हो तो मैं भी तुम्हारी हूँ, केवल तुम्हारी, एकमात्र तुम्हारी! पर मैं कुछ कह नहीं पाती। बस, साथ चलते निशीथ को देखती-भर रहती हूँ। गाड़ी के गति पकड़ते ही वह हाथ को जरा-सा दबाकर छोड़ देता है। मेरी छलछलाई आँखें मुँद जाती हैं। मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, बाकी सब झूठ है, अपने को भूलने का, भरमाने का, छलने का असफल प्रयास है।

आँसू-भरी आँखों से मैं प्लेटफॉर्म को पीछे छूटता हुआ देखती हूँ। सारी आकृतियाँ धुँधली-सी दिखाई देती हैं। असंख्य हिलते हुए हाथों के बीच निशीथ के हाथ को, उस हाथ को, जिसने मेरा हाथ पकड़ा था, ढूँढने का असफल-सा प्रयास करती हूँ। गाड़ी प्लेटफॉर्म को पार कर जाती है, और दूर-दूर तक कलकत्ता की जगमगाती बत्तियाँ दिखाई देती हैं। धीरे-धीरे वे सब दूर हो जाती हैं, पीछे छूटती जाती हैं। मुझे लगता है, यह दैत्याकार ट्रेन मुझे मेरे घर से कहीं दूर ले जा रही है – अनदेखी, अनजानी राहों में गुमराह करने के लिए, भटकाने के लिए!

बोझिल मन से मैं अपने फैलाए हुए बिस्तर पर लेट जाती हूँ। आँखें बंद करते ही सबसे पहले मेरे सामने संजय का चित्र उभरता है, कानपुर जाकर मैं उसे क्या कहूँगी? इतने दिनों तक उसे छलती आई, अपने को छलती आई, पर अब नहीं। मैं उसे सारी बात समझा दूँगी। कहूँगी, संजय जिस संबंध को टूटा हुआ जानकर मैं भूल चुकी थी, उसकी जड़ें हृदय की किन अतल गहराइयों में जमी हुई थीं, इसका अहसास कलकत्ता में निशीथ से मिलकर हुआ। याद आता है, तुम निशीथ को लेकर सदैव ही संदिग्ध रहते थे, पर तब मैं तुम्हें ईर्ष्यालु समझती थी, आज स्वीकार करती हूँ कि तुम जीते, मैं हारी!

सच मानना संजय, ढाई साल मैं स्वयं भ्रम में थी और तुम्हें भी भ्रम में डाल रखा था, पर आज भ्रम के, छलना के सारे ही जाल छिन्न-भिन्न हो गए हैं। मैं आज भी निशीथ को प्यार करती हूँ। और यह जानने के बाद, एक दिन भी तुम्हारे साथ और छल करने का दुस्साहस कैसे करूँ? आज पहली बार मैंने अपने संबंधों का विश्लेषण किया, तो जैसे सब कुछ ही स्पष्ट हो गया और जब मेरे सामने सब कुछ स्पष्ट हो गया, तो तुमसे कुछ भी नहीं छिपाऊँगी, तुम्हारे सामने मैं चाहूँ तो भी झूठ नहीं बोल सकती।

आज लग रहा है, तुम्हारे प्रति मेरे मन में जो भी भावना है वह प्यार की नहीं, केवल कृतज्ञता की है। तुमने मुझे उस समय सहारा दिया था, जब अपने पिता और निशीथ को खोकर मैं चूर-चूर हो चुकी थी। सारा संसार मुझे वीरान नजर आने लगा था, उस समय तुमने अपने स्नेहिल स्पर्श से मुझे जिला दिया, मेरा मुरझाया, मरा मन हरा हो उठा, मैं कृत-कृत्य हो उठी, और समझने लगी कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ। पर प्यार की बेसुध घड़ियाँ, वे विभोर क्षण, तन्मयता के वे पल, जहाँ शब्द चुक जाते हैं, हमारे जीवन में कभी नहीं आए। तुम्हीं बताओ, आए कभी? तुम्हारे असंख्य आलिंगनों और चुंबनों के बीच भी, एक क्षण के लिए भी तो मैंने कभी तन-मन की सुध बिसरा देनेवाली पुलक या मादकता का अनुभव नहीं किया।

सोचती हूँ, निशीथ के चले जाने के बाद मेरे जीवन में एक विराट शून्यता आ गई थी, एक खोखलापन आ गया था, तुमने उसकी पूर्ति की। तुम पूरक थे, मैं गलती से तुम्हें प्रियतम समझ बैठी।

मुझे क्षमा कर दो संजय, और लौट जाओ। तुम्हें मुझ जैसी अनेक दीपाएँ मिल जाएँगी, जो सचमुच ही तुम्हें प्रियतम की तरह प्यार करेंगी। आज एक बात अच्छी तरह जान गई हूँ कि प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है, बाद में किया हुआ प्रेम तो अपने को भूलने का, भरमाने का प्रयास-मात्र होता है।

इसी तरह की असंख्य बातें मेरे दिमाग में आती हैं, जो मैं संजय से कहूँगी। कह सकूँगी यह सब? लेकिन कहना तो होगा ही। उसके साथ अब एक दिन भी छल नहीं कर सकती। मन से किसी और की आराधना करके तन से उसकी होने का अभिनय करती रहूँ? छिः! नहीं जानती, यही सब सोचते-सोचते मुझे कब नींद आ गई।

लौटकर अपना कमरा खोलती हूँ, तो देखती हूँ, सब कुछ ज्यों-का-त्यों है, सिर्फ फूलदान के रजनीगंधा मुरझा गए हैं। कुछ फूल झरकर जमीन पर इधर-उधर भी बिखर गए हैं।

आगे बढ़ती हूँ तो जमीन पर पड़ा एक लिफाफा दिखाई देता है। संजय की लिखाई है, खोला तो छोटा-सा पत्र था-

दीपा,

तुमने तो कलकत्ता जाकर कोई सूचना ही नहीं दी। मैं आज ऑफिस के काम से कटक जा रहा हूँ। पाँच-छः दिन में लौट आऊँगा। तब तक तुम आ ही जाओगी। जानने को उत्सुक हूँ कि कलकत्ता में क्या हुआ?

तुम्हारा,

संजय।

एक लंबा निःश्वास निकल जाता है। लगता है, एक बड़ा बोझ हट गया। इस अवधि में तो मैं अपने को अच्छी तरह तैयार कर लूँगी।

नहा-धोकर सबसे पहले मैं निशीथ को पत्र लिखती हूँ। उसकी उपस्थिति में जो हिचक मेरे होंठ बंद किए हुए थी, दूर रहकर वह अपने-आप ही टूट जाती हैं। मैं स्पष्ट शब्दों में लिख देती हूँ कि चाहे उसने कुछ नहीं कहा, फिर भी मैं सब कुछ समझ गई हूँ। साथ ही यह भी लिख देती हूँ कि मैं उसकी उस हरकत से बहुत दुखी थी, बहुत नाराज भी, पर उसे देखते ही जैसे सारा क्रोध बह गया। इस अपनत्व में क्रोध भला टिक भी कैसे पाता? लौटी हूँ, तब से न जाने कैसी रंगीनी और मादकता मेरी आँखों के आगे छाई है!

एक खूबसूरत-से लिफाफे में उसे बंद करके मैं स्वयं पोस्ट करने जाती हूँ।

रात में सोती हूँ तो अनायास ही मेरी नजर सूने फूलदान पर जाती है। मैं करवट बदलकर सो जाती हूँ।

कानपुर

आज निशीथ को पत्र लिखे पाँचवाँ दिन है। मैं तो कल ही उसके पत्र की राह देख रही थी। पर आज की भी दोनों डाकें निकल गईं। जाने कैसा सूना-सूना, अनमना-अनमना लगता रहा सारा दिन! किसी भी तो काम में जी नहीं लगता। क्यों नहीं लौटती डाक से ही उत्तर दे दिया उसने? समझ में नहीं आता, कैसे समय गुजारूँ!

मैं बाहर बालकनी में जाकर खड़ी हो जाती हूँ। एकाएक खयाल आता है, पिछले ढाई सालों से करीब इसी समय, यहीं खड़े होकर मैंने संजय की प्रतीक्षा की है। क्या आज मैं संजय की प्रतीक्षा कर रही हूँ? या मैं निशीथ के पत्र की प्रतीक्षा कर रही हूँ? शायद किसी की नहीं, क्योंकि जानती हूँ कि दोनों में से कोई भी नहीं आएगा। फिर?

निरुद्देश्य-सी कमरे में लौट पड़ती हूँ। शाम का समय मुझसे घर में नहीं काटा जाता। रोज ही तो संजय के साथ घूमने निकल जाया करती थी। लगता है, यहीं बैठी रही तो दम ही घुट जाएगा। कमरा बंद करके मैं अपने को धकेलती-सी सड़क पर ले आती हूँ।

शाम का धुँधलका मन के बोझ को और भी बढ़ा देता है। कहाँ जाऊँ? लगता है, जैसे मेरी राहें भटक गई हैं, मंजिल खो गई है। मैं स्वयं नहीं जानती, आखिर मुझे जाना कहाँ है। फिर भी निरुद्देश्य-सी चलती रहती हूँ। पर आखिर कब तक यों भटकती रहूँ? हारकर लौट पड़ती हूँ।

आते ही मेहता साहब की बच्ची तार का एक लिफाफा देती है।

धड़कते दिल से मैं उसे खोलती हूँ। इरा का तार था – ‘नियुक्ति हो गई है। बधाई!’

इतनी बड़ी खुशखबरी पाकर भी जाने क्या है कि खुश नहीं हो पाती। यह खबर तो निशीथ भेजनेवाला था। एकाएक ही एक विचार मन में आता है- क्या जो कुछ मैं सोच गई, वह निरा भ्रम ही था, मात्र मेरी कल्पना, मेरा अनुमान? नहीं-नहीं! उस स्पर्श को मैं भ्रम कैसे मान लूँ, जिसने मेरे तन-मन को डुबो दिया था, जिसके द्वारा उसके हृदय की एक-एक परत मेरे सामने खुल गई थी? लेक पर बिताए उन मधुर क्षणों को भ्रम कैसे मान लूँ, जहाँ उसका मौन ही मुखरित होकर सब कुछ कह गया था? आत्मीयता के वे अनकहे क्षण! तो फिर उसने पत्र क्यों नहीं लिखा? क्या कल उसका पत्र आएगा? क्या आज भी उसे वही हिचक रोके हुए है?

तभी सामने की घड़ी टन्-टन् करके नौ बजाती है। मैं उसे देखती हूँ। यह संजय की लायी हुई है।… लगता है, जैसे यह घड़ी घंटे सुना-सुनाकर मुझे संजय की याद दिला रही है। फरफराते ये हरे पर्दे, यह हरी बुक-रैक, यह टेबल, यह फूलदान, सभी तो संजय के ही लाए हुए हैं। मेज पर रखा यह पेन उसने मुझे सालगिरह पर लाकर दिया था।

अपनी चेतना के इन बिखरे सूत्रों को समेटकर मैं फिर पढ़ने का प्रयास करती हूँ, पर पढ़ नहीं पाती। हारकर मैं पलंग पर लेट जाती हूँ।

सामने के फूलदान का सूनापन मेरे मन के सूनेपन को और अधिक बढ़ा देता है। मैं कसकर आँखें मूँद लेती हूँ। एक बार फिर मेरी आँखों के आगे लेक का स्वच्छ, नीला जल उभर आता है, जिसमें छोटी-छोटी लहरें उठ रही थीं। उस जल की ओर देखते हुए निशीथ की आकृति उभरकर आती है। वह लाख जल की ओर देखे, पर चेहरे पर अंकित उसके मन की हलचल को मैं आज भी, इतनी दूर रहकर भी महसूस करती हूँ। कुछ न कह पाने की मजबूरी, उसकी विवशता, उसकी घुटन आज भी मेरे सामने साकार हो उठती है। धीरे-धीरे लेक के पानी का विस्तार सिमटता जाता है, और एक छोटी-सी राइटिंग टेबल में बदल जाता है, और मैं देखती हूँ कि एक हाथ में पेन लिए और दूसरे हाथ की उँगलियों को बालों में उलझाए निशीथ बैठा है वही मजबूरी, वही विवशता, वही घुटन लिए। वह चाहता है, पर जैसे लिख नहीं पाता। वह कोशिश करता है, पर उसका हाथ बस काँपकर रह जाता है। ओह! लगता है, उसकी घुटन मेरा दम घोंटकर रख देगी। मैं एकाएक ही आँखें खोल देती हूँ। वही फूलदान, पर्दे, मेज, घड़ी!

