Sunday, January 7, 2024
पाजेब - जैनेंद्र कुमार
बाजार में एक नई तरह की पाजेब चली है। पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं।
पास-पड़ोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाजेब देख लीजिए। एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी। देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है।
हमारी मुन्नी ने भी कहा कि बाबूजी, हम पाजेब पहनेंगे। बोलिए भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाजेब पहनेगी।
मैंने कहा, कैसी पाजेब?
बोली, वही जैसी रुकमन पहनती है, जैसी शीला पहनती है।
मैंने कहा, अच्छा-अच्छा।
बोली, मैं तो आज ही मंगा लूंगी।
मैंने कहा, अच्छा भाई आज सही।
उस वक्त तो खैर मुन्नी किसी काम में बहल गई। लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी की बुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी।
बुआ ने मुन्नी को मिठाई खिलाई और गोद में लिया और कहा कि अच्छा, तो तेरी पाजेब अबके इतवार को जरूर लेती आऊंगी।
इतवार को बुआ आई और पाजेब ले आई। मुन्नी पहनकर खुशी के मारे यहां-से-वहां ठुमकती फिरी। रुकमन के पास गई और कहा-देख रुकमन, मेरी पाजेब। शीला को भी अपनी पाजेब दिखाई। सबने पाजेब पहनी देखकर उसे प्यार किया और तारीफ की। सचमुच वह चांदी कि सफेद दो-तीन लड़ियां-सी टखनों के चारों ओर लिपटकर, चुपचाप बिछी हुई, बहुत ही सुघड़ लगती थी, और बच्ची की खुशी का ठिकाना न था।
और हमारे महाशय आशुतोष, जो मुन्नी के बड़े भाई थे, पहले तो मुन्नी को सजी-बजी देखकर बड़े खुश हुए। वह हाथ पकड़कर अपनी बढ़िया मुन्नी को पाजेब-सहित दिखाने के लिए आस-पास ले गए। मुन्नी की पाजेब का गौरव उन्हें अपना भी मालूम होता था। वह खूब हँसे और ताली पीटी, लेकिन थोड़ी देर बाद वह ठुमकने लगे कि मुन्नी को पाजेब दी, सो हम भी बाईसिकिल लेंगे।
बुआ ने कहा कि अच्छा बेटा अबके जन्म-दिन को तुझे बाईसिकिल दिलवाएंगे।
आशुतोष बाबू ने कहा कि हम तो अभी लेंगे।
बुआ ने कहा, ‘छी-छी, तू कोई लड़की है? जिद तो लड़कियाँ किया करती हैं। और लड़कियाँ रोती हैं। कहीं बाबू साहब लोग रोते हैं?”
आशुतोष बाबू ने कहा कि तो हम बाईसिकिल जरूर लेंगे जन्म-दिन वाले रोज।
बुआ ने कहा कि हां, यह बात पक्की रही, जन्म-दिन पर तुमको बाईसिकिल मिलेगी।
इस तरह वह इतवार का दिन हंसी-खुशी पूरा हुआ। शाम होने पर बच्चों की बुआ चली गई। पाजेब का शौक घड़ीभर का था। वह फिर उतारकर रख-रखा दी गई; जिससे कहीं खो न जाए। पाजेब वह बारीक और सुबुक काम की थी और खासे दाम लग गए थे।
श्रीमतीजी ने हमसे कहा, क्यों जी, लगती तो अच्छी है, मैं भी अपने लिए बनवा लूं?
मैंने कहा कि क्यों न बनावाओं! तुम कौन चार बरस की नहीं हो?
खैर, यह हुआ। पर मैं रात को अपनी मेज पर था कि श्रीमती ने आकर कहा कि तुमने पाजेब तो नहीं देखी?
मैंने आश्चर्य से कहा कि क्या मतलब?
बोली कि देखो, यहाँ मेज-वेज पर तो नहीं है? एक तो है पर दूसरे पैर की मिलती नहीं है। जाने कहां गई?
मैंने कहा कि जाएगी कहाँ? यहीं-कहीं देख लो। मिल जाएगी।
उन्होंने मेरे मेज के कागज उठाने-धरने शुरू किए और आलमारी की किताबें टटोल डालने का भी मनसूबा दिखाया।
मैंने कहा कि यह क्या कर रही हो? यहां वह कहाँ से आएगी?
जवाब में वह मुझी से पूछने लगी कि फिर कहाँ है?
मैंने कहा तुम्हीं ने तो रखी थी। कहाँ रखी थी?
बतलाने लगी कि दोपहर के बाद कोई दो बजे उतारकर दोनों को अच्छी तरह संभालकर उस नीचे वाले बाक्स में रख दी थीं। अब देखा तो एक है, दूसरी गायब है।
मैंने कहा कि तो चलकर वह इस कमरे में कैसे आ जाएगी? भूल हो गई होगी। एक रखी होगी, एक वहीं-कहीं फर्श पर छूट गई होगी। देखो, मिल जाएगी। कहीं जा नहीं सकती।
इस पर श्रीमती कहा-सुनी करने लगीं कि तुम तो ऐसे ही हो। खुद लापरवाह हो, दोष उल्टे मुझे देते हो। कह तो रही हूँ कि मैंने दोनों संभालकर रखी थीं।
मैंने कहा कि संभालकर रखी थीं, तो फिर यहां-वहां क्यों देख रही थी? जहां रखी थीं वहीं से ले लो न। वहां नहीं है तो फिर किसी ने निकाली ही होगी।
श्रीमती बोलीं कि मेरा भी यही ख्याल हो रहा है। हो न हो, बंसी नौकर ने निकाली हो। मैंने रखी, तब वह वहां मौजूद था।
मैंने कहा, तो उससे पूछा?
बोलीं, वह तो साफ इंकार कर रहा है।
मैंने कहा, तो फिर?
श्रीमती जोर से बोली, तो फिर मैं क्या बताऊं? तुम्हें तो किसी बात की फिकर है नही। डांटकर कहते क्यों नहीं हो, उस बंसी को बुलाकर? जरूर पाजेब उसी ने ली है।
मैंने कहा कि अच्छा, तो उसे क्या कहना होगा? यह कहूं कि ला भाई पाजेब दे दे!
श्रीमती झल्ला कर बोलीं कि हो चुका सब कुछ तुमसे। तुम्हीं ने तो उस नौकर की जात को शहजोर बना रखा है। डांट न फटकार, नौकर ऐसे सिर न चढ़ेगा तो क्या होगा?
बोलीं कि कह तो रही हूं कि किसी ने उसे बक्स से निकाला ही है। और सोलह में पंद्रह आने यह बंसी है। सुनते हो न, वही है।
मैंने कहा कि मैंने बंसी से पूछा था। उसने नहीं ली मालूम होती।
इस पर श्रीमती ने कहा कि तुम नौकरों को नहीं जानते। वे बड़े छंटे होते हैं। बंसी चोर जरूर है। नहीं तो क्या फरिश्ते लेने आते?
मैंने कहा कि तुमने आशुतोष से भी पूछा?
बोलीं, पूछा था। वह तो खुद ट्रंक और बक्स के नीचे घुस-घुसकर खोज लगाने में मेरी मदद करता रहा है। वह नहीं ले सकता।
मैंने कहा, उसे पतंग का बड़ा शौक है।
बोलीं कि तुम तो उसे बताते-बरजते कुछ हो नहीं। उमर होती जा रही है। वह यों ही रह जाएगा। तुम्हीं हो उसे पतंग की शह देने वाले।
मैंने कहा कि जो कहीं पाजेब ही पड़ी मिल गई हो तो?
बोलीं, नहीं, नहीं! मिलती तो वह बता न देता?
खैर, बातों-बातों में मालूम हुआ कि उस शाम आशुतोष पतंग और डोर का पिन्ना नया लाया है।
श्रीमती ने कहा कि यह तुम्हीं हो जिसने पतंग की उसे इजाजत दी। बस सारे दिन पतंग-पतंग। यह नहीं कि कभी उसे बिठाकर सबक की भी कोई बात पूछो। मैं सोचती हूँ कि एक दिन तोड़-ताड़ दूं उसकी सब डोर और पतंग।
मैंने कहा कि खैर; छोड़ो। कल सवेरे पूछ-ताछ करेंगे।
सवेरे बुलाकर मैंने गंभीरता से उससे पूछा कि क्यों बेटा, एक पाजेब नहीं मिल रही है, तुमने तो नहीं देखी?
वह गुम हो गया। जैसे नाराज हो। उसने सिर हिलाया कि उसने नहीं ली। पर मुंह नहीं खोला।
मैंने कहा कि देखो बेटे, ली हो तो कोई बात नहीं, सच बता देना चाहिए।
उसका मुँह और भी फूल आया। और वह गुम-सुम बैठा रहा।
मेरे मन में उस समय तरह-तरह के सिद्धांत आए। मैंने स्थिर किया कि अपराध के प्रति करुणा ही होनी चाहिए। रोष का अधिकार नहीं है। प्रेम से ही अपराध-वृति को जीता जा सकता है। आतंक से उसे दबाना ठीक नहीं है। बालक का स्वभाव कोमल होता है और सदा ही उससे स्नेह से व्यवहार करन चाहिए, इत्यादि।
मैंने कहा कि बेटा आशुतोष, तुम घबराओ नहीं। सच कहने में घबराना नहीं चाहिए। ली हो तो खुल कर कह दो, बेटा! हम कोई सच कहने की सजा थोड़े ही दे सकते हैं। बल्कि बोलने पर तो इनाम मिला करता है।
आशुतोष तब बैठा सुनता रहा। उसका मुंह सूजा था। वह सामने मेरी आँखों में नहीं देख रहा था। रह-रहकर उसके माथे पर बल पड़ते थे।
“क्यों बेटे, तुमने ली तो नहीं?”
उसने सिर हिलाकर क्रोध से अस्थिर और तेज आवाज में कहा कि मैंने नहीं ली, नहीं ली, नहीं ली। यह कहकर वह रोने को हो आया, पर रोया नहीं। आँखों में आँसू रोक लिए।
उस वक्त मुझे प्रतीत हुआ, उग्रता दोष का लक्षण है।
मैंने कहा, देखो बेटा, डरो नहीं; अच्छा जाओ, ढूंढो; शायद कहीं पड़ी हुई वह पाजेब मिल जाए। मिल जाएगी तो हम तुम्हें इनाम देंगे।
वह चला गया और दूसरे कमरे में जाकर पहले तो एक कोने में खड़ा हो गया। कुछ देर चुपचाप खड़े रहकर वह फिर यहां-वहां पाजेब की तलाश में लग गया।
श्रीमती आकर बोलीं, आशू से तुमने पूछ लिया? क्या ख्याल है?
मैंने कहा कि संदेह तो मुझे होता है। नौकर का तो काम यह है नहीं!
श्रीमती ने कहा, नहीं जी, आशू भला क्यों लेगा?
मैं कुछ बोला नहीं। मेरा मन जाने कैसे गंभीर प्रेम के भाव से आशुतोष के प्रति उमड़ रहा था। मुझे ऐसा मालूम होता था कि ठीक इस समय आशुतोष को हमें अपनी सहानुभूति से वंचित नहीं करना चाहिए। बल्कि कुछ अतिरिक्त स्नेह इस समय बालक को मिलना चाहिए। मुझे यह एक भारी दुर्घटना मालूम होती थी। मालूम होता था कि अगर आशुतोष ने चोरी की है तो उसका इतना दोष नहीं है; बल्कि यह हमारे ऊपर बड़ा भारी इल्जाम है। बच्चे में चोरी की आदत भयावह हो सकती है, लेकिन बच्चे के लिए वैसी लाचारी उपस्थित हो आई, यह और भी कहीं भयावह है। यह हमारी आलोचना है। हम उस चोरी से बरी नहीं हो सकते।
मैंने बुलाकर कहा, “अच्छा सुनो। देखो, मेरी तरफ देखो, यह बताओ कि पाजेब तुमने छुन्नू को दी है न?”
वह कुछ देर कुछ नहीं बोला। उसके चेहरे पर रंग आया और गया। मैं एक-एक छाया ताड़ना चाहता था।
मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि डरने की कोई बात नहीं। हाँ, हाँ, बोलो डरो नहीं। ठीक बताओ, बेटे ! कैसा हमारा सच्चा बेटा है!
मानो बड़ी कठिनाई के बाद उसने अपना सिर हिलाया।
मैंने बहुत खुश होकर कहा कि दी है न छुन्नू को ?
उसने सिर हिला दिया।
अत्यंत सांत्वना के स्वर में स्नेहपूर्वक मैंने कहा कि मुंह से बोलो। छुन्नू को दी है?
उसने कहा, “हाँ-आँ।”
मैंने अत्यंत हर्ष के साथ दोनों बाँहों में लेकर उसे उठा लिया। कहा कि ऐसे ही बोल दिया करते हैं अच्छे लड़के। आशू हमारा राजा बेटा है। गर्व के भाव से उसे गोद में लिए-लिए मैं उसकी माँ की तरफ गया। उल्लासपूर्वक बोला कि देखो हमारे बेटे ने सच कबूल किया है। पाजेब उसने छुन्नू को दी है।
सुनकर माँ उसकी बहुत खुश हो आईं। उन्होंने उसे चूमा। बहुत शाबाशी दी ओर उसकी बलैयां लेने लगी !
आशुतोष भी मुस्करा आया, अगरचे एक उदासी भी उसके चेहरे से दूर नहीं हुई थी।
उसके बाद अलग ले जाकर मैंने बड़े प्रेम से पूछा कि पाजेब छुन्नू के पास है न? जाओ, माँग ला सकते हो उससे?
आशुतोष मेरी ओर देखता हुआ बैठा रहा। मैंने कहा कि जाओ बेटे! ले आओ।
उसने जवाब में मुंह नहीं खोला।
मैंने आग्रह किया तो वह बोला कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा ?
मैंने कहा कि तो जिसको उसने दी होगी उसका नाम बता देगा। सुनकर वह चुप हो गया। मेरे बार-बार कहने पर वह यही कहता रहा कि पाजेब छुन्नू के पास न हुई तो वह देगा कहाँ से ?
अंत में हारकर मैंने कहा कि वह कहीं तो होगी। अच्छा, तुमने कहाँ से उठाई थी ?
“पड़ी मिली थी ।”
“और फिर नीचे जाकर वह तुमने छुन्नू को दिखाई ?”
“हाँ !”
“फिर उसी ने कहा कि इसे बेचेंगे !”
“हाँ !”
“कहाँ बेचने को कहा ?”
“कहा मिठाई लाएंगे ?”
“नहीं, पतंग लाएंगे ?”
“हाँ!”
“सो पाजेब छुन्नू के पास रह गई ?”
“हाँ !”
“तो उसी के पास होनी चाहिए न ! या पतंग वाले के पास होगी ! जाओ, बेटा, उससे ले आओ। कहना, हमारे बाबूजी तुम्हें इनाम देंगे।
वह जाना नहीं चाहता था। उसने फिर कहा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो कहाँ से देगा !
मुझे उसकी जिद बुरी मालूम हुई। मैंने कहा कि तो कहीं तुमने उसे गाड़ दिया है? क्या किया है? बोलते क्यों नहीं?
वह मेरी ओर देखता रहा, और कुछ नहीं बोला।
मैंने कहा, कुछ कहते क्यों नहीं?
वह गुम-सुम रह गया। और नहीं बोला।
मैंने डपटकर कहा कि जाओ, जहाँ हो वही से पाजेब लेकर आओ।
जब वह अपनी जगह से नहीं उठा और नहीं गया तो मैंने उसे कान पकड़कर उठाया। कहा कि सुनते हो ? जाओ, पाजेब लेकर आओ। नहीं तो घर में तुम्हारा काम नहीं है।
उस तरह उठाया जाकर वह उठ गया और कमरे से बाहर निकल गया । निकलकर बरामदे के एक कोने में रूठा मुंह बनाकर खड़ा रह गया ।
मुझे बड़ा क्षोभ हो रहा था। यह लड़का सच बोलकर अब किस बात से घबरा रहा है, यह मैं कुछ समझ न सका। मैंने बाहर आकर धीरे से कहा कि जाओ भाई, जाकर छुन्नू से कहते क्यों नहीं हो?
पहले तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो बार-बार कहने लगा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?
मैंने कहा कि जितने में उसने बेची होगी वह दाम दे देंगे। समझे न जाओ, तुम कहो तो।
छुन्नू की माँ तो कह रही है कि उसका लड़का ऐसा काम नहीं कर सकता। उसने पाजेब नहीं देखी।
जिस पर आशुतोष की माँ ने कहा कि नहीं तुम्हारा छुन्नू झूठ बोलता है। क्यों रे आशुतोष, तैने दी थी न?
आशुतोष ने धीरे से कहा, हाँ, दी थी।
दूसरे ओर से छुन्नू बढ़कर आया और हाथ फटकारकर बोला कि मुझे नहीं दी। क्यों रे, मुझे कब दी थी ?
आशुतोष ने जिद बांधकर कहा कि दी तो थी। कह दो, नहीं दी थी ?
नतीजा यह हुआ कि छुन्नू की माँ ने छुन्नू को खूब पीटा और खुद भी रोने लगी। कहती जाती कि हाय रे, अब हम चोर हो गए। कुलच्छनी औलाद जाने कब मिटेगी ?
बात दूर तक फैल चली। पड़ोस की स्त्रियों में पवन पड़ने लगी। और श्रीमती ने घर लौटकर कहा कि छुन्नू और उसकी माँ दोनों एक-से हैं। मैंने कहा कि तुमने तेजा-तेजी क्यों कर डाली? ऐसी कोई बात भला सुलझती है !