आखिर आज निशीथ का पत्र आ गया। धड़कते दिल से मैंने उसे खोला। इतना छोटा-सा पत्र!

प्रिय दीपा,

तुम अच्छी तरह पहुँच गई, यह जानकर प्रसन्नता हुई।

तुम्हें अपनी नियुक्ति का तार तो मिल ही गया होगा। मैंने कल ही इरा जी को फोन करके सूचना दे दी थी, और उन्होंने बताया था कि तार दे देंगी। ऑफिस की ओर से भी सूचना मिल जाएगी।

इस सफलता के लिए मेरी ओर से हार्दिक बधाई स्वीकार करना। सच, मैं बहुत खुश हूँ कि तुम्हें यह काम मिल गया! मेहनत सफल हो गई। शेष फिर।

शुभेच्छु,

निशीथ

बस? धीरे-धीरे पत्र के सारे शब्द आँखों के आगे लुप्त हो जाते हैं, रह जाता है केवल, ‘शेष फिर!’

तो अभी उसके पास ‘कुछ’ लिखने को शेष है? क्यों नहीं लिख दिया उसने अभी? क्या लिखेगा वह?

“दीप!”

मैं मुड़कर दरवाजे की ओर देखती हूँ। रजनीगंधा के ढेर सारे फूल लिए मुस्कुराता-सा संजय खड़ा है। एक क्षण मैं संज्ञा-शून्य-सी उसे इस तरह देखती हूँ, मानो पहचानने की कोशिश कर रही हूँ। वह आगे बढ़ता है, तो मेरी खोई हुई चेतना लौटती है, और विक्षिप्त-सी दौड़कर मैं उससे लिपट जाती हूँ।

“क्या हो गया है तुम्हें, पागल हो गई हो क्या?”

“तुम कहाँ चले गए थे संजय?” और मेरा स्वर टूट जाता है। अनायास ही आँखों से आँसू बह चलते हैं।

“क्या हो गया? कलकत्ता का काम नहीं मिला क्या? मारो भी गोली काम को। तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो उसके लिए?”

पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस, मेरी बाँहों की जकड़ कसती जाती है, कसती जाती है। रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे मेरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था।

और हम दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में बँधे रहते हैं – चुम्बित, प्रति-चुम्बित!

मिस पाल - मोहन राकेश

वह दूर से दिखायी देती आकृति मिस पाल ही हो सकती थी।

फिर भी विश्वास करने के लिए मैंने अपना चश्मा ठीक किया। निःसंदेह, वह मिस पाल ही थी। यह तो ख़ैर मुझे पता था कि वह उन दिनों कुल्लू में ही कहीं रहती है, पर इस तरह अचानक उससे भेंट हो जाएगी, यह नहीं सोचा था। और उसे सामने देखकर भी मुझे विश्वास नहीं हुआ कि वह स्थायी रूप से कुल्लू और मनाली के बीच उस छोटे-से गाँव में रहती होगी। जब वह दिल्ली से नौकरी छोड़कर आयी थी, तो लोगों ने उसके बारे में क्या-क्या नहीं सोचा था!

बस रायसन के डाकख़ाने के पास पहुँचकर रुक गई। मिस पाल डाकख़ाने के बाहर खड़ी पोस्टमास्टर से कुछ बात कर रही थी। हाथ में वह एक थैला लिए थी। बस के रुकने पर न जाने किस बात के लिए पोस्टमास्टर को धन्यवाद देती हुई वह बस की तरफ़ मुड़ी। तभी मैं उतरकर उसके सामने पहुँच गया। एक आदमी के अचानक सामने आ जाने से मिस पाल थोड़ा अचकचा गई, मगर मुझे पहचानते ही उसका चेहरा ख़ुशी और उत्साह से खिल गया।

“रणजीत तुम?” उसने कहा, “तुम यहाँ कहाँ से टपक पड़े?”

“मैं इस बस से मनाली से आ रहा हूँ।” मैंने कहा।

“अच्छा! मनाली तुम कब से आए हुए थे?”

“आठ-दस दिन हुए, आया था। आज वापस जा रहा हूँ।”

“आज ही जा रहे हो?” मिस पाल के चेहरे से आधा उत्साह ग़ायब हो गया, “देखो, कितनी बुरी बात है कि आठ-दस दिन से तुम यहाँ हो और मुझसे मिलने की तुमने कोशिश भी नहीं की। तुम्हें यह तो पता ही था कि मैं आजकल कुल्लू में हूँ।”

“हाँ, यह तो पता था, पर यह नहीं पता था कि कुल्लू के किस हिस्से में हो। अब भी तुम अचानक ही दिखायी दे गईं, नहीं मुझे कहाँ से पता चलता कि तुम इस जंगल को आबाद कर रही हो?”

“सचमुच बहुत बुरी बात है”, मिस पाल उलाहने के स्वर में बोली, “तुम इतने दिनों से यहाँ हो और मुझसे तुम्हारी भेंट हुई आज जाने के वक़्त…।”

ड्राइवर ज़ोर-ज़ोर से हॉर्न बजाने लगा। मिस पाल ने कुछ चिढ़कर ड्राइवर की तरफ़ देखा और एक साथ झिड़कने और क्षमा माँगने के स्वर में कहा, “बस जी एक मिनट। मैं भी इसी बस से कुल्लू चल रही हूँ। मुझे कुल्लू की एक सीट दे दीजिए। थैंक यू। थैंक यू वेरी मच!” और फिर मेरी तरफ़ मुड़कर बोली, “तुम इस बस से कहाँ तक जा रहे हो?”

“आज तो इस बस से जोगिन्दरनगर जाऊँगा। वहाँ एक दिन रहकर कल सुबह आगे की बस पकड़ूँगा।”

ड्राइवर अब और ज़ोर से हॉर्न बजाने लगा। मिस पाल ने एक बार क्रोध और बेबसी के साथ उसकी तरफ़ देखा और बस के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ती हुई बोली, “अच्छा, कुल्लू तक तो हम लोगों का साथ है ही, और बात कुल्लू पहुँचकर करेंगे। मैं तो कहती हूँ कि तुम दो-चार दिन यहीं रुको, फिर चले जाना।”

बस में पहले ही बहुत भीड़ थी। दो-तीन आदमी वहाँ से और चढ़ गए थे, जिससे अंदर खड़े होने की जगह भी नहीं रही थी। मिस पाल दरवाज़े से अंदर जाने लगी तो कंडक्टर ने हाथ बढ़ाकर उसे रोक दिया। मैंने कंडक्टर से बहुतेरा कहा कि अंदर मेरे वाली जगह ख़ाली है, मिस साहब वहाँ बैठ जाएँगी और मैं भीड़ में किसी तरह खड़ा होकर चला जाऊँगा, मगर कंडक्टर एक बार ज़िद पर अड़ा तो अड़ा ही रहा कि और सवारी वह नहीं ले सकता। मैं अभी उससे बात कर ही रहा था कि ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दी। मेरा सामान बस में था, इसलिए मैं दौड़कर चलती बस में सवार हो गया। दरवाज़े से अंदर जाते हुए मैंने एक बार मुड़कर मिस पाल की तरफ़ देख लिया। वह इस तरह अचकचाई-सी खड़ी थी जैसे कोई उसके हाथ से उसका सामान छीनकर भाग गया हो और उसे समझ न आ रहा हो कि उसे अब क्या करना चाहिए।

बस हल्के-हल्के मोड़ काटती कुल्लू की तरफ़ बढ़ने लगी। मुझे अफ़सोस होने लगा कि मिस पाल को बस में जगह नहीं मिली तो मैंने ही क्यों न अपना सामान वहाँ उतरवा लिया। मेरा टिकट जोगिन्दरनगर का था, पर यह ज़रूरी नहीं था कि उस टिकट से जोगिन्दरनगर तक जाऊँ ही। मगर मिस पाल से भेंट कुछ ऐसे आकस्मिक ढंग से हुई थी और निश्चय करने के लिए समय इतना कम था कि मैं यह बात उस समय सोच भी नहीं सका था। थोड़ा-सा भी समय और मिलता, तो मैं ज़रूर कुछ देर के लिए वहाँ उतर जाता। उतने समय में तो मैं मिस पाल से कुशल-समाचार भी नहीं पूछ सका था, हालाँकि मन में उसके सम्बन्ध में कितना-कुछ जानने की उत्सुकता थी। उसके दिल्ली छोड़ने के बाद लोग उसके बारे में जाने क्या-क्या बातें करते रहे थे। किसी का ख़याल था कि उसने कुल्लू में एक रिटायर्ड अंग्रेज़ मेजर से शादी कर ली है और मेजर ने अपने सेब के बग़ीचे उसके नाम कर दिए हैं। किसी की सूचना थी कि उसे वहाँ सरकार की तरफ़ से वज़ीफ़ा मिल रहा है और वह करती-वरती कुछ नहीं, बस घूमती और हवा खाती है। कुछ ऐसे लोग भी थे जिनका कहना था कि मिस पाल का दिमाग़ ख़राब हो गया है और सरकार उसे इलाज के लिए अमृतसर पागलख़ाने में भेज रही है। मिस पाल एक दिन अचानक अपनी लगी हुई पाँच सौ की नौकरी छोड़कर चली आयी थी, उससे लोगों में उसके बारे में तरह-तरह की कहानियाँ प्रचलित थीं।

जिन दिनों मिस पाल ने त्यागपत्र दिया, मैं दिल्ली में नहीं था। लम्बी छुट्टी लेकर बाहर गया था। मगर मिस पाल के नौकरी छोड़ने का कारण मैं काफ़ी हद तक जानता था। वह सूचना विभाग में हम लोगों के साथ काम करती थी और राजेंद्रनगर में हमारे घर से दस-बारह घर छोड़कर रहती थी। दिल्ली में भी उसका जीवन काफ़ी अकेला था, क्योंकि दफ़्तर के ज़्यादातर लोगों से उसका मनमुटाव था और बाहर के लोगों से वह मिलती बहुत कम थी। दफ़्तर का वातावरण उसे अपने अनुकूल नहीं लगता था। वह वहाँ एक-एक दिन जैसे गिनकर काटती थी। उसे हर एक से शिकायत थी कि वह घटिया क़िस्म का आदमी है, जिसके साथ उसका उठना-बैठना नहीं हो सकता।

“ये लोग इतने ओछे और बेईमान हैं।” वह कहा करती, “इतनी छोटी और कमीनी बातें करते हैं कि मेरा इनके बीच काम करते हर वक़्त दम घुटता रहता है। जाने क्यों ये लोग इतनी छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से लड़ते हैं और अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए एक-दूसरे को कुचलने की कोशिश करते रहते हैं!”

मगर उस वातावरण में उसके दुखी रहने का मुख्य कारण दूसरा था, जिसे वह मुँह से स्वीकार नहीं करती थी। लोग इस बात को जानते थे, इसलिए जान-बूझकर उसे छेड़ने के लिए कुछ-न-कुछ कहते रहते थे। बुखारिया तो रोज ही उसके रंग-रूप पर कोई-न-कोई टिप्पणी कर देता था।

“क्या बात है मिस पाल, आज रंग बहुत निखर रहा है!”

दूसरी तरफ़ से जोरावरसिंह बात जोड़ देता, “आजकल मिस पाल पहले से स्लिम भी तो हो रही हैं।”

मिस पाल इन संकेतों से बुरी तरह परेशान हो उठती और कई बार ऐसे मौक़े पर कमरे से उठकर चली जाती। उसकी पोशाक पर भी लोग तरह-तरह की टिप्पणियाँ करते रहते थे। वह शायद अपने मुटापे की क्षतिपूर्ति के लिए ही बाल छोटे कटवाती थी, बग़ैर बाँह की कमीज़ें पहनती थी और बनाव-सिंगार से चिढ़ होने पर भी रोज़ काफ़ी समय मेकअप पर ख़र्च करती थी। मगर दफ़्तर में दाख़िल होते ही उसे किसी-न-किसी के मुँह से ऐसी बात सुनने को मिल जाती थी, “मिस पाल, इस नई कमीज़ का डिज़ाइन बहुत अच्छा है। आज तो ग़ज़ब ढा रही हो तुम!”

मिस पाल को इस तरह की हर बात दिल में चुभ जाती थी। जितनी देर दफ़्तर में रहती, उसका चेहरा गम्भीर बना रहता। जब पाँच बजते, तो वह इस तरह अपनी मेज़ से उठती जैसे कई घंटे की सज़ा भोगने के बाद उसे छुट्टी मिली हो। दफ़्तर से उठकर वह सीधी अपने घर चली जाती और अगले दिन सुबह दफ़्तर के लिए निकलने तक वहीं रहती। शायद दफ़्तर के लोगों से तंग आ जाने की वजह से ही वह और लोगों से भी मेलजोल नहीं रखना चाहती थी। मेरा घर पास होने की वजह से, या शायद इसलिए कि दफ़्तर के लोगों में एक मैं ही था जिसने उसे कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया था, वह कभी शाम को हमारे यहाँ चली आती थी। मैं अपनी बुआ के पास रहता था और मिस पाल मेरी बुआ और उनकी लड़कियों से काफ़ी घुल-मिल गई थी। कई बार घर के कामों में वह उनका हाथ भी बँटा देती थी। किसी दिन हम उसके यहाँ चले जाते थे। वह घर में समय बिताने के लिए संगीत और चित्रकला का अभ्यास करती थी। हम लोग पहुँचते तो उसके कमरे से सितार की आवाज़ आ रही होती या वह रंग और कूचियाँ लिये किसी तस्वीर में उलझी होती। मगर जब वह इन दोनों में से कोई भी काम न कर रही होती तो अपने तख़्त पर बिछे मुलायम गद्दे पर दो तकियों के बीच लेटी छत को ताक रही होती। उसके गद्दे पर जो झीना रेशमी कपड़ा बिछा रहता था, उसे देखकर मुझे बहुत चिढ़ होती थी। मन करता था कि उसे खींचकर बाहर फेंक दूँ। उसके कमरे में सितार, तबला, रंग, कैनवस, तस्वीरें, कपड़े तथा नहाने और चाय बनाने का सामान इस तरह उलझे-बिखरे रहते थे कि बैठने के लिए कुर्सियों का उद्धार करना एक समस्या हो जाती थी। कभी मुझे उसके झीने रेशमी कपड़े वाले तख़्त पर बैठना पड़ जाता तो मुझे मन में बहुत ही परेशानी होती। मन करता कि जितनी जल्दी हो वहाँ से उठ जाऊँ। मिस पाल अपने कमरे के चारों तरफ़ खोजकर जाने कहाँ से एक चायदानी और तीन-चार टूटी प्यालियाँ निकाल लेती और हम लोगों को ‘फ़र्स्ट क्लास बोहीमियन कॉफ़ी’ पिलाने की तैयारी करने लगती। कभी वह हम लोगों को अपनी बनायी तस्वीरें दिखाती और हम तीनों—मैं और मेरी दोनों बहनें—अपना अज्ञान छिपाने के लिए उनकी प्रशंसा कर देते। मगर कई बार वह हमें बहुत उदास मिलती और ठीक ढंग से बात भी न करती। मेरी बहनें ऐसे मौक़े पर उससे चिढ़ जातीं और कहतीं कि वे उसके यहाँ फिर नहीं जाएँगी। मगर मुझे ऐसे अवसर पर मिस पाल से ज़्यादा सहानुभूति होती।

आख़िरी बार जब मैं मिस पाल के यहाँ गया, मैंने उसे बहुत ही उदास देखा था। मेरा उन दिनों एपेंडेसाइटिस का ऑपरेशन हुआ था और मैं कई दिन अस्पताल में रहकर आया था। मिस पाल उन दिनों रोज़ अस्पताल में ख़बर पूछने आती रही थी। बुआ अस्पताल में मेरे पास रहती थी पर खाने-पीने का सामान इकट्‌ठा करना उनके लिए मुश्किल था। मिस पाल सुबह-सुबह आकर सब्ज़ियाँ और दूध दे जाती थी। जिस दिन मैं उसके यहाँ गया, उससे एक ही दिन पहले मुझे अस्पताल से छुट्टी मिली थी और मैं अभी काफ़ी कमज़ोर था। फिर भी उसने मेरे लिए जो तकलीफ़ उठायी थी, उसके लिए मैं उसे धन्यवाद देना चाहता था।

मिस पाल ने दफ़्तर से छुट्टी ले रखी थी और कमरा बंद किए अपने गद्दे पर लेटी थी। मुझे पता लगा कि शायद वह सुबह से नहायी भी नहीं है।

“क्या बात है, मिस पाल? तबीयत तो ठीक है?” मैंने पूछा।

“तबीयत ठीक है”, उसने कहा, “मगर मैं नौकरी छोड़ने की सोच रही हूँ।”

“क्यों? कोई ख़ास बात हुई है क्या?”

“नहीं, ख़ास बात क्या होगी? बात बस इतनी ही है मैं ऐसे लोगों के बीच काम कर ही नहीं सकती। मैं सोच रही हूँ कि दूर के किसी ख़ूबसूरत-से पहाड़ी इलाक़े में चली जाऊँ और वहाँ रहकर संगीत और चित्रकला का ठीक से अभ्यास करूँ। मुझे लगता है, मैं ख़ामख़ाह यहाँ अपनी ज़िन्दगी बरबाद कर रही हूँ। मेरी समझ में नहीं आता कि इस तरह की ज़िन्दगी जीने का आख़िर मतलब ही क्या है? सुबह उठती हूँ, दफ़्तर चली जाती हूँ। वहाँ सात-आठ घंटे ख़राब करके घर आती हूँ, खाना खाती हूँ और सो जाती हूँ। यह सारा का सारा सिलसिला मुझे बिलकुल बेमानी लगता है। मैं सोचती हूँ कि मेरी ज़रूरतें ही कितनी हैं? मैं कहीं भी जाकर एक छोटा-सा कमरा या शैक लूँ तो थोड़ा-सा ज़रूरत का सामान अपने पास रखकर पचास-साठ या सौ रुपए में गुज़ारा कर सकती हूँ। यहाँ मैं जो पाँच सौ लेती हूँ, वे पाँच के पाँच सौ हर महीने ख़र्च हो जाते हैं। किस तरह ख़र्च हो जाते हैं, यह ख़ुद मेरी समझ में नहीं आता। पर अगर ज़िन्दगी इसी तरह चलती है, तो क्यों मैं ख़ामख़ाह दफ़्तर जाने-आने का भार ढोती रहूँ? बाहर रहने में कम से कम अपनी स्वतंत्रता तो होगी। मेरे पास कुछ रुपए पहले के हैं, कुछ मुझे प्राविडेंट फ़ंड के मिल जाएँगे। इतने में एक छोटी-सी जगह पर मेरा काफ़ी दिन गुज़ारा हो सकता है। मैं ऐसी जगह रहना चाहती हूँ जहाँ यहाँ की गंदगी न हो और लोग इस तरह की छोटी हरकतें न करते हों। ठीक से जीने के लिए इंसान को कम से कम इतना तो महसूस होना चाहिए कि उसके आसपास का वातावरण उजला और साफ़ है, और वह एक मेंढक की तरह गंदले पानी में नहीं जी रहा।”

“मगर तुम यह कैसे कह सकती हो कि जहाँ भी तुम जाकर रहोगी, वहाँ हर चीज़ वैसी ही होगी जैसी तुम चाहती हो? मैं तो समझता हूँ कि इंसान जहाँ भी चला जाए, अच्छी और बुरी दोनों तरह की चीज़ें उसे अपने आसपास मिलेंगी ही। तुम यहाँ के वातावरण से घबराकर कहीं और जाती हो, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि वहाँ का वातावरण भी तुम्हें ऐसा ही नहीं लगेगा? इसलिए मेरे ख़याल से नौकरी छोड़ने की बात तुम ग़लत सोचती हो। तुम यहीं रहो और अपना संगीत और चित्रकला का अभ्यास करती रहो। लोग जैसी बातें करते हैं, करने दो।”

पर मिस पाल की वितृष्णा इससे कम नहीं हुई।

“तुम नहीं समझते, रणजीत।” वह बोली, “यहाँ ऐसे लोगों के बीच और रहूँगी, तो मेरा दिमाग़ बिलकुल खोखला हो जाएगा। तुम नहीं जानते कि मैं जो तुम्हारे लिए सुबह दूध और सब्ज़ियाँ लेकर जाती रही हूँ, उसे लेकर भी ये लोग क्या-क्या बातें करते रहे हैं। जो लोग अच्छे-से-अच्छे काम का ऐसा कमीना मतलब लेते हों, उनके बीच आदमी रह ही कैसे सकता है? मैंने यह सब बहुत दिन सह लिया है, अब और मुझसे नहीं सहा जाता। मैं सोच रही हूँ जितनी जल्दी हो सके, यहाँ से चली जाऊँ। बस यही एक बात तय नहीं कर पा रही कि जाऊँ कहाँ। अकेली होने से किसी अनजान जगह जाकर रहते डर लगता है। तुम जानते ही हो कि मैं…।” और बात बीच में छोड़कर वह उठ खड़ी हुई, “अच्छा, तुम्हारे लिए कुछ चाय-वाय तो बनाऊँ। तुम अभी अस्पताल से निकलकर आए हो और मैं हूँ कि अपनी ही बात किए जा रही हूँ। तुम्हें अभी कुछ दिन घर पर आराम करना चाहिए। अभी से इस तरह चलना-फिरना ठीक नहीं।”

“मैं चाय नहीं पिऊँगा”, मैंने कहा, “मैं तुम्हें कुछ समझा तो नहीं सकता, सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि तुम लोगों की बातों को ज़रूरत से ज़्यादा महत्त्व दे रही हो। मेरा यह भी ख़याल है कि लोग वास्तव में उतने बुरे नहीं हैं जितना कि तुम उन्हें समझती हो। अगर तुम इस नज़र से सोचो कि…।”

“इस बात को रहने दो”, मिस पाल ने मेरी बात बीच में काट दी, “मैं इन लोगों से दिल से नफ़रत करती हूँ। तुम इन्हें इंसान समझते हो? मुझे तो ऐसे लोगों से अपना पिंकी ज़्यादा अच्छा लगता है। यह उन सबसे कहीं ज़्यादा सभ्य है।”

पिंकी मिस पाल का छोटा-सा कुत्ता था। वह कुछ देर उसे गोदी में लिए उसके बालों पर हाथ फेरती रही। मैंने पहले भी कई बार देखा था कि वह उस कुत्ते को एक बच्चे की तरह प्यार करती है और उसे खाना खिलाकर बच्चों की तरह ही तौलिए से उसका मुँह पोंछती है। मैं कुछ देर बाद वहाँ से उठकर चला, तो मिस पाल पिंकी को गोदी में लिए मुझे बाहर दरवाज़े तक छोड़ने आयी।

“अंकल को टा टा करो”, वह पिंकी की एक अगली टाँग हाथ से हिलाती हुई बोली, “टा टा, टा टा!”

मैं लम्बी छुट्टी से वापस आया, तो मिस पाल त्यागपत्र देकर जा चुकी थी। वह अपने बारे में लोगों को इतना ही बताकर गई थी कि वह कुल्लू के किसी गाँव में बसने जा रही है। बाक़ी बातें लोगों की कल्पना ने अपने-आप जोड़ दी थीं।

बस ब्यास के साथ-साथ मोड़ काट रही थी और मेरा मन हो रहा था कि लौटकर रायसन चला जाऊँ। मैं मनाली में दस दिन अकेला रहकर ऊब गया था, और मिस पाल थी कि कई महीनों से वहाँ रहती थी। मैं जानना चाहता था कि वह अकेली वहाँ कैसा महसूस करती है और नौकरी छोड़ने के बाद से उसने क्या-क्या कुछ कर डाला है। यूँ एक अपरिचित स्थान पर किसी पुराने परिचित से मिलने और बात करने का भी अपना आकर्षण होता है। बस जब कुल्लू पहुँचकर रुकी, तो मैंने अपना सामान वहाँ उतरवाकर हिमाचल राज्य परिवहन के दफ़्तर में रखवा दिया और रायसन के लिए वापसी की पहली बस पकड़ ली। बस ने पंद्रह-बीस मिनट में मुझे रायसन के बाज़ार में उतार दिया। मैंने वहाँ एक दुकानदार से पूछा कि मिस पाल कहाँ रहती हैं।

“मिस पाल कौन है, भाई?” दुकानदार ने अपने पास बैठे युवक से पूछा।

“वह तो नहीं, वह कटे बालों वाली मिस?”