बोली कि हाँ, मैं तेज बोलती हूँ। अब जाओ ना, तुम्हीं उनके पास से पाजेब निकालकर लाते क्यों नहीं ? तब जानूँ, जब पाजेब निकलवा दो।
मैंने कहा कि पाजेब से बढ़कर शांति है । और अशांति से तो पाजेब मिल नहीं जाएगी।
श्रीमती बुदबुदाती हुई नाराज होकर मेरे सामने से चली गईं ।
थोड़ी देर बाद छुन्नू की माँ हमारे घर आई । श्रीमती उन्हें लाई थी। अब उनके बीच गर्मी नहीं थी, उन्होंने मेरे सामने आकर कहा कि छुन्नू तो पाजेब के लिए इनकार करता है। वह पाजेब कितने की थी, मैं उसके दाम भर सकती हूँ।
मैंने कहा, “यह आप क्या कहती है! बच्चे बच्चे हैं। आपने छुन्नू से सहूलियत से पूछा भी !”
उन्होंने उसी समय छुन्नू को बुलाकर मेरे सामने कर दिया। कहा कि क्यों रे, बता क्यों नहीं देता जो तैने पाजेब देखी हो ?
छुन्नू ने जोर से सिर हिलाकर इनकार किया। और बताया कि पाजेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वालों को दे आया है। मैंने खूब देखी थी, वह चाँदी की थी।
“तुम्हें ठीक मालूम है ?”
“हाँ, वह मुझसे कह रहा था कि तू भी चल। पतंग लाएंगे।”
“पाजेब कितनी बड़ी थी? बताओ तो ।”
छुन्नू ने उसका आकार बताया, जो ठीक ही था।
मैंने उसकी माँ की तरफ देखकर कहा देखिए न पहले यही कहता था कि मैंने पाजेब देखी तक नहीं। अब कहता है कि देखी है ।
माँ ने मेरे सामने छुन्नू को खींचकर तभी धम्म-धम्म पीटना शुरू कर दिया। कहा कि क्यों रे, झूठ बोलता है ? तेरी चमड़ी न उधेड़ी तो मैं नहीं।
मैंने बीच-बचाव करके छुन्नू को बचाया। वह शहीद की भांति पिटता रहा था। रोया बिल्कुल नहीं और एक कोने में खड़े आशुतोष को जाने किस भाव से देख रहा था।
खैर, मैंने सबको छुट्टी दी। कहा, जाओ बेटा छुन्नू खेलो। उसकी माँ को कहा, आप उसे मारिएगा नहीं। और पाजेब कोई ऐसी बड़ी चीज़ नहीं है।
छुन्नू चला गया। तब, उसकी माँ ने पूछा कि आप उसे कसूरवर समझतें हैं ?
मैंने कहा कि मालूम तो होता है कि उसे कुछ पता है। और वह मामले में शामिल है।
इस पर छुन्नू की माँ ने पास बैठी हुई मेरी पत्नी से कहा, “चलो बहनजी, मैं तुम्हें अपना सारा घर दिखाए देती हूँ। एक-एक चीज देख लो। होगी पाजेब तो जाएगी कहाँ ?”
मैंने कहा, “छोड़िए भी। बेबात को बात बढ़ाने से क्या फायदा ।” सो ज्यों-त्यों मैंने उन्हें दिलासा दिया। नहीं तो वह छुन्नू को पीट-पाट हाल-बेहाल कर डालने का प्रण ही उठाए ले रही थी। कुलच्छनी, आज उसी धरती में नहीं गाड़ दिया तो, मेरा नाम नहीं ।
खैर, जिस-तिस भांति बखेड़ा टाला। मैं इस झंझट में दफ्तर भी समय पर नहीं जा सका। जाते वक्त श्रीमती को कह गया कि देखो, आशुतोष को धमकाना मत। प्यार से सारी बातें पूछना। धमकाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, और हाथ कुछ नहीं आता। समझी न ?
शाम को दफ्तर से लौटा तो श्रीमती से सूचना दी कि आशुतोष ने सब बतला दिया है। ग्यारह आने पैसे में वह पाजेब पतंग वाले को दे दी है। पैसे उसने थोड़े-थोड़े करके देने को कहे हैं। पाँच आने जो दिए वह छुन्नू के पास हैं। इस तरह रत्ती-रत्ती बात उसने कह दी है ।
कहने लगी कि मैंने बड़े प्यार से पूछ-पूछकर यह सब उसके पेट में से निकाला है। दो-तीन घंटे में मगज़ मारती रही। हाय राम, बच्चे का भी क्या जी होता है।
मैं सुनकर खुश हुआ। मैंने कहा कि चलो अच्छा है, अब पाँच आने भेजकर पाजेब मँगवा लेंगे। लेकिन यह पतंग वाला भी कितना बदमाश है, बच्चों के हाथ से ऐसी चीज़ें लेता है। उसे पुलिस में दे देना चाहिए । उचक्का कहीं का !
फिर मैंने पूछा कि आशुतोष कहाँ है?
उन्होंने बताया कि बाहर ही कहीं खेल-खाल रहा होगा।
मैंने कहा कि बंसी, जाकर उसे बुला तो लाओ।
बंसी गया और उसने आकर कहा कि वे अभी आते हैं।
“क्या कर रहा है ?”
“छुन्नू के साथ गिल्ली डंडा खेल रहे हैं ।”
थोड़ी देर में आशुतोष आया । तब मैंने उसे गोद में लेकर प्यार किया । आते-आते उसका चेहरा उदास हो गया और गोद में लेने पर भी वह कोई विशेष प्रसन्न नहीं मालूम नहीं हुआ।
उसकी माँ ने खुश होकर कहा कि आशुतोष ने सब बातें अपने आप पूरी-पूरी बता दी हैं। हमारा आशुतोष बड़ा सच्चा लड़का है ।
आशुतोष मेरी गोद में टिका रहा। लेकिन अपनी बड़ाई सुनकर भी उसको कुछ हर्ष नहीं हुआ, ऐसा प्रतीत होता था।
मैंने कहा कि आओ चलो । अब क्या बात है। क्यों हज़रत, तुमको पाँच ही आने तो मिले हैं न ? हम से पाँच आने माँग लेते तो क्या हम न देते? सुनो, अब से ऐसा मत करना, बेटे !
कमरे में जाकर मैंने उससे फिर पूछताछ की, “क्यों बेटा, पतंग वाले ने पाँच आने तुम्हें दिए न ?”
“हाँ”!
“और वह छुन्नू के पास हैं न!”
“हाँ!”
“अभी तो उसके पास होंगे न !”
“नहीं”
“खर्च कर दिए !”
“नहीं”
“नहीं खर्च किए?”
“हाँ”
“खर्च किए, कि नहीं खर्च किए ?”
उस ओर से प्रश्न करने वह मेरी ओर देखता रहा, उत्तर नहीं दिया।
“बताओं खर्च कर दिए कि अभी हैं ?”
जवाब में उसने एक बार ‘हाँ’ कहा तो दूसरी बात ‘नहीं’ कहा।
मैंने कहा, तो यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हें नहीं मालूम है ?
“हाँ।”
“बेटा, मालूम है न ?”
“हाँ।”
पतंग वाले से पैसे छुन्नू ने लिए हैं न?
“हाँ”
“तुमने क्यों नहीं लिए ?”
वह चुप।
“इकन्नियां कितनी थी, बोलो ?”
“दो।”
“बाकी पैसे थे ?”
“हाँ”
“दुअन्नी थी!”
“हाँ ।”
मुझे क्रोध आने लगा। डपटकर कहा कि सच क्यों नहीं बोलते जी ? सच बताओ कितनी इकन्नियां थी और कितना क्या था ।”
वह गुम-सुम खड़ा रहा, कुछ नहीं बोला।
“बोलते क्यों नहीं ?”
वह नहीं बोला।
“सुनते हो ! बोला-नहीं तो—”
आशुतोष डर गया। और कुछ नहीं बोला।
“सुनते नहीं, मैं क्या कह रहा हूँ?”
इस बार भी वह नहीं बोला तो मैंने कान पकड़कर उसके कान खींच लिए। वह बिना आँसू लाए गुम-सुम खड़ा रहा।
“अब भी नहीं बोलोगे ?”
वह डर के मारे पीला हो आया। लेकिन बोल नहीं सका। मैंने जोर से बुलाया “बंसी यहाँ आओ, इनको ले जाकर कोठरी में बंद कर दो ।”
बंसी नौकर उसे उठाकर ले गया और कोठरी में मूंद दिया।
दस मिनट बाद फिर उसे पास बुलवाया। उसका मुँह सूजा हुआ था। बिना कुछ बोले उसके ओंठ हिल रहे थे। कोठरी में बंद होकर भी वह रोया नहीं।
मैंने कहा, “क्यों रे, अब तो अकल आई ?”
वह सुनता हुआ गुम-सुम खड़ा रहा।
“अच्छा, पतंग वाला कौन सा है ? दाई तरफ का चौराहे वाला ?”
उसने कुछ ओठों में ही बड़बड़ा दिया। जिसे मैं कुछ समझ न सका ।
“वह चौराहे वाला ? बोलो—”
“हाँ।”
“देखो, अपने चाचा के साथ चले जाओ। बता देना कि कौन सा है। फिर उसे स्वयं भुगत लेंगे। समझते हो न ?”
यह कहकर मैंने अपने भाई को बुलवाया। सब बात समझाकर कहा, “देखो, पाँच आने के पैसे ले जाओ। पहले तुम दूर रहना। आशुतोष पैसे ले जाकर उसे देगा और अपनी पाजेब माँगेगा। अव्वल तो यह पाजेब लौटा ही देगा। नहीं तो उसे डांटना और कहना कि तुझे पुलिस के सुपुर्द कर दूंगा। बच्चों से माल ठगता है ? समझे ? नरमी की जरूरत नहीं हैं।”
“और आशुतोष, अब जाओ। अपने चाचा के साथ जाओ।” वह अपनी जगह पर खड़ा था। सुनकर भी टस-से-मस होता दिखाई नहीं दिया।
“नहीं जाओगे!”
उसने सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा।
मैंने तब उसे समझाकर कहा कि “भैया घर की चीज है, दाम लगे हैं। भला पाँच आने में रुपयों का माल किसी के हाथ खो दोगे ! जाओ, चाचा के संग जाओ। तुम्हें कुछ नहीं कहना होगा। हाँ, पैसे दे देना और अपनी चीज वापस माँग लेना। दे तो दे, नहीं दे तो नहीं दे । तुम्हारा इससे कोई सरोकार नहीं। सच है न, बेटे ! अब जाओ।”
पर वह जाने को तैयार ही नहीं दिखा। मुझे लड़के की गुस्ताखी पर बड़ा बुरा मालूम हुआ। बोला, “इसमें बात क्या है? इसमें मुश्किल कहाँ है? समझाकर बात कर रहे है सो समझता ही नहीं, सुनता ही नहीं।”
मैंने कहा कि, “क्यों रे नहीं जाएगा?”
उसने फिर सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा।
मैंने प्रकाश, अपने छोटे भाई को बुलाया। कहा, “प्रकाश, इसे पकड़कर ले जाओ।”
प्रकाश ने उसे पकड़ा और आशुतोष अपने हाथ-पैरों से उसका प्रतिकार करने लगा। वह साथ जाना नहीं चाहता था।
मैंने अपने ऊपर बहुत जब्र करके फिर आशुतोष को पुचकारा, कि जाओ भाई! डरो नहीं। अपनी चीज घर में आएगी। इतनी-सी बात समझते नहीं। प्रकाश इसे गोद में उठाकर ले जाओ और जो चीज माँगे उसे बाजार में दिला देना। जाओ भाई आशुतोष !
पर उसका मुंह फूला हुआ था। जैसे-तैसे बहुत समझाने पर वह प्रकाश के साथ चला। ऐसे चला मानो पैर उठाना उसे भारी हो रहा हो। आठ बरस का यह लड़का होने को आया फिर भी देखो न कि किसी भी बात की उसमें समझ नहीं हैं। मुझे जो गुस्सा आया कि क्या बतलाऊं! लेकिन यह याद करके कि गुस्से से बच्चे संभलने की जगह बिगड़ते हैं, मैं अपने को दबाता चला गया। खैर, वह गया तो मैंने चैन की सांस ली।
लेकिन देखता क्या हूँ कि कुछ देर में प्रकाश लौट आया है।
मैंने पूछा, “क्यों?”
बोला कि आशुतोष भाग आया है।
मैंने कहा कि “अब वह कहाँ है?”
“वह रूठा खड़ा है, घर में नहीं आता।”
“जाओ, पकड़कर तो लाओ।”
वह पकड़ा हुआ आया। मैंने कहा, “क्यों रे, तू शरारत से बाज नहीं आएगा? बोल, जाएगा कि नहीं?”
वह नहीं बोला तो मैंने कसकर उसके दो चांटे दिए। थप्पड़ लगते ही वह एक दम चीखा, पर फौरन चुप हो गया। वह वैसे ही मेरे सामने खड़ा रहा।
मैंने उसे देखकर मारे गुस्से से कहा कि ले जाओ इसे मेरे सामने से। जाकर कोठरी में बंद कर दो। दुष्ट!
इस बार वह आध-एक घंटे बंद रहा। मुझे ख्याल आया कि मैं ठीक नहीं कर रहा हूँ, लेकिन जैसे कोई दूसरा रास्ता न दिखता था। मार-पीटकर मन को ठिकाना देने की आदत पड़ कई थी, और कुछ अभ्यास न था।
खैर, मैंने इस बीच प्रकाश को कहा कि तुम दोनों पतंग वाले के पास जाओ।
मालूम करना कि किसने पाजेब ली है। होशियारी से मालूम करना। मालूम होने पर सख्ती करना। मुरव्वत की जरूरत नहीं। समझे।
प्रकाश गया और लौटने पर बताया कि उसके पास पाजेब नहीं है।
सुनकर मैं झल्ला आया, कहा कि तुमसे कुछ काम नहीं हो सकता। जरा सी बात नहीं हुई, तुमसे क्या उम्मीद रखी जाए?
वह अपनी सफाई देने लगा। मैंने कहा, “बस, तुम जाओ।”
प्रकाश मेरा बहुत लिहाज मानता था। वह मुंह डालकर चला गया। कोठरी खुलवाने पर आशुतोष को फर्श पर सोता पाया। उसके चेहरे पर अब भी आँसू नहीं थे। सच पूछो तो मुझे उस समय बालक पर करुणा हुई । लेकिन आदमी में एक ही साथ जाने क्या-क्या विरोधी भाव उठते हैं !
मैंने उसे जगाया। वह हड़बड़ाकर उठा। मैंने कहा, “कहो, क्या हालत है?”
थोड़ी देर तक वह समझा ही नहीं। फिर शायद पिछला सिलसिला याद आया।
झट उसके चेहरे पर वहीं जिद, अकड़ ओर प्रतिरोध के भाव दिखाई देने लगे।
मैंने कहा कि या तो राजी-राजी चले जाओ नहीं तो इस कोठरी में फिर बंद किए देते हैं।
आशुतोष पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा हो, ऐसा मालूम नहीं हुआ।
खैर, उसे पकड़कर लाया और समझाने लगा। मैंने निकालकर उसे एक रुपया दिया और कहा, “बेटा, इसे पतंग वाले को दे देना और पाजेब माँग लेना कोई घबराने की बात नहीं। तुम समझदार लड़के हो।”
उसने कहा कि जो पाजेब उसके पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?
“इसका क्या मतलब, तुमने कहा न कि पाँच आने में पाजेब दी है। न हो तो छुन्नू को भी साथ ले लेना। समझे?”
वह चुप हो गया। आखिर समझाने पर जाने को तैयार हुआ। मैंने प्रेमपूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने को कहा। उसका मुँह भारी देखकर डांटने वाला ही था कि इतने में सामने उसकी बुआ दिखाई दी।
बुआ ने आशुतोष के सिर पर हाथ रखकर पूछा कि कहाँ जा रहे हो, मैं तो तुम्हारे लिए केले और मिठाई लाई हूँ।
आशुतोष का चेहरा रूठा ही रहा। मैंने बुआ से कहा कि उसे रोको मत, जाने दो।
आशुतोष रुकने को उद्यत था। वह चलने में आनाकानी दिखाने लगा। बुआ ने पूछा, “क्या बात है?”
मैंने कहा, “कोई बात नहीं, जाने दो न उसे।”
पर आशुतोष मचलने पर आ गया था। मैंने डांटकर कहा, “प्रकाश, इसे ले क्यों नहीं जाते हो?”
बुआ ने कहा कि बात क्या है? क्या बात है?
मैंने पुकारा, “बंसी, तू भी साथ जा। बीच से लौटने न पाए।” सो मेरे आदेश पर दोनों आशुतोष को जबरदस्ती उठाकर सामने से ले गए। बुआ ने कहा, “क्यों उसे सता रहे हो?”
मैंने कहा कि कुछ नहीं, जरा यों ही-
फिर मैं उनके साथ इधर-उधर की बातें ले बैठा। राजनीति राष्ट्र की ही नहीं होती, मुहल्ले में भी राजनीति होती है। यह भार स्त्रियों पर टिकता है। कहाँ क्या हुआ, क्या होना चाहिए इत्यादि चर्चा स्त्रियों को लेकर रंग फैलाती है। इसी प्रकार कुछ बातें हुईं, फिर छोटा-सा बक्सा सरका कर बोली, इनमें वह कागज है जो तुमने माँगें थे। और यहाँ-
यह कहकर उन्होंने अपने बास्कट की जेब में हाथ डालकर पाजेब निकालकर सामने की, जैसे सामने बिच्छू हों। मैं भयभीत भाव से कह उठा कि यह क्या?
बोली कि उस रोज भूल से यह एक पाजेब मेरे साथ चली गई थी।
Saturday, December 17, 2022
जंगली बूटी - अमृता प्रीतम
अंगूरी, मेरे पड़ोसियों के पड़ोसियों के पड़ोसियों के घर, उनके बड़े ही पुराने नौकर की बिल्कुल नयी बीवी है। एक तो नयी इस बात से कि वह अपने पति की दूसरी बीवी है, सो उसका पति ‘दुहाजू’ हुआ। जू का मतलब अगर ‘जून’ हो तो इसका पूरा मतलब निकला ‘दूसरी जून में पड़ा चुका आदमी’, यानी दूसरे विवाह की जून में, और अंगूरी क्योंकि अभी विवाह की पहली जून में ही है, यानी पहली विवाह की जून में, इसलिए नयी हुई। और दूसरे वह इस बात से भी नयी है कि उसका गौना आए अभी जितने महीने हुए हैं, वे सारे महीने मिलकर भी एक साल नहीं बनेंगे।
पाँच-छह साल हुए, प्रभाती जब अपने मालिकों से छुट्टी लेकर अपनी पहली पत्नी की ‘किरिया’ करने के लिए गाँव गया था, तो कहते हैं कि किरिया वाले दिन इस अंगूरी के बाप ने उसका अंगोछा निचोड़ दिया था। किसी भी मर्द का यह अँगोछा भले ही पत्नी की मौत पर आँसुओं से नहीं भीगा होता, चौथे दिन या किरिया के दिन नहाकर बदन पोंछने के बाद वह अँगोछा पानी से ही भीगा होता है, पर इस साधारण-सी गाँव की रस्म से किसी और लड़की का बाप उठकर जब यह अँगोछा निचोड़ देता है तो जैसे कह रहा होता है— “उस मरनेवाली की जगह मैं तुम्हें अपनी बेटी देता हूँ और अब तुम्हें रोने की ज़रूरत नहीं, मैंने तुम्हारा आँसुओं भीगा हुआ अँगोछा भी सुखा दिया है।”
इस तरह प्रभाती का इस अंगूरी के साथ दूसरा विवाह हो गया था। पर एक तो अंगूरी अभी आयु की बहुत छोटी थी, और दूसरे अंगूरी की माँ गठिया के रोग से जुड़ी हुई थी इसलिए भी गौने की बात पाँच सालों पर जा पड़ी थी। फिर एक-एक कर पाँच साल भी निकल गए थे और इस साल जब प्रभाती अपने मालिकों से छु्ट्टी लेकर अपने गाँव गौना लेने गया था तो अपने मालिकों को पहले ही कह गया था कि या तो वह बहू को भी साथ लाएगा और शहर में अपने साथ रखेगा, या फिर वह भी गाँव से नहीं लौटेगा। मालिक पहले तो दलील करने लगे थे कि एक प्रभाती की जगह अपनी रसोई में से वे दो जनों की रोटी नहीं देना चाहते थे। पर जब प्रभाती ने यह बात कही कि वह कोठरी के पीछे वाली कच्ची जगह को पोतकर अपना चूल्हा बनाएगी, अपना पकाएगी, अपना खाएगी तो उसके मालिक यह बात मान गए थे। सो अंगूरी शहर आ गयी थी।
चाहे अंगूरी ने शहर आकर कुछ दिन मुहल्ले के मर्दों से तो क्या, औरतों से भी घूँघट न उठाया था, पर फिर धीरे-धीरे उसका घूँघट झीना हो गया था। वह पैरों में चाँदी की झाँजरें पहनकर छनक-छनक करती मुहल्ले की रौनक बन गयी थी। एक झाँजर उसके पाँवों में पहनी होती, एक उसकी हँसी में। चाहे वह दिन का अधिकतर हिस्सा अपनी कोठरी में ही रहती थी पर जब भी बाहर निकलती, एक रौनक़ उसके पाँवों के साथ-साथ चलती थी।
“यह क्या पहना है, अंगूरी?”
“यह तो मेरे पैरों की छैल चूड़ी है।”
“और यह उँगलियों में?”
“यह तो बिछुआ है।”
“और यह बाहों में?”
“यह तो पछेला है।”
“और माथे पर?”
“आलीबन्द कहते हैं इसे।”
“आज तुमने कमर में कुछ नहीं पहना?”
“तगड़ी बहुत भारी लगती है, कल को पहनूँगी। आज तो मैंने तौक भी नहीं पहना। उसका टाँका टूट गया है, कल शहर में जाऊँगी, टाँका भी गढ़ाऊँगी और नाक-कील भी लाऊँगी। मेरी नाक को नकसा भी था, इत्ता बड़ा, मेरी सास ने दिया नहीं।”
इस तरह अंगूरी अपने चाँदी के गहने एक नख़रे से पहनती थी, एक नखरे से दिखाती थी।
पीछे जब मौसम फिरा था, अंगूरी का अपनी छोटी कोठरी में दम घुटने लगा था। वह बहुत बार मेरे घर के सामने आ बैठती थी। मेरे घर के आगे नीम के बड़े-बड़े पेड़ हैं, और इन पेड़ों के पास ज़रा ऊँची जगह पर एक पुराना कुआँ है। चाहे मुहल्ले का कोई भी आदमी इस कुएँ से पानी नहीं भरता, पर इसके पार एक सरकारी सड़क बन रही है और उस सड़क के मज़दूर कई बार इस कुएँ को चला लेते हैं जिससे कुएँ के गिर्द अकसर पानी गिरा होता है और यह जगह बड़ी ठण्डी रहती है।
“क्या पढ़ती हो बीबीजी?” एक दिन अंगूरी जब आयी, मैं नीम के पेड़ों के नीचे बैठकर एक किताब पढ़ रही थी।
“तुम पढ़ोगी?”
“मेरे को पढ़ना नहीं आता।”
“सीख लो।”
“ना।”
“क्यों?”
“औरतों को पाप लगता है पढ़ने से।”
“औरतों को पाप लगता है, मर्द को नहीं लगता?”
“ना, मर्द को नहीं लगता?”
“यह तुम्हें किसने कहा है?”
“मैं जानती हूँ।”
“फिर तो मैं पढ़ती हूँ मुझे पाप लगेगा?”
“सहर की औरत को पाप नहीं लगता, गाँव की औरत को पाप लगता है।”
मैं भी हँस पड़ी और अंगूरी भी। अंगूरी ने जो कुछ सीखा-सुना हुआ था, उसमें उसे कोई शंका नहीं थी, इसलिए मैंने उससे कुछ न कहा। वह अगर हँसती-खेलती अपनी ज़िन्दगी के दायरे में सुखी रह सकती थी, तो उसके लिए यही ठीक था। वैसे मैं अंगूरी के मुँह की ओर ध्यान लगाकर देखती रही। गहरे साँवले रंग में उसके बदन का माँस गुथा हुआ था। कहते हैं—औरत आटे की लोई होती है। पर कइयों के बदन का माँस उस ढीले आटे की तरह होता है जिसकी रोटी कभी भी गोल नहीं बनती, और कइयों के बदन का माँस बिलकुल ख़मीरे आटे जैसा, जिसे बेलने से फैलाया नहीं जा सकता। सिर्फ़ किसी-किसी के बदन का माँस इतना सख़्त गुँथा होता है कि रोटी तो क्या चाहे पूरियाँ बेल लो। मैं अंगूरी के मुँह की ओर देखती रही, अंगूरी की छाती की ओर, अंगूरी की पिण्डलियों की ओर… वह इतने सख़्त मैदे की तरह गुथी हुई थी कि जिससे मठरियाँ तली जा सकती थीं और मैंने इस अंगूरी का प्रभाती भी देखा हुआ था, ठिगने क़द का, ढलके हुए मुँह का, कसोरे जैसा। और फिर अंगूरी के रूप की ओर देखकर उसके ख़ाविन्द के बारे में एक अजीब तुलना सूझी कि प्रभाती असल में आटे की इस घनी गुथी लोई को पकाकर खाने का हक़दार नहीं—वह इस लोई को ढककर रखने वाला कठवत है। इस तुलना से मुझे ख़ुद ही हँसी आ गई। पर मैं अंगूरी को इस तुलना का आभास नहीं होने देना चाहती थी। इसलिए उससे मैं उसके गाँव की छोटी-छोटी बातें करने लगी।
माँ-बाप की, बहन-भाइयों की, और खेतों-खलिहानों की बातें करते हुए मैंने उससे पूछा, “अंगूरी, तुम्हारे गॉंव में शादी कैसे होती है?”
“लड़की छोटी-सी होती है। पाँच-सात साल की, जब वह किसी के पाँव पूज लेती है।”
“कैसे पूजती है पाँव?”
“लड़की का बाप जाता है, फूलों की एक थाली ले जाता है, साथ में रुपये, और लड़के के आगे रख देता है।”
“यह तो एक तरह से बाप ने पाँव पूज लिए। लड़की ने कैसे पूजे?”
“लड़की की तरफ़ से तो पूजे।”
“पर लड़की ने तो उसे देखा भी नहीं?”
“लड़कियाँ नहीं देखतीं।”
“लड़कियाँ अपने होने वाले ख़ाविन्द को नहीं देखतीं?”
“ना।”
“कोई भी लड़की नहीं देखती?”
“ना।”
पहले तो अंगूरी ने ‘ना’ कर दी पर फिर कुछ सोच-सोचकर कहने लगी, “जो लड़कियाँ प्रेम करती हैं, वे देखती हैं।”
“तुम्हारे गाँव में लड़कियाँ प्रेम करती हैं?”
“कोई-कोई।”
“जो प्रेम करती हैं, उनको पाप नहीं लगता?” मुझे असल में अंगूरी की वह बात स्मरण हो आयी थी कि औरत को पढ़ने से पाप लगता है। इसलिए मैंने सोचा कि उस हिसाब से प्रेम करने से भी पाप लगता होगा।
“पाप लगता है, बड़ा पाप लगता है।” अंगूरी ने जल्दी से कहा।
“अगर पाप लगता है तो फिर वे क्यों प्रेम करती हैं?”
“जे तो… बात यह होती है कि कोई आदमी जब किसी की छोकरी को कुछ खिला देता है तो वह उससे प्रेम करने लग जाती है।”
“कोई क्या खिला देता है उसको?”
“एक जंगली बूटी होती है। बस वही पान में डालकर या मिठाई में डालकर खिला देता है। छोकरी उससे प्रेम करने लग जाती है। फिर उसे वही अच्छा लगता है, दुनिया का और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।”
“सच?”
“मैं जानती हूँ, मैंने अपनी आँखों से देखा है।”
“किसे देखा था?”
“मेरी एक सखी थी। इत्ती बड़ी थी मेरे से।”
“फिर?”
“फिर क्या? वह तो पागल हो गयी उसके पीछे। सहर चली गयी उसके साथ।”
“यह तुम्हें कैसे मालूम है कि तेरी सखी को उसने बूटी खिलायी थी?”
“बरफी में डालकर खिलायी थी। और नहीं तो क्या, वह ऐसे ही अपने माँ-बाप को छोड़कर चली जाती? वह उसको बहुत चीज़ें लाकर देता था। सहर से धोती लाता था, चूड़ियाँ भी लाता था शीशे की, और मोतियों की माला भी।”
“ये तो चीज़ें हुईं न! पर यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि उसने जंगली बूटी खिलायी थी!”
“नहीं खिलायी थी तो फिर वह उसको प्रेम क्यों करने लग गयी?”
“प्रेम तो यों भी हो जाता है।”
“नहीं, ऐसे नहीं होता। जिससे माँ-बाप बुरा मान जाएँ, भला उससे प्रेम कैसे हो सकता है?”
“तूने वह जंगली बूटी देखी है?”
“मैंने नहीं देखी। वो तो बड़ी दूर से लाते हैं। फिर छिपाकर मिठाई में डाल देते हैं, या पान में डाल देते हैं। मेरी माँ ने तो पहले ही बता दिया था कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खाना।”
“तूने बहुत अच्छा किया कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खायी। पर तेरी उस सखी ने कैसे खा ली?”
“अपना किया पाएगी।”
‘किया पाएगी।’ कहने को तो अंगूरी ने कह दिया पर फिर शायद उसे सहेली का स्नेह आ गया या तरस आ गया, दुखे मन से कहने लगी, “बावरी हो गई थी बेचारी! बालों में कंघी भी नहीं लगाती थी। रात को उठ-उठकर गाती थी।”
“क्या गाती थी?”
“पता नहीं, क्या गाती थी। जो कोई जड़ी बूटी खा लेती है, बहुत गाती है। रोती भी बहुत है।”
बात गाने से रोने पर आ पहुँची थी। इसलिए मैंने अंगूरी से और कुछ न पूछा।
और अब थोड़े ही दिनों की बात है। एक दिन अंगूरी नीम के पेड़ के नीचे चुपचाप मेरे पास आ खड़ी हुई। पहले जब अंगूरी आया करती थी तो छन-छन करती, बीस गज़ दूर से ही उसके आने की आवाज़ सुनायी दे जाती थी, पर आज उसके पैरों की झाँजरें पता नहीं कहाँ खोयी हुई थीं। मैंने किताब से सिर उठाया और पूछा, “क्या बात है, अंगूरी?”
अंगूरी पहले कितनी ही देर मेरी ओर देखती रही और फिर धीरे से बोली, “मुझे पढ़ना सीखा दो बीबी जी।”
लगता है इसने भी जंगली बूटी खा ली…
“क्या हुआ अंगूरी?”
“मुझे नाम लिखना सिखा दो।”
“किसी को ख़त लिखोगी?”
अंगूरी ने उत्तर न दिया और एकटक मेरे मुँह की ओर देखती रही।
“पाप नहीं लगेगा पढ़ने से?” मैंने फिर पूछा।
अंगूरी ने फिर भी जवाब न दिया और एकटक सामने आसमान की ओर देखने लगी।
यह दोपहर की बात थी। मैं अंगूरी को नीम के पेड़ के नीचे बैठी छोड़कर अन्दर आ गयी थी। शाम को फिर कहीं मैं बाहर निकली तो देखा, अंगूरी अब भी नीम के पेड़ के नीचे बैठी हुई थी। बड़ी सिमटी हुई थी। शायद इसलिए कि शाम की ठण्डी हवा देह में थोड़ी-थोड़ी कँपकँपी छेड़ रही थी।
मैं अंगूरी की पीठ की और थी। अंगूरी के होंठो पर एक गीत था, पर बिलकुल सिसकी जैसा- “मेरी मुँदरी में लागो नगीनवा, हो बैरी कैसे काटूँ जोबनावाँ।”
अंगूरी ने मेरे पैरों की आहट सुन ली, मुँह फेर देखा और फिर अपने गीत को अपने होंठों में समेत लिया।
“तू तो बहुत अच्छा जाती है अंगूरी!”
सामने दिखायी दे रहा था कि अंगूरी ने अपनी आँखों में काँपते आँसू रोक लिए और उनकी जगह अपने होंठों पर एक काँपती हँसी रख दी।
“मुझे गाना नहीं आता।”
“आता है।”
“यह तो।”
“तेरी सखी गाती थी?”
“उसी से सुना था।”
“फिर मुझे भी तो सुनाओ।”
“ऐसे ही गिनती है बरस की… चार महीने ठण्डी होती है, चार महीने गर्मी और चार महीने बरखा…”
“ऐसे नहीं, गाकर सुनाओ।”
अंगूरी ने गया तो नहीं, पर बारह महीने को ऐसे गिना दिया जैसे यह सारा हिसाब वह अपनी उँगलियों पर कर रही हो-
“चार महीने राजा, ठण्डी होवत है, थर थर काँपे करेजवा। चार महीने राजा, गरमी होवत है, थर थर काँपे पवनवा। चार महीने राजा, बरखा होवत है, थर थर काँपे बदरवा।”
“अंगूरी?”
अंगूरी एकटक मेरे मुँह की ओर देखने लगी। मन में आया कि इसके कन्धे पर हाथ रखके पूछूँ, “पगली, कहीं जंगली बूटी तो नहीं खा ली?”
मेरा हाथ उसके कन्धे पर रखा भी गया। पर मैंने यह बात पूछने के स्थान पर यह पूछा, “तूने खाना भी खाया है, या नहीं?”
“खाना?” अंगूरी ने मुँह ऊपर उठाकर देखा।
उसके कन्धे पर रखे हुए हाथ के नीचे मुझे लगा कि अंगूरी की सारी देह काँप रही थी। जाने अभी-अभी जो उसने गीत गाया था – बरखा के मौसम में काँपने वाले बादलों का, गरमी के मौसम में काँपने वाली हवा का, और सर्दी के मौसम में काँपने वाले कलेजे का – उस गीत का सारा कम्पन अंगूरी की देह में समाया हुआ था।
यह मुझे मालूम था कि अंगूरी अपनी रोटी ख़ुद ही बनाती थी। प्रभाती मालिकों की रोटी बनाता था। और मालिकों के घर से ही खाता था, इसलिए अंगूरी को उसकी रोटी की चिन्ता नहीं थी। इसलिए मैंने फिर कहा, “तूने आज रोटी बनायी है या नहीं?”
“अभी नहीं।”
“सवेरे बनायी थी? चाय पी थी?”
“चाय? आज तो दूध ही नहीं था।”
“आज दूध क्यों नहीं लिया था?”
“वह तो मैं लेती नहीं, वह तो…”
“तो रोज़ चाय नहीं पीती?”
“पीती हूँ।”
“फिर आज क्या हुआ?”