“हाँ-हाँ, वही होगी।”

दुकान में और भी चार-पाँच व्यक्ति थे। उन सबकी आँखें मेरी तरफ़ घूम गईं। मुझे लगा जैसे वे मन में यह तय करना चाह रहे हों कि कटे बालों वाली मिस के साथ मेरा क्या रिश्ता होगा।

“चलिए, मैं आपको उसके यहाँ छोड़ आता हूँ।” कहकर युवक दुकान से उतर आया। सड़क पर मेरे साथ चलते हुए उसने पूछा, “क्यों भाई साहब यह मिस क्या अकेली ही हैं या…?”

“हाँ, अकेली ही हैं।”

कुछ देर हम लोग चुप रहकर चलते रहे। फिर उसने पूछा, “आप उसके क्या लगते हैं?”

मुझे समझ नहीं आया कि मैं उसको क्या उत्तर दूँ। पल भर सोचकर मैंने कहा, “मैं उसका रिश्तेदार नहीं हूँ। उसे वैसे ही जानता हूँ।”

सड़क से बाईं तरफ थोड़ा ऊपर को जाकर हम लोग एक खुले मैदान में पहुँच गए। मैदान चारों तरफ़ से पेड़ों से घिरा था और बीच में पाँच-छह जालीदार कॉटेज बने थे, जो बड़े-बड़े मुर्ग़ीख़ानों जैसे लगते थे। लड़का मुझे बताकर कि उनमें पहला कॉटेज मिस पाल का है, वहाँ से लौट गया। मैंने जाकर कॉटेज का दरवाज़ा खटखटाया।

“कौन है?” अंदर से मिस पाल की आवाज सुनायी दी।

“एक मेहमान है मिस, दरवाज़ा खोलो।”

“दरवाज़ा खुला है, आ जाइए।”

मैंने दरवाज़ा धकेलकर खोल लिया और अंदर चला गया। मिस पाल ने एक चारपाई पर अपना गद्दा लगा रखा था और उसी तरह दो तकियों के बीच लेटी थी जैसे दिल्ली में अपने तख़्त पर लेटी रहती थी। सिरहाने के पास एक खुली हुई पुस्तक रखी थी—बट्रेंड रसेल की ‘कांक्वेस्ट ऑफ़ हेपीनेस’। मैं देखकर तय नहीं कर सका कि वह पुस्तक पढ़ रही थी या लेटी हुई सिर्फ़ छत की तरफ देख रही थी। मुझे देखते ही वह चौंककर बैठ गई।

“अरे तुम…?”

“हाँ, मैं। तुमने सोचा भी नहीं होगा कि गया आदमी फिर वापस भी आ सकता है।”

“बहुत अजीब आदमी हो तुम! वापस आना था, तो उसी समय क्यों नहीं उतर गए!”

“बजाय इसके कि शुक्रिया अदा करो जो सात मील जाकर वापस चला आया हूँ…।”

“शुक्रिया अदा करती अगर तुम उसी समय उतर जाते और मुझे बस में अपनी सीट ले लेने देते।”

मैंने ठहाका लगाया और बैठने के लिए जगह ढूँढने लगा। वहाँ भी चारों तरफ़ वही बिखराव और अव्यवस्था थी जो दिल्ली में उसके घर दिखायी दिया करती थी। हर चीज़ हर दूसरी चीज़ की जगह काम में लायी जा रही थी। एक कुर्सी ऊपर से नीचे तक मैले कपड़ों से लदी थी। दूसरी पर कुछ रंग बिखरे थे और एक प्लेट रखी थी जिसमें बहुत-सी कीलें पड़ी थीं।

“बैठो, मैं झट से तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ”, मिस पाल व्यस्त होकर उठने लगी।

“अभी मुझसे बैठने को तो कहा नहीं, और चाय की फ़िक्र पहले से करने लगीं?” मैंने कहा, “मुझे बैठने की जगह बता दो और चाय-वाय रहने दो। इस वक़्त तुम्हारी ‘बोहीमियन चाय’ पीने का ज़रा मन नहीं है।”

“तो मत पियो। मुझे कौन झंझट करना अच्छा लगता है! बैठने की जगह मैं अभी बनाए देती हूँ।” और कपड़े-अपड़े हटाकर उसने एक कुर्सी ख़ाली कर दी। बाईं तरफ़ एक बड़ी-सी मेज़ थी, पर उस पर भी इतनी चीज़ें पड़ी थीं कि कहीं कुहनी रखने तक की जगह नहीं थी। मैंने बैठकर टाँगें फैलाने की कोशिश की तो पता चला कपड़ों के ढेर के नीचे मिस पाल ने अपने बनाए खाके रख रखे हैं। मिस पाल फिर से अपने बिस्तर में तकियों के सहारे बैठ गई थी। गद्दे पर उसने वही झीना रेशमी कपड़ा बिछा रखा था, जिसे देखकर मुझे चिढ़ हुआ करती थी। मेरा उस समय भी मन हुआ कि उस कपड़े को निकालकर फाड़ दूँ या कहीं आग में झोंक दूँ। मैंने सिगरेट सुलगाने के लिए मेज़ से दियासलाई की डिबिया उठायी मगर खोलते ही वापस रख दी। डिबिया में दियासलाइयाँ नहीं थीं, गुलाबी-सा रंग भरा था। मैंने चारों तरफ़ नज़र दौड़ायी, मगर और डिबिया कहीं दिखायी नहीं दी।

“दियासलाई किचन में होगी, मैं अभी लाती हूँ”, कहती हुई मिस पाल फिर उठी और कमरे से चली गई। मैं उतनी देर आसपास देखता रहा। मुझे फिर उस दिन की याद हो आयी जिस दिन मैं मिस पाल के घर देर तक बैठा उससे बातें करता रहा था। पिंकी से मिस पाल के ‘टा टा’ कराने की बात याद आने से मैं हँस दिया।

तभी मिस पाल दियासलाई की डिबिया लिए आ गई। मेरा अकेले में हँसना शायद उसे बहुत अस्वाभाविक लगा। वह सहसा गम्भीर हो गई।

“किसी ने कुछ पिला-विला दिया है क्या?” उसने मज़ाक़ और शिकायत के स्वर में कहा।

“मैं अपने इस तरह लौटकर आने की बात पर हँस रहा हूँ।” और जैसे अपने को ही अपने झूठ का विश्वास दिलाने के लिए मैंने अपनी हँसी की नक़ल की और कहा, “मैं सोच भी नहीं सकता था कि इस अनजान जगह पर अचानक तुमसे भेंट हो जाएगी? और तुम्हीं ने कहाँ सोचा होगा कि जो आदमी बस में आगे चला गया था, वह घंटा-भर बाद तुम्हारे कमरे में बैठा तुमसे बात कर रहा होगा !”

और विश्वास करके कि मैंने अपने हँसने के कारण की व्याख्या कर दी है, मैंने पूछा, “तुम्हारा पिंकी कहाँ है? यहाँ दिखायी नहीं दे रहा।”

मिस पाल पहले से भी गम्भीर हो गई। मुझे लगा कि उसका चेहरा अब काफी रूखा लगने लगा है। आँखों में लाली भर रही थी, जैसे कई रातों से वह ठीक से सोयी न हो।

“पिंकी को यहाँ आने के बाद एक रात सरदी लग गई थी”, उसने अपनी उसाँस दबाकर कहा, “मैंने उसे कितनी ही गरम चीज़ें खिलायीं, पर वह दो दिन में चलता बना।”

मैंने विषय बदल दिया। उससे शिकायत करने लगा कि वह जो अपने बारे में बिना किसी को ठीक बताए दिल्ली से चली आयी, यह उसने ठीक नहीं किया।

“दफ़्तर में अब भी लोग मिस पाल की बात करके हँसते होंगे!” उसने ऐसे पूछा जैसे वह स्वयं उस मिस पाल से भिन्न हो, जिसके बारे में वह सवाल पूछ रही थी। पर उसकी आँखों में यह जानने की बहुत उत्सुकता भर रही थी कि मैं उसके सवाल का क्या जवाब देता हूँ।

“लोगों की बातों को तुम इतना महत्त्व क्यों देती हो?” मैंने कहा, “लोग वैसी बातें इसलिए करते हैं कि उनके जीवन में मनोरंजन के दूसरे साधन बहुत कम होते हैं। जब वह व्यक्ति चला जाता है, तो चार दिन में यह भूल जाते हैं कि संसार में उसका अस्तित्व था भी या नहीं।”

कहते-कहते मुझे एहसास हो आया कि मैंने यह कहकर ग़लती की है। मिस पाल मुझसे यही सुनना चाहती थी कि लोग अब भी उसके बारे में उसी तरह बात करते हैं और उसी तरह उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं—यह विश्वास उसके लिए अपने वर्तमान को सार्थक समझने के लिए ज़रूरी था।

“हो सकता है तुम्हारे सामने बात न करते हों”, मिस पाल बोली, “क्योंकि उन्हें पता है कि हम लोग… अम्… अ… मित्र रहे हैं। नहीं तो वे कमीने लोग बात करने से बाज़ आ सकते हैं?”

अच्छा था कि मिस पाल ने मेरी बात पर विश्वास नहीं किया। उसने समझा कि मैं झूठमूठ उसे दिलासा देने की कोशिश कर रहा हूँ।

“हो सकता है बात करते भी हों”, मैंने कहा, “पर तुम अब उन लोगों की बात क्यों सोचती हो? कम-से-कम तुम्हारे लिए तो उन लोगों का अब अस्तित्व ही नहीं है।”

“मेरे लिए उन लोगों का अस्तित्व कभी था ही नहीं”, मिस पाल ने मुँह बिचका दिया, “मैं उनमें से किसी को अपने पैर के अँगूठे के बराबर भी नहीं समझती थी।”

आँखों से लग रहा था जैसे अब भी उन लोगों को अपने पास देख रही हो और उसे खेद हो कि वह ठीक से उनसे प्रतिशोध क्यों नहीं ले पा रही।

“तुम्हें पता है कि रमेश का फिर लखनऊ ट्रांसफ़र हो गया है?” मैंने बात बदल दी।

“अच्छा, मुझे पता नहीं था!”

पर उसने उस सम्बन्ध में और जानने की उत्सुकता प्रकट नहीं की। मैं फिर भी उसे रमेश के ट्रांसफ़र का क़िस्सा विस्तार से सुनाने लगा। मिस पाल ‘हूँ-हाँ’ करती रही। पर यह साफ़ था कि वह अपने अंदर ही कहीं खो गई है।

मैं रमेश की बात कह चुका, तो कुछ क्षण हम दोनों चुप रहे। फिर मिस पाल बोली, “देखो, मैं तुमसे सच कहती हूँ रणजीत, मुझे वहाँ उन लोगों के बीच एक-एक पल काटना असम्भव लगता था। मुझे लगता था, मैं नरक में रहती हूँ। तुम्हें पता ही है, मैं दफ़्तर में किसी से बात करना भी पसंद नहीं करती थी।”

मैं सुबह मनाली से बिना नाश्ता किए चला था, इसलिए मुझे भूख लग आयी थी। मैंने बात को रोटी के प्रकरण पर ले आना उचित समझा। मैंने उससे पूछा कि उसने खाने की क्या व्यवस्था कर रखी है—ख़ुद बनाती है, या कोई नौकर रख रखा है।

“तुम्हें भूख तो नहीं लगी?” मिस पाल अब दफ़्तर के माहौल से बाहर निकल आयी, “लगी हो, तो उधर मेरे साथ किचन में चलो। जो कुछ बना है, इस वक़्त तो तुम्हें उसी में से थोड़ा-बहुत खा लेना होगा। शाम को मैं तुम्हें ठीक से बनाकर खिलाऊँगी। मुझे तुम्हारे आने का पता होता, तो मैं इस वक़्त भी कुछ और चीज़ बना रखती। यहाँ बाज़ार में तो कुछ मिलता ही नहीं। किसी दिन अच्छी सब्ज़ी मिल जाए, तो समझो बड़े भाग्य का दिन है। कोई दिन होता है जिस दिन एकाध अंडा मिल जाता है।… शाम को मैं तुम्हारे लिए मछली बनाऊँगी। यहाँ की ट्राउट बहुत अच्छी होती है। मगर मिलती बहुत मुश्किल से है।”

मुझे ख़ुशी हुई कि मैंने सफलतापूर्वक बात का विषय बदल दिया है। मिस पाल बिस्तर से उठकर खड़ी हो गई थी। मैंने भी कुर्सी से उठते हुए कहा, “आओ, चलकर तुम्हारा रसोईघर तो देख लूँ। इस समय मुझे कसकर भूख लगी है, इसलिए जो कुछ भी बना है, वह मुझे ट्राउट से अच्छा लगेगा। शाम को मैं जोगिन्दरनगर पहुँच जाऊँगा।”

मिस पाल दरवाज़े से बाहर निकलती हुई सहसा रुक गई।

“तुम्हें शाम को जोगिन्दरनगर ही पहुँचना है तो लौटकर क्यों आए थे? यह बात तुम गाँठ में बाँध लो कि आज मैं तुम्हें यहाँ से नहीं जाने दूँगी। तुम्हें पता है इन तीन महीनों में तुम मेरे यहाँ पहले ही मेहमान आए हो? मैं तुम्हें आज कैसे जाने दे सकती हूँ?… तुम्हारे साथ कुछ सामान-आमान भी है या ऐसे ही चले आए थे?”