“दूध तो वह रामतारा…”
रामतारा हमारे मुहल्ले का चौकीदार है। सबका साँझा चौकीदार। सारी रात पहरा देता। वह सबेरसार ख़ूब उनींदा होता है। मुझे याद आया कि जब अंगूरी नहीं आयी थी, वह सवेरे ही हमारे घरों से चाय का गिलास माँगा करता था। कभी किसी के घर से और कभी किसी के घर से, और चाय पीकर वह कुएँ के पास खाट डालकर सो जाता था। और अब, जब से अंगूरी आयी थी, वह सवेरे ही किसी ग्वाले से दूध ले आता था, अंगूरी के चूल्हे पर चाय का पतीला चढ़ाता था, और अंगूरी, प्रभाती और रामतारा तीनों चूल्हे के गिर्द बैठकर चाय पीते थे। और साथ ही मुझे याद आया कि रामतारा पिछले तीन दिनों से छुट्टी लेकर अपने गाँव गया हुआ था।
मुझे दुखी हुई हँसी आयी और मैंने कहा, “और अंगूरी, तुमने तीन दिन से चाय नहीं पी?”
“ना।”, अंगूरी ने ज़ुबान से कुछ न कहकर केवल सिर हिला दिया।
“रोटी भी नहीं खायी?”
अंगूरी से बोला नहीं गया। लग रहा था कि अगर अंगूरी ने रोटी खायी भी होगी तो न खाने जैसी ही।
रामतारे की सारी आकृति मेरे सामने आ गई। बड़े फुर्तीले हाथ-पाँव, इकहरा बदन, जिसके पास हल्का-हल्का हँसती हुई और शरमाती आँखें थीं और जिसकी ज़ुबान के पास बात करने का एक ख़ास सलीक़ा था।
“अंगूरी!”
“जी!”
“कहीं जंगली बूटी तो नहीं खा ली तूने?”
अंगूरी के मुँह पर आँसू बह निकले। इन आँसुओं ने बह-बहकर अंगूरी की लटों को भिगो दिया। और फिर इन आँसुओं ने बह-बहकर उसके होंठों को भिगो दिया। अंगूरी के मुँह से निकलते अक्षर भी गीले थे, “मुझे कसम लागे जो मैंने उसके हाथ से कभी मिठाई खायी हो। मैंने पान भी कभी नहीं खाया। सिर्फ़ चाय… जाने उसने चाय में ही…।”
और आगे अंगूरी की सारी आवाज़ उसके आँसुओं में डूब गई।
Monday, December 20, 2021
वाङ्चू - भीष्म साहनी
तभी दूर से वाङ्चू आता दिखाई दिया।
नदी के किनारे, लालमंडी की सड़क पर धीरे-धीरे डोलता-सा चला आ रहा था। धूसर रंग का चोगा पहने था और दूर से लगता था कि बौद्ध भिक्षुओं की ही भांति उसका सिर भी घुटा हुआ है। पीछे शंकराचार्य की ऊंची पहाड़ी थी और ऊपर स्वच्छ नीला आकाश। सड़क के दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे सफेदे के पेड़ों की कतारें। क्षण-भर के लिए मुझे लगा, जैसे वाङ्चू इतिहास के पन्नों पर से उतरकर आ गया है। प्राचीनकाल में इसी भांति देश-विदेश से आनेवाले चीवरधारी भिक्षु पहाड़ों और घाटियों को लांघकर भारत के आया करते होंगे। अतीत के ऐसे ही रोमांचकारी धुंधलके में मुझे वाङ्चू भी चलता हुआ नजर आया। जब से वह श्रीनगर में आया था, बौद्ध विहारों के खंडहरों और संग्रहालयों में घूम रहा था। इस समय भी वह लालमंडी के संग्रहालय में से निकलकर आ रहा था जहां बौद्धकाल के अनेक अवषेष रखे हैं। उसकी मनः स्थिति को देखते हुए लगता, वह सचमुच ही वर्तमान से कटकर अतीत के ही किसी कालखंड में विचर रहा था।
“बोधिसत्वों से भेंट हो गई?” पास आने पर मैंने चुटकी ली।
वह मुस्करा दिया, हल्की टेढ़ी-सी मुस्कान, जिसे मेरी मौसेरी बहन डेढ दांत की मुस्कान कहा करती थी, क्योंकि मुस्कराते वक्त वाङ्चू का ऊपर का होंठ केवल एक ओर से थोड़ा-सा ऊपर को उठता था।
“संग्रहालय के बाहर बहुत-सी मूर्तियां रखी हैं। मैं वही देखता रहा।” उसने धीमे से कहा, फिर वह सहसा भावुक होकर बोला, “एक मूर्ति के केवल पैर ही पैर बचे हैं.... ”
मैंने सोचा, आगे कुछ कहेगा, परंतु वह इतना भाव विहल हो उठा था कि उसका गला रुंध गया और उसके लिए बोलना असंभव हो गया।
हम एक साथ घर की ओर लौटने लगे।
“महाप्राण के भी पैर ही पहले दिखाए जाते थे।” उसने कांपती-सी आवाज में कहा और अपना हाथ मेरी कोहनी पर रख दिया। उसके हाथ का हल्का-सा कम्पन धड़कते दिल की तरह महसूस हो रहा था।
“आरम्भ में महाप्राण की मूर्तियां नहीं बनाई जाती थीं ना! तुम तो जानते हो, पहले स्तूप के नीचे केवल पैर ही दिखाए जाते थे। मूर्तियां तो बाद में बनाई जाने लगी थीं।”
जाहिर है, बोधिसत्त्व के पैर देखकर उसे महाप्राण के पैर याद हो आए थे और वह भावुक हो उठा था। कुछ पता नहीं चलता था, कौन-सी बात किस वक्त वाङ्चू को पुलकाने लगे, किस वक्त वह गद्गद् होने लगे।
“तुमने बहुत देर कर दी। सभी लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। मैं चिनारों के नीचे भी तुम्हें खोज आया हूं।” मैंने कहा।
“मैं संग्रहालय में था....”
“वह तो ठीक है, पर दो बजे तक हमें हब्बाकदल पहुंच जाना चाहिए, वरना जाने का कोई लाभ नहीं।”
उसने छोटे-छोटे झटकों के साथ तीन बार सिर हिलाया और कदम बढ़ा दिए।
वाङ्चू भारत में मतवाला बना घूम रहा था। वह महाप्राण के जन्मस्थान लुम्बिनी की यात्रा नंगे पांव कर चुका था, सारा रास्ता हाथ जोड़े हुए। जिस-जिस दिशा में महाप्राण के चरण उठे थे, वाङ्चू मन्त्रमुग्ध-सा उसी-उसी दिशा में घूम आया था। सारनाथ में, जहां महाप्राण ने अपना पहला प्रवचन दिया था और दो मृगशावक मन्त्रमुग्ध-से झाड़ियों में से निकलकर उनकी ओर देखते रह गए थे, वाङ्चू एक पीपल के पेड़ के नीचे घंटों नतमस्तक बैठा रहा था, यहां तक कि उसके कथानुसार उसके मस्तक से अस्फुट-से वाक्य गूंजने लगे थे और उसे लगा था, जैसे महाप्राण का पहला प्रवचन सुन रहा है। वह इस भक्तिपूर्ण कल्पना में इतना गहरा डूब गया था कि सारनाथ में ही रहने लगा था। गंगा की धार को वह दसियों शताब्दियों के धुंधलके में पावन जलप्रवाह के रूप में देखता। जब से श्रीनगर में आया था, बर्फ के ढंके पहाड़ों की चोटियों की ओर देखते हुए अक्सर मुझसे कहता— वह रास्ता ल्हासा को जाता है ना, उसी रास्ते बौद्ध ग्रंथ तिब्बत में भेजे गए थे। वह उस पर्वतमाला को भी पुण्य-पावन मानता था क्योंकि उस पर बिछी पगडंडियों के रास्ते बौद्ध भिक्षु तिब्बत की ओर गए थे।
वाङ्चू कुछ वर्षों पहले वृद्ध प्रोफेसर तानशान के साथ भारत आया था। कुछ दिनों तक तो वह उन्हीं के साथ रहा और हिंदी और अंगरेजी भाषाओं का अध्ययन करता रहा, फिर प्रोफेसर शान चीन लौट गए और वह यहीं बना रहा और किसी बौद्ध सोसाइटी से अनुदान प्राप्त कर सारनाथ में आकर बैठ गया। भावुक, काव्यमयी प्रकृति का जीवन, जो प्राचीनता के मनमोहक वातावरण में विचरते रहना चाहता था.... वह यहां तथ्यों की खोज करने कहीं आया था, वह तो बोधिसत्त्वों की मूर्तियों को देखकर गद्गद् होने आया था। महीने-भर से संग्रहालयों से चक्कर काट रहा था, लेकिन उसने कभी नहीं बताया कि बौद्ध धर्म की किस शिक्षा से उसे सबसे अधिक प्रेरणा मिलती है। न तो वह किसी तथ्य को पाकर उत्साह से खिल उठता, न उसे काई संशय परेशान करता। वह भक्त अधिक और जिज्ञासु कम था।
मुझे याद नहीं कि उसने हमारे साथ कभी खुलकर बात की हो या किसी विषय पर अपना मत पेश किया हो। उन दिनों मेरे और मेरे दोस्तों के बीच घंटों बहसें चला करतीं, कभी देश की राजनीति के बारे में, कभी धर्म मे बारे में, लेकिन वाङ्चू इनमें कभी भाग नहीं लेता था। वह सारा वक्त धीमे-धीमे मुस्कराता रहता और कमरे के एक कोने में दुबककर बैठा रहता। उन दिनों देश में वलवलों का सैलाब-सा उठ रहा था। स्वतन्त्रता-आंदोलन कौन-सा रूख पकड़ेगा। क्रियात्मक स्तर पर तो हम लोग कुछ करते-कराते नहीं थे, लेकिन भावनात्मक स्तर पर उसके साथ बहुत कुछ जुड़े हुए थे। इस पर वाङ्चू की तटस्थता कभी हमें अखरने लगाती, तो कभी अचम्भे में डाल देती। वह हमारे देश की ही गतिविधि के बारे में नहीं, अपने देश की गतिविधि में भी कोई विशेष दिलचस्पी नहीं लेता था। उससे उसके अपने देश के बारे में भी पूछो, तो मुस्कराता सिर हिलाता रहता था।
कुछ दिनों से श्रीनगर की हवा भी बदली हुई थी। कुछ मास पहले यहां गोली चली थी। कश्मीर के लोग महाराजा के खिलाफ उठ खड़े हुए थे और अब कुछ दिनों से शहर में एक नई उत्तेजना पाई जाती थी। नेहरूजी श्रीनगर आनेवाले थे और उनका स्वागत करने के लिए नगर को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा था। आज ही दोपहर को नेहरूजी श्रीनगर पहुंच रहे हैं। नदी के रास्ते नावों के जुलूस की शक्ल में उन्हें लाने की योजना थी और इसी कारण मैं वाङ्चू को खोजता हुआ उस ओर आ निकला था।
हम घर की ओर बढ़े जा रहे थे, जब सहसा वाङ्चू ठिठककर खड़ा हो गया। “क्या मेरा जाना बहुत जरूरी है? जैसा तुम कहो....”
मुझे धक्का-सा लगा। ऐसे समय में, जब लाखों लोग नेहरूजी के स्वागत के लिए इकट्ठे हो रहे थे, वाङ्चू का यह कहना कि अगर वह साथ न जाए, तो कैसा रहे, मुझे सचमुच बुरा लगा। लेकिन फिर स्वयं ही कुछ सोचकर उसने अपने आग्रह को दोहराया नहीं और हम घर की ओर साथ-साथ जाने लगे।
कुछ देर बाद हब्बाकदल के पुल के निकट लाखों की भीड़ में हम लोग खड़े थे — मैं, वाङ्चू तथा मेरे दो-तीन मित्र। चारों ओर जहां तक नजर जाती, लोग ही लोग थे — मकानों की छतों पर, पुल पर, नदी के ढलवां किनारों पर। मैं बार-बार कनखियों से वाङ्चू के चेहरे की ओर देख रहा था कि उसकी क्या प्रतिक्रिया हुई है, कि हमारे दिल में उठनेवाले वलवलों का उस पर क्या असर हुआ है। यों भी यह मेरी आदत-सी बन गई है, जब भी कोई विदेशी साथ में हो मैं उसके चेहरे का भाव पढ़ने की कोशिश करता रहता हूं कि हमारे रीति-रिवाज, हमारे जीवनयापन के बारे में उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। वाङ्चू अधमुंदी आंखों से सामने का दृश्य देखे जा रहा था। जिस समय नेहरूजी की नाव सामने आई, तो जैसे मकानों की छतें भी हिल उठीं। राजहंस शक्ल की सफेद नाव में नेहरूजी स्थानीय नेताओं के साथ खड़े हाथ हिला-हिलाकर लोगों का अभिवादन कर रहे थे। और हवा में फूल ही फूल बिखर गए। मैंने पलटकर वाङ्चू के चेहरे की ओर देखा। वह पहले ही की तरह निष्चेष्ट-सा सामने का दृश्य देखे जा रहा था।
“आपको नेहरूजी कैसे लगे?” मेरे एक साथी ने वाङ्चू से पूछा। वाङ्चू ने अपनी टेढ़ी-सी आंखें उठाकर चेहरे की ओर देखा, फिर अपनी डेढ़ दांत की मुस्कान के साथ कहा, “अच्चा, बहुत अच्चा!”
वाङ्चू मामूली-सी हिन्दी और अंग्रेजी जानता था। अगर तेज बोलो, तो उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ता था।
नेहरूजी की नाव दूर जा चुकी थी लेकिन नावों का जुलूस अभी भी चलता जा रहा था, जब वाङ्चू सहसा मुझसे बोला, “मैं थोड़ी देर के लिए संग्रहालय में जाना चाहूंगा। इधर से रास्ता जाता है, मैं स्वयं चला जाऊंगा।” और वह बिना कुछ कहे, एक बार अधमिची आंखों से मुस्काया और हल्के से हाथ हिलाकर मुड़ गया।
हम सभी हैरान रह गए। इसे सचमुच जुलूस में रुचि नहीं रही होगी जो इतनी जल्दी संग्रहालय की ओर अकेला चल दिया है।
“यार, किस बूदम को उठा लाए हो? यह क्या चीज है? कहां से पकड़ लाए हो इसे?” मेरे एक मित्र ने कहा।
“बाहर का रहनेवाला है, इसे हमारी बातों में कैसे रुचि हो सकती है!” मैंने सफाई देते हुए कहा।
“वाह, देश में इतना कुछ हो रहा हो और इसे रुचि न हो!”
वाङ्चू अब तक दूर जा चुका था और भीड़ में से निकलकर पेड़ों की कतार के नीचे आंखों से ओझल होता जा रहा था।
“मगर यह है कौन?” दूसरा एक मित्र बोला, “न यह बोलता है, न चहकता है। कुछ पता नहीं चलता, हंस रहा है या रो रहा है। सारा वक्त एक कोने में दुबककर बैठा रहता है।”
“नहीं, नहीं बड़ा समझदार आदमी है। पिछले पांच साल से यहां पर रह रहा है। बड़ा पढ़ा-लिखा आदमी है। बौद्ध धर्म के बारे में बहुत कुछ जानता है।” मैंने फिर उसकी सफाई देते हुए कहा।
मेरी नजर में इस बात का बड़ा महत्व था कि वह बौद्ध ग्रंथ बांचता है और उन्हें बांचने के लिए इतनी दूर से आया है।
“अरे भाड़ में जाए ऐसी पढ़ाई। वाह जी, जुलूस को छोड़कर म्यूजियम की ओर चल दिया है!”
“सीधी-सी बात है यार!” मैंने जोड़ा, “इसे यहां भारत का वर्तमान खींचकर नहीं लाया, भारत का अतीत लाया है। ह्यूनत्सांग भी तो यहां बौद्ध ग्रंथ ही बांचने आया था। यह भी शिक्षार्थी है। बौद्ध मत में इसकी रुचि है।”
घर लौटते हुए हम लोग सारा रास्ता वाङ्चू की ही चर्चा करते रहे। अजय का मत था, अगर वह पांच साल भारत में काट गया है, तो अब वह जिन्दगी-भर यहीं पर रहेगा।
“अब आ गया है, तो लौटकर नहीं जाएगा। भारत मे एक बार परदेशी आ जाए, तो लौटने का नाम नहीं लेता।”
“भारत देश वह दलदल है कि जिसमें एक बार बाहर के आदमी का पांव पड़ जाए, तो धंसता ही चला जाता है, निकलना चाहे भी तो नहीं निकल सकता!” दिलीप ने मजाक में कहा, “न जाने कौन-से कमल-फूल तोड़ने के लिए इस दलदल में घुसा है!”
“हमारा देश हम हिंदुस्तानियों को पसंद नहीं, बाहर के लोगों को तो बहुत पसंद है।” मैंने कहा।
“पसंद क्यों न होगा! यहां थोड़े में गुजर हो जाती है, सारा वक्त धूप खिली रहती है, फिर बाहर के आदमी को लोग परेशान नहीं करते, जहां बैठा वहीं बैठा रहने देते हैं। इस पर उन्हें तुम जैसे झुड्डू भी मिल जाते हैं जो उनका गुणगान करते रहते हैं और उनकी आवभगत करते रहते हैं। तुम्हारा वाङ्चू भी यहीं पर मरेगा....।”
हमारे यहां उन दिनों मेरी छोटी मौसेरी बहन ठहरी हुई थी, वही जो वाङ्चू की मुस्कान को डेढ़ दांत की मुस्कान कहा करती थी। चुलबुली-सी लड़की बात-बात पर ठिठोली करती रहती थी। मैंने दो-एक बार वाङ्चू को कनखियों से उसकी ओर देखते पाया था, लेकिन कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वह सभी को कनखियों से ही देखता था। पर उस शाम नीलम मेरे पास आयी और बोली, “आपके दोस्त ने मुझे उपहार दिया है। प्रेमोपहार!”
मेरे कान खड़े हो गए, “क्या दिया है?” “झूमरों का जोड़ा।”
और उसने दोनों मुट्ठियां खोल दीं जिनमें चांदी के कश्मीरी चलन के दो सफेद झूमर चमक रहे थे। और फिर वह दोनों झूमर अपने कानों के पास ले जाकर बोली, “कैसे लगते हैं?”
मैं हत्बुद्धि-सा नीलम की ओर देख रहा था।
“उसके अपने कान कैसे भूरे-भूरे हैं!” नीलम ने हंसकर कहा। “किसके?”
“मेरे इस प्रेमी के।”
“तुम्हें उसके भूरे कान पसन्द हैं?”
“बहुत ज्यादा। जब शरमाता है, तो ब्राउन हो जाते हैं गहरे ब्राउन।” और नीलम खिलखिलाकर हंस पड़ी।
लड़कियां कैसे उस आदमी के प्रेम का मजाक उड़ा सकती है, जो उन्हें पसंद न हो! या कहीं नीलम मुझे बना तो नहीं रही है?
पर मैं इस सूचना से बहुत विचलित नहीं हुआ था। नीलम लाहौर में पढ़ती थी और वाङ्चू सारनाथ में रहता था और अब वह हफ्ते-भर में श्रीनगर से वापस जानेवाला था। इस प्रेम का अंकुर अपने-आप ही जल-भुन जाएगा।
“नीलम, ये झूमर तो तुमने उससे ले लिए हैं, पर इस प्रकार की दोस्ती अंत में उसके लिए दुखदायी होगी। बने-बनाएगा कुछ नहीं।“
“वाह भैया, तुम भी कैसे दकियानूस हो! मैंने भी चमड़े का एक राइटिंग पैड उसे उपहार में दिया है। मेरे पास पहले से पड़ा था, मैंने उसे दे दिया। जब लौटेगा तो प्रेम-पत्र लिखने में उसे आसानी होगी।”
“वह क्या कहता था?”
“कहता क्या था, सारा वक्त उसके हाथ कांपते रहे और चेहरा कभी लाल होता रहा, कभी पीला। कहता था, मुझे पत्र लिखना, मेरे पत्रों का जवाब देना। और क्या कहेगा बेचारा, भूरे कानोंवाला।”
मैंने ध्यान से नीलम की ओर देखा, पर उसकी आंखों में मुझे हंसी के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं दिया। लड़कियां दिल की बात छिपाना खूब जानती हैं। मुझे लगा, नीलम उसे बढ़ावा दे रही है। उसके लिए वह खिलवाड़ था, लेकिन वाङ्चू जरूर इसका दूसरा ही अर्थ निकालेगा।
इसके बाद मुझे लगा कि वाङ्चू अपना सन्तुलन खो रहा है। उसी रात मैं अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा बाहर मैदान में चिनारों की पांत की ओर देख रहा था, जब चांदनी में, कुछ दूरी पर पेड़ों के नीचे मुझे वाङ्चू टहलता दिखाई दिया। वह अक्सर रात को देर तक पेड़ों के नीचे टहलता रहता था। पर आज वह अकेला नहीं था। नीलम भी उसके साथ ठुमक-ठुमककर चलती जा रही थी। मुझे नीलम पर गुस्सा आया। लड़कियां कितनी जालिम होती हैं! यह जानते हुए भी कि इस खिलवाड़ से वाङ्चू की बेचैनी बढ़ेगी, वह उसे बढ़ावा दिए जा रही थी।
दूसरे रोज खाने की मेज पर नीलम फिर उसके साथ ठिठोली करने लगी। किचन में से एक चौड़ा-सा एलुमीनियम का डिब्बा उठा लाई। उसका चेहरा तपे तांबे जैसा लाल हो रहा था।
“आपके लिए रोटियां और आलू बना लाई हूं। आम के अचार की फांक भी रखी है। आप जानते हैं फांक किसे कहते हैं? एक बार कहो तो ‘फांक’। कहो वाङ्चू जी, ‘फांक’!”
उसने नीलम की ओर खोई-खोई आंखों से देखा और बोला, “बांक!” हम सभी खिलखिलाकर हंस पड़े।
“बांक नहीं, फांक!”
फिर हंसी का फव्वारा फूट पड़ा।
नीलम ने डिब्बा खोला। उसमें से आम के अचार का टुकड़ा निकालकर उसे दिखाते हुए बोली, “यह है फांक, फांक इसे कहते हैं!” और उसे वाङ्चू की नाक के पास ले जाकर बोली, “इसे सूंघने पर मुंह में पानी भर आता है। आया मुंह में पानी? अब कहो, ‘फांक’!”
“नीलम, क्या फिजूल बातें कर रही हो! बैठो आराम से!” मैंने डांटते हुए कहा।
नीलम बैठ गई, पर उसकी हरकतें बंद नहीं हुई। बड़े आग्रह से वाङ्चू से कहने लगी, “बनारस जाकर हमें भूल नहीं जाईयेगा। हमें खत जरूर लिखिएगा और मगर किसी चीज की जरूरत हो तो संकोच नहीं कीजिएगा।”
वाङ्चू शब्दों के अर्थ तो समझ लेता था लेकिन उनके व्यंग्य की ध्वनि वह नहीं पकड़ पाता था। वह अधिकाधिक विचलित महसूस कर रहा था।
“भेड़ की खाल की जरूरत हो या कोई नमदा या अखरोट...” “नीलम!”
“क्यों भैया, भेड़ की खाल पर बैठकर ग्रंथ बांचेगे!”
वाङ्चू के कान लाल होने लगे। शायद पहली बार उसे भास होने लगा था कि नीलम ठिठोली कर रही है। उसके कान सचमुच भूरे रंग के हो रहे थे, जिनका नीलम मजाक उड़ाया करती थी।
“नीलम जी, आप लोगों ने मेरा बड़ा अतिथि-सत्कार किया है। मैं बड़ा कृतज्ञ हूं।”
हम सब चुप हो गए। नीलम भी झेंप-सी गई। वाङ्चू ने जरूर ही उसकी ठिठोली से समझ लिया होगा। उसके मन को जरूर ठेस लगी होगी। पर मेरे मन में यह विचार भी उठा कि एक तरह से यह अच्छा ही है कि नीलम के प्रति उसकी भावना बदले, वरना उसे ही सबसे अधिक परेशानी होगी।
शायद वाङ्चू अपनी स्थिति को जानते-समझते हुए भी एक स्वाभाविक आकर्षण की चपेट में आ गया था। भावुक व्यक्ति का अपने पर कोई काबू नहीं होता। वह पछाड़ खाकर गिरता है, तभी अपनी भूल को समझ पाता है।
सप्ताह के अन्तिम दिनों में वह रोज कोई-न-कोई उपहार लेकर आने लगा।
एक बार मेरे लिए भी एक चोगा ले आया और बच्चों की तरह जिद करने लगा कि मैं और वह अपना-अपना चोगा पहनकर एक साथ घूमने जाएं। संग्रहालय में वह अब भी जाता था, दो-एक बार नीलम को भी अपने साथ ले गया था और लौटने पर सारी शाम नीलम बोधिसत्त्वों की खिल्ली उड़ाती रही थीं मैं मन-ही-मन नीलम के इस व्यवहार का स्वागत ही करता रहा, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वाङ्चू की कोई भावना हमारे घर में जड़ जमा पाए। सप्ताह बीत गया और वाङ्चू सारनाथ लौट गया।
वाङ्चू के चले जाने के बाद उसके साथ मेरा संपर्क वैसा ही रहा, जैसा आमतौर पर एक परिचित व्यक्ति के साथ रहता है। गाहे-ब-गाहे कभी खत आ जाता, कभी किसी आते-जाते व्यक्ति से उसकी सूचना मिल जाती। वह उन लोगों में से था, जो बरसों तक औपचारिक परिचय की परिधि पर ही डोलते रहते हैं, न परिधि लांघकर अंदर आते हैं और न ही पीछे हटकर आंखों से ओझल होते हैं। मुझे इतनी ही जानकारी रही कि उसकी समतल और बंधी-बंधाई दिनचर्या में कोई अन्तर नहीं आया। कुछ देर तक मुझे कुतूहल-सा बना रहा कि नीलम और वाङ्चू के बीच की बात आगे बढ़ी या नहीं, लेकिन लगा कि वह प्रेम भी वाङ्चू के जीवन पर हावी नहीं हो पाया।
बरस और साल बीतते गए। हमारे देश में उन दिनों बहुत कुछ घट रहा था। आए दिन सत्यग्रह होते, बंगाल में दुर्भिक्ष फूटा, ‘भारत छोड़ो’ का आंदोलन हुआ, सड़कों पर गोलियां चलीं, बम्बई में नाविकों का विद्रोह हुआ, देश में खूरेजी हुई, फिर देश का बंटवारा हुआ, और सारा वक्त वाङ्चू सारनाथ में ही बना रहा। वह अपने में सन्तुष्ट जाना पड़ता था। कभी लिखता कि तन्त्रज्ञान का अध्ययन कर रहा है, कभी पता चलता कि कोई पुस्तक लिखने की योजना बना रहा है।
इसके बाद मेरी मुलाकात वाङ्चू से दिल्ली में हुई। यह उन दिनों की बात है, जब चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई भारत-यात्रा पर आनेवाले थे। वाङ्चू अचानक सड़क पर मुझे मिल गया और मैं उसे अपने घर ले आया। मुझे अच्छा लगा कि चीन के प्रधानमंत्री के आगमन की सूचना मिली है, तो मुझे उसकी मनोवृत्ति पर अचम्भा हुआ। उसका स्वभाव वैसा-का-वैसा ही था। पहले की ही तरह हौले-हौले अपनी डेढ़ दांत की मुस्कान मुस्कराता रहा। वैसा ही निश्चेष्ट, असम्पृक्त। इसी बीच उसने कोई पुस्तक अथवा लेखादि भी नहीं लिखे थे। मेरे पूछने पर इस काम में उसने कोई विशेष रुचि भी नहीं दिखाई। तन्त्रज्ञान की चर्चा करते समय भी वह बहुत चहका नहीं। दो-एक ग्रंथों के बारे में बताता रहा, जिसमें से वह कुछ टिप्पणियां लेता रहा था। अपने किसी लेख की भी चर्चा उसने की, जिस पर वह अभी काम कर रहा था। नीलम के साथ उसकी चिट्ठी-पत्री चलती रही, उसने बताया, हालांकि नीलम कब की ब्याही जा चुकी थी और दो बच्चों की मां बन चुकी थी। समय की गति के साथ हमारी मूल धारणाएं भले ही न बदलें, पर उनके आग्रह और उत्सुकता में स्थिरता-सी आ गई थी पहले जैसी भावविह्नलता नहीं थी। बोधिसत्त्वों के पैरों पर अपने प्राण न्योछावर नहीं करता फिरता था। लेकिन अपने जीवन से सन्तुष्ट था। पहले की ही भांति थोड़ा खाता, थोड़ा पढ़ता, थोडा भ्रमण करता और थोड़ा सोता था। और दूर लड़कपन से झुटपुटे में किसी भावावेश में चुने गए अपने जीवन-पथ पर कछुए की चाल मजे से चलता आ रहा था।
खाना खाने के बाद हमारे बीच बहस छिड़ गई — “सामाजिक शक्तियों को समझे बिना तुम बौद्ध धर्म को भी कैसे समझ पाओगे? ज्ञान का प्रत्येक क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़ा है, जीवन से जुड़ा है। कोई चीज जीवन से अलग नहीं है। तुम जीवन से अलग होकर धर्म को भी कैसे समझ सकते हो?”
कभी वह मुस्कराता, कभी सिर हिलाता और सारा वक्त दार्शनिकों की तरह मेरे चेहरे की ओर देखता रहा। मुझे लग रहा था कि मेरे कहे का उस पर कोई असर नहीं हो रहा, कि चिकने घड़े पर मैं पानी उंडेले जा रहा हूं।
“हमारे देश में न सही, तुम अपने देश के जीवन में तो रुचि लो! इतना जानो-समझो कि वहां पर क्या हो रहा है!”
इस पर भी वह सिर हिलाता और मुस्कराता रहा। मैं जानता था कि एक भाई को छोड़कर चीन में उसका कोई नहीं है। 1929 में वहां पर कोई राजनीतिक उथल-पुथल हुई थी, उसमें उसका गांव जला डाला गया था और सब सगे-संबंधी मर गए थे या भाग गए थे। ले-देकर एक भाई बचा था और वह पेकिंग के निकट किसी गांव में रहता था। बरसों से वाङ्चू का संपर्क उसके साथ टूट चूका था। वाङ्चू पहले गांव के स्कूल में पढ़ता रहा था, बाद में पेकिंग के एक विद्यालय में पढने लगा था। वहीं से वह प्रोफेसर शान के साथ भारत चला आया था।
“सुनो वाङ्चू, भारत और चीन के बीच बंद दरवाजे अब खुल रहे हैं। अब दोनों देशों के बीच संपर्क स्थापित हो रहे हैं और इसका बड़ा महत्त्व है। अध्ययन का जो काम तुम अभी तक अलग-थलग करते रहे हो, वही अब तुम अपने देश के मान्य प्रतिनिधि के रूप में कर सकते हो। तुम्हारी सरकार तुम्हारे अनुदान का प्रबंध करेगी। अब तुम्हें अलग-थलग पड़े नहीं रहना पड़ेगा। तुम पन्द्रह साल से अधिक समय से भारत में रह रहे हो, अंग्रेजी और हिंदी भाषाएं जानते हो, बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन करते रहे हो, तुम दोनों देशों के सांस्कृतिक संपर्क में एक बहुमूल्य कड़ी बन सकते हो....”
उसकी आंखों में हल्की-सी चमक आई। सचमुच उसे कुछ सुविधाएं मिल सकती थीं। क्यों न उनसे लाभ उठाया जाए। दोनो देशों के बीच पाई जानेवाली सद्भावना से वह भी प्रभावित हुआ था। उसने बताया कि कुछ ही दिनों पहले अनुदान की रकम लेने जब वह बनारस गया, तो सड़कों पर राह चलते लोग उससे गले मिल रहे थे। मैंने उसे मशविरा दिया कि कुछ समय के लिए जरूर अपने देश लौट जाए और वहां होने वाले विराट परिवर्तनों को देखे और समझे कि सारनाथ में अलग-थलग बैठे रहने से उसे कुछ लाभ नहीं होगा, आदि-आदि।
वह सुनता रहा, सिर हिलाता और मुस्कराता रहा, लेकिन मुझे कुछ मालूम नहीं हो पाया कि उस पर कोई असर हुआ है या नहीं।
लगभग छह महीने बाद उसका पत्र आया कि वह चीन जा रहा है। मुझे बड़ा संतोष हुआ। अपने देश में जाएगा तो धोबी के कुत्तेवाली उसकी स्थिति खत्म होगी, कहीं का होकर तो रहेगा। उसके जीवन में नई स्फूर्ति आएगी। उसने लिखा कि वह अपना एक ट्रंक सारनाथ में छोड़े जा रहा है जिसमें उसकी कुछ किताबें और शोध के कागज आदि रखे हैं, कि बरसों तक भारत में रह चुकने के बाद वह अपने को भारत का ही निवासी मानता है, कि वह शीघ्र ही लौट आएगा और फिर अपना अध्ययन-कार्य करने लगेगा। मैं मन-ही-मन हंस दिया, एक बार अपने देश में गया लौटकर यहां नहीं आने का।
चीन में वह लगभग दो वर्षों तक रहा। वहां से उसने मुझे पेकिंग के प्राचीन राजमहल का चित्रकार्ड भेजा, दो-एक पत्र भी लिखे, पर उनसे मनः स्थिति के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं मिली।
उन दिनों चीन में भी बड़े वलवले उठ रहे थे, बड़ा जोश था और उस जोश की लपेट में लगभग सभी लोग थे। जीवन नई करवट ले रहा था। लोग काम करने जाते, तो टोलियां बनाकर, गाते हुए, लाल ध्वज हाथ में उठाए हुए। वाङ्चू सड़क के किनारे खड़ा उन्हें देखता रह जाता। अपने संकोची स्वभाव के कारण वह टोलियों के साथ गाते हुए जा तो नहीं सकता था, लेकिन उन्हें जाते देखकर हैरान-सा खड़ा रहता, मानों किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गया हो।
उसे अपना भाई तो नहीं मिला, लेकिन एक पुराना अध्यापक, दूर-पार की उसकी मौसी और दो-एक परिचित मिल गए थे। वह अपने गांव गया। गांव में बहुत कुछ बदल गया था। स्टेशन से घर की ओर जाते हुए उसका एक सहयात्री उसे बताने लगा — वहां, उस पेड़ के नीचे, जमींदार के सभी कागज, सभी दस्तावेज जला डाले गए थे और जमींदार हाथ बांधे खड़ा रहा था।
वाङ्चू ने बचपन में जमींदार का बड़ा घर देखा था, उसकी रंगीन खिड़कियां उसे अभी भी याद भी। दो-एक बार जमींदार की बग्घी को भी कस्बे की सड़कों पर जाते देखा था। अब वह घर ग्राम प्रशासन केंद्र बना हुआ था और भी बहुत कुछ बदला था। पर यहां पर भी उसके लिए वैसी ही स्थिति थी जैसी भारत में रही थी। उसके मन में उछाह नहीं उठता था। दूसरों का उत्साह उसके दिल पर से फिसल-फिसल जाता था। वह यहां भी दर्शक ही बना घूमता था। शुरू-शुरू के दिनों में उसकी आवभगत भी हुई। उसके पुराने अध्यापक की पहलकदमी पर उसे स्कूल में आमंत्रित किया गया। भारत-चीन सांस्कृतिक संबंधों की महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में उसे सम्मानित भी किया गया। वहां वाङ्चू देर तक लोगों को भारत के बारे में बताता रहा। लोगों ने तरह-तरह के सवाल पूछे, रीति-रिवाज के बारे में, तीर्थों, मेलों-पर्वों के बारे में, वाङ्चू केवल उन्हीं प्रश्नों का संतोषप्रद उत्तर दे पाता जिनके बारे में भारत में रहते हुए भी वह कुछ नहीं जानता था।
कुछ दिनों बाद चीन में ‘बड़ी छलांग’ की मुहिम जोर पकड़ने लगी। उसके गांव में भी लोग लोहा इकट्ठा कर रहे थे। एक दिन सुबह उसे भी रद्दी लोहा बटोरने के लिए एक टोली के साथ भेज दिया गया था। दिन-भर वह लोग बड़े गर्व से दिखा-दिखाकर ला रहे थे और साझे ढेर पर डाल रहे थे। रात के वक्त आग के लपलपाते शोलों के बीच उस ढेर को पिघलाया जाने लगा। आग के इर्द-गिर्द बैठे लोग क्रांतिकारी गीत गा रहे थे। सभी लोग एक स्वर में सहगान में भाग ले रहे थे। अकेला वाङ्चू मुंह बाए बैठा था।
चीन में रहते, धीरे-धीरे वातावरण में तनाव-सा आने लगा और एक झुटपुटा-सा घिरने लगा। एक रोज एक आदमी नीले रंग का कोट और नीले ही रंग की पतलून पहने उसके पास आया और उसे अपने साथ ग्राम प्रशासन केंद्र में लिवा ले गया। रास्ते भर वह आदमी चुप बना रहा। केंद्र में पहुंचने पर उसने पाया कि एक बड़े-से कमरे में पांच व्यक्तियों का एक दल मेज के पीछे बैठा उसकी राह देख रहा है।
जब वाङ्चू उनके सामने बैठ गया, तो वे बारी-बारी से उसके भारत निवास के बारे में पूछने लगे — ‘तुम भारत में कितने वर्षों तक रहे?...’ ‘वहाँ पर क्या करते थे?’...‘कहां-कहां घूमे?’ आदि-आदि। फिर बौद्ध धर्म के प्रति वाङ्चू की जिज्ञासा के बारे में जानकर उनमें से एक व्यक्ति बोला, “तुम क्या सोचते हो, बौद्ध धर्म का भौतिक आधार क्या है?”