मैंने उसे बताया कि मैं अपना सामान हिमाचल राज्य परिवहन के दफ़्तर में छोड़ आया हूँ और उससे कह आया हूँ कि दो घंटे में मैं लौट आऊँगा।

“मैं अभी पोस्टमास्टर से वहाँ टेलीफ़ोन करा दूँगी। कल तक तुम्हारा सामान यहाँ ले आएँगे। तुम कम-से-कम एक सप्ताह यहाँ रहोगे। समझे? मुझे पता होता कि तुम मनाली में आए हुए हो तो मैं भी कुछ दिन के लिए वहाँ चली आती। आजकल तो मैं यहाँ… ख़ैर… तुम पहले उधर तो आओ, नहीं भूख के मारे ही यहाँ से भाग जाओगे।”

मैं इस नई स्थिति के लिए तैयार नहीं था। उस सम्बन्ध में बाद में बात करने की सोचकर मैं उसके साथ रसोईघर में चला गया। रसोईघर में कमरे जितनी अराजकता नहीं थी, शायद इसलिए कि वहाँ सामान ही बहुत कम था। एक कपड़े की आरामकुर्सी थी, जो लगभग ख़ाली ही थी—उस पर सिर्फ़ नमक का एक डिब्बा रखा हुआ था। शायद मिस पाल उस पर बैठकर खाना बनाती थी। खाना बनाने का और सारा सामान एक टूटी हुई मेज़ पर रखा था। कुर्सी पर रखा हुआ डिब्बा उसने जल्दी से उठाकर मेज़ पर रख दिया और इस तरह मेरे बैठने के लिए जगह कर दी।

फिर मिस पाल ने जल्दी-जल्दी स्टोव जलाया और सब्ज़ी की पतीली उस पर रख दी। कलछी साफ़ नहीं थी, वह उसे साफ़ करने के लिए बाहर चली गई। लौटकर उसे कलछी को पोंछने के लिए कोई कपड़ा नहीं मिला। उसने अपनी कमीज़ से ही उसे पोंछ लिया और सब्जी को हिलाने लगी।

“दो आदमियों का खाना है भी या दोनों को ही भूखे रहना पड़ेगा?” मैंने पूछा।

“खाना बहुत है”, मिस पाल झुककर पतीली में देखती हुई बोली।

“क्या-क्या है?”

मिस पाल कलछी से पतीली में टटोलकर देखने लगी।

“बहुत कुछ है। आलू भी हैं, बैंगन भी हैं और शायद… शायद बीच में एकाध टिंडा भी है। यह सब्जी मैंने परसों बनायी थी।”

“परसों?” मैं ऐसे चौंक गया जैसे मेरा माथा सहसा किसी चीज़ से टकरा गया हो। मिस पाल कलछी चलाती रही।

“हर रोज़ तो नहीं बना पाती हूँ”, वह बोली। रोज़ बनाने लगूँ तो बस खाना बनाने की ही हो रहूँ। और अम्… अ.. अपने अकेली के लिए रोज़ बनाने का उत्साह भी तो नहीं होता। कई बार तो मैं सप्ताह-भर का खाना एक साथ बना लेती हूँ और फिर निश्चिंत होकर खाती रहती हूँ। कहो तो तुम्हारे लिए मैं अभी ताज़ा बना दूँ।”

“तो चपातियाँ भी क्या परसों की ही बना रखी हैं?” मैं अनायास कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

“आओ, इधर आकर देख लो, खा सकोगे या नहीं।” वह कोने में रखे हुए बेंत के संदूक़ के पास चली गई। मैं भी उसके पास पहुँच गया। मिस पाल ने संदूक़ का ढकना उठा दिया। संदूक़ में पच्चीस-तीस खुश्क चपातियाँ पड़ी थीं। सूखकर उन सबने कई तरह की आकृतियाँ धारण कर ली थीं। मैं संदूक़ के पास से आकर फिर कुर्सी पर बैठ गया।

“तुम्हारे लिए ताज़ा चपातियाँ बना देती हूँ”, मिस पाल एक अपराधी की तरह देखती हुई बोली।

“नहीं-नहीं, जो कुछ बना रखा है, वही खाएँगे”, मैंने कहा। मगर अपनी इस भलमनसाहत के लिए मेरा मन अंदर-ही-अंदर कुढ़ गया।

मिस पाल संदूक़ का ढक्कन बंद करके स्टोव के पास लौट गई।

“सब्ज़ी तीन दिन से ज़्यादा नहीं चलती”, वह बोली, “बाद में मैं जैम, प्याज़ और नमक से काम चलाती हूँ। यहाँ अलूचे बहुत मिल जाते हैं, इसलिए मैंने बहुत-सा अलूचे का जैम बना रखा है। खाकर देखो, अच्छा जैम है।… ठहरो, तुम्हें प्लेट देती हूँ।”

वह फिर जल्दी से बाहर चली गई और कमरे से कीलोंवाली प्लेट ख़ाली करके ले आयी।

“गिलास में अम्… अ” वह आकर बोली, “सरसों का तेल रखा है। पानी तुम प्याली में ही ले लोगे या…?”

ट्राउट मछली… खाना खाते समय और खाना खा चुकने के बाद भी मिस पाल के दिमाग़ पर ट्राउट मछली की बात ही सवार रही। जैसे भी हो, शाम को वह ट्राउट मछली बनाएगी। उसके हठ की वजह से मैंने उससे कह दिया था कि मैं अगले दिन सुबह तक वहाँ रह जाऊँगा। मिस पाल ने आगे का फ़ैसला अगले दिन पर छोड़ दिया था। उसे शाम के लिए कई और चीज़ों का इंतज़ाम करना था, क्योंकि ट्राउट मछली आसानी से तो नहीं बन जाती। पहली चीज़ घी चाहिए था। डिब्बे में घी नाममात्र को ही था। प्याज़ और मसाला भी घर में नहीं था। मिट्टी का तेल भी चाहिए था। खाने के बाद हम लोग घूमने के लिए निकले तो पहले वह मुझे साथ बाज़ार में ले गई। हटवार के पास भी घी नहीं था। उसके लिए मिस पाल ने पोस्टमास्टर से अनुरोध किया कि वह अपने घर से उसे शाम के लिए आधा सेर घी भिजवा दे, अगले दिन कुल्लू से लाकर लौटा देगी। उससे उसने यह भी कहा कि वह अपने घर के थोड़े-से फ़्रेंच बीन भी उतरवाकर उसे भेज दे, और कोई मछलीवाला उधर से गुज़रे तो उसके लिए सेर-भर ट्राउट ले रखे।

“सब्बरवाल साहब, मैं आपको बहुत तकलीफ़ देती हूँ”, वह चलने से पहले सात-आठ बार उसे धन्यवाद देकर बोली, “मगर देखिए, मेरे मेहमान आए हुए हैं, और यहाँ ट्राउट के अलावा कोई अच्छी चीज़ मिलती नहीं। देखती हूँ, अगर बाली मुझे मिल जाए तो मैं उससे कहूँगी कि वह मुझे दरिया से एक मछली पकड़ दे। मगर बाली का कोई भरोसा नहीं। आप ज़रूर मेरे लिए ले रखिएगा। मैंने मिसेज़ एटकिन्सन को भी कहला दिया है। उन्होंने भी ले ली तो मैं आज और कल दोनों दिन बना लूँगी। ध्यान रखिएगा। कई बार मछलीवाला आवाज़ नहीं लगाता और ऐसे ही निकल जाता है। थैंक यू। थैंक यू वेरी मच!”

मेरे सामान के लिए उसने कुल्लू फ़ोन भी करा दिया। अब सड़क पर चलती हुई वह सुबह के नाश्ते की बात करने लगी।

“रात को तो ट्राउट हो जाएगी, मगर सुबह नाश्ता क्या बनाया जाए? डबलरोटी यहाँ नहीं मिलेगी, नहीं तो मैं तुम्हें शहद के टोस्ट ही बनाकर खिलाती। अच्छा ख़ैर, देखो…।”

सड़क पर खुली धूप फैली थी और भेड़ों और पश्म के बकरों का रेवड़ हमारे आगे-आगे चल रहा था। साथ दो कुत्ते जीभ लपलपाते हुए पहरेदारी करते जा रहे थे। सामने से एक जीप के आ जाने से रेवड़ में खलबली मच गई। बकरीवाले भेड़ों को पहाड़ की तरफ धकेलने लगे। एक भेड़ का बच्चा ढलान से फिसल गया और नीचे से सिर उठाकर मिमियाने लगा। किसी बकरीवाले का ध्यान उसकी तरफ़ नहीं गया तो मिस पाल सहसा परेशान हो उठी, “ए भाई, देखो वह बच्चा नीचे जा गिरा है। बकरीवाले, एक बच्चा नीचे खाई में गिर गया है, उसे उठा लाओ। ए भाई!”

एक दिन पहले वर्षा हुई थी, इसलिए ब्यास ख़ूब चढ़ा हुआ था। नुकीली चट्‌टानों से छिलता और कटता हुआ पानी शोर करता हुआ बह रहा था। सामने दरिया पार करने का झूला था। झूले की चर्खियाँ घूम रही थीं, रस्सियाँ इकट्ठी हो रही थीं और झूला दो व्यक्तियों को लिए हुए इस पार से उस पार जा रहा था। सहसा झूले में बैठे हुए दोनों व्यक्ति ‘ही-ही-ही-ही’ करके हँसने लगे, जैसे किसी को चिढ़ा रहे हों। फिर उनमें से एक ने ज़ोर से छींक दिया। झूला उस पार पहुँच गया और वे व्यक्ति उसी तरह हँसते और छींकते हुए उससे उतर गए। झूला छोड़ दिया गया, और उसकी रस्सियाँ इस सिरे से उस सिरे तक आधी गोलाइयों में फैल गईं। जो व्यक्ति उधर उतरे थे, वे उस किनारे से फिर एक बार ज़ोर से हँसे। तभी झूला खींचने वालों में एक लड़का मचान से उतरकर हमारे पास आ गया। वह ऐसे बात करने लगा जैसे अभी-अभी कोई दुर्घटना होकर हटी हो।

“मिस साहब”, उसने कहा, “यह वही सुदर्शन है, जिसने आपके कुत्ते को कुछ खिलाया था। यह अब भी शरारत करने से बाज़ नहीं आता।”

उन व्यक्तियों के हँसने और छींकने का मिस पाल पर उतना असर नहीं हुआ था जितना उस लड़के की बात का हुआ था। उसका चेहरा एकदम से उतर गया और आवाज खुश्क हो गई।

“यह उधर के गाँव का आदमी है न?” उसने पूछा।

“हाँ, मिस साहब!”