सवाल वाङ्चू की समझ में नहीं आया। उसने आंखें मिचमिचाईं। “द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी की दृष्टि से तुम बौद्ध धर्म को कैसे आंकते हो?” सवाल फिर भी वाङ्चू की समझ में नहीं आया, लेकिन उसने बुदबुदाते हुए उत्तर दिया, “मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के लिए उसके सुख और शांति के लिए बौद्ध धर्म का पथ-प्रदर्शन बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। महाप्राण के उपदेश...”
और वाङ्चू बौद्ध धर्म के आठ उपदेशों की व्याख्या करने लगा। वह अपना कथन अभी समाप्त नहीं कर पाया था जब प्रधान की कुर्सी पर बैठे पैनी तिरछी आंखों वाले एक व्यक्ति ने बात काटकर कहा, “भारत की विदेशी-नीति के बारे में तुम क्या सोचते है?”
वाङ्चू मुस्कराया अपनी डेढ दांत की मुस्कान, फिर बोला, “आप भद्रजन इस संबंध में ज्यादा जानते हैं। मैं तो साधारण बौद्ध जिज्ञासु हूं। पर भारत बड़ा प्राचीन देश है। उसकी संस्कृति शांति और मानवीय सद्भावना की संस्कृति है.....”
“नेहरू के बारे में तुम क्या सोचते हो?”
“नेहरू को मैंने तीन बार देखा है। एक बार तो उनसे बातें भी की हैं। उन पर पश्चिमी विज्ञान का प्रभाव है, परंतु प्राचीन संस्कृति के वह भी बड़े प्रशंसक हैं।”
उसके उत्तर सुनते हुए कुछ सदस्य तो सिर हिलाने लगे, कुछ का चेहरा तमतमाने लगा। फिर तरह-तरह के पैने सवाल पूछे जाने लगे। उन्होंने पाया कि जहां तक तथ्यों का और भारत के वर्तमान जीवन का सवाल है, वाङ्चू की जानकारी अधूरी और हास्यास्पद है।
“राजनीतिक दृष्टि से तो तुम शून्य हो। बौद्ध धर्म की अवधारणाओं को भी समाजशास्त्र की दृष्टि से तुम आंक नही सकते। न जाने वहां बैठे क्या करते रहे हो! पर हम तुम्हारी मदद करेंगे।”
पूछताछ घंटों तक चलती रही। पार्टी-अधिकारियों ने उसे हिंदी पढ़ाने का काम दे दिया, साथ ही पेकिंग के संग्रहालय मे सप्ताह में दो दिन काम करने की भी इजाजत दे दी।
जब वाङ्चू पार्टी-दफ्तर से लौटा तो थका हुआ था। उसका सिर भन्ना रहा था। अपने देश में उसका दिल जम नहीं पाया था। आज वह और भी ज्यादा उखड़ा-उखड़ा महसूस कर रहा था। छप्पर के नीचे लेटा तो उसे सहसा ही भारत की याद सताने लगी। उसे सारनाथ की अपनी कोठरी याद आई जिसमें दिन-भर बैठा पोथी बांचा करता था। नीम का घना पेड़ याद आया जिसके नीचे कभी-कभी सुस्ताया करता था। स्मृतियों की श्रृंखला लंबी होती गई। सारनाथ की कैंटीन का रसोइया याद आया जो सदा प्यार से मिलता था, सदा हाथ जोड़कर ‘कहो भगवान’ कहकर अभिवादन करता था।
एक बार वाङ्चू बीमार पड़ गया था तो दूसरे रोज कैंटीन का रसोईया अपने-आप उसकी कोठरी में चला आया था — “मैं भी कहूं, चीनी बाबू चाय पीने नहीं आए, दो दिन हो गए! पहले आते थे, तो दर्शन हो जाते थे। हमें खबर की होती भगवान, तो हम डाक्टर बाबू को बुला लाते.... मैं भी कहूं, बात क्या है।” फिर उसकी आंखों के सामने गंगा का तट आया जिस पर वह घंटों घूमा करता था। फिर सहसा दृश्य बदल गया और कश्मीर की झील आंखों के सामने आ गई और पीछे हिमाच्छादित पर्वत, फिर नीलम सामने आई, उसकी खुली-खुली आंखें, मोतियों-सी झिलमिलाती दंतपंक्ति.... उसका दिल बेचैन हो उठा।
ज्यों-ज्यों दिन बीतने लगे, भारत की याद उसे ज्यादा परेशान करने लगी। वह जल में से बाहर फेंकी हुई मछली की तरह तड़पने लगा। सारनाथ के विहार में सवाल-जवाब नहीं होते थे। जहां पड़े रहो, पड़े रहो। रहने के लिए कोठरी और भोजन का प्रबंध विहार की ओर से था। यहां पर नई दृष्टि से धर्मग्रंथों को पढ़ने और समझने के लिए उसमें धैर्य नहीं था, जिज्ञासा भी नहीं थी। बरसों तक एक ढर्रे पर चलते रहने के कारण वह परिवर्तन से कतराता था। इस बैठक के बाद वह फिर से सकुचाने-सिमटने लगा था। कहीं-कहीं पर उसे भारत सरकार-विरोधी वाक्य सुनने को मिलते। सहसा वाङ्चू बेहद अकेला महसूस करने लगा और उसे लगा कि जिन्दा रह पाने के लिए उसे अपने लड़कपन के उस ‘दिवा-स्वप्न’ में फिर से लौट जाना होगा, जब वह बौद्ध भिक्षु बनकर भारत में विचरने की कल्पना करता था।
उसने सहसा भारत लौटने की ठान ली। लौटना आसान नहीं था। भारतीय दूतावास से तो वीजा मिलने में कठिनाई नहीं हुई, लेकिन चीन की सरकार ने बहुत-से ऐतराज उठाए। वाङ्चू की नागरिकता का सवाल था, और अनेक सवाल थे। पर भारत और चीन के संबंध अभी तक बहुत बिगड़े नहीं थे, इसलिए अंत में वाङ्चू को भारत लौटने की इजाजत मिल गई। उसने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि वह भारत में ही अब जिंदगी के दिन काटेगा। बौद्ध भिक्षु ही बने रहना उसकी नियति थी।
जिस रोज वह कलकत्ता पहुंचा, उसी रोज सीमा पर चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच मुठभेड़ हुई थी और दस भारतीय सैनिक मारे गए थे। उसने पाया कि लोग घूर-घूरकर उसकी ओर देख रहे हैं। वह स्टेशन के बाहर अभी निकला ही था, जब दो सिपाही आकर उसे पुलिस के दफ्तर में ले गए और वहां घंटे-भर एक अधिकारी उसके पासपोर्ट और कागजों की छानबीन करता रहा।
“दो बरस पहले आप चीन गए थे। वहां जाने का क्या प्रयोजन था?”
“मैं बहुत बरस तक यहां रहता रहा था, कुछ समय के लिए अपने देश जाना चाहता था।” पुलिस-अधिकारी ने उसे सिर से पैर तक देखा। वाङ्चू आश्वस्त था और मुस्करा रहा था— वहीं टेढ़ी-सी मुस्कान।
“आप वहां क्या करते रहे?”
“वहां एक कम्यून में मैं खेती-बारी की टोली में काम करता था।” “मगर आप तो कहते हैं कि आप बौद्ध ग्रंथ पढ़ते हैं?”
“हां, पेकिंग में मैं एक संस्था में हिंदी पढ़ाने लगा था और पेकिंग म्यूजियम में मुझे काम करने की इजाजत मिल गई थी।”
“अगर इजाजत मिल गई थी तो आप अपने देश से भाग क्यों आए?” पुलिस-अधिकारी ने गुस्से में कहा।
वाङ्चू क्या जवाब दे? क्या कहे?
“मैं कुछ समय के लिए ही वहां गया था, अब लौट आया हूं....” पुलिस-अधिकारी ने फिर से सिर से पांव तक उसे घूरकर देखा, उसकी
आंखों में संशय उतर आया था। वाङ्चू अटपटा-सा महसूस करने लगा। भारत में पुलिस-अधिकारियों के सामने खड़े होने का उसका पहला अनुभव था। उससे जामिनी के लिए पूछा गया, तो उसने प्रोफेसर तान-शान का नाम लिया, फिर गुरूदेव का, पर दोनों मर चुके थे। उसने सारनाथ की संस्था के मंत्री का नाम लिया, शांतिनिकेतन के पुराने दो-एक सहयोगियों के नाम लिए, जो उसे याद थे। सुपरिंटेंडेंट ने सभी नाम और पते नोट कर लिए। उसके कपड़ों की तीन बार तलाशी ली गई। उसकी डायरी को रख लिया गया जिसमें उसने अनेक उद्धरण और टिप्पणियां लिख रहे थे और सुपरिंटेंडेंट ने उसके नाम के आगे टिप्पणी लिख दी कि इस आदमी पर नजर रखने की जरूरत है।
रेल के डिब्बे में बैठा, तो मुसाफिर गोली-कांड की चर्चा कर रहे थे उसे बैठते देख सब चुप हो गए और उसकी ओर घूरने लगे।
कुछ देर बाद जब मुसाफिरों ने देखा कि वह थोड़ी-बहुत बंगाली और हिंदी बोल लेता है, तो एक बंगाली बाबू उचककर उठ खड़े हुए और हाथ झटक-झटकर कहने लगे, “या तो कहो कि तुम्हारे देशवालों ने विश्वासघात किया है, नहीं तो हमारे देश से निकल जाओ.... निकल जाओ.... निकल जाओ!”
डेढ़ दांत की मुस्कान जाने कहां ओझल हो चुकी थी। उसकी जगह चेहरे पर त्रास उतर आया था। भयाकुल और मौन वाङ्चू चुपचाप बैठा रहा। कहे भी तो क्या कहे? गोली-कांड के बारे में जानकर उसे भी गहरा धक्का लगा था। उस झगड़े के कारण के बारे में उसे कुछ भी स्पष्ट मालूम नहीं था और वह जानना चाहता भी नहीं था।
हां, सारनाथ में पहुंचकर वह सचमुच भावविह्वल हो उठा। अपना थैला रिक्शा में रखे जब वह आश्रम के निकट पहुंचा, तो कैंटीन का रसोइया सचमुच लपककर बाहर निकल आया — “आ गए भगवान! आ गए मेरे चीनी बाबू! बहुत दिनों बाद दर्शन दिए! हम भी कहें, इतने अरसा हो गया चीनी बाबू नहीं लौटे! और कहिए, सब कुशल-मंगल है? आप यहां नहीं थे, हम कहें जाने कब लौटेंगे। यहां पर थे तो दिन में दो बातें हो जाती थीं, भले आदमी के दर्शन हो जाते थे। इससे बड़ा पुण्य होता है। “और उसने हाथ बढ़ाकर थैला उठा लिया, “ हम दें पैसे, चीनी बाबू? “
वाङ्चू को लगा, जैसे वह अपने घर पहुंच गया है।
“आपका ट्रंक, चीनी बाबू, हमारे पास रखी है। मंत्रीजी से हमने ले ली। आपकी कोठरी में एक दूसरे सज्जन रहने आए, तो हमने कहा कोई चिंता नहीं, यह ट्रंक हमारे पास रख जाइए, और चीनी बाबू, आप अपना लोटा बाहर ही भूल गए थे। हमने मंत्रीजी से कहा, यह लोटा चीनी बाबू का है, हम जानते हैं, हमारे पास छोड़ जाइए।”
वाङ्चू का दिल भर-भर आया। उसे लगा, जैसे उसकी डावांडोल जिंदगी में संतुलन आ गया है। डगमगाती जीवन-नौका फिर से स्थिर गति से चलने लगी है।
मंत्रीजी भी स्नेह से मिले। पुरानी जान-पहचान के आदमी थे। उन्होंने एक कोठरी भी खोलकर दे दी, परंतु अनुदान के बारे में कहा कि उसके लिए फिर से कोशिश करनी होगी। वाङ्चू ने फिर से कोठरी के बीचोंबीच चटाई बिछा ली, खिड़की के बाहर वही दृश्य फिर से उभर आया। खोया हुआ जीव अपने स्थान पर लौट आया।
तभी मुझे उसका पत्र मिला कि वह भारत लौट आया है और फिर से जमकर बौद्धग्रंथों का अध्ययन करने लगा है। उसने यह भी लिखा कि उसे मासिक अनुदान के बारे में थोड़ी चिंता है और इस सिलसिले में मैं बनारस में यदि अमुक सज्जन को पत्र लिख दूं, तो अनुदान मिलने में सहायता होगी।
पत्र पाकर मुझे खटका हुआ। कौन-सी मृगतृष्णा इसे फिर से वापस खींच लाई है? यह लौट क्यों आया है? अगर कुछ दिन और वहां बना रहता तो अपने लोगों के बीच इसका मन लगने लगता। पर किसी की सनक का कोई इलाज नहीं। अब जो लौट आया है, तो क्या चारा है! मैंने ‘अमुक’ जी को पत्र लिख दिया और वाङ्चू के अनुदान का छोटा-मोटा प्रबंध हो गया।
पर लौटने के दसेक दिन बाद वाङ्चू एक दिन प्रातः चटाई पर बैठा एक ग्रंथ पढ़ रहा था और बार-बार पुलक रहा था, जब उसकी किताब पर किसी का साया पड़ा। उसने नजर उठाकर देखा, तो पुलिस का थानेदार खड़ा था, हाथ में एक पर्चा उठाए हुए। वाङ्चू को बनारस के बड़े पुलिस स्टेशन में बुलाया गया था। वाङ्चू का मन आशंका से भर उठा था।
तीन दिन बाद वाङ्चू बनारस के पुलिस के बरामदे में बैठा था। उसी के साथ बेंच पर बड़ी उम्र का एक और चीनी व्यक्ति बैठा था जो जूते बनाने का काम करता था। आखिर बुलावा आया और वाङ्चू चिक उठाकर बड़े अधिकारी की मेज के सामने जा खड़ा हुआ।
“तुम चीन से कब लौटे?” वाङ्चू ने बता दिया।
“कलकत्ता में तुमने अपने बयान में कहा कि तुम शांतिनिकेतन जा रहे हो, फिर तुम यहां क्यों चले आए? पुलिस को पता लगाने में बड़ी परेशानी उठानी पड़ी है।”
“मैंने दोनों स्थानों के बारे में कहा था। शांतिनिकेतन तो मैं केवल दो दिन के लिए जाना चाहता था।”
“मैं भारत में रहना चाहता हूं...।” उसने पहले का जवाब दोहरा दिया। “जो लौट आना था, तो गए क्यों थे?”
यह सवाल वह बहुत बार पहले भी सुन चुका था। जवाब में बौद्धग्रंथों का हवाला देने के अतिरिक्त उसे कोई और उत्तर नहीं सूझ पाता था।
बहुत लम्बी इंटरव्यू नहीं हुई। वाङ्चू को हिदायत की गई कि हर महीने के पहले सोमवार को बनारस के बड़े पुलिस स्टेशन में उसे आना होगा और अपनी हाजिरी लिखानी होगी।
वाङ्चू बाहर आ गया, पर खिन्न-सा महसूस करने लगा। महीने में एक बार आना कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन वह उसके समतल जीवन में बाधा थी, व्यवधान था।
वाडचू मन-ही-मन इतना खिन्न-सा महसूस कर रहा था कि बनारस से लौटने के बाद कोठरी में जाने की बजाय वह सबसे पहले उस नीरव पुण्य स्थान पर जाकर बैठ गया, जहां शताब्दियों पहले महाप्राण ने अपना पहला प्रवचन किया था, और देर तक बैठा मनन करता रहा। बहुत देर बाद उसका मन फिर से ठिकाने पर आने लगा और दिल में फिर से भावना की तरंगे उठने लगीं।
पर वाङ्चू को चैन नसीब नहीं हुआ। कुछ ही दिन बाद सहसा चीन और भारत के बीच जंग छिड़ गई। देश-भर में जैसे तूफान उठा खड़ा हुआ। उसी रोज शाम को पुलिस के कुछ अधिकारी एक जीप में आए और वाङ्चू को हिरासत में लेकर बनारस चले गए। सरकार यह न करती, तो और क्या करती? शासन करनेवालों को इतनी फुरसत कहां कि संकट के समय संवेदना और सद्भावना के साथ दुश्मन के एक-एक नागरिक की स्थिति की जांच करते फिरें?
दो दिनों तक दोनों चीनियों को पुलिस स्टेशन की एक कोठरी में रखा गया। दोनों के बीच किसी बात में भी समानता नहीं थी। जूते बनानेवाला चीनी सारा वक्त सिगरेट फूंकता रहता और घुटनों पर कोहनियां टिकाए बड़बड़ाता रहता, जबकि वाङ्चू उद्भ्रांत और निढाल-सा दीवार के साथ पीठ लगाए बैठा शून्य में देखता रहता।
जिस समय वाङ्चू अपनी स्थिति को समझने की कोशिश कर रहा था, उसी समय दो-तीन कमरे छोड़कर पुलिस सुपरिंटेंडेंट की मेज पर उसकी छोटी-सी पोटली की तलाशी ली जा रही थी। उसकी गैरमौजूदगी में पुलिस के सिपाही कोठरी में से उसका ट्रंक उठा लाए थे। सुपरिंटेंडेंट के सामने कागजों का पुलिंदा रखा था, जिस पर कहीं पाली में तो कहीं संस्कृत भाषा में उद्धरण लिखे थे। लेकिन बहुत-सा हिस्सा चीनी भाषा में था। साहब कुछ देर तक तो कागजों में उलटते-पलटे रहे, रोशनी के सामने रखकर उनमें लिखी किसी गुप्त भाषा को ढूंढ़ते भी रहे, अंत मे उन्होंने हुक्म दिया कि कागजों के पुलिंदे को बांधकर दिल्ली के अधिकारियों के पास भेज दिया जाए, क्योंकि बनारस में कोई आदमी चीनी भाषा नहीं जानता था।
पांचवें दिन लड़ाई बंद हो गई, लेकिन वाङ्चू के सारनाथ लौटने की इजाजत एक महीने के बाद मिली। चलते समय जब उसे उसका ट्रंक दिया गया और उसने उसे खोलकर देखा, तो सकते में आ गया। उसके कागज उसमें नहीं थे, जिस पर वह बरसों से अपनी टिप्पणियां और लेखादि लिखता रहा था और जो एक तरह से उसके सर्वस्व थे। पुलिस अधिकारी के कहने पर कि उन्हें दिल्ली भेज दिया गया है, वह सिर से पैर तक कांप उठा था।
“वे मेरे कागज आप मुझे दे दीजिए। उन पर मैंने बहुत कुछ लिखा है, वे बहुत जरूरी हैं।”
इस पर अधिकारी रूखाई से बोला, “मुझे उन कागजों का क्या करना है, आपके हैं, आपको मिल जाएंगे।” और उसने वाङ्चू को चलता किया। वाङ्चू अपनी कोठरी में लौट आया। अपने कागजों के बिना वह अधमरा-सा हो रहा था। न पढ़ने में मन लगता, न कागजों पर नए उद्धरण उतारने में। और फिर उस पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी थी। खिड़की से थोड़ा हटकर नीम के पेड़ के नीचे एक आदमी रोज बैठा नजर आने लगा। डंडा हाथ में लिए वह कभी एक करवट बैठता, कभी दूसरी करवट। कभी उठकर डोलने लगता। कभी कुएं की जगत पर जा बैठता, कभी कैंटीन की बेंच पर आ बैठता, कभी गेट पर जा खड़ा होता। इसके अतिरिक्त अब वाङ्चू को महीने में एक बार के स्थान पर सप्ताह में एक बार बनारस मे हाजिरी लगवाने जाना पड़ता था।
तभी मुझे वाङ्चू की चिट्ठी मिली। सारा ब्यौरा देने के बाद उसने लिखा कि बौद्ध विहार का मंत्री बदल गया है और नए मंत्री को चीन से नफरत है और वाङ्चू को डर है कि अनुदान मिलना बंद हो जाएगा। दूसरे, कि मैं जैसे भी हो उसके कागजों को बचा लूं। जैसे भी बन पड़े, उन्हें पुलिस के हाथों से निकलवाकर सारनाथ में उसके पास भिजवा दूं। और अगर बनारस के पुलिस स्टेशन में प्रति सप्ताह पेश होने की बजाय उसे महीने मे एक बार जाना पड़े तो उसके लिए सुविधाजनक होगा, क्योंकि इस तरह महीने में लगभग दस रूपए आने-जाने में लग जाते हैं और फिर काम में मन ही नहीं लगता, सिर पर तलवार टंगी रहती है।
वाङ्चू ने पत्र तो लिख दिया, लेकिन उसने यह नहीं सोचा कि मुझ जैसे आदमी से यह काम नहीं हो पाएगा। हमारे यहां कोई काम बिना जान-पहचान और सिफारिश के नहीं हो सकता। और मेरे परिचय का बड़े-से बड़ा आदमी मेरे कालेज का प्रिंसिपल था। फिर भी मैं कुछेक संसद-सदस्यों के पास गया, एक ने दूसरे की ओर भेजा, दूसरे ने तीसरे की ओर। भटक-भटककर लौट आया। आश्वासन तो बहुत मिले, पर सब यही पूछते — “वह चीन जो गया था वहां से लौट क्यों आया?” या फिर पूछते— “पिछले बीस साल से अध्ययन ही कर रहा है?”
पर जब मैं उसकी पाण्डुलिपियों का जिक्र करता, तो सभी यही कहते, “हां, यह तो कठिन नहीं होना चाहिए।” और सामने रखे कागज पर कुछ नोट कर लेते। इस तरह के आश्वासन मुझे बहुत मिले। सभी सामने रखे कागज पर मेरा आग्रह नोट कर लेते। पर सरकारी काम के रास्ते चक्रव्यूह के रास्तों के सामने होते हैं और हर मोड़ पर कोई-न-कोई आदमी तुम्हें तुम्हारी हैसियत का बोध कराता रहता है। मैंने जवाब में उसे अपनी कोशिशों का पूरा ब्यौरा दिया, यह भी आश्वासन दिया कि मैं फिर लोगों से मिलूंगा, पर साथ ही मैंने यह भी सुझाव दिया कि जब स्थिति बेहतर हो जाए, तो वह अपने देश वापस लौट जाए, उसके लिए यही बेहतर है।
खत से उसके दिल की क्या प्रतिक्रिया हुई, मैं नहीं जानता। उसने क्या सोचा होगा? पर उन तनाव के दिनों में जब मुझे स्वयं चीन के व्यवहार पर गुस्सा आ रहा था, मैं वाङ्चू की स्थिति को बहुत सहानुभूति के साथ नहीं देख सकता था।
उसका फिर एक खत आया। उसमें चीन लौट जाने का काई जिक्र नहीं था। उसमें केवल अनुदान की चर्चा की गई थी। अनुदान की रकम अभी भी चालीस रूपए ही थी, लेकिन उसे पूर्व सूचना दे दी गई थी कि साल खत्म होने पर उस पर फिर से विचार किया जाएगा कि वह मिलती रहेगी या बंद कर दी जाएगी।
लगभग साल-भर बाद वाङ्चू को एक पुर्जा मिला कि तुम्हारे कागज वापस किए जा सकते हैं, कि तुम पुलिस स्टेशन आकर उन्हें ले जा सकते हो। उन दिनों वह बीमार पड़ा था, लेकिन बीमारी की हालत में भी वह गिरता-पड़ता बनारस पहुंचा। लेकिन उसके हाथ एक-तिहाई कागज लगे। पोटली अभी भी अधखुली थी। वाङ्चू को पहले तो यकीन नहीं आया, फिर उसका चेहरा जर्द पड़ गया और हाथ-पैर कांपने लगे। इस पर थानेदार रूखाई के साथ बोला, “हम कुछ नहीं जानते! इन्हें उठाओ और यहां से ले जाओ वरना इधर लिख दो कि हम लेने से इन्कार करते हैं।“
कांपती टांगों से वाङ्चू पुलिंदा बगल में दबाए लौट आया। कागजों में केवल एक पूरा निबन्ध और कुछ टिप्पणियां बची थीं।
उसी दिन से वाङ्चू की आंखों के सामने धूल उड़ने लगी थी।
वाङ्चू की मौत की खबर मुझे महीने-भर बाद मिली, वह भी बौद्ध विहार के मंत्री की ओर से। मरने से पहले वाङ्चू ने आग्रह किया था उसका छोटा-सा ट्रंक और उसकी गिनी चुनी किताबें मुझे पहुंचा दी जाएं।
उम्र के इस हिस्से में पहुंचकर इंसान बुरी खबरें सुनने का आदी हो जाता है और वे दिल पर गहरा आघात नहीं करतीं।
मैं फौरन सारनाथ नहीं जा पाया, जाने मे कोई तुक भी नहीं थी, क्योंकि वहां वाङ्चू का कौन बैठा था, जिसके सामने अफसोस करता, वहां तो केवल ट्रंक ही रखा था। पर कुछ दिनों बाद मौका मिलने पर मैं गया। मंत्रीजी ने वाङ्चू के प्रति सद्भावना के शब्द कहे — ‘बड़ा नेकदिल आदमी था, सच्चे अर्थों में बौद्ध भिक्षु था,’ आदि-आदि। मेरे दस्तखत लेकर उन्होंने ट्रंक में वाङ्चू के कपड़े थे, वह फटा-पुराना चोगा था, जो नीलम ने उसे उपहारस्वरूप दिया था। तीन-चार किताबें थीं, पाली की और संस्कृत की। चिट्ठियां थीं, जिनमें कुछ चिट्ठियां मेरी, कुछ नीलम की रही होंगी, कुछ और लोगों की।
ट्रंक उठाए मैं बाहर की ओर जा रहा था जब मुझे अपने पीछे कदमों की आहट मिली। मैंने मुड़कर देखा, कैंटीन का रसोइया भागता चला आ रहा था। अपने पत्रों में अक्सर वाङ्चू उसका जिक्र किया करता था....
“बाबू आपको बहुत याद करते थे। मेरे साथ आपकी चर्चा बहुत करते थे। बहुत भले आदमी थे.....”
और उसकी आंखें डबडबा गईं। सारे संसार में शायद यही अकेला जीव था, जिसने वाङ्चू की मौत पर दो आंसू बहाए थे।
“बड़ी भोली तबीयत थी। बेचारे को पुलिसवालों ने बहुत परेशान किया। शुरू-शुरू में तो चौबीस घंटे की निगरानी रहती थी। मैं उस हवलदार से कहूं, भैया, तू क्यों इस बेचारे को परेशान करता है? वह कहे, मैं तो ड्यूटी कर रहा हूं...!”
मैं ट्रंक और कागजों का पुलिंदा ले आया हूं। इस पुलिंदे का क्या करूं? कभी सोचता हूं, इसे छपवा डालूं। पर अधूरी पाण्डुलिपि को कौन छापेगा? पत्नी रोज बिगड़ती है कि मैं घर में कचरा भरता जा रहा हूं। दो-तीन बार वह फेंकने की धमकी भी दे चुकी है, पर मैं इसे छिपाता रहता हूं। कभी किसी तख्ते पर रख देता हूं, कभी पलंग के नीचे छिपा देता हूं। पर मैं जानता हूं किसी दिन ये भी गली में फेंक दिए जाएंगे।
गंगो का जाया - भीष्म साहनी (Gango Ka Jaaya By Bhisham Sahani)
गंगो की जब नौकरी छूटी तो बरसात का पहला छींटा पड़ रहा था. पिछले तीन दिन से गहरे नीले बादलों के पुंज आकाश में करवटें ले रहे थे, जिनकी छाया में गरमी से अलसाई हुई पृथ्वी अपने पहले ठण्डे उच्छ्वास छोड़ रही थी, और शहर-भर के बच्चे-बूढ़े बरसात की पहली बारिश का नंगे बदन स्वागत करने के लिए उतावले हो रहे थे. यह दिन नौकरी से निकाले जाने का न था. मज़दूरी की नौकरी थी बेशक, पर बनी रहती, तो इसकी स्थिरता में गंगो भी बरसात के छींटे का शीतल स्पर्श ले लेती. पर हर शगुन के अपने चिन्ह होते हैं. गंगो ने बादलों की पहली गर्जन में ही जैसे अपने भाग्य की आवाज़ सुन ली थी.
नौकरी छूटने में देर नहीं लगी. गंगो जिस इमारत पर काम करती थी, उसकी निचली मंज़िल तैयार हो चुकी थी, अब दूसरी मंज़िल पर काम चल रहा था. नीचे मैदान में से गारे की टोकरियां उठा-उठाकर छत पर ले जाना गंगो का काम था.
मगर आज सुबह जब गंगो टोकरी उठाने के लिए ज़मीन की ओर झुकी, तो उसके हाथ ज़मीन तक न पहुंच पाए. ज़मीन पर, पांव के पास पड़ी हुई टोकरी को छूना एक गहरे कुएं के पानी को छूने के समान होने लगा. इतने में किसी ने गंगो को पुकारा, “मेरी मान जाओ, गंगो, अब टोकरी तुमसे न उठेगी. तुम छत पर ईंट पकड़ने के लिए आ जाओ.”
छत पर, लाल ओढ़नी पहने और चार ईंटें उठाए, दूलो मज़दूरन खड़ी उसे बुला रही थी.
गंगो ने न माना और फिर एक बार टोकरी उठाने का साहस किया, मगर होंठ काटकर रह गई. टोकरी तक उसका हाथ न पहुंच पाया.
गंगो के बच्चा होने वाला था, कुछ ही दिन बाकी रह गए थे. छत पर बैठकर ईंट पकड़नेवाला काम आसान था. एक मज़दूर, नीचे मैदान में खड़ा, एक-एक ईंट उठाकर छत की ओर फेंकता, और ऊपर बैठी हुई मज़दूरन उसे झपटकर पकड़ लेती. मगर गंगो का इस काम से ख़ून सूखता था. कहीं झपटने में हाथ चूक जाए, और उड़ती हुई ईंट पेट पर आ लगे तो क्या होगा?
ठेकेदार हर मज़दूर के भाग्य का देवता होता है. जो उसकी दया बनी रहे तो मज़दूर के सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं, पर जो देवता के तेवर बदल जाएं तो अनहोनी भी होके रहती है. गंगो खड़ी सोच ही रही थी कि कहीं से, मकान की परिक्रमा लेता हुआ ठेकेदार सामने आ पहुंचा. छोटा-सा, पतला शरीर, काली टोपी, घनी-घनेरी मूंछों में से बीड़ी का धुआं छोड़ता हुआ, गंगो को देखते ही चिल्ला उठा-
“खड़ी देख क्या रही है? उठाती क्यों नहीं, जो पेट निकला हुआ था, तो आई क्यों थी?”
गंगो धीरे-धीरे चलती हुई ठेकेदार के सामने आ खड़ी हुई. ठेकेदार का डर होते हुए भी गंगो के होंठों पर से वह हल्की-सी स्निग्ध मुस्कान ओझल न हो पाई, जो महीने-भर से उसके चेहरे पर खेल रही थी, जब से बच्चे ने गर्भ में ही अपने कौतुक शुरू कर दिए थे और गंगो की आंखें जैसे अन्तर्मुखी हो गई थीं. ठेकेदार झगड़ता तो भी शान्त रहती, और जो उसका घरवाला बात-बात पर तिनक उठता, तो भी चुपचाप सुनती रहती.
“काम क्यों नहीं करूंगी? छत पर ईंटें पकड़ने का काम दे दो, वह कर लूंगी.” गंगो ने निश्चय करते हुए कहा.
“तेरे बाप का मकान बन रहा है, जो जी चाहा करेगी? चल, दूर हो यहां से. आधे दिन के पैसे ले और दफ़ा हो जा. हरामख़ोर आ जाते हैं...”
“तुम्हें क्या फ़रक पड़ेगा, दूलो मेरा काम कर लेगी, मैं उसकी जगह चली जाऊंगी, काम तो होता रहेगा.”
“पहले पेट खाली करके आओ, फिर काम मिलेगा.”
क्षण-भर में ठेकेदार का रजिस्टर खुल गया और गंगो के नाम पर लकीर फिर गई.