“तुम पोस्टमास्टर को बताना। वे अपने-आप इसे ठीक कर लेंगे।”

“मिस साहब, यह हमसे कहता है कि यह मिस साहब…!”

“तुम इस वक़्त जाओ अपना काम करो”, मिस पाल उसे झिड़ककर बोली, “पोस्टमास्टर से कहना वे इसे एक दिन में ठीक कर देंगे।”

“मगर मिस साहब…!”

“जाओ, फिर कभी उधर आकर बात करना।”

लड़के की समझ में नहीं आया कि मिस साहब से बात करने में उस समय उससे क्या अपराध हुआ है। वह सिर लटकाए हुए चुपचाप वहाँ से लौट गया।

कुछ देर हम लोग वहीं रुके रहे। मिस पाल जैसे थकी हुई-सी सड़क के किनारे एक बड़े-से पत्थर पर बैठ गई। मैं दरिया के उस पार पहाड़ की चोटी पर उगे हुए वृक्षों की लम्बी पंक्ति को देखने लगा, जो नीले आकाश और ग़ुब्बारे जैसे सफ़ेद बादलों के बीच खिंची हुई लकीर-सी लगती थी। दरिया के दोनों तरफ़ पुल के सलेटी खम्भे खड़े थे, जिन पर अभी पुल नहीं बना था। खम्भों के आसपास से झड़कर थोड़ी-थोड़ी मिट्टी दरिया में गिर रही थी। मैंने उधर से आँखें हटाकर मिस पाल की तरफ़ देखा। मिस पाल मेरी तरफ़ देख रही थी। शायद वह जानना चाहती थी कि झूलेवाले लड़के की बात का मेरे मन पर क्या प्रभाव पड़ा है।

“तो आगे चलें?” मुझसे आँखें मिलते ही उसने पूछा।

“हाँ, चलो।”

मिस पाल उठ खड़ी हुई। उसकी साँस कुछ-कुछ फूल रही थी। वह चलती हुई मुझे बताने लगी कि वहाँ के लोगों में कितनी तरह के अंधविश्वास हैं। जब पिंकी बीमार हुआ तो वहाँ के लोगों ने सोचा था कि किसी ने उसे कुछ खिला-विला दिया है।

“ये अनपढ़ लोग हैं। मैंने इनकी बातों का विरोध भी नहीं किया। ये लोग अपने अंधविश्वास एक दिन में थोड़े ही छोड़ सकते हैं! इस चीज़ में जाने अभी कितने बरस लगेंगे!”

और रास्ते में चलते हुए वह बार-बार मेरी तरफ़ देखती रही कि मुझे उसकी बात पर विश्वास हुआ है या नहीं। मैंने सड़क से एक छोटा-सा पत्थर उठा लिया था और चुपचाप उसे उछालने लगा था। काफ़ी देर तक हम लोग ख़ामोश चलते रहे। वह ख़ामोशी मुझे अस्वाभाविक लगने लगी तो मैंने मिस पाल से वापस घर चलने का प्रस्ताव किया।

“चलो, चलकर तुम्हारी बनायी हुई नई तस्वीरें ही देखी जाएँ”, मैंने कहा, “इन तीन-चार महीनों में तो तुमने काफ़ी काम कर लिया होगा।”

“पहले घर चलकर एक-एक प्याली चाय पीते हैं”, मिस पाल बोली, “सचमुच इस समय मैं चाय की गरम प्याली के लिए ज़िन्दगी की कोई भी चीज़ क़ुर्बान कर सकती हूँ। मेरा तो मन था कि घर से चलने से पहले ही एक-एक प्याली पी लेते, मगर फिर मैंने कहा कि पोस्टमास्टर से कहने में देर हो जाएगी तो मछलीवाला निकल जाएगा।”

इस बात ने मेरे मन को थोड़ा गुदगुदा दिया कि तीन महीने में आया हुआ पहला मेहमान उस समय मिस पाल के लिए अपनी तस्वीरों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।

लौटकर कॉटेज में पहुँचते ही मिस पाल चाय बनाने में व्यस्त हो गई। वह आते हुए काफ़ी थक गई थी, क्योंकि ज़रा-सी चढ़ाई चढ़ने में ही उसकी साँस फूलने लगती थी, मगर वह ज़रा देर भी सुस्ताने के लिए नहीं रुकी। चाय के लिए उसकी यह व्यस्तता मुझे बहुत अस्वाभाविक लगी, शायद इसलिए कि मुझे ख़ुद चाय की ज़रूरत महसूस नहीं हो रही थी। मिस पाल इस तरह चम्मचों और प्यालियों को ढूँढने के लिए परेशान हो रही थी, जैसे उसके दस मेहमान चाय का इंतज़ार कर रहे हों और उसे समझ न आ रहा हो कि कैसे जल्दी से सारा इंतज़ाम करे।

मैं घूमकर कमरे में और बरामदे में लगी हुई तस्वीरों को देखने लगा। जिस-जिस तस्वीर पर भी मेरी नज़र पड़ी, मुझे लगा वह मेरी पहले की देखी हुई है। कुछ बड़ी तस्वीरें थीं जो मिस पाल पंजाब के एक मेले से बनाकर लायी थी। वह अजीब-अजीब-से चेहरे थे, जिन पर हम लोग एक बार फब्तियाँ कसते रहे थे। जाने क्यों, मिस पाल अपने चित्रों के लिए सदा ऐसे ही चेहरे चुनती थी जो किसी-न-किसी रूप में विकृत हों! मैंने सारा कमरा और बरामदा घूम लिया। दो-एक अधूरी तस्वीरों को छोड़कर मुझे एक भी नई चीज़ दिखायी नहीं दी। मैंने रसोईघर में जाकर मिस पाल से पूछा कि उसकी नई तस्वीरें कहाँ हैं।

“अजी छोड़ो भी”, मिस पाल प्यालियाँ धोती हुई बोली, “चाय की प्याली पीकर हम लोग ऊपर की तरफ़ घूमने चलते हैं। ऊपर एक बहुत पुराना मंदिर है। वहाँ का पुजारी तुम्हें ऐसे-ऐसे क़िस्से सुनाएगा कि तुम सुनकर हैरान रह जाओगे। एक दिन वह बता रहा था कि यहाँ कुछ मंदिर ऐसे हैं, जहाँ लोग पहले तो देवता से वर्षा के लिए प्रार्थना करते हैं, मगर बाद में अगर देवता वर्षा नहीं देता तो उसे हिडिम्बा के मंदिर में ले जाकर रस्सी से लटका देते हैं। है नहीं मज़ेदार बात? जो देवता तुम्हारा काम न करे, उसे फाँसी लगा दो। मैं कहती हूँ रणजीत, यहाँ लोगों में इतने अंधविश्वास हैं, इतने अंधविश्वास हैं कि क्या कहा जाए! ये लोग अभी तक जैसे कौरवों-पांडवों के ज़माने में ही जीते हैं, आज के ज़माने से इनका कोई सम्बन्ध ही नहीं है।”

और एक बार उड़ती नज़र से मुझे देखकर वह चीनी ढूँढने में व्यस्त हो गई।

“अरे चीनी कहाँ चली गई? अभी हाथ में थी, और अभी न जाने कहाँ रख दी? देखो, कैसी भुलक्कड़ हो गई हूँ! मेरा तो बस एक ही इलाज है कि कोई हाथ में छड़ी लेकर मुझे ठीक करे। यह भी कोई रहने का ढंग है जैसे मैं रहती हूँ?”

“तुमने यहाँ के कुछ लैंडस्केप नहीं बनाए?” मैंने पूछा।

“तस्वीरें तो बहुत-सी शुरू कर रखी हैं, पर अभी तक पूरी नहीं कर सकी”, मिस पाल जैसे उस मुश्किल स्थिति से बचने का प्रयत्न करती हुई बोली, “अब किसी दिन लगकर सबकी-सब तस्वीरें पूरी करूँगी। तारपीन का तेल भी ख़त्म हो चुका है, किसी दिन जाकर लाना है। कई दिनों से सोच रही थी कि मंडी जाकर कैनवस और रंग भी ले आऊँ, पर यूँ ही आलस कर जाती हूँ। कुछ ड्राइंग पेपर भी जिल्द कराने हैं। अब जाऊँगी किसी दिन और सारे काम एक साथ ही कर आऊँगी।”

बात करते हुए मिस पाल की आँखें झुकी जा रही थीं, जैसे वह अपने ही सामने किसी चीज़ के लिए अपराधी हो, और लगातार बात करके अपने अपराध के अनुभव को छिपाना चाहती हो। मैं चुप रहकर उसे चाय में चीनी मिलाते देखता रहा। उसे देखते हुए उस समय मेरे मन में कुछ वैसी उदासी भरने लगी जैसी एक निर्जन समुद्र-तट पर या ऊँची पहाड़ियों से घिरी हुई किसी एकांत पथरीली घाटी में जाकर अनायास मन में भर जाती है।

“कल से एक तो मैं अपने घर को ठीक करूँगी”, मिस पाल क्षण-भर बाद फिर उसी तरह बिना रुके बात करने लगी, “एक तो घर का सारा सामान ठीक ढंग से लगाना है। तुम्हें पता है, मैंने कितने चाव से दिल्ली में अपने कमरे के लिए जाली के पर्दे बनवाए थे? वे पर्दे यहाँ ज्यों-के-त्यों बक्स में बंद पड़े हैं; मेरा लगाने को मन ही नहीं हुआ। मैं कल ही तरखान से कहकर पर्दों के लिए चौखटे बनवाऊँगी। खाने-पीने का थोड़ा-बहुत सामान भी घर में रखना ही चाहिए; बिस्कुट, मक्खन, डबलरोटी और अचार का होना तो बहुत ही ज़रूरी है। जो चीज़ें कुल्लू से मिल जाती हैं, वे तो मैं लाकर रख ही सकती हूँ।… तारपीन का तेल भी मुझे कुल्लू से ही मिल जाएगा।”

उसने चाय की प्याली मेरे हाथ में दे दी तो भी मेरे मुँह से कोई बात नहीं निकली, और मैं चुपचाप छोटे-छोटे घूँट भरने लगा। मेरे मन को उस समय एक तरह की जड़ता ने घेर लिया था। कहाँ मिस पाल के बारे में दिल्ली के लोगों से सुनी हुई वे सब बातें और कहाँ उसके जीवन की यह एकांत विडम्बना!

ट्राउट मछली! मिस पाल की सारी परेशानी के बावजूद उस दिन उसे ट्राउट नहीं मिल सकी। पोस्टमास्टर ने बताया कि मछलीवाला उस दिन आया ही नहीं। मिस पाल के बहुत-बहुत ख़ुशामद करने पर भी मकान-मालकिन का चौकीदार बाली दरिया से मछली पकड़ने के लिए राज़ी नहीं हुआ। उसने कहा कि वह अपनी छड़ी पॉलिश कर रहा है, उसे फ़ुरसत नहीं है। मिसेज़ एटकिन्सन के बच्चों ने एक मछली पकड़ी थी। मगर उसके पति ने उस दिन ख़ासतौर पर मछली की कतलियों के लिए कहा था, इसलिए वह अपनी मछली मिस पाल को नहीं दे सकती थी। हाँ, पोस्टमास्टर ने फ़्रेंच बीन ज़रूर भेज दिए। चावल और सूखे फ़्रेंच बीन! रात की रोटी के लिए मिस पाल का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया। खाना बनाने में उसका मन भी नहीं लगा, जिससे चावल थोड़ा नीचे लग गए। खाना खाते समय मिस पाल बस अफ़सोस ही प्रकट करती रही।

“मैं बहुत बदक़िस्मत हूँ रणजीत, हर लिहाज़ से मैं बहुत ही बदक़िस्मत हूँ”, खाना खाने के बाद हम लोग बाहर मैदान में कुर्सियाँ निकालकर बैठ गए तो उसने कहा। वह सिर के पीछे हाथ रखे आकाश की ओर देख रही थी। बारहीं या तेरहीं की रात होने से आकाश में तीन तरफ़ खुली चाँदनी फैली थी। ब्यास की आवाज़ वातावरण में एक गूँज पैदा कर रही थी। वृक्षों की सरसराहट के अतिरिक्त मैदान की घास से भी एक धीमी-सी सरसराहट निकलती प्रतीत होती थी। हवा तेज़ थी और सामने पहाड़ के पीछे से उठता हुआ बादल धीरे-धीरे चाँद की तरफ़ सरक रहा था।

“क्या बात है मिस पाल, तुम इस तरह गुमसुम क्यों हो रही हो?” मैंने कहा, “चावल थोड़े ख़राब हो गए, तो इसमें इस तरह उदास होने की क्या बात है!”

मिस पाल सामने पहाड़ की धुँधली रेखा को देखती रही, जैसे उसमें कोई चीज़ खोज रही हो।

“मैं सोचती हूँ रणजीत कि मेरे जीने का कोई भी अर्थ नहीं है”, उसने कहा।

और वह मुझे अपने आरम्भिक जीवन की कहानी सुनाने लगी। उसे बहुत बड़ी शिकायत थी कि आरम्भ में अपने घर में भी उसे ज़रा सुख नहीं मिला, यहाँ तक कि अपने माता-पिता का स्नेह भी उसे नहीं मिला। उसकी माँ ने—उसकी अपनी माँ ने—भी उसे प्यार नहीं किया। इसी वजह से पंद्रह साल पहले वह अपना घर छोड़कर नौकरी करने के लिए निकल आयी थी।

“सोचो, माँ को मेरा घर में होना ही बुरा लगता था। पिताजी को मेरे संगीत सीखने से चिढ़ थी। वे कहा करते थे कि मेरा घर—घर है रंडीख़ाना नहीं। भाइयों का जो थोड़ा-बहुत प्यार था, वह भी भाभियों के आने के बाद छिन गया। मैंने आज तक कितनी-कितनी मुश्किल से अपनी अम्… अ… पवित्रता को बचाया है, यह मैं ही जानती हूँ। तुम सोच सकते हो कि एक अकेली लड़की के लिए यह कितना मुश्किल होता है। मेरा लाहौर की तरफ़ घूमने जाने को मन था; वहाँ की कुछ तस्वीरें बनाना चाहती थी, मगर मैं वहाँ नहीं गई, क्योंकि मैं सोचती थी कि मर्द की पशु-शक्ति के सामने अम्… अ… मैं अकेली क्या कर सकूँगी। फिर, तुम्हें पता है कि डिपार्टमेंट के लोग वहाँ मेरे बारे में कैसी बुरी-बुरी बातें किया करते थे। इसीलिए मैं कहती हूँ कि मुझे वहाँ के एक-एक आदमी से नफ़रत है। वे तुम्हारे बुखारिया और मिर्ज़ा और जोरावरसिंह। मैं तो कभी ऐसे लोगों के साथ बैठकर एक प्याली चाय भी पीना पसंद नहीं करती थी। तुम्हें याद है, एक बार जब जोरावरसिंह ने मुझसे कहा था…”

और फिर वह दफ़्तर के जीवन की कई छोटी-छोटी घटनाएँ दोहराने लगी। जब मैंने देखा कि वह फिर से उसी वातावरण में जाकर ख़ामख़ाह अपना ग़ुस्सा भड़का रही है तो मैंने उससे फिर कहा कि वह अब दफ़्तर के लोगों के बारे में न सोचे, अपने संगीत और अपने चित्रों की बात ही सोचे।

“तुम यहाँ रहकर कुछ अच्छी-अच्छी चीज़ें बना लो, फिर दिल्ली आकर अपनी प्रदर्शनी करना।” मैंने कहा, “जब लोग तुम्हारी चीज़ें देखेंगे और तुम्हारा नाम सुनेंगे तो अपने-आप तुम्हारी क़द्र करेंगे।”

“न, मैं प्रदर्शनी-अदर्शनी के किसी चक्कर में नहीं पड़ूँगी।” मिस पाल उसी तरह सामने की तरफ़ देखती हुई बोली, “तुम जानते ही हो इन सब चीज़ों में कितनी पॉलिटिक्स चलती है। मैं उस पॉलिटिक्स में नहीं पड़ना चाहती। मेरे पास अभी तीन-चार हज़ार रुपए हैं, जिनसे मेरा काफ़ी दिन गुज़ारा चल जाएगा। जब ये रुपए चुक जाएँगे, तो…” और वह जैसे कुछ सोचती हुई चुप कर गई।

मैं आगे की बात सुनने के लिए बहुत उत्सुक था। मगर मिस पाल कुछ देर बाद कंधे हिलाकर बोली, “…तो भी कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। अभी वह वक़्त आए तो सही।”

बादल ऊँचा उठ रहा था और वातावरण में ठंडक बढ़ती जा रही थी। जंगल की तरफ़ से आती हुई हवा की गूँज शरीर में बार-बार सिहरन भर देती थी। साथ के कॉटेज में रेडियो पर पश्चिमी संगीत चल रहा था। उससे आगे के कॉटेज में लोग खिलखिलाकर हँस रहे थे। मिस पाल अपनी आँखें मूँदें हुए मुझे बताने लगी कि होशियारपुर में उसने भृगुसंहिता से अपनी कुंडली निकलवायी थी। उस कुंडली के फल के अनुसार इस जन्म में उस पर यह शाप है कि उसे कोई सुख नहीं मिल सकता—न धन का, न ख्याति का, न प्यार का। इसका कारण भी भृगुसंहिता में दिया था। अपने पिछले जन्म में वह सुंदर लड़की थी और नृत्य-संगीत आदि कलाओं में बहुत पटु थी। उसके पिता बहुत धनी थे और वह उनकी अकेली संतान थी। जिस व्यक्ति से उसका ब्याह हुआ, वह बहुत सुंदर और धनी था।

“मगर मुझे अपनी सुंदरता और अपनी कला का बहुत मान था, इसलिए मैंने अपने पति का आदर नहीं किया। कुछ ही दिनों में वह बेचारा दुखी होकर इस संसार से चल बसा। इसीलिए मुझ पर अब यह शाप है कि इस जन्म में मुझे सुख नहीं मिल सकता।”

मैं चुपचाप उसे देखता रहा। अभी दिन में ही वह वहाँ के लोगों के अंधविश्वासों की चर्चा करती हुई उनका मज़ाक़ उड़ा रही थी। सहसा मिस पाल भी बोलते-बोलते चुप कर गई और उसकी आँखें मेरे चेहरे पर स्थिर हो गईं। उसके लिपस्टिक से रँगे हुए ओठों की तह में जैसे उस समय कोई चीज़ काँप रही थी। काफ़ी देर हम लोग चुप बैठे रहे। बादल ने चाँद को छा लिया था और चारों तरफ़ गहरा अँधेरा हो रहा था। सहसा साथ के कॉटेज की बत्ती भी बुझ गई, जिससे अँधेरा और भी गहरा लगने लगा।

मिस पाल उसी तरह मेरी तरफ़ देख रही थी। मुझे महसूस होने लगा कि मेरे आसपास की हवा कुछ भारी हो रही है। मैं सहसा कुर्सी पीछे सरकाकर उठ खड़ा हुआ।

“मेरा ख़याल है, अब रात काफ़ी हो गई है”, मैंने कहा, “इसलिए अब चलकर सो रहा जाए। और बातें अब सुबह होंगी।”

“हाँ-हाँ”, मिस पाल भी अपनी कुर्सी से उठती हुई बोली, “मैं अभी चलकर बिस्तर बिछा देती हूँ। तुम बताओ, तुम्हारा बिस्तर बरामदे में बिछा दूँ या…”

“हाँ, बरामदे में ही बिछा दो। अंदर काफ़ी गरमी होगी।”

“देख लो, रात को ठंड हो जाएगी।”

“कोई बात नहीं, बरामदे में हवा आती रहेगी तो अच्छा लगेगा।”

और बरामदे में लेटे हुए मैं देर तक जाली के बाहर देखता रहा। बादल पूरे आकाश में छा गया था और दरिया का शब्द बहुत पास आया-सा लगता था। जाली से लगा हुआ मकड़ी का जाला हवा से हिल रहा था। पास ही कोई चूहा कोई चीज़ कुतर रहा था। अंदर कमरे से बार-बार करवट बदलने की आवाज़ सुनायी दे जाती थी।

“रणजीत!” अंदर से आवाज़ आयी तो मेरे सारे शरीर में एक सिहरन भर गई।

“मिस पाल!”

“सरदी तो नहीं लग रही?”

“नहीं, बल्कि हवा है, इसलिए अच्छा लग रहा है।”

और तभी टप्‌-टप्‌-टप्‌-टप्‌ मोटी-मोटी बूँदें पड़ने लगीं। पानी की बौछार मेरे बिस्तर पर आने लगी तो मैंने करवट बदली। बरामदे की बत्ती मैंने जलती रहने दी थी, इसलिए कई चीज़ें इधर-उधर बिखरी नज़र आ रही थीं। बिस्तर बिछाते समय मिस पाल को घर की काफ़ी उथल-पुथल करनी पड़ी थी। मेरी चारपाई के पास ही एक तिपाई औंधी पड़ी थी और उससे ज़रा आगे तस्वीरों के कुछ एक फ़्रेम रास्ते में गिरे थे। सामने के कोने में मिस पाल के ब्रश और कपड़े एक ढेर में उलझे हुए पड़े थे।

अंदर की चारपाई चिरमिरायी और लकड़ी के फ़र्श पर पैरों की धप्-धप्‌ आवाज़ सुनायी देने लगी। फिर सुराही से चुल्लू में पानी पीने की आवाज़ आने लगी।

“रणजीत!”

“मिस पाल!”

“प्यास तो नहीं लगी?”

“नहीं।”

“अच्छा, सो जाओ।”

कुछ देर मुझे लगता रहा जैसे मेरे आसपास एक बहुत तेज़ साँस चल रही है जो धीरे-धीरे दबे पैरों, सारे वातावरण पर अधिकार करती जा रही है, और आसपास की हर चीज़ अपने पर उसका दबाव महसूस कर रही है। पानी की बौछार कुछ धीमी पड़ने लगी तो मैंने फिर से जाली की तरफ़ करवट बदल ली और पहले की तरह ही बाहर देखने लगा। तभी पास ही झन्न से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ सुनायी दी।

“क्या गिरा है रणजीत?” अंदर से आवाज़ आयी।

“पता नहीं, शायद किसी चूहे ने कुछ गिरा दिया है।”

“सचमुच मैं यहाँ चूहों से बहुत तंग आ गई हूँ।”

मैं चुप रहा। अंदर की चारपाई फिर चिरमिरायी।

“अच्छा, सो जाओ!”

सारी रात पानी पड़ता रहा। सुबह-सुबह, वर्षा थम गई, मगर आकाश साफ़ नहीं हुआ। सुबह उठकर चाय के समय तक मेरी मिस पाल से ख़ास बात नहीं हुई। चाय पीते समय भी मिस पाल अधूरे-अधूरे टुकड़ों में ही बात करती रही। मैंने उससे कहा कि मैं अब पहली बस से चला जाऊँगा तो उसने एक बार भी मुझसे रुकने के लिए आग्रह नहीं किया। यूँ साधारण बातचीत में भी मिस पाल काफ़ी तकल्लुफ़ बरत रही थी, जैसे किसी बिलकुल अपरिचित व्यक्ति से बात कर रही हो। मुझे उसका सारा व्यवहार बहुत अस्वाभाविक लग रहा था। वह जैसे बात न करने के लिए ही अपने को छोटे-छोटे कामों में व्यस्त रख रही थी। मैंने दो-एक बार उससे हल्के-से मज़ाक़ करने का भी प्रयत्न किया जिससे तनाव हट जाए और मैं उससे ठीक से विदा लेकर जा सकूँ, मगर मिस पाल के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कराहट भी नहीं आयी।

“अच्छा तो मिस पाल, अब चलने की बात की जाए”, आख़िर मैंने कहा, “तुम कल कह रही थीं कि तुम भी कुल्लू तक साथ ही चलोगी। तो अच्छा होगा कि तुम आज ही वहाँ से अपना सारा सामान भी ले आओ। बाद में तुम फिर आलस कर जाओगी।”

“नहीं, मैं आलस नहीं करूँगी”, मिस पाल बोली, “किसी दिन जाकर जो-जो कुछ लाना है, सब ले आऊँगी।”