ऐन उसी वक़्त बारिश का छींटा भी पड़ने लगा था. गंगो ने समझ लिया कि जो आसमान में बादल न होते तो काम पर से भी छुट्टी न मिलती. आकाश में बादल आए नहीं कि ठेकेदार को काम ख़त्म करने की चिन्ता हुई नहीं. इस हालत में गर्भवाली मज़दूरन को कौन काम पर रखेगा. गंगो चुपचाप, ओढ़नी के पल्ले से अपने गर्भ को ढंकती हुई बाहर निकल आई.
उन दिनों दिल्ली फिर से जैसे बसने लगी थी. कोई दिशा या उपदिशा ऐसी न थी, जहां नई आबादियों के झुरमुट न उठ रहे हों. नए मकानों की लम्बी कतारें, समुद्र की लहरों की तरह फैलती हुई, अपने प्रसार में दिल्ली के कितने ही खण्डहर और स्मृति-कंकाल रौंदती हुई, बढ़ रही थीं. देखते- ही-देखते एक नई आबादी, गर्व से माथा ऊंचा किए, समय का उपहास करती हुई खड़ी हो जाती. लोग कहते, दिल्ली फिर से जवान हो रही है. नई आबादियों की बाढ़ आ गयी थी. नया राष्ट्र, नये निर्माण-कार्य, लोगों को इस फैलती राजधानी पर गर्व होने लगा था.
जहां कहीं किसी नई आबादी की योजना पनपने लगती, तो सैकड़ों मज़दूर खिंचे हुए, अपने फूस के छप्पर कन्धों पर उठाए, वहां जा पहुंचते, और उसी की बगल में अपनी झोंपड़ों की बस्ती खड़ी कर लेते. और जब वह नई आबादी बनकर तैयार हो जाती, तो फिर मज़दूरों की टोलियां अपने फूस के छप्पर उठाए, किसी दूसरी आबादी की नींव रखने चल पड़तीं. मगर ज्योंही बरसात के बादल आकाश में मंडराने लगते, तो सब काम ठप्प हो जाता, और मज़दूर अपने झोंपड़ों में बैठे, आकाश को देखते हुए, चौमासे के दिन काटने लगते. कई मज़दूर अपने गांवों को चले जाते, पर अधिकतर छोटे-मोटे काम की तलाश में सड़कों पर घूमते रहते. काम इतना न था जितने मज़दूर आ पहुंचते थे. दिल्ली के हर खण्डहर की अपनी गाथा है, कहानी है, पर मज़दूर की फूस की झोंपड़ी का खण्डहर क्या होगा, और कहानी क्या होगी? हंसती-खेलती नई आबादियों में इन झोंपड़ों का या इन नये झोंपड़ों में खेले गए नाटकों का, स्मृति-चिन्ह भी नहीं मिलता.
उस रात गंगो और उसका पति घीसू, देर तक झोंपड़े के बाहर बैठे अपनी स्थिति का सोचते रहे.
“जो छुट्टी मिल गई थी तो घर क्यों चली आई, कहीं दूसरी जगह काम देखती.”
“देखा है. इस हालत में कौन काम देगा? जहां जाओ, ठेकेदार पेट देखने लगते हैं.”
झोंपड़े के अन्दर उनका छह बरस का लड़का रीसा सोया पड़ा था. घीसू कई दिनों से चिन्तित था, तीन आदमी खानेवाले, और कमानेवाला अब केवल एक और ऊपर चौमासा और गंगो की हालत! उसका मन खीज उठा. अगर और पन्द्रह-बीस रोज़ मज़दूरी पर निकल जाते, तो क्या मुश्किल था? गर्भवाली औरतें बच्चा होनेवाले दिन तक काम पर जुटी रहती हैं. घीसू गठीले बदन का, नाटे कद का मज़दूर था, जो किसी बात पर तिनक उठता तो घण्टों उसका मन अपने काबू में न रहता. थोड़ी देर चिलम के कश लगाने के बाद धीरे-धीरे कहने लगा, “तुम गांव चली जाओ.”
“गांव में मेरा कौन है?”
“तू पहले से ही सब पाठ पढ़े हुए है, तू इस हालत में जाएगी, तो तुझे घर से निकाल देंगे?”
“मैं कहीं नहीं जाऊंगी. तुम्हारा भाई ज़मीन पर पांव नहीं रखने देगा. दो दफ़े तो तुमसे लड़ने-मरने की नौबत आ चुकी है.”
“तो यहां क्या करेगी? मेरे काम का भी कोई ठिकाना नहीं. सुनते हैं सरकार ज़ियादा मज़दूर लगाकर तीन दिन में बाकी सड़क तैयार कर देना चाहती है.”
“मरम्मती काम तो चलता रहेगा?” गंगो ने धीरे-से कहा.
“मरम्मती काम से तीन जीव खा सकते हैं? एक दिन काम है, चार दिन नहीं.”
काफ़ी रात गए तक यह उधेड़-बुन चलती रही.
सोमवार को गंगो काम पर से बरख़ास्त हुई, और सनीचर तक पहुंचते-पहुंचते झोंपड़ी की गिरस्ती डावांडोल हो गई. मां, बाप और बेटा, तीन जीव खानेवाले, और कमानेवाला केवल एक. गंगो काम की तलाश में सुबह घर से निकल जाती, और दोपहर तक बस्ती के तीन-तीन चक्कर काट आती. किसी से काम का पूछती तो या तो वह हंसने लगता, या आसमान पर मंडराते बादल दिखा देता. सड़कों पर दर्ज़नों मज़दूर दोपहर तक घूमते हुए नज़र आने लगे. फिर एक दिन जब घीसू ने घर लौटकर सुना दिया कि सरकारी सड़क का काम समाप्त हो चुका है, तो घीसू और गंगो, मज़दूरों के स्तर से लुढ़ककर आवारा लोगों के स्तर पर आ पहुंचे. कभी चूल्हा जलता, कभी नहीं. भर-पेट खाना किसी को न मिल पाता. छोटा बालक रीसा, जो दिन-भर खेलते न थकता था, अब झोंपड़े के इर्दगिर्द ही मंडराता रहता. पति-पत्नी रोज़ रात को झोंपड़े के बाहर बैठते, झगड़ते, परामर्श करते और बात-बात पर खीज उठते.
फिर एक रात, हज़ार सोचने और भटकने के बाद घीसू के उद्विग्न मन ने घर का खर्चा कम करने की तरकीब सोची. अधभरे पेट की भूख को चिलम के धुएं से शान्त करते हुए बोला, “रीसे को किसी काम पर लगा दें.”
“रीसा क्या करेगा, छोटा-सा तो है?”
“छोटा है? चंगे-भले आदमी का राशन खाता है. इस जैसे सब लड़के काम करते हैं.”
गंगो चुप रही. कमाऊ बेटा किसे अच्छा नहीं लगता? मगर रीसा अभी सड़क पर चलता भी था, तो बाप का हाथ पकड़कर. वह क्या काम करेगा? पर घीसू कहता गया, “इस जैसे लौंडे बूट-पॉलिश करते हैं, साइकिलों की दूकानों पर काम करते हैं, अख़बार बेचते हैं, क्या नहीं करते? कल इसे मैं गणेशी के सुपुर्द कर दूंगा, इसे बूट-पॉलिश करना सिखा देगा.”
गणेशी घीसू के गांव का आदमी था. इस बस्ती से एक फर्लांग दूर, पुल के पास छोटी-सी कोठरी में रहता था. एक छोटा-सा सन्दूकचा कन्धे पर से लटकाए गलियों के चक्कर काटता और बूटों के तलवे लगाया करता था.
दूसरे दिन घीसू काम की खोज में झोंपड़े में से निकलते हुए गंगो से कह गया--
“मैं गणेशी को रास्ते में कहता जाऊंगा. तू सूरज चढ़ने तक रीसे को उसके पास भेज देना.”
रीसा काम पर निकला. छोटा-सा पतला शरीर, चकित, उत्सुक आंखें. बदन पर एक ही कुर्ता लटकाए हुए. गणेशी के घर तक पहुंचना कौन-सी आसान बात थी. रास्ते में प्रकृति रीसे के मन को लुभाने के लिए जगह-जगह अपना मायाजाल फैलाए बैठी थी. किसी जगह दो लौंडे झगड़ रहे थे, उनका निपटारा करना ज़रूरी था, रीसा घण्टा-भर उन्हीं के साथ घूमता रहा, कहीं एक भैंस कीचड़ में फँसी पड़ी थी, कहीं पर एक मदारी अपने खेल दिखा रहा था, रीसा दिन-भर घूम-फिरकर, दोपहर के वक़्त, हाथ में एक छड़ी घुमाता हुआ घर लौट आया.
कह देना आसान था कि रीसा काम करे, मगर रीसे को काम में लगाना नए बैल को हल में जोतने के बराबर था. पर उधर झोंपड़े में बची-बचाई रसद क्षीण होती जा रही थी. दूसरे दिन घीसू उसे स्वयं गणेशी के सुपुर्द कर आया, और पांच-सात आने पैसे भी पॉलिश की डिब्बिया और ब्रुश के लिए दे आया.
उस दिन तो रीसा जैसे हवा में उड़ता रहा. दिल्ली की नई-नई गलियां घूमने को मिलीं, नए-नए लोग देखने को मिले. चप्पे-चप्पे पर आकर्षण था. रीसे की समझ में न आया कि बाप गुस्सा क्यों हो रहा था, जब उसे यहां घूमने के लिए भेजना चाहता था. दूकानें रंग-बिरंगी चीज़ों से लदी हुईं और भीड़ इतनी कि रीसे का लुब्ध मन भी चकरा गया.
रीसे की मां सड़क पर आंखें गाड़े उसकी राह देख रही थी, जब रीसा अपने बोझल पांव खींचता हुआ घर पहुंचा. अपने छः सालों के नन्हें-से जीवन में वह इतना कभी नहीं चल पाया था, जितना कि वह आज एक दिन में. मगर मां को मिलते ही वह उसे दिन-भर की देखी-दिखाई सुनाने लगा. और जब बाप काम पर से लौटा तो रीसा अपना ब्रुश और पॉलिश की डिब्बिया उठाकर भागता हुआ उसके पास जा पहुंचा, “बप्पू, तेरा जूता पॉलिश कर दूं?”
सुनकर, घीसू के हर वक़्त तने हुए चेहरे पर भी हल्की-सी मुस्कान दौड़ गई-
“मेरा नहीं, किसी बाबू का करना, जो पैसे भी देगा.”
और गंगो और उसका पति, अपने कमाऊ बेटे की दिनचर्या सुनते हुए, कुछ देर के लिए अपनी चिन्ताएं भूल गए.
दूसरा दिन आया. घीसू और रीसा अपने-अपने काम पर निकले. दो रोटियां, एक चिथड़े में लिपटी हुइर्ं, घीसू की बगल के नीचे, और एक रोटी रीसे की बगल के नीचे. दोनों सड़क पर इकट्ठे उतरे और फिर अपनी-अपनी दिशा में जाने के लिए अलग हो गए.
पर आज रीसा जब सड़क की तलाई पार करके पुल के पास पहुंचा तो गणेशी वहां पर नहीं था.
थोड़ी देर तक मुंह में उंगली दबाए वह पुल पर आते-जाते लोगों को देखता रहा, फिर गणेशी की तलाश में आगे निकल गया. शहर की गलियां, एक के बाद दूसरी, अपना जटिल इन्द्रजाल फैलाए, जैसे रीसे की इन्तज़ार में ही बैठी थीं. एक के बाद दूसरी गली में वह बढ़ने लगा, मगर किसी में भी उसे कल का परिचित रूप नज़र नहीं आया, न ही कहीं गणेशी की आवाज़ सुनाई दी. थोड़ी देर घूमने के बाद रीसा एक गली के मोड़ पर बैठ गया, अपनी पॉलिश की डिब्बियां और ब्रुश सामने रख लिए और अपने पहले ग्राहक का इन्तज़ार करने लगा. गणेशी की तरह उसने मुंह टेढ़ा करके ‘पॉलिश श श श...!' का शब्द पूरी चिल्लाहट के साथ पुकारा. पहले तो अपनी आवाज़ ही सुनकर स्तब्ध हो रहा, फिर निःसंकोच बार-बार पुकारने लगा. पांच-सात मर्तबा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने पर एक बाबू, जो सामने एक दूकान की भीड़ में सौदा ख़रीदने के इन्तज़ार में खड़ा था, रीसे के पास चला आया.
“पॉलिश करने का क्या लोगे?”
“जो खुसी हो दे देना.” रीसे ने गणेशी के वाक्य को दोहरा दिया. बाबू ने बूट उतार दिए, और दूकान की भीड़ में फिर जाकर खड़ा हो गया.
रीसे ने अपनी डिब्बिया खोली. गणेशी के वाक्य तो वह दोहरा सकता था, मगर उसकी तरह हाथ कैसे चलाता? बूट पर पॉलिश क्या लगी, जितनी उसकी टांगों, हाथों और मुंह को लगी. एक जूते पर पॉलिश लगाने में रीसे की आधी डिब्बिया खर्च हो गई. अभी बूट के तलवे पर पॉलिश लगाने की सोच ही रहा था कि बाबू सामने आन खड़ा हुआ. रीसे के हाथ अनजाने में ठिठक गए. बाबू ने बूटों की हालत देखी, आव देखा न ताव, ज़ोर से रीसे के मुंह पर थप्पड़ दे मारा, जिससे रीसे का मुंह घूम गया. उसकी समझ में न आया कि बात क्या हुई है. गणेशी को तो किसी बाबू ने थप्पड़ नहीं मारा था.
“हरामजादे, काले बूटों पर लाल पॉलिश!” और गुस्से में गालियां देने लगा.
पास खड़े लोगों ने यह अभिनय देखा, कुछ हंसे, कुछ-एक ने बाबू को समझाया, दो-एक ने रीसे को गालियां दीं, और उसके बाद बाबू गालियां देता हुआ, बूट पहनकर चला गया. रीसा, हैरान और परेशान कभी एक के मुंह की तरफ़, कभी दूसरे के मुंह की तरफ़ देखता रहा, और फिर वहां से उठकर, धीरे-धीरे गली के दूसरे कोने पर जाकर खड़ा हो गया. हर राह जाते बाबू से उसे डर लगने लगा. गणेशी की तरह ‘पॉलिश श श!' चिल्लाने की उसकी हिम्मत न हुई. रीसे को मां की याद आई, और उल्टे पांव वापिस हो लिया. मगर गलियों का कोई छोर किनारा न था, एक गली के अन्त तक पहुंचता तो चार गलियां और सामने आ जातीं. अनगिनत गलियों में घूमने के बाद वह घबराकर रोने लगा, मगर वहां कौन उसके आंसू पोंछनेवाला था. एक गली के बाद दूसरी गली लांघता हुआ, कभी गणेशी की तलाश में, कभी मां की तलाश में वह दोपहर तक घूमता रहा. बार-बार रोता और बार-बार स्तब्ध और भयभीत चुप हो जाता. फिर शाम हुई और थोड़ी देर बाद गलियों में अंधेरा छाने लगा. एक गली के नाके पर खड़ा सिसकियां ले रहा था, कि उस- जैसे ही लड़कों का टोला यहां-वहां से इकट्ठा होकर उसके पास आ पहुंचा. एक छोटे- से लड़के ने अपनी फटी हुई टोपी सिर पर खिसकाते हुए कहा, “अबे साले रोता क्यों है?”
दूसरे ने उसका बाजू पकड़ा और रीसे को खींचते हुए एक बराण्डे के नीचे ले गया. तीसरे ने उसे धक्का दिया! चौथे ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए, उसे बराण्डे के एक कोने में बैठा दिया. फिर उस छोटे-से लड़के ने अपने कुर्ते की जेब में से थोड़ी-सी मूंगफली निकालकर रीसे की झोली में डाल दी.
“ले साले, कभी कोई रोता भी है? हमारे साथ घूमा कर, हम भी बूट-पॉलिश करते हैं.”
आधी रात गए, नन्हा रीसा, जीवन की एक पूरी मंज़िल एक दिन में लांघकर, सिर के नीचे ब्रुश और पॉलिश की डिब्बिया और एक छोटा-सा चीथड़ा रखे, उसी बराण्डे की छत के नीचे अपनी यात्रा के नये साथियों के साथ, भाग्य की गोद में सोया पड़ा था.
उधर, झोंपड़े के अन्दर लेटे-लेटे, कई घण्टे की विफल खोज के बाद, घीसू गंगो को आश्वासन दे रहा थाः “मुझे कौन काम सिखाने आया था? सभी गलियों में ही सीखते हैं. मरेगा नहीं, घीसू का बेटा है, कभी-न-कभी तुझे मिलने आ जाएगा.’’
घीसू का उद्विग्न मन जहां बेटे के यूं चले जाने पर व्याकुल था, वहां इस दारुण सत्य को भी न भूल सकता था कि अब झोंपड़े में दो आदमी होंगे, और बरसात काटने तक, और गंगो की गोद में नया जीव आ जाने तक, झोंपड़ा शायद सलामत खड़ा रह सकेगा.
गंगो झोंपड़े की बालिश्त-भर ऊंची छत को ताकती हुई चुपचाप लेटी रही. उसी वक्त गंगो के पेट में उसके दूसरे बच्चे ने करवट ली. जैसे संसार का नवागन्तुक संसार का द्वार खटखटाने लगा हो. और गंगो ने सोचा-यह क्यों जन्म लेने के लिए इतना बेचैन हो रहा है? गंगो का हाथ कभी पेट के चपल बच्चे को सहलाता, कभी आंखों से आंसू पोंछने लगता.
आकाश पर बरसात के बादलों से खेलती हुई चांद की किरनों के नीचे नए मकानों की बस्ती झिलमिला रही थी. दिल्ली फिर बस रही थी, और उसका प्रसार दिल्ली के बढ़ते गौरव को चार चांद लगा रहा था.