और फिर बरामदे में बिखरे हुए कपड़ों को बिना मतलब ही उठाकर इधर से उधर रखते हुए उसने कहा, “आज बरसात का दिन है, इसलिए आज नहीं जाऊँगी। कल या परसों किसी समय देखूँगी। लाने के लिए कितनी ही चीज़ें हैं, इसलिए अच्छी तरह सब सोचकर जाना चाहिए। आज घिरा हुआ दिन है, इसलिए आज नहीं…।”

“घिरा हुआ दिन है तो क्या घर का सामान नहीं आएगा?” मैंने अपने आग्रह से उसे सुलझाने की चेष्टा करते हुए कहा, “तुम मुझे बताओ कि घी और तारपीन के डिब्बे कहाँ रखे हैं। कोई बड़ा थैला हो तो वह भी साथ में ले लो। फुटकर चीज़ें उसमें आ जाएँगी। यहाँ से जो भी बस मिलेगी, उसमें हम लोग साथ-साथ चले चलेंगे। मैं कुल्लू से बारह बजे की बस पकड़कर आगे चला जाऊँगा। तुम्हें तो उधर से लौटने के लिए सारा दिन बसें मिलती रहेंगी।”

मैं जान-बूझकर इस तरह बात कर रहा था जैसे मिस पाल का साथ चलना निश्चित ही हो, हालाँकि मैं जानता था कि वह टालने का पूरा प्रयत्न करेगी। मिस पाल इधर से उधर जाती हुई ढूँढ-ढूँढकर अपने करने के लिए काम निकाल रही थी। उसके चेहरे से लग रहा था जैसे मेरी बातें उसे बिलकुल व्यर्थ लग रही हों और वह जल्द-अज़-जल्द अपने एकांत में लौट जाना चाहती हो।

“देखो, कभी-कभी यहाँ बस में एक भी सीट नहीं मिलती”, उसने कहा, “दो-दो सीटें मिलना तो बहुत ही मुश्किल है। तुम मेरी वजह से अपनी बारह बजे की बस क्यों मिस करते हो? तुम चले जाओ, मैं कल या परसों जाकर, जो कुछ भी मुझे लाना है, ले आऊँगी।” और जैसे सहसा कोई काम याद आ जाने से वह जल्दी से अपना चेहरा दूसरी तरफ़ हटाए हुए कमरे में चली गई। कुछ देर में वह पेटीकोट लिए हुए कमरे से बाहर आयी। पेटीकोट को टिड्डियाँ काट गई थीं। उसने जैसे नुक़सान की परेशानी की वजह से ही चेहरा सख़्त किए हुए उसे एक तरफ़ कोने में फेंक दिया और किसी तरह कठिनाई से बोली, “मैंने तुमसे कह दिया है कि तुम चले जाओ। तुम्हें पता है कि मुझे तो अकेली को ही दो सीटें चाहिए।”

“ये सब बहाने तुम रहने दो”, मैंने कहा, “एक बस में जगह नहीं मिलेगी तो दूसरी में मिल जाएगी। तुम इधर आकर मुझे बताओ कि वे डिब्बे कहाँ रखे हैं।”

मिस पाल शायद ज़्यादा बात नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने मेरी बात का विरोध नहीं किया।

“अच्छा तुम बैठो, मैं अभी ढूँढती हूँ।” उसने कहा और आँखें बचाती हुई रसोईघर में चली गई।

पहली बस में सचमुच हम लोगों को जगह नहीं मिली। ड्राइवर ने बस वहाँ रोकी ही नहीं, और हाथ के इशारे से कह दिया कि बस में जगह नहीं है। दूसरी बस में भी जगह नहीं थी, मगर किसी तरह कह-कहाकर हमने उसमें अपने लिए जगह बना ली। मगर हम कुल्लू काफ़ी देर से पहुँचे, क्योंकि रात की बरसात से एक जगह सड़क टूट गई थी और उसकी मरम्मत की जा रही थी। हमारे कुल्लू पहुँचने के लगभग साथ ही बारह बजे की बस भी मनाली से आ पहुँची। पौने बारह हो चुके थे। मैंने अंदर जाकर अपने सामान का पता किया, फिर बाहर मिस पाल के पास आ गया। मिस पाल ने ख़ाली डिब्बे अपने दोनों हाथों में सम्भाल रखे थे। मैं डिब्बे उसके हाथों से लेने लगा तो उसने अपने हाथ पीछे हटा लिए।

“चलो, पहले बाज़ार में चलकर तुम्हारा सामान ख़रीद लें”, मैंने कहा।

“अब सामान की बात रहने दो।” उसने कहा, “तुम्हारी बस आ गई है, तुम इसमें चले जाओ। सामान तो मैं किसी भी समय ख़रीद लूँगी। तुम्हें इसके बाद फिर किसी बस में जगह नहीं मिलेगी। दो बजे की बस मनाली से ही भरी हुई आती है। तुम्हारा एक दिन और यहाँ ख़राब होगा।”

“दिन ख़राब होने की क्या बात है।” मैंने कहा, “पहले चलकर बाज़ार से सामान ख़रीद लेते हैं। अगर आज सचमुच किसी बस में जगह नहीं मिली तो मैं तुम्हारे साथ लौट चलूँगा और कल किसी बस से चला जाऊँगा। मुझे वापस पहुँचने की ऐसी कोई जल्दी नहीं है।”

“नहीं तुम चले जाओ”, मिस पाल हठ के साथ बोली, “अपने लिए ख़ामख़ाह मैं तुम्हें क्यों परेशान करूँ? अपना सामान तो मैं जब कभी भी ले लूँगी।”

“मगर मुझे लगता है कि आज तुम ये डिब्बे इसी तरह लिए हुए ही लौट जाओगी।”

“अरे नहीं”, मिस पाल की आँखें उमड़ आयीं और वह अपने आँसुओं को रोकने के लिए दूसरी तरफ़ देखने लगी, “तुम समझते हो मैं अपने शरीर की देखभाल ही नहीं करती। अगर न करती तो यह इतना शरीर ऐसे ही होता?… लाओ, पैसे दो मैं तुम्हारा टिकट ले आती हूँ। देर करोगे तो इस बस में भी जगह नहीं मिलेगी।”

“तुम इस तरह ज़िद क्यों करती हो मिस पाल? मुझे जाने की सचमुच ऐसी कोई जल्दी नहीं है।” मैंने कहा।

“मैंने तुमसे कहा है, तुम पैसे निकालो, मैं तुम्हारा टिकट ले आ…। मगर नहीं, तुम रहने दो। कल का तुम्हारा टिकट मेरी वजह से ख़राब हुआ था। मैं फिर तुमसे पैसे किसलिए माँग रही हूँ?”

और वह डिब्बे वहीं रखकर झटपट टिकटघर की तरफ़ बढ़ गई।

“ठहरो, मिस पाल”, मैंने असमंजस में अपना बटुआ जेब से निकाल लिया।

“तुम रुको, मैं अभी आ रही हूँ। तुम उतनी देर में अपना सामान निकलवाकर ऊपर रखवाओ।”

मेरा मन उस समय न जाने कैसा हो रहा था, फिर भी मैंने अंदर से अपना सामान निकलवाया और बस की छत पर रखवा दिया। मिस पाल तब तक टिकटघर के बाहर ही खड़ी थी। शनिवार होने के कारण उस दिन स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गई थी और बहुत-से बच्चे बस्ते लटकाए सुल्तानपुर की पहाड़ी से नीचे आ रहे थे। कई बच्चे बस की सवारियों को देखने के लिए वहाँ आसपास जमा हो रहे थे। मिस पाल उस समय प्याज़ी रंग की सलवार-कमीज़ पहने थी और ऊपर काला दुपट्‌टा लिए थी। उन कपड़ों की वजह से उसका शरीर पीछे से और भी फैला हुआ लगता था। बच्चे एक-दूसरे से आगे होते हुए टिकटघर के नज़दीक जाने लगे। मिस पाल टिकटघर की खिड़की पर झुकी हुई थी। एक लड़के ने धीरे-से आवाज़ लगायी, “कमाल है भई कमाल है!”

इस पर आसपास खड़े बहुत-से बच्चे हँस दिए। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे भारी मन पर एक और बड़ा पत्थर डाल दिया हो। बच्चे सबके सब टिकटघर के आसपास जमा हो गए थे और आपस में खुसर-पुसर कर रहे थे। मैं उनसे कुछ कह भी नहीं सकता था, क्योंकि उससे मिस पाल का ध्यान ख़ामख़ाह उनकी तरफ़ चला जाता। मैं उधर से अपना ध्यान हटाकर दरिया की तरफ़ से आते हुए लोगों को देखने लगा। फिर भी बच्चों की खुसर-पुसर मेरे कानों में पड़ती रही। दो लड़कियाँ बहुत धीरे-धीरे आपस में बात कर रही थीं, “मर्द है।”

“नहीं, औरत है।”

“तू सिर के बाल देख, बाक़ी शरीर देख। मर्द है।”

“तू कपड़े देख, और सब कुछ देख। औरत है।”

“आओ, बच्चो आओ, पास आकर देखो”, मिस पाल की आवाज़ से मैं जैसे चौंक गया। मिस पाल टिकट लेकर खिड़की से हट आयी थी। बच्चे उसे आते देखकर ‘आ गई, आ गई’ कहते भाग खड़े हुए। एक बच्चे ने सड़क के उस तरफ़ जाकर फिर ज़ोर से आवाज़ लगायी, “कमाल है भई कमाल है !”

मिस पाल सड़क पर आकर कई क़दम बच्चों के पीछे चली गई।

“आओ बच्चों, यहाँ हमारे पास आओ”, वह कहती रही, “हम तुम्हें मारेंगे नहीं, टॉफ़ियाँ देंगे। आओ…”

मगर बच्चे पास आने के बजाय और भी दूर भाग गए। मिस पाल कुछ देर सड़क के बीच रुकी रही, फिर लौटकर मेरे पास आ गई। उस समय उसके चेहरे का भाव बहुत विचित्र लग रहा था। उसकी आँखों में आए हुए आँसू नीचे गिरने को हो रहे थे और उन्हें झुठलाने के लिए एक फीकी हँसी का प्रयत्न कर रही थी। उसने अपने ओठों को जाने किस तरह काटा था कि एकाध जगह से उसकी लिपस्टिक नीचे फैल गई थी। उसकी घिसी हुई कमीज़ की सीवनें कंधे के पास से खुल रही थीं।

“ख़ूबसूरत बच्चे थे, नहीं?” उसने आँखें झपकाते हुए कहा।

मैंने उसकी बात का समर्थन करने के लिए सिर हिलाया तो मुझे लगा कि मेरा सिर पत्थर की तरह भारी हो गया है। उसके बाद मेरी समझ में कुछ नहीं आया कि मिस पाल मुझसे क्या कह रही है और मैं उससे क्या बात कर रहा हूँ; जैसे आँखों और शब्दों के साथ विचारों का कोई सम्बन्ध ही नहीं रहा था। मुझे इतना याद है कि मैंने मिस पाल को टिकट के पैसे देने का प्रयत्न किया, मगर वह पीछे हट गई और मेरे बहुत अनुरोध करने पर भी उसने पैसे नहीं लिए। मगर किस अवचेतन प्रक्रिया से हम लोगों के बीच अब तक बातचीत का सूत्र बना रहा, यह मैं नहीं जान सका। मेरे कान उसे बोलते सुन रहे थे और अपने को भी। परन्तु वे जैसे दूर की ध्वनियाँ थीं—अस्फुट, अस्पष्ट और अर्थहीन। जो बात मैं ठीक से सुन सका वह यही थी, “और वहाँ जाकर रणजीत, दफ़्तर में मेरे बारे में किसी से बात मत करना। समझे? तुम्हें पता ही है कि वे लोग कितने ओछे हैं। बल्कि अच्छा होगा कि तुम किसी को यह भी न बताओ कि तुम मुझे यहाँ मिले थे। मैं नहीं चाहती कि वहाँ कोई भी मेरे बारे में कुछ जाने या बात करे। समझे।”

बस तब स्टार्ट हो रही थी और मैं खिड़की से झाँककर मिस पाल को देख रहा था। बस चली तो मिस पाल हाथ हिलाने लगी। दोनों ख़ाली डिब्बे वह अपने हाथों में लिए हुए थी। मैंने भी एक बार उसकी तरफ़ हाथ हिलाया और बस के मुड़ने तक हिलते हुए ख़ाली डिब्बों को ही देखता रहा